Archive for November, 2015

हर दिन पढ़ें हनुमान चालीसा, पढ़ने के यह हैं सात फायदे

ऐसी मान्यता है कि, कलियुग में एक मात्र हनुमान जी ही जीवित देवता हैं। यह अपने भक्तों और आराधकों पर सदैव कृपालु रहते हैं और उनकी हर इच्छा पूरी करते हैं।

हनुमान जी की कृपा से ही तुलसीदास जी को भगवान राम के दर्शन हुए थे। शिवाजी महाराज के गुरू समर्थ रामदास के बारे में भी कहा जाता है कि उन्हें हनुमान जी ने दर्शन दिए थे।

हनुमान जी के बारे में यह भी कहा जाता है कि जहां कहीं भी रामकथा होती है हनुमान जी वहां किसी न किसी रूप में जरूर मौजूद रहते हैं।

हनुमान जी की महिमा और भक्तहितकारी स्वभाव को देखते हुए तुलसीदास जी ने हनुमान जी को प्रसन्न करने के लिए हनुमान चालीसा लिखा है। इस चालीसा का नियमित पाठ बहुत ही सरल और आसान है, लेकिन इसके लाभ हैं चमत्कारी।

हनुमान चालीसा में कहा गया है कि हनुमान जी अष्टसिद्घि और नवनिधि के दाता कहा गया। जो व्यक्ति नियमित रूप से हनुमान चालीसा का पाठ करता है। उसकी हर मनोकामना हनुमान जी पूरी करते हैं चाहे वह धन संबंधी इच्छा ही क्यों न हो।

जब कभी भी आपको आर्थिक संकट का सामना करना पड़े मन में हनुमान जी का ध्यान करके हनुमान चालीसा का पाठ करना शुरू कर दीजिए।

कुछ ही हफ्तों में आपको समस्या का समाधान मिल जाएगा और आर्थिक चिंताएं दूर हो जाएगी। इस बात का ध्यान रखें कि पाठ किसी दिन छोड़ें नहीं। अगर यह क्रम मंगलवार से शुरू करें तो बेहतर रहेगा।

हनुमान चालीसा का एक दोहा है ‘भूत पिशाच निकट नहीं आए, महावीर जब नाम सुनावे। इस दोहे से बताया गया है कि जो व्यक्ति नियमित हनुमान चालीसा का पाठ करता है उसके आस-पास भूत-पिशाच और दूसरी नकारात्मक शक्तियां नहीं आती हैं।

हनुमान चालीसा का नियमित पाठ करने वाले व्यक्ति का मनोबल बढ़ जाता है और उसे किसी भी तरह का भय नहीं रहता है।

अगर किसी को कोई अनजाना भय डरा रहा हो तो उसे हर रात सोने से पहले हाथ पैर धोकर पवित्र मन से हनुमान चालीसा का पाठ करना शुरू कर देना चाहिए।

अगर आप सोने के लिए बिस्तर पर जाते हैं लेकिन मन बेचैन रहता है, ठीक से नींद नहीं आती है तो आप नियमित हनुमान चालीसा पाठ करना शुरू कर दीजिए।

नींद अच्छी तरह नहीं आने का एक बड़ा कारण मानसिक अशांति है। हनुमान चालीसा के पाठ से मानसिक शांति मिलती है और मन में चल रही उधेड़ बुन से मुक्ति मिलती है जिससे व्यक्ति को अच्छी नींद आती है और जीवन में उन्नति का मौका मिलता है।

हनुमान जी परम पराक्रमी और महावीर हैं इस बात का उल्लेख रामचरित मानस से लेकर हनुमान चालीसा तक में किया गया है।

इनके ध्यान से पुरूष बलवान और वीर्यवान होता है। जो लोग अक्सर बीमार रहते हैं या काफी उपचार के बाद भी जिनका रोग दूर नहीं होता उन्हें नियमित हनुमान चालीसा का पाठ करना चाहिए।

हनुमान चालीसा में लिखा भी गया है” नासै रोग हरै सब पीरा। जपत निरन्तर हनुमत बीरा।।”

आपने देखा होगा कि मंगलवार के दिन छात्र बड़ी संख्या में हनुमान जी के मंदिर में दर्शन के लिए आते हैं। इसका कारण यह है कि हनुमान जी की जिनपर कृपा होती है वह बुद्घिमान, गुणी और चातुर यानी अक्लमंद हो जाते हैं।

हनुमान जी की कृपा पाने के लिए छात्रों को नियमित हनुमान चालीसा का पाठ करना चाहिए। छात्र जीवन में चालीसा का पाठ करने से स्मरण शक्ति बढ़ती है और शिक्षा के क्षेत्र में कामयाबी मिलती है।

इसका कारण यह है कि हनुमान जी स्वयं हैं ‘विद्यावान गुनी अति चातुर। राम काज करिबे को आतुर।।’ जो इनकी भक्ति सहित हनुमान चालीसा का पाठ करता है उनमें भी हनुमान जी यह गुण भर देते हैं।

मनुष्य जीवन का परम लक्ष्य माना गया है मुक्ति यानी शरीर त्याग के बाद परमधाम में स्थान। हनुमान चालीसा में बताया गया है ‘अन्त काल रघुबर पुर जाई। जहाँ जन्म हरि–भक्त कहाई।। और देवता चित्त न धरई। हनुमत् सेई सर्व सुख करई।।

यानी जो व्यक्ति हनुमान जी का ध्यान करता है उनकी पूजा और हनुमान चालीसा का पाठ नियमित करता है उसके परम धाम जाने का मार्ग सरल हो जाता है।

।। दोहा।।
श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मन मुकुरु सुधारि।
बरनउँ रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि।।
बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन–कुमार।
बल बुद्धि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार।।

।। चौपाई।।
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। जय कपीस तिहुँ लोक उजागर।
राम दूत अतुलित बल धामा। अंजनि पुत्र पवनसुत नामा।।

महाबीर बिक्रम बजरंगी। कुमति निवार सुमति के संगी।
कंचन बरन बिराज सुबेसा। कानन कुण्डल कुंचित केसा।।

हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै। काँधे मुँज जनेऊ साजै।।
शंकर सुवन केसरी नन्दन। तेज प्रताप महा जग बन्दन।।

विद्यावान गुनी अति चातुर। राम काज करिबे को आतुर।।
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया। राम लखन सीता मन बसिया।।

सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा। विकट रूप धरि लंक जरावा।।
भीम रूप धरि असुर सँहारे। रामचन्द्र के काज सँवारे।।

लाय संजीवन लखन जियाये। श्री रघुबीर हरषि उर लाये।
रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई। तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई।।

सहस बदन तुम्हरो जस गावैं। अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं।।
सनकादिक ब्रादि मुनीसा। नारद सारद सहित अहीसा।।

जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते। कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते।।
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा। राम मिलाय राज पद दीन्हा।।

तुम्हरो मन्त्र विभीषन माना। लंकेश्वर भए सब जग जाना।।
जुग सहस्त्र जोजन पर भानू। लील्यो ताहि मधुर फल जानू।।

प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं। जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं।।
दुर्गम काज जगत के जेते। सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते।।

राम दुआरे तुम रखवारे। होत न आज्ञा बिनु पैसारे।।
सब सुख लहै तुम्हरी सरना। तुम रक्षक काहू को डर ना।।

आपन तेज सम्हारो आपै। तीनों लोक हाँक तें काँपै।।
भूत पिसाच निकट नहिं आवै। महाबीर जब नाम सुनावै।।

नासै रोग हरै सब पीरा। जपत निरन्तर हनुमत बीरा।।
संकट तें हनुमान छुड़ावै। मन क्रम बचन ध्यान जो लावै।।

सब पर राम तपस्वी राजा। तिन के काज सकल तुम साजा।।
और मनोरथ जो कोई लावै। सोइ अमित जीवन फल पावै।।

चारों जुग परताप तुम्हारा।। है परसिद्ध जगत उजियारा।।
साधु सन्त के तुम रखवारे। असुर निकंदन राम दुलारे।।

अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता। अस बर दीन जानकी माता।।
राम रसायन तुम्हरे पासा। सदा रहो रघुपति के दासा।।

तुम्हरे भजन राम को पावै। जनम जनम के दु:ख बिसरावै।।
अन्त काल रघुबर पुर जाई। जहाँ जन्म हरि–भक्त कहाई।।

और देवता चित्त न धरई। हनुमत् सेई सर्व सुख करई।।
संकट कटै मिटे सब पीरा। जो सुमिरै हनुमत बलबीरा।।

जय जय जय हनुमान गौसाईं। वृपा करहु गुरुदेव की नाईं।
जो त बार पाठ कर कोई। छुटहि बंदि महासुख होई।

जो यह पढ़ै हनुमान् चालीसा। होय सिद्धि साखी गौरीसा।।
तुलसीदास सदा हरि चेरा। कीजै नाथ हृदय महँ डेरा।।

।।। दोहा।।
पवनतनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप।।

 

 

Be the first to comment - What do you think?  Posted by admin - November 21, 2015 at 7:11 am

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जब देवी सीता से मन ही मन जले हनुमान क‌िया अजब सा काम

हनुमान जी देवी भगवान राम के परम भक्त माने जाते हैं। भगवान राम भी हनुमान जी को अपने भाई के समान ही मानते हैं। हनुमान चालीसा में राम जी कहते भी हैं क‌ि हे हनुमान ‘तुम मम प्रिय भरतहिं सम भाई’ यानी तुम मुझे अपने छोटे भाई भरत के समान ही प्र‌िय हो।

लेक‌िन हनुमान जी के मन में तो कुछ और ही था वह राम जी के इतना कहने भर से प्रसन्न नहीं थे। हनुमान जी के मन की यह बात भगवान राम भी नहीं जान पाए थे। पर‌िणाम यह हुआ क‌ि जब देवी सीता लंका से अयोध्या लौटी तो हनुमान जी कुछ परेशान रहने लगे।

ज‌िस देवी सीता को हनुमान जी माता कहते थे। वही देवी सीता अब उन्हें अपने रास्ते की बाधा नजर आने लगी और हनुमान जी देवी सीता से जलने लगे।

स्‍थ‌ित‌ि अब यहां तक पहुंच गयी थी क‌ि हनुमान जी हर समय देवी सीता पर नजर रखने लगे। हनुमान जी के मन को बार-बार एक सवाल परेशान करने लगा क‌ि आख‌िर देवी सीता क्या करती हैं ज‌िससे भगवान राम उन्हें सबसे अध‌िक स्नेह करते हैं।

कई द‌िनों तक जब हनुमान जी इस सवाल में उलझे रहे तो उन्हें समझ आया क‌ि देवी सीता एक लाल रंग की चीज अपने माथे में लगती हैं। हनुमान जी ने सोचा इसी लाल वस्तु के कारण भगवान राम देवी सीता से अध‌िक स्नेह करते हैं।

हनुमान जी ने अपनी उत्सुकता को प्रकट करते हुए देवी सीता से पूछ ही ल‌िया क‌ि माता यह कौन सी चीज है ज‌िसे आप माथे में लगाती हैं। देवी सीता ने हनुमान जी को बताया क‌ि यह स‌िंदूर है ज‌‌िसे लगाने से भगवान राम मुझे स्नेह करते हैं।

देवी सीता का उत्तर सुनकर हनुमान जी को लगा क‌ि अब उनकी परेशानी का समाधान म‌िल गया है। फ‌िर क्या था हनुमान जी मौके की ताक में रहने लगे। एक द‌िन जब देवी सीता श्रृंगार करके अपने कक्ष से न‌िकली तो हुनमान जी ने अपने पूरे शरीर पर स‌िंदूर लगा ल‌िया।

इसके बाद हनुमान जी उछलते कूदते राम जी के पास पहुंच गए। राम जी उस समय सभा में बैठे थे और सभासदों से व‌िचार व‌िमर्श कर रहे थे। राम जी ने जब हनुमान जी को पूरे शरीर पर स‌िंदूर लगाए देखा तो हैरान रह गए।

राम जी ने हनुमान जी से पूछा क‌ि हनुमान यह सब क्या है, तुमने अपने पूरे शरीर पर स‌िंदूर क्यों लगाया है। राम जी के प्रश्नों का उत्तर देते हुए हनुमान जी ने क‌हा क‌ि प्रभु माता सीता केवल मांग में स‌िंदूर लगाती हैं तब आप उन्हें इतना स्नेह करते हैं। इसल‌िए मैंने सोचा क‌ि पूरे शरीर पर ही स‌िंदूर लगा लेता हूं ताक‌ि आप मुझे सबसे अध‌िक स्नेह करें।

हनुमान जी की इन प्रेमपूर्ण बातों को सुनकर भगवान राम भाव व‌िभोर हो गए और अपने आसान से उठकर हनुमान जी को गले लगा ल‌िया। इस घटना के बाद से ही कुंवारे हनुमान जी को स‌िंदूर चढ़ाने का न‌ियम बन गया। मान्यता है क‌ि स‌िंदूर अर्प‌ित करने वाले भक्तों पर हनुमान जी बड़े प्रसन्न होते हैं।

Be the first to comment - What do you think?  Posted by admin - November 20, 2015 at 1:46 pm

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देवी के दुर्गा नाम का क्या है महत्व जानते हैं?

हम सब एक अदृश्य जगमगाती ब्रह्मांडीय शक्ति के ओज में तैर रहे हैं जिसे ‘देवी‘ कहा गया है। देवी या देवी माँ इस सम्पूर्ण सृष्टि का गर्भ स्थान है। वह गतिशीलता, ओज, सुंदरता, धैर्य, शांति और पोषण की बीज हैं। वह जीवन ऊर्जा शक्ति हैं। एक मां को अपने बच्चे के लिये पूरा प्रेम होता है। देवी मां को भी अपने बच्चों के लिये हर हाल में असीम प्रेम है जिसमें इस सम्पूर्ण जगत के सभी जीव शामिल हैं।

नवरात्रि के नौ रातों में देवी के सभी नाम रुपों की आराधना की जाती है। नामों का अपना एक महत्व होता है। हम चंदन के वृक्ष को उसके सुगंध की स्मृति द्वारा याद करते हैं। देवी का हरेक नाम और रुप दिव्य शक्ति के एक विलक्षण गुण या स्वरुप का प्रतीक है। हम उस रूप को याद करके या देवी के उन नामों का उच्चारण करके हम उन दिव्य गुणों को अपनी चेतना में जगाते हैं जो कि आवश्यकता पड़ने पर हमारे अंदर प्रकट हो जाते हैं।

नाम रूप वाले बाहरी स्थूल जगत से ऊर्जा के सूक्ष्म जगत की ओर की यात्रा ही नवरात्रि है, जिसका आह्वान विभिन्न यज्ञों द्वारा किया जाता है और जो कि हमें अन्तःकरण की गहराईयों में ले जाकर आत्मसाक्षात्कार कराती है। पहले तीन दिनों तक देवी के दुर्गा स्वरुप की आराधना करते है। दुर्गा का एक अर्थ पहाड़ी होता है। बहुत कठिन कार्य के लिये प्रायः दुर्गम कार्य कहा जाता है।

दुर्गा की उपस्थिति में नकारात्मक तत्व कमजोर पड़तें हैं। दुर्गा को ‘‘जय दुर्गा‘‘भी कहते हैं या जो विजेता बनाती है। वे दुर्गति परिहारिणी हैं – वे जो विघ्नों को हरण कर लेती हैं। वे नकारात्मकता को सकारात्मकता में परिवर्तित करती है। कठिनाइयों को भी उनके समक्ष खड़े होने में कठिनता अनुभव होती है।

देवी को शेर या चीते पर सवारी करते हुये दिखाया गया है, जो कि साहस और वीरता का प्रतीक है – यही दुर्गा देवी का मूल सार है। नवदुर्गा दुर्गा शक्ति के नौ स्वरूप हैं जो कि नकारात्मकता के प्रति एक ढाल का काम करती हैं। जब आपके सामने कोई बाधा हो या कोई मानसिक रुकावट तो उनके ये गुण याद करने से उन रुकावटों को दूर कर सकते हैं।

विशेषकर जब मनुष्य चिंता, आत्मसंशय या स्वयं की योग्यता पर शंका, अभाव की भावना, शत्रु का भय और नकारात्मकता से भरा हो तो देवी के इन नामों का उच्चारण करना चाहिये, इन मंत्रों से हमारी चेतना का उत्थान होता है और हम अधिक केंद्रित, साहसी और अविचलित होने लगते हैं। देवी के दुर्गा स्वरूप का यही महत्व है।

Be the first to comment - What do you think?  Posted by admin - at 1:44 pm

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इन रोमांटिक देवी-देवताओं की अद्भुत प्रेम कहानी हैरान करती है

भारतीय पौराणिक कथाओं की तरह दूसरे देशों की भी कुछ पौराणिक कथाएं और मान्यताएं हैं। भारत में जिस तरह रति और कामदेव को प्रेम के देवता कहा जाता है। और इनके विषय में यह कहा जाता है कि यह लोगों के मन में प्रेम और काम भाव उत्पन्न करते हैं। उसी प्रकार यूनान की पौराणिक कथाओं और मान्यताओं में कुछ ऐसे देवी देवताओं का जिक्र किया गया है जिनका प्रेम संबंध और रिश्ता बड़ा ही अनोखा और हैरान करने वाला है। आइये यूनान के उन सात देवी देवताओं के बारे में जानें जो यूनान में बहुत ही रोमांटिक माने जाते हैं और इनके प्रेम संबंध लोगों को चकित करते हैं।

यूनान की पौराणिक कथाओं में ओसिएनस देवता और टेथिस देवी की बड़ी मान्यता है। ओसिएनस समुद्र के देवता माने जाते हैं और टेथिस नदियों की देवी कहलाती हैं। यह दोनों देवी देवता आपस में भाई बहन और पति पत्नी भी थे। इनके माता पिता थे आवरेनस (आकाश) और गिया (धरती)। पति पत्नी के तौर पर इन दोनों ने तीन हजार देवियों को जन्म दिया जो ओसिनाड्स कहलाते हैं। इनकी संतानों में कई प्रमुख नदियां भी मानी जाती हैं जिनमें नील नदी भी शामिल है।

यूनान के रोमांटिक देवताओं में प्रमुखता से जिउस का नाम लिया जाता है। इनके बारे में कहा जाता है कि इनके संबंध नौ देवियों से रहे जिनसे इनके 21 बच्चे हुए। यूनानी मान्यता के अनुसार यह ओलंपस पर्वत पर रहते थे और पूरे ओलंपिया पर राज करते थे। ओलंपस पर्वत पर जिउस का मंदिर भी है जहां से पहली बार सूर्य की किरणों से ओलंपिक की मशाल जलाई गयी थी।

यूनान की पौराणिक कथाओं में निमोसिन देवी का जिक्र आता है यह स्मृति यानी यादद्श्त की देवी मानी जाती हैं। जिउस जो बहुत ही रोमांटिक देवता था उनके साथ इनका कुछ समय लिए रिश्ता बना। माना जाता है कि एक बार नौ दिन और नौ रात जिउस और नमोसिन एक साथ रहे। इनके संबंध से नौ कला की देवियों का जन्म हुआ।

टेथिस और ओसिएनस की तीन हजार बेटियों में से प्लाओनी और एथरा का नाम भी शामिल है। इन दोनों से यूनान देवता एटलस ने विवाह किया। प्लाओनी से एटलस की सात बेटियां हुई। एथरा से भी एटलस के कई संतान थी। एटलस की एक अन्य पत्नी फोइबी भी मानी जाती हैं। फेइबी एटलस की बहन भी मानी जाती है। फेइबी के बारे में कहा जाता है कि इनकी शादी कोइअस के साथ भी हुआ माना जाता है। कोइअस फेइबी का भाई था जिससे इनकी दो संतान हुई थी।

यूरेनस की हत्या करने वाला उसका ही पुत्र क्रोनस था जिसने अपनी बहन रेह के साथ मिलकर छह बच्चों को जन्म दिया। क्रोनस एक दैत्य था जो अपने बच्चों को निगल जाता था। इससे परेशान होकर एक दिन रेह ने अपने सबसे छोटे बेटे जिउस को पिता को मारने के लिए भेजा। जिउस ने अपने पिता क्रोनस को जहर दे दिया। क्रोनस ने जब अपने पिता यूरेनस की हत्या की थी उसी समय उसे पिता का शाप मिला था कि अपने ही बेटे के हाथों तुम्हारी मृत्यु होगी जो सच साबित हुई।

यूनान के चौथे रोमांटिक देवता के रूप में यूरेनस का नाम लिया जाता है जिन्होंने अपनी मा गिया यानी धरती के साथ मिलकर 12 बच्चों को जन्म दिया। यह सभी बच्चे दैत्य थे। इनकी पहली संतान के 50 सिर और 100 हाथ थे। यूरेनस के ही एक पुत्र क्रोनस ने इनकी हत्या कर दी थी।

ऐरेबस देवता को अंधकार का अवतार और प्रतीक माना जाता है। इनकी पत्नी है निक्स जो आपस में भाई बहन भी माने जाते हैं। ऐरेबस और निक्स के 14 बच्चे हुए जिनमें हिप्नोस यानी नींद के देवता और ईरिस कलह की देवी प्रमुख हैं। ऐरेबस की पत्नी को रात की देवी माना जाता है क्योंकि यह रात लेकर आती है।

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किसके इंतजार में कुंवारी बैठी हैं माता वैष्णो देवी

 

जम्मू के त्रिकूट पर्वत पर एक भव्य गुफा है। इस गुफा में प्राकृतिक रूप से तीन पिण्डी बनी हुई। यह पिण्डी देवी सरस्वती, लक्ष्मी और काली की है। भक्तों को इन्ही पिण्डियों के दर्शन होते हैं। लेकिन माता वैष्णो की यहां कोई पिण्डी नहीं है। माता वैष्णो यहां अदृश रूप में मौजूद हैं फिर भी यह स्थान वैष्णो देवी तीर्थ कहलता है। इसका कारण यह है कि माता यहां अदृश्य रूप में उस वचन के पूरा होने का इंतजार कर रही हैं जो भगवान श्री राम ने लंका से लौटते समय देवी त्रिकूटा को दिया था।

इस संदर्भ में कथा है कि धर्म की रक्षा के लिए भगवान विष्णु के अंश से एक कन्या का जन्म दक्षिण भारत में रामेश्वरम तट पर पण्डित रत्नाकर के घर हुआ था। 9 वर्ष की उम्र में जब इन्हें पता चला कि भगवान विष्णु ने राम के रूप में अवतार लिया तब देवी त्रिकूटा ने राम को पति रूप में पाने के लिए तपस्या शुरू कर दी। सीता हरण के बाद भगवान राम जब सीता को ढूंढते हुए रामेश्वरम तट पर पहुंचे। यहां राम और त्रिकूटा की पहली मुलाकात हुई। देवी त्रिकूटा ने राम को पति रूप में प्राप्त करने की इच्छा प्रकट की।

भगवान राम ने देवी त्रिकूटा से कहा कि मैंने इस अवतार में एक पत्नी व्रत रहने का वचन लिया है। मेरा विवाह सीता से हो चुका है इसलिए मैं आपसे विवाह नहीं कर सकता है। देवी त्रिकूटा ने जब बहुत अनुनय विनय किया तब श्री राम ने कहा कि लंका से लौटते समय मैं आपके पास आऊंगा अगर आप मुझे पहचान लेंगी तो मैं आपसे विवाह कर लूंगा।

श्री राम ने अपने वचन का पालन किया और लंका से लौटते समय देवी त्रिकूटा के पास आए लेकिन भगवान राम की माया के कारण देवी त्रिकूटा उन्हें पहचान नहीं सकी। त्रिकूटा के दुःख को दूर करने के लिए श्री राम ने कहा कि देवी आप त्रिकूट पर्वत पर एक दिव्य गुफा है उस गुफा में तीनों महाशक्तियां महासरस्वती, महालक्ष्मी और महाकाली पिण्डी रूप में विराजमान हैं।

आप उसी गुफा में जाकर मेरी प्रतिक्षा कीजिए। कलयुग में जब मेरा अवतार होगा तब मैं आकर आपसे विवाह करुंगा। तब तक महावीर हनुमान आपकी सेवा में रहेंगे और धर्म की रक्षा में आपकी सहायता करेंगे। धर्म का पालन करने वाले भक्तों की आप मनोकामना पूरी कीजिए। भगवान राम के आदेश के अनुसार आज भी वैष्णो माता उनकी प्रतिक्षा कर रही हैं और अपने दरबार में आने वाले भक्त के दुःख दूर कर उनकी झोली भर रही हैं।

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नवरात्र में कौन सी सब्जियां खा सकते हैं aur kanyao ko bhojan

नवरात्र में कौन सी सब्जियां खा सकते हैं

नवरात्र में फलाहार या सात्विक आहार लिए जाने का विधान है। इन दिनों प्याज, लहसुन, टमाटर, हरी मटर, मांसाहार जैसे तामसिक आहार के सेवन से बचना चाहिए।

आहार में कुट्टू, सिंघाड़े का आटा, समा के चावल, फल, गौ दुग्ध, दही, घी, आम, अनार, नारंगी, कदली फल, शाक, सूखे मेवे के व्यंजन आदि लिए जा सकते हैं।

उद्यापन के समय सूजी का हलवा और काले चने के साथ-साथ पूरी, सब्जी, खीर आदि का प्रसाद लगाया जा सकता है।

नवरात्र में कितनी कन्याओं को भोजन करना चाहिए

नवरात्र में कुमारी कन्याओं के पूजन को सर्वोत्तम माना गया है। देवी पुराण के अनुसार होम, दान व जप के साथ कुमारी पूजन से देवी शीघ्र प्रसन्न होती हैं। स्कन्द पुराण में कहा गया है, नवरात्र में या तो प्रतिदिन एक-एक कन्या का पूजन करें या फिर दो-तीन गुनी कन्याओं को भोजन कराएं।

उनके पांव धोकर स्वच्छ भूमि पर आसन बिछाकर गंध, पुष्पमाला से पूजन करके कन्याओं को भोजन कराने से देवी की कृपा होती है। देवी के उद्यापन के लिए अपनी श्रद्धा और आर्थिक स्थिति के अनुसार ही कन्याओं को बुलाना चाहिए।

यह संख्या एक, दो, पांच, सात, नौ, ग्यारह या इससे अधिक हो सकती है। कन्याएं कितनी भी हों, उनको पूर्ण सम्मान और श्रद्धा भाव से भोजन कराना चहिए।

 

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नवरात्र में रामचरित मानस पाठ का क्या महत्व है? RamcharitManas Path

नवरात्र आदिशक्ति को जागृत करने का प्रमुख पर्व है। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम ने लंका पर विजय प्राप्त करने से पूर्व माता भगवती और भगवान शिव की आराधना की थी। इसलिए इन दिनों तुलसीदास द्वारा रचित रामचरितमानस का पाठ किया जाता है।

कहते हैं जिस घर में पूर्ण श्रद्धा भाव से रामचरितमानस का अखंड पाठ होता है, वहां श्री राम के अनन्य भक्त पवनपुत्र हनुमानजी स्वयं मौजूद रहते हैं और प्रभु श्रीराम तथा माता भगवती का आशीर्वाद अपने माध्यम से समस्त भक्तों तक पहुंचाते हैं।

रामचरितमानस का पाठ पूर्ण होने पर पारायण किया जाता है। इसके लिए विधि-विधान से रामायण की आरती, श्रीरामजी की वंदना, हनुमानजी की आरती के बाद गरीबों को श्रद्धानुसार भोजन कराकर दान देने का विधान है।

रामचरितमानस का पाठ करने वाले विद्वान मनीषी को भोजन कराकर नए वस्त्र, धन, अन्न, फल आदि का दान दें। पाठ का श्रवण करने वाले श्रद्धालुओं को बूंदी का प्रसाद वितरित किया जाता है।

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दुर्गा सप्तशती पाठ विधि Durga Saptashati path in hindi

 

दुर्गा सप्तशती का विधिपूर्वक किया गया पाठ जीवन में अन्न, धन, वस्त्र, यश, शौर्य, शांति और मनवांछित फल प्रदान करता है। विशेषकर, नवरात्र में पहले दिन कलश स्थापना के बाद दुर्गा सप्तशती के तेरह अध्यायों का पाठ करने का विधान है। रहस्याध्याय के अनुसार, जिस मनुष्य को एक दिन में पूरे पाठ करने का अवसर न मिले, तो वह एक दिन केवल मध्यम चरित्र का तथा दूसरे दिन शेष दो चरित्रों का पाठ कर सकता है।

प्रतिदिन पाठ करने वाले मनुष्य एक दिन में पूरा पाठ न कर पाएं, तो वे एक, दो, एक, चार, दो, एक और दो अध्यायों के क्रम से सात दिनों में पाठ पूरा कर सकते हैं। संपूर्ण दुर्गासप्तशती का पाठ न करने वाले मनुष्य देवी कवच, अर्गलास्तोत्र, कीलकम का पाठ करके देवी सूक्तम पढ़ सकते हैं।

लेकिन नवरात्र में दुर्गा कवच प्रत्येक देवी भक्त को पढ़ना चाहिए। समय का अभाव हो, तो केवल सूक्तम से भी भगवती की आराधना करके उन्हें प्रसन्न किया जा सकता है। देवी सूक्तम से पहले अगर सातवां अध्याय पढ़ लिया जाए, तो अधिक लाभकारी रहता है।

 
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How to make an underwater rangoli

In Indian tradition, a rangoli is said to symbolise good luck, so drawing it at the entrance of your home and pooja spot is considered auspicious. The word rangoli is a hybrid of the words rang (colour) and Holi (celebration), so essentially, they are a celebration of colours that embellish the floor during festivals. Rather than use synthetic colours again this Diwali, enthusiasts in the city are trying their hand at creative versions like floating and underwater rangolis. Here’s how to achieve these styles.

alpana pookalam kolam rangoli

alpana pookalam kolam rangoli

color for rangoli

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How to make a floating rangoli

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how to make an underwater rangoli

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Be the first to comment - What do you think?  Posted by admin - November 2, 2015 at 7:17 am

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Shri Shiv Chalisa in Hindi

श्री शिव चालीसा (Shri Shiv Chalisa in Hindi)

।।दोहा।।

श्री गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान।
कहत अयोध्यादास तुम, देहु अभय वरदान॥

जय गिरिजा पति दीन दयाला। सदा करत सन्तन प्रतिपाला॥
भाल चन्द्रमा सोहत नीके। कानन कुण्डल नागफनी के॥
अंग गौर शिर गंग बहाये। मुण्डमाल तन छार लगाये॥
वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे। छवि को देख नाग मुनि मोहे॥1॥

मैना मातु की ह्वै दुलारी। बाम अंग सोहत छवि न्यारी॥
कर त्रिशूल सोहत छवि भारी। करत सदा शत्रुन क्षयकारी॥
नन्दि गणेश सोहै तहँ कैसे। सागर मध्य कमल हैं जैसे॥
कार्तिक श्याम और गणराऊ। या छवि को कहि जात न काऊ॥2॥

देवन जबहीं जाय पुकारा। तब ही दुख प्रभु आप निवारा॥
किया उपद्रव तारक भारी। देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी॥
तुरत षडानन आप पठायउ। लवनिमेष महँ मारि गिरायउ॥
आप जलंधर असुर संहारा। सुयश तुम्हार विदित संसारा॥3॥

त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई। सबहिं कृपा कर लीन बचाई॥
किया तपहिं भागीरथ भारी। पुरब प्रतिज्ञा तसु पुरारी॥
दानिन महं तुम सम कोउ नाहीं। सेवक स्तुति करत सदाहीं॥
वेद नाम महिमा तव गाई। अकथ अनादि भेद नहिं पाई॥4॥

प्रगट उदधि मंथन में ज्वाला। जरे सुरासुर भये विहाला॥
कीन्ह दया तहँ करी सहाई। नीलकण्ठ तब नाम कहाई॥
पूजन रामचंद्र जब कीन्हा। जीत के लंक विभीषण दीन्हा॥
सहस कमल में हो रहे धारी। कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी॥5॥

एक कमल प्रभु राखेउ जोई। कमल नयन पूजन चहं सोई॥
कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर। भये प्रसन्न दिए इच्छित वर॥
जय जय जय अनंत अविनाशी। करत कृपा सब के घटवासी॥
दुष्ट सकल नित मोहि सतावै । भ्रमत रहे मोहि चैन न आवै॥6॥

त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो। यहि अवसर मोहि आन उबारो॥
लै त्रिशूल शत्रुन को मारो। संकट से मोहि आन उबारो॥
मातु पिता भ्राता सब कोई। संकट में पूछत नहिं कोई॥
स्वामी एक है आस तुम्हारी। आय हरहु अब संकट भारी॥7॥

धन निर्धन को देत सदाहीं। जो कोई जांचे वो फल पाहीं॥
अस्तुति केहि विधि करौं तुम्हारी। क्षमहु नाथ अब चूक हमारी॥
शंकर हो संकट के नाशन। मंगल कारण विघ्न विनाशन॥
योगी यति मुनि ध्यान लगावैं। नारद शारद शीश नवावैं॥8॥

नमो नमो जय नमो शिवाय। सुर ब्रह्मादिक पार न पाय॥
जो यह पाठ करे मन लाई। ता पार होत है शम्भु सहाई॥
ॠनिया जो कोई हो अधिकारी। पाठ करे सो पावन हारी॥
पुत्र हीन कर इच्छा कोई। निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई॥9॥

पण्डित त्रयोदशी को लावे। ध्यान पूर्वक होम करावे ॥
त्रयोदशी ब्रत करे हमेशा। तन नहीं ताके रहे कलेशा॥
धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे। शंकर सम्मुख पाठ सुनावे॥
जन्म जन्म के पाप नसावे। अन्तवास शिवपुर में पावे॥10॥

कहे अयोध्या आस तुम्हारी। जानि सकल दुःख हरहु हमारी॥

॥दोहा॥

नित्त नेम कर प्रातः ही, पाठ करौं चालीसा।
तुम मेरी मनोकामना, पूर्ण करो जगदीश॥
मगसर छठि हेमन्त ॠतु, संवत चौसठ जान।
अस्तुति चालीसा शिवहि, पूर्ण कीन कल्याण॥
Shri Shiva Chalisa with English Translation

Jai Ganesh Girija Suvan Mangal Mul Sujan Kahat Ayodhya Das Tum Dev Abhaya Varadan
Glory to Lord Ganesh, the Divine Son of Goddess Girija, the cause of all auspiciousness and intelligence. Ayodha Dass (the composer of these verses) humbly requests that every one be blessed with the boon of being fearless.

Jai Girija Pati Dinadayala Sada Karat Santan Pratipala Bhala Chandrama Sohat Nike Kanan Kundal Nagaphani Ke
O Glorious Lord, consort of Parvati You are most merciful . You always bless the poor and pious devotees. Your beautiful form is adorned with the moon on Your forehead and on your ears are earrings of snakes’ hood.

Anga Gaur Shira Ganga Bahaye Mundamala Tan Chhara Lagaye Vastra Khala Baghambar Sohain Chhavi Ko Dekha Naga Muni Mohain
The holy Ganges flows from your matted hair. The saints and sages are attracted by Your splendid appearance. Around Your neck is a garland of skulls. White ash beautifies Your Divine form and clothing of lion’s skin adorns Your body.

Maina Matu Ki Havai Dulari Vama Anga Sohat Chhavi Nyari Kara Trishul Sohat Chhavi Bhari Karat Sada Shatrun Chhayakari
O Lord, the beloved daughter of Maina on Your left adds to Your splendid appearance. O Wearer of the lion’s skin, the trishul in Your hand destroys all enemies.

Nandi Ganesh Sohain Tahan Kaise Sagar Madhya Kamal Hain Jaise Kartik Shyam Aur Ganara-U Ya Chhavi Ko Kahi Jata Na Ka-U
Nandi and Shri Ganesh along with Lord Shiva appear as beautiful as two lotuses in the middle of an ocean.Poets and philosophers cannot describe the wonderful appearance of Lord Kartikeya and the dark complexioned Ganas (attendants).

Devan Jabahi Jaya Pukara Tabahi Dukha Prabhu Apa Nivara Kiya Upadrav Tarak Bhari Devan Sab Mili Tumahi Juhari
O Lord, whenever the Deities humbly sought Your assistance, You kindly and graciously uprooted all their problems. You blessed the Deities with Your generous help when the demon Tarak outraged them and You destroyed him.

Turata Shadanana Apa Pathayau Lava-Ni-Mesh Mahan Mari Girayau Apa Jalandhara Asura Sanhara Suyash Tumhara Vidit Sansara
O Lord, You sent Shadanan without delay and thus destroyed the evil ones Lava and Nimesh. You also destroyed the demon Jalandhara. Your renown is known throughout the world.

Tripurasur Sana Yudha Macha-I Sabhi Kripakar Lina Bacha-I Kiya Tapahin Bhagiratha Bhari Purva Pratigya Tasu Purari
O Lord, Purari, You saved all Deities and mankind by defeating and destroying the demons Tripurasura. You blessed Your devotee Bhagirath and he was able to accomplish his vow after rigorous penance.

Danin Mahan Tum Sama Kou Nahin Sevak Astuti Karat Sadahin Veda Nam Mahima Tab Ga-I Akatha Anandi Bhed Nahin Pa-I
O Gracious One, devotees always sing Your glory. Even the Vedas are unable to describe Your greatness. No one is as generous as You.

Pragate Udadhi Mantan Men Jvala Jarat Sura-Sur Bhaye Vihala Kinha Daya Tahan Kari Sara-I Nilakantha Tab Nam Kaha-I
Lord, when the ocean was churned and the deadly poison emerged, out of Your deep compassion for all, You drank the poison and saved the world from destruction. Your throat became blue, thus You are known as Nilakantha.

Pujan Ramchandra Jab Kinha Jiti Ke Lanka Vibhishan Dinhi Sahas Kamal Men Ho Rahe Dhari Kinha Pariksha Tabahin Purari
When Lord Rama worshipped You, He became victorious over the king of demons, Ravan. When Lord Rama wished to worship Thee with one thousand lotus flowers, the Divine Mother, to test the devotion of ShriRam, hid all the flowers at Your request.

Ek Kamal Prabhu Rakheu Joi Kushal-Nain Pujan Chaha Soi Kathin Bhakti Dekhi Prabhu Shankar Bhaye Prasanna Diye-Ichchhit Var
O Lord, You kept on looking at Shri Ram, who wished to offer His lotus-like eyes to worship Thee. When You observed such intense devotion, You were delighted and blessed Him. You granted His heart’s desire.

Jai Jai Jai Anant Avinashi Karat Kripa Sabake Ghat Vasi Dushta Sakal Nit Mohin Satavai Bhramat Rahe Mohin Chain Na Avai
Glory be unto You O Gracious, Infinite, Immortal, All-pervading Lord. Evil thoughts torture me and I keep on travelling aimlessly in this world of mundane existence. No relief seems to be coming my way.

Trahi-Trahi Main Nath Pukaro Yahi Avasar Mohi Ana Ubaro Lai Trishul Shatrun Ko Maro Sankat Se Mohin Ana Ubaro
O Lord! I beseech Your help and seel your divine blessing at this very moment. Save and protect me. Destroy my enemies with Your Trishul. Release me from the torture of evil thoughts.

Mata Pita Bhrata Sab Hoi Sankat Men Puchhat Nahin Koi Svami Ek Hai Asha Tumhari Ava Harahu Aba Sankat Bhari
O Lord, when I am in distress, neither my parents, brothers, sisters nor loved ones can relieve my suffering. I depend only on You. You are my hpe. Eliminate the cause of this tremendous torture and bless me with Your compassion.

Dhan Nirdhan Ko Deta Sadahin Jo Koi Janche So Phal Pahin Astuti Kehi Vidhi Karai Tumhari Kshamahu Nath Aba Chuka Hamari
O Lord, You bless the down-trodden with prosperity and grant wisdom to the ignorant. Lord, due to my limited knowledge, I omitted to worship Thee. Please forgive me and shower Your grace upon me.

Shankar Ho Sankat Ke Nishan Vighna Vinashan Mangal Karan
O Lord Sankar, You are the destroyer of all miseries. You remove the cause

Yogi Yati Muni Dhyan Lagavan Sharad Narad Shisha Navavain
of all obstacles and grant Your devotees eternal bliss. The saints ans sages meditate upon Thy most beautiful form. Even celestial beings like Sharad and Narad bow in reverence to You.

Namo Namo Jai Namah Shivaya Sura Brahmadik Par Na Paya Jo Yah Patha Karai Man Lai Tapar Hota Hai Shambhu Saha-I
O Lord, prostrations to You. Even Brahma is unable to describe Thy greatness. Whosoever recites these verses with faith and devotion receives Your infinite blessings.

Riniyan Jo Koi Ho Adhikari Patha Karai So Pavan Hari Putra-hin Ichchha Kar Koi Nischaya Shiva Prasad Tehin Hoi
Devotees who chant these verses with intense love become prosperous by the grace of Lord Shiva. Even the childless wishing to have children, have their desires fulfilled after partaking of Shiva-prasad with faith and devotion.

Pandit Trayodashi Ko Lavai Dhyan-Purvak Homa Karavai Trayodashi Vrat Kare Hamesha Tan Nahin Take Rahe Kalesha
On Trayodashi (13th day of the dark and bright fortnights) one should invite a pandit and devotely make offerings to Lord Shiva. Those who fast and pray to Lord Shiva on Trayodashi are always healthy and prosperous.

Dhupa Dipa Naivedya Charhavai Anta Vasa Shivapur Men Pavai Kahai Ayodhya Asha Tumhari Jani Sakal Dukha Harahu Hamari
Whosoever offers incense, prasad and performs arti to Lord Shiva, with love and devotion, enjoys material happiness and spiritual bliss in this world and hereafter ascends to the abode of Lord Shiva. The poet prays that Lord Shiva removed the suffering of all and grants them eternal bliss.

Nitya Nema kari Pratahi Patha karau Chalis
O Universal Lord, every morning as a rule I recite this Chalisa with

Tum Meri Man Kamana Purna Karahu Jagadish
devotion. Please bless me so that I may be able to accomplish my material and spiritual desires.

ll Doha ll
Nit Nem Kar Praatha Hee ,Paath Karo Chaalis l Tum Meri Manokaamna, Puran Karo Jagdeesh ll
Magsar Chhati Hemant Ritu, Sanvat Chausadh Jaan l Astuti Chaalisa Shivhi, Puran Keen Kalyaan ll

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Be the first to comment - What do you think?  Posted by admin - November 1, 2015 at 5:56 pm

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