Archive for March, 2016

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Be the first to comment - What do you think?  Posted by admin - March 29, 2016 at 6:12 pm

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Kamdhenu Cow story in Hindi

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गाय

हिन्दू धर्म में हमेशा से ही ‘गाय’ को एक पवित्र पशु माना गया है, ना केवल एक जीव, वरन् हिन्दू मान्यताओं ने गाय को ‘मां’ की उपाधि दी है। गाय को मनुष्य का पालनहार माना गया और इससे मिलने वाले दूध को अमृत के समान माना जाता है। लेकिन यह मान्यता कुछ महीनों, वर्षों या दशकों की नहीं….

पूजनीय पशु

युगों से ही गाय को पूजनीय माना गया है। यदि आप हिन्दू धर्म को समझते हैं या फिर हिन्दू मान्यताओं की जानकारी रखते हैं तो शायद आपने कामधेनु गाय के बारे में भी सुना होगा। हिन्दू धर्म के अनेक धार्मिक ग्रंथों में कामधेनु गाय का जिक्र किया गया है। कहते हैं कामधेनु गाय में दैवीय शक्तियां थीं, जिसके बल पर वह अपने भक्तों की हर मनोकामना पूरी करती थी।

 

कामधेनु

यह गाय जिसके भी पास होती थी उसे हर तरह से चमत्कारिक लाभ होता था। लेकिन इस गाय के दर्शन मात्र से भी मनुष्य के हर कार्य सफल हो जाते थे। दैवीय शक्तियां प्राप्त कर चुकी कामधेनु गाय का दूध भी अमृत एवं चमत्कारी शक्तियों से भरपूर माना जाता था।

पौराणिक कथा

एक पौराणिक कथा के अनुसार समुद्र मंथन के समय देवता और दैत्यों को समुद्र में से कई वस्तुएं प्राप्त हुईं। जैसे कि मूल्यवान रत्न, अप्सराएं, शंख, पवित्र वृक्ष, चंद्रमा, पवित्र अमृत, कुछ अन्य देवी-देवता और हलाहल नामक अत्यंत घातक विष भी। इसी समुद्र मंथन के दौरान क्षीर सागर में से कामधेनु गाय की उत्पत्ति भी हुई थी।

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समुद्र मंथन

पुराणों में कामधेनु गाय को नंदा, सुनंदा, सुरभी, सुशीला और सुमन भी कहा गया है। कामधेनु गाय से संबंधित पुराणों में कई सारी कथाएं प्रचलित हैं… कृष्ण कथा में अंकित सभी पात्र किसी न किसी कारणवश शापग्रस्त होकर जन्में थे। कश्यप ने वरुण से कामधेनु मांगी थी, लेकिन बाद में लौटाई नहीं। अत: वरुण के शाप से वे ग्वाले हुए।

भगवान परशुराम

कामधेनु गाय से संबंधित एक और कथा विष्णु के मानवरूपी अवतार भगवान परशुराम से जुड़ी है जिसके अनुसार एक बार सहस्त्रार्जुन अपनी पूरी सेना के साथ जंगलों को पार करता हुआ जमदग्नि ऋषि (भगवान परशुराम के पिता) के आश्रम में विश्राम करने के लिए पहुंचा।

जमदग्नि ऋषि

महर्षि ने राजा को अपने आश्रम का मेहमान समझकर स्वागत सत्कार किया और उन्हें आसरा दिया। उन्होंने सहस्त्रार्जुन की सेवा में किसी भी प्रकार की कोई कसर नहीं छोड़ी। यह तब की बात है जब ऋषि जमदग्रि के पास देवराज इन्द्र से प्राप्त दिव्य गुणों वाली कामधेनु नामक अद्भुत गाय थी।

दैवीय गुणों वाली कामधेनु

राजा नहीं जानते थे कि यह गाय कोई साधारण पशु नहीं, वरन् दैवीय गुणों वाली कामधेनु गाय है, लेकिन कुछ समय के पश्चात जब राजा ने गाय के चमत्कार देखे तो वे दंग रह गए। महर्षि का आश्रम काफी साधारण था, ना अधिक सुविधाएं थीं और ना ही काम में हाथ बंटाने लायक कोई सेवक।

राजा ने देखे चमत्कार

लेकिन महर्षि ने कामधेनु गाय की मदद से कुछ ही पलों में देखते ही देखते राजा और उनकी पूरी सेना के लिए भोजन का प्रबंध कर दिया। कामधेनु के ऐसे विलक्षण गुणों को देखकर सहस्त्रार्जुन को ऋषि के आगे अपना राजसी सुख कम लगने लगा।

ऋषि से मांगी कामधेनु

अब उनके मन में महर्षि के प्रति ईर्ष्या उत्पन्न होने लगी और साथ ही वे महर्षि से उस गाय को ले जाने की तरकीब भी बनाने लगे। लेकिन सबसे पहले राजा ने सीधे ही ऋषि जमदग्नि से कामधेनु को मांगा। किंतु जब ऋषि जमदग्नि ने कामधेनु को आश्रम के प्रबंधन और जीवन के भरण-पोषण का एकमात्र जरिया बताकर उसे देने से इंकार कर दिया, तो राजा ने बुराई का मार्ग चुनना सही समझा।

जबरन ले ली

राजा ने क्रोधित होकर ऋषि जमदग्नि के आश्रम को उजाड़ दिया, सब तहस-नहस हो गया। लेकिन यह सब करने के बाद जैसे ही राजा सहस्त्रार्जुन अपने साथ कामधेनु को ले जाने लगा तो तभी वह गाय उसके हाथों से छूट कर स्वर्ग की ओर चली गई। और आखिरकार दुष्ट राजा को वह गाय नसीब नहीं हुई, लेकिन वहीं दूसरी ओर महर्षि जमदग्नि दोहरे नुकसान को झेल रहे थे।

स्वर्ग की ओर चली गई कामधेनु

एक ओर वे अपनी कामधेनु गाय को खो चुके थे और दूसरी ओर आश्रम भी ना रहा। कुछ समय के पश्चात महर्षि के पुत्र भगवान परशुराम आश्रम लौटे और जब उन्होंने यह दृश्य देखा तो हैरान रह गए। इस हालात का कारण पूछने पर उनकी माता रेणुका ने उन्हें सारी बातें विस्तारपूर्वक बताई।

परशुराम हुए क्रोधित

परशुराम माता-पिता के अपमान और आश्रम को तहस नहस देखकर आवेश में आ गए। पराक्रमी परशुराम ने उसी वक्त दुराचारी सहस्त्रार्जुन और उसकी सेना का नाश करने का संकल्प लिया। परशुराम अपने परशु अस्त्र को साथ लेकर सहस्त्रार्जुन के नगर महिष्मतिपुरी पहुंचे।

लिया पिता के अपमान का बदला

यहां पहुंचने पर राजा सहस्त्रार्जुन और उनके बीच भीषण युद्ध हुआ। किंतु परशुराम के प्रचण्ड बल के आगे सहस्त्रार्जुन बौना साबित हुआ। भगवान परशुराम ने दुष्ट सहस्त्रार्जुन की हजारों भुजाएं और धड़, परशु से काटकर कर उसका वध कर दिया।

फिर गए तीर्थ

कहते हैं सहस्त्रार्जुन के वध के बाद जैसे ही परशुराम अपने पिता के पास वापस आश्रम पहुंचे तो उनके पिता ने उन्हें आदेश दिया के वे इस वध का प्रायश्चित करने के लिए तीर्थ यात्रा पर जाएं, तभी उनके ऊपर से राजा की हत्या का पाप खत्म होगा। लेकिन ना जाने कहां से परशुराम के तीर्थ पर जाने की खबर सहस्त्रार्जुन के पुत्रों को मिल गई।

1 comment - What do you think?  Posted by admin - March 28, 2016 at 11:04 am

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वैज्ञानिकों ने अहिरावण के पाताल लोक खोज निकालने का दावा किया

Found Patal Lok of Ahiravan Rakshas

वैज्ञानिकों ने उस स्थान को खोज निकालने का दावा किया है जिसका वर्णन रामायण में पाताल लोक के रूप में है। हनुमानजी ने यहीं से भगवान राम व लक्ष्मण को पातालपुरी के राजा अहिरावण के चंगुल से मुक्त कराया था। यह स्थान मध्य अमेरिकी महाद्वीप में पूर्वोत्तर होंडुरास के जंगलों के नीचे दफन है। अमेरिकी वैज्ञानिकों ने लाइडर तकनीकी से इस स्थान का 3-डी नक्शा तैयार किया है, जिसमें जमीन की गहराइयों में गदा जैसा हथियार लिए वानर देवता की मूर्ति होने की पुष्टि हुई है।1940 में हुई थी जानकारीअमेरिकी वैज्ञानिकों की इस खोज की पुष्टि एसएमएस (स्कूल ऑफ मैनेजमेंट साइंसेज)के निदेशक व वैदिक विज्ञान केन्द्र के प्रभारी प्रो. भरत राज सिंह ने की है।

उन्होंने बताया कि प्रथम विश्वयुद्ध के बाद एक अमेरिकी पायलट ने होंडुरास के जंगलों में कुछ अवशेष देखे थे। उसकी पहली जानकारी अमेरिकी खोजकर्ता थिंयोडोर मोर्ड ने 1940 में दी थी।एक अमेरिकी पत्रिका में उसने उस प्राचीन शहर में वानर देवता की पूजा होने की बात भी लिखी थी, लेकिन उसने जगह का खुलासा नहीं किया था। बाद में रहस्यमय तरीके से थियोडोर की मौत हो गई और जगह का रहस्य बरकरार रहा।लाइडर तकनीक से खोजा प्राचीन शहरकरीब 70 साल बाद अमेरिका की ह्यूस्टन यूनिवर्सिटी व नेशनल सेंटर फार एयरबोर्न लेजर मैपिंग के वैज्ञानिकों ने होंडुरास के घने जंगलों में मस्कीटिया नामक स्थान पर लाइडर नामक तकनीक से जमीन के नीचे 3-डी मैपिंग की, जिसमें प्राचीन शहर का पता चला। इसमें जंगल के ऊपर से विमान से अरबों लेजर तरंगें जमीन पर फेंकी गईं। इससे 3-डी डिजिटल नक्शा तैयार हो गया।3-डी नक्शे में जमीन के नीचे गहराइयों में मानव निर्मित कई वस्तुएं दिखाई दीं।

इसमें हाथ में गदा जैसा हथियार लिए घुटनों के बल बैठी हुई है वानर मूर्ति भी दिखी है। हालांकि होंडुरास के जंगल की खुदाई पर प्रतिबंध के कारण इस स्थान की वास्तविक स्थिति का पता लग पाना मुश्किल है।इतिहासकार भी मानते हैं प्राचीन शहर में वानर पूजाअमेरिकी इतिहासकार भी मानते हैं कि पूर्वोत्तर होंडुरास के घने जंगलों के बीच मस्कीटिया नाम के इलाके में हजारों साल पहले एक गुप्त शहर सियूदाद ब्लांका का वजूद था। वहां के लोग एक विशालकाय वानर मूर्ति की पूजा करते थे।

प्रो. भरत राज सिंह ने बताया कि बंगाली रामायण में पाताल लोक की दूरी 1000 योजन बताई गई है, जो लगभग 12,800 किलोमीटर है।यह दूरी सुरंग के माध्यम से भारत व श्रीलंका की दूरी के बराबर है। रामायण में वर्णन है कि अहिरावण के चंगुल से भगवान राम व लक्ष्मण को छुड़ाने के लिए बजरंगबली को पातालपुरी के रक्षक मकरध्वज को परास्त करना पड़ा था। मकरध्वज बजरंगबली के ही पुत्र थे, लिहाजा उनका स्वरूप बजरगंबली जैसा ही था। अहिरावण के वध के बाद भगवान राम ने मकरध्वज को ही पातालपुरी का राजा बना दिया था। जमीन के नीचे वानर मूर्ति मिलने के बाद अनुमान लगाया जा सकता है कि बाद में वहां के लोग मकरध्वज की ही मूर्ति की पूजा करने लगे होंगे।

1 comment - What do you think?  Posted by admin - March 25, 2016 at 10:27 am

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Be the first to comment - What do you think?  Posted by admin - March 17, 2016 at 12:43 pm

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Be the first to comment - What do you think?  Posted by admin - at 12:25 pm

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Kaupeena Panchakam Stotra sanskrit with Hindi meaning

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Be the first to comment - What do you think?  Posted by admin - at 12:14 pm

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Sri Kundalini Stuti Stotra in Hindi Sanskrit lyrics – Jago Kundalini Maa

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PRAYER TO MOTHER KUNDALINI

Wake up Mother Kundalini.
Thou whose nature is Bliss Eternal—The Bliss of Brahman.
Thou dwelling like a serpent asleep at the lotus of Muladhara,
Sore, affected and distressed am I in body and mind,
Do thou bless me and leave thy place at the basic lotus.
Consort of Siva the Self-caused Lord of Universe,
Do thou take thy upward course through the central canal.
Leaving behind Svadhishthana, Manipuraka, Anahata, Vishuddha, and Ajna.
Be thou united with Siva, thy Lord the God.
At Sahasrara—the thousand-petalled-lotus in the brain.
Sport there freely, O Mother, Giver of Bliss Supreme.
Mother, who is Existence, Knowledge, Bliss Absolute.
Wake up, Mother Kundalini! Wake up.

 

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Be the first to comment - What do you think?  Posted by admin - March 15, 2016 at 10:00 am

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Bhagwan Mahavir Swami Chalisa

श्री महावीर चालीसा
‪‎Bhagwan_Mahavir_Swami‬
दोहाः-

सिद्ध समूह नमौं सदा, अरु सुमरुं अरहन्त |
निर आकुल निर्वाच्छ हो, गए लोक के अन्त |1|
मंगल मय मंगल करन, वर्धमान महावीर |
तुम चिंतत चिंता मिटे, हरो सकल भव पीर |2|
जय महावीर दया के सागर, जय श्री सन्मति ज्ञान उजागर |
शांत छवि मूरत अति प्यारी, वेष दिगम्बर के तुम धारी |3|
कोटि भानु से अति छवि छाजे, देखत तिमिर पाप सब भाजे |
महाबली अरि कर्म विदारे, जोधा मोह सुभट से मारे |4|
काम क्रोध तजि छोड़ी माया, क्षण में मान कषाय भगाया |
रागी नहीं, नहीं तू द्वेषी, वीतराग तू हित उपदेशी |5|
प्रभु तुम नाम जगत में सांचा, सुमिरत भागत भूत पिशाचा |
राक्षस यक्ष डाकिनी भागे, तुम चिंतत भय कोई न लागे |6|
महा शूल को जो तन धारे, होवे रोग असाध्य निवारे |
व्याल कराल होय फणधारी, विष को उगल क्रोध कर भारी |7|
महाकाल सम करै डसन्ता, निर्विष करो आप भगवन्ता |
महामत्त मद गज को झारे, भगे तुरत जब तुझे पुकारे |8|
फाड़ दाढ़ सिंहादिक आवे, ताको हे प्रभु तूही भगावे |
होकर प्रबल अग्नि जो जारे, तुम प्रताप शीतलता धारे |9|
शस्त्र धार अरि युद्ध लड़न्ता, तुम प्रसाद हो विजय तुरन्ता |
पवन प्रचण्ड चले झकझोरा, प्रभु तुम हरो होय भय चोरा |10|
झार खण्ड गिरि अटवी मांही, तुम बिनशरण तहां कोउ नांही |
वज्रपात करि घन गरजावे, मूसलधार होय तड़काव |11|
होय अपुत्र दरिद्र संताना, सुमिरत होत कुबेर समाना |
बन्दीगृह में बँधी जंजीरा, कठ सुई अनि में सकल शरीरा |12|
राजदण्ड करि शूल धरावै, ताहि सिंहासन तू ही बिठावे |
न्यायाधीश राजदरबारी, विजय करे होय कृपा तुम्हारी |13|
जहर हलाहल दुष्ट पियन्ता, अमृत सम प्रभु करो तुरन्ता |
चढ़े जहर, जीवादि डसन्ता, निर्विष क्षण में आप करन्ता |14|
एक सहस वसु तुमरे नामा, जन्म लियो कुण्डलपुर धामा |
सिद्धारथ नृप सुत कहलाये, त्रिशला मात उदर प्रगटाये |15|
तुम जनमत भयो लोक अशोका, अनहद शब्द भयो तिहुंलोका |
इन्द्र ने नेत्र सहस्र करि देखा, गिरि सुमेर कियो अभिषेका |16|
कामादिक तृष्णा संसारी, तज तुम भए बाल ब्रह्मचारी |
अथिर जान जग अनित बिसारी, बालपने प्रभु दीक्षा धारी |17|
शांत भाव धर कर्म विनाशे, तुरतहि केवल ज्ञान प्रकाशे |
जड़-चेतन त्रय जग के सारे, हस्त रेखवत् सम तू निहारे |18|
लोक-अलोक द्रव्य षट जाना, द्वादशांग का रहस्य बखाना |
पशु यज्ञों का मिटा कलेशा, दया धर्म देकर उपदेशा |19|
अनेकान्त अपरिग्रह द्वारा, सर्वप्राणि समभाव प्रचारा |
पंचम काल विषै जिनराई, चांदनपुर प्रभुता प्रगटाई |20|
क्षण में तोपनि बाढ़ि-हटाई, भक्तन के तुम सदा सहाई |
मुरख नर नहिं अक्षर ज्ञाता, सुमिरत पंडित होय विख्याता|
सोरठाः-

करे पाठ चालीस दिन नित चालीसहिं बार |
खेवै धूप सुगन्ध पढ़, श्रीमहावीर अगार ||
जनम दरिद्री होय, अरु जिसके नहिं सन्तान |
नाम वंश जग में चले, होय कुबेर समान ||
पूरनमल रचकर चालीसा, हे प्रभु तोहि नवावत शीशा |

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