Archive for March, 2020

How to get darshan of Lord Rama?

गोस्वामी तुलसीदास का हनुमानजी से कैसे मिलना हुया था? क्या वास्तव में हनुमान जी ने उन्हें भगवान राम के दर्शन करवाये थे?

तो चलिए शुरू करते हैं जब भगवान श्री राम ने अपने सारे सांसारिक कर्त्तव्यों से निवृत होने के पश्चात सरयू नदी में जब प्राण त्यागने का निश्चय किया तो हनुमान जी ने भी उनके साथ चलने का अनुरोध किया तब श्रीराम ने उन्हें इस पृथ्वी पर रहकर समाज कल्याण करने का आदेश दिया और साथ ही अपने शरीर को त्यागने के पहले महाबली हनुमानजी को अजर अमर होने का भी आशीर्वाद दिया था ताकि वे सदैव राम नाम की अलख और भक्तों का मार्गदर्शन करते रहें। आज भी आप को हनुमान जी की उपस्थिति सच्चे दिल से याद करने पर महसूस स्वयं कर सकते हैं जिसके अनगिनत प्रमाण हमारे इतिहास में दर्ज हैं।

स्वयं महाकवि तुलसीदास जी को हनुमान जी ने साक्षात प्रगट होकर श्रीराम के दर्शन करने का सूत्र बतलाया था। यदि आप उस किस्से को पढें तो आपको इस बात की सत्यता का स्वंय आभास हो जाएगा की सदियों से हनुमानजी अपने भक्तों को दर्शन देकर उनकी विकट से विकट समस्या को हल करते रहे हैं। श्रीराम से तुलसीदास जी मिलवाने की यह सत्य घटना आप अपने घर के किसी भी बुजुर्ग से मिलकर पुख्ता कर सकते हैं ।चलिए इस अविश्वरणीय घटना को आपको सुनाने का सौभाग्य प्राप्त करूँ, ताकि आपके साथ साथ क्योरा के मेरे समस्त साथीगण भी इसे सुने व समझें और पुनः ताजा कर लें। तो किस्सा यूँ है कि महान ग्रन्थ रामचरित मानस के रचयिता श्री तुलसी दास जी जिनका जन्म 1554 ईस्वी में हुआ था उन्हें भगवान श्रीराम के साक्षात् दर्शन करने की प्रकट अभिलाषा हुई। और यह अजर अमर हनुमानजी की कृपा रही कि उन्हें कलियुग में भी भगवान श्री राम और लक्ष्मणजी के दर्शन हुए या यूं कहें कि हनुमानजी जी की असीम कृपा व भगवान राम के अनन्य भक्त होने के कारण ही तुलसी दास जी बाल्य रूप रूप में भगवान राम के दर्शन का सौभाग्य मिला।

विदित हो कि तुलसीदास जी को भगवान राम की भक्ति की प्रेरणा अपनी पत्नी रत्नावली से ही प्राप्त हुई थी जिसके द्वारा अपमानित किये जाने से वे रामजी की भक्ति में फिर ऐसे डूबे कि दुनिया-जहान की सुध न रखी। तुलसी दासजी अक्सर भगवान की भक्ति में लीन होकर जनमानस को राम कथा सुनाया करते थे। एक बार काशी में रामकथा सुनाते समय इनकी भेंट एक प्रेत से हुई जो अपनी मुक्ति हेतु भटक रहा था तथा तुलसीदास जी से केवल इस कारण प्रसन्न हो गया था कि तुलसीदास जी अनजाने में जिस पेड़ पर जल छोड़ते थे उसी पेड़ पर उस प्रेत का निवास था। वार्तालाप के दौरान उस प्रेत ने उन्हें किसी भी तरह की सहायता प्रदान करने को पूछा तो, तुलसीदास जी ने उस प्रेत से भगवान राम मिलने की अपनी तड़प के बारे में बतलाया। तब उसने ने ही उन्हें हनुमानजी के आव्हान के लिए कहा था साथ ही तुलसीदास जी से बोला कि इस जगत में सदैव अजर अमर रहने वाले रामजी के परम भक्त केवल हनुमानजी ही हैं जो आपको भगवान श्रीराम से मिलवा सकते हैं। साथ ही उस प्रेत ने उन्हें हनुमान जी के दर्शन करने का उपाय बतलाया। तुलसी दास जी अब हनुमान जी के दर्शन को व्याकुल हो गए और फिर उन्हें सच्चे दिल से याद करने के फलस्वरूप उनके दर्शन पा ही लिए और उनसे प्रार्थना करने लगे कि वे उन्हें श्रीरामजी के दर्शन करवा दें।हनुमान जी ने तुलसी दास जी को बहुत समझाने व बहलाने की कोशिश की लेकिन तुलसीदास टस से मस नहीं हुए। तब हनुमान जी ने उनसे कहा कि चलिए आपको भगवान श्रीरामजी के दर्शन चित्रकूट में प्राप्त होंगे। प्रशन्नचित तुलसीदास जी उसी समय चित्रकूट के लिए रवाना हो लिए और वहाँ के रामघाट पर अपना डेरा जमा लिया तथा श्रीराम का स्मरण करते हुए व्याकुलता से उनकी राह देखने लगे।एक दिन मार्ग में उन्हें 2 अति सुंदर युवक घोड़े पर बैठे नजर आए, जैसे ही तुलसीदास जी उन्हें देखा वे सम्मोहित हो लगभग अपनी सुध-बुध खो बैठे। जब वे युवक इनके सामने से चले गए तब उनके सामने हनुमान जी प्रकट हुए और बतालाया कि ये युवक ही श्रीराम और लक्ष्मण जी थे। तुलसी दास जी भावातुर होकर रोने लगे और पछताने लगे कि वह अपने प्रिय प्रभु को ही नहीं पहचान पाए। तुलसी दास जी को विकट दुखी देखकर हनुमान जी ने सांत्वना दी कि कल सुबह आपको फिर राम-लक्ष्मण के दर्शन होंगे। दूसरे दिन जब प्रात:काल स्नान-ध्यान करने के बाद तुलसी दास जी जब घाट पर लोगों को चंदन लगा रहे थे तभी बालक के रूप में भगवान राम इनके पास आए और कहने लगे कि बाबा हमें चंदन नहीं लगाओगे। हनुमान जी को लगा कि तुलसी दास जी इस बार भी भूल न कर बैठें इसलिए वे तोते का रूप धारण कर गाने लगे

‘चित्रकूट के घाट पर भई संतन की भीर। तुलसी दास चंदन घिसें, तिलक देत रघुबीर’।

ये महाबली हनुमान जी ही थे जिन्होंने तुलसीदास जी को भगवान श्रीराम का सशरीर दर्शन करवाए।

जय श्रीराम।

प्रेरणास्त्रोत: मानस का हंस (अमृतलाल नागर)

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Posted by admin - March 25, 2020 at 5:50 pm

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Stotra to fight with Corona Virus

श्री हनुमान वडवानल स्तोत्र

यह स्तोत्र सभी रोगों के निवारण में, शत्रुनाश, दूसरों के
द्वारा किये गये पीड़ा कारक कृत्या अभिचार के निवारण, राज-बंधन
विमोचन आदि कई प्रयोगों में काम आता है ।

विनियोग

ॐ अस्य श्री हनुमान् वडवानल-स्तोत्र-मन्त्रस्य श्रीरामचन्द्र ऋषिः,
श्रीहनुमान् वडवानल देवता, ह्रां बीजम्, ह्रीं शक्तिं, सौं कीलकं,
मम समस्त विघ्न-दोष-निवारणार्थे, सर्व-शत्रुक्षयार्थे
सकल-राज-कुल-संमोहनार्थे, मम समस्त-रोग-प्रशमनार्थम्
आयुरारोग्यैश्वर्याऽभिवृद्धयर्थं समस्त-पाप-क्षयार्थं
श्रीसीतारामचन्द्र-प्रीत्यर्थं च हनुमद् वडवानल-स्तोत्र जपमहं करिष्ये।

ध्यान
मनोजवं मारुत-तुल्य-वेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठं।
वातात्मजं वानर-यूथ-मुख्यं श्रीरामदूतम् शरणं प्रपद्ये।।

ॐ ह्रां ह्रीं ॐ नमो भगवते श्रीमहा-हनुमते प्रकट-पराक्रम
सकल-दिङ्मण्डल-यशोवितान-धवलीकृत-जगत-त्रितय
वज्र-देह रुद्रावतार लंकापुरीदहय उमा-अर्गल-मंत्र
उदधि-बंधन दशशिरः कृतान्तक सीताश्वसन वायु-पुत्र
अञ्जनी-गर्भ-सम्भूत श्रीराम-लक्ष्मणानन्दकर कपि-सैन्य-प्राकार
सुग्रीव-साह्यकरण पर्वतोत्पाटन कुमार-ब्रह्मचारिन् गंभीरनाद
सर्व-पाप-ग्रह-वारण-सर्व-ज्वरोच्चाटन डाकिनी-शाकिनी-विध्वंसन
ॐ ह्रां ह्रीं ॐ नमो भगवते महावीर-वीराय सर्व-दुःख
निवारणाय ग्रह-मण्डल सर्व-भूत-मण्डल सर्व-पिशाच-मण्डलोच्चाटन
भूत-ज्वर-एकाहिक-ज्वर, द्वयाहिक-ज्वर, त्र्याहिक-ज्वर
चातुर्थिक-ज्वर, संताप-ज्वर, विषम-ज्वर, ताप-ज्वर,
माहेश्वर-वैष्णव-ज्वरान् छिन्दि-छिन्दि यक्ष ब्रह्म-राक्षस
भूत-प्रेत-पिशाचान् उच्चाटय-उच्चाटय स्वाहा।

ॐ ह्रां ह्रीं ॐ नमो भगवते श्रीमहा-हनुमते
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ह्रौं ह्रः आं हां हां हां हां
ॐ सौं एहि एहि ॐ हं ॐ हं ॐ हं ॐ हं
ॐ नमो भगवते श्रीमहा-हनुमते श्रवण-चक्षुर्भूतानां
शाकिनी डाकिनीनां विषम-दुष्टानां सर्व-विषं हर हर
आकाश-भुवनं भेदय भेदय छेदय छेदय मारय मारय
शोषय शोषय मोहय मोहय ज्वालय ज्वालय
प्रहारय प्रहारय शकल-मायां भेदय भेदय स्वाहा।

ॐ ह्रां ह्रीं ॐ नमो भगवते महा-हनुमते सर्व-ग्रहोच्चाटन
परबलं क्षोभय क्षोभय सकल-बंधन मोक्षणं कुर-कुरु
शिरः-शूल गुल्म-शूल सर्व-शूलान्निर्मूलय निर्मूलय
नागपाशानन्त-वासुकि-तक्षक-कर्कोटकालियान्
यक्ष-कुल-जगत-रात्रिञ्चर-दिवाचर-सर्पान्निर्विषं कुरु-कुरु स्वाहा।

ॐ ह्रां ह्रीं ॐ नमो भगवते महा-हनुमते
राजभय चोरभय पर-मन्त्र-पर-यन्त्र-पर-तन्त्र
पर-विद्याश्छेदय छेदय सर्व-शत्रून्नासय
नाशय असाध्यं साधय साधय हुं फट् स्वाहा।
।। इति विभीषणकृतं हनुमद् वडवानल स्तोत्रं ।।

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Posted by admin - March 23, 2020 at 5:41 pm

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Astrological Benefits of Bhagavad Gita

यदि आपके ऊपर जादू- टोना , तंत्र-मंत्र है तो उसके के वार को निष्फल करे गीता पाठ के द्वारा—- ग्रहों के प्रभाव को दूर करने का भी है अचूक उपचार

महाभारत के युद्ध से ठीक पहले श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए ज्ञान यानी गीता में ढेरों ज्योतिषीय उपचार भी छिपे हुए हैं। गीता के अध्यायों का नियमित अध्ययन कर हम कई समस्याओं से मुक्ति पा सकते हैं।

गीता की टीका तो बहुत से योगियों और महापुरुषों ने की है लेकिन ज्योतिषीय अंदाज में अब तक कहीं पुख्ता टीका नहीं है। फिर भी कहीं-कहीं ज्योतिषियों ने अपने स्तर पर प्रयोग किए हैं और ये बहुत अधिक सफल भी रहे हैं। गीता की नैसर्गिक विशेषता यह है कि इसे पढऩे वाले व्यक्ति के अनुसार ही इसकी टीका होती है। यानि हर एक के लिए अलग। इन संकेतों के साथ इस स्वतंत्रता को बनाए रखने का प्रयास किया गया है।

गीता के अठारह अध्यायों में भगवान श्रीकृष्ण ने जो संकेत दिए हैं उन्हें ज्योतिष के आधार पर विश्लेषित किया गया है। इसमें ग्रहों का प्रभाव और उनसे होने वाले नुकसान से बचने और उनका लाभ उठाने के संबंध में यह सूत्र बहुत काम के लगते हैं। शनि संबंधी पीड़ा होने पर प्रथम अध्याय का पठन करना चाहिए। द्वितीय अध्याय, जब जातक की कुंडली में गुरु की दृष्टि शनि पर हो, तृतीय अध्याय 10वां भाव शनि, मंगल और गुरु के प्रभाव में होने पर, चतुर्थ अध्याय कुंडली का 9वां भाव तथा कारक ग्रह प्रभावित होने पर, पंचम अध्यायय भाव 9 तथा 10 के अंतरपरिवर्तन में लाभ देते हैं। इसी प्रकार छठा अध्याय तात्कालिक रूप से आठवां भाव एवं गुरु व शनि का प्रभाव होने और शुक्र का इस भाव से संबंधित होने पर लाभकारी है।

सप्तम अध्याय का अध्ययन 8वें भाव से पीड़ित और मोक्ष चाहने वालों के लिए उपयोगी है। आठवां अध्याय कुंडली में कारक ग्रह और 12वें भाव का संबंध होने पर लाभ देता है। नौंवे अध्याय का पाठ लग्नेश, दशमेश और मूल स्वभाव राशि का संबंध होने पर करना चाहिए। गीता का दसवां अध्याय कर्म की प्रधानता को इस भांति बताता है कि हर जातक को इसका अध्ययन करना चाहिए। हर ग्रह की पीड़ा में यह लाभदायी है। कुंडली में लग्नेश 8 से 12 भाव तक सभी ग्रह होने पर ग्यारहवें अध्याय का पाठ करना चाहिए। बारहवां अध्याय भाव 5 व 9 तथा चंद्रमा प्रभावित होने पर उपयोगी है। तेरहवां अध्याय भाव 12 तथा चंद्रमा के प्रभाव से संबंधित उपचार में काम आएगा। आठवें भाव में किसी भी उच्च के ग्रह की उपस्थिति में चौदहवां अध्याय लाभ दिलाएगा। इसी प्रकार पंद्रहवां अध्याय लग्न एवं 5वें भाव के संबंध में और सोलहवां अध्याय मंगल और सूर्य की खराब स्थिति में उपयोगी है।

सर्वोपनिषदो गावो दोग्धा गोपालनंदनः। पार्थो वत्सः सुधीभोंक्ता दुग्धं गीतामृतं महत॥

अर्थ सभी उपनिषद गाय के समान हैं, भगवान श्री कृष्ण दुहने वाले हैं, पार्थ बछड़ा है, गीता रूपी ज्ञानामृत ही दूध है। सद्बुद्धि वाले जिज्ञासु उसके भोक्ता हैं।

गीता स्वयं श्री भगवान की वाणी है। जीवन की सच्चाई से रूबरू करवाकर जीने की राह सिखाती है। गीता का पाठ करने से भगवान का प्रेम मिलता है। जीवन रूपी राह में आने वाली समस्त विध्न बाधाओं से निजात मिलता है। किन्ही विशेष परिस्थितियों में मनुष्य अपने कर्तव्य पथ से भटकने लगे तो गीता का पाठ उसे तनिक भी विचलित नहीं होने देता। गीता संजीवनी के समान है जो निराश मन में आशा के बीज डालती है।

गीता का नियमित पाठ करने से जीवन में कभी कोई समस्या नहीं रहती। यह जादू- टोने, तंत्र-मंत्र के वार को भी निष्फल कर देती है। गीता के अठारह अध्याय को सबसे अधिक महत्वपूर्ण माना गया है। ज्योतिष के आधार पर उनका विश्लेषन किया गया जाए तो ग्रहों के दुष्प्रभाव से भी मुक्ति पाई जा सकती है।

शनि के दुष्प्रभाव से मुक्ति पाने के लिए प्रथम अध्याय का पाठन करें।

कुंडली में गुरु की दृष्टि शनि पर हो तो द्वितीय अध्याय का पाठ करें।

कुंडली में 10वें भाव में शनि, मंगल और गुरु का प्रभाव हो तो तृतीय अध्याय का पाठ करें।

कुंडली में 9वां भाव तथा कारक ग्रह प्रभावित होने पर चतुर्थ अध्याय का पाठ करें।

कुंडली का पंचम अध्यायय भाव 9 तथा10 के अंतरपरिवर्तन में लाभ देते हैं।

छठा अध्याय तात्कालिक रूप से आठवां भाव एवं गुरु व शनि का प्रभाव होने और शुक्र का इस भाव से संबंधित होने पर लाभकारी है।

सप्तम अध्याय का अध्ययन 8वें भाव से पीड़ित और मोक्ष चाहने वालों के लिए उपयोगी है।

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Posted by admin - March 22, 2020 at 7:08 pm

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Shashthi Devi Stotram – Protection of Kids षष्ठीदेवी स्तोत्र

॥ श्रीषष्ठीदेवि स्तोत्रम् ॥
श्री गणेशाय नमः ॥
ध्यानम् ।
श्रीमन्मातरमम्बिकां विधि मनोजातां सदाभीष्टदांस्कन्देष्टां च जगत्प्रसूं विजयदां सत्पुत्र सौभाग्यदाम् ।
सद्रत्नाभरणान्वितां सकरुणां शुभ्रां शुभां सुप्रभांषष्ठांशां प्रकृतेः परां भगवतीं श्रीदेवसेनां भजे ॥
षष्ठांशां प्रकृतेः शुद्धां सुप्रतिष्ठां च सुव्रताम् ।सुपुत्रदां च शुभदां दयारूपां जगत्प्रसूम् ॥
श्वेतचम्पक वर्णाभां रक्तभूषण भूषिताम् ।पवित्ररूपां परमां देवसेनां पराम्भजे ॥

अथ श्रीषष्ठीदेवि स्तोत्रम् ।
स्तोत्रं श‍ृणु मुनिश्रेष्ठ सर्वकामशुभावहम् ।
वाञ्छाप्रदं च सर्वेषां गूढं वेदे च नारद ॥
प्रियव्रत उवाच ।
नमो देव्यै महादेव्यै सिद्ध्यै शान्त्यै नमो नमः ।शुभायै देवसेनायै षष्ठीदेव्यै नमो नमः ॥ १॥
वरदायै पुत्रदायै धनदायै नमो नमः ।सुखदायै मोक्षदायै च षष्ठीदेव्यै नमो नमः ॥ २॥
सृष्ट्यै षष्ठांशरूपायै सिद्धायै च नमो नमः । var शक्तिषष्ठीस्वरूपायैमायायै सिद्धयोगिन्यै षष्ठीदेव्यै नमो नमः ॥ ३॥
परायै पारदायै च षष्ठीदेव्यै नमो नमः ।सारायै सारदायै च परायै सर्वकर्मणाम् ॥ ४॥
बालाधिष्ठातृदेव्यै च षष्ठीदेव्यै नमो नमः ।कल्याणदायै कल्याण्यै फलदायै च कर्मणाम् ॥ ५॥
प्रत्यक्षायै च भक्तानां षष्ठीदेव्यै नमो नमः ।पूज्यायै स्कन्दकान्तायै सर्वेषां सर्वकर्मसु ॥ ६॥
देवरक्षणकारिण्यै षष्ठीदेव्यै नमो नमः ।शुद्धसत्त्वस्वरूपायै वन्दितायै नृणां सदा ॥ ७॥
हिंसाक्रोधवर्जितायै षष्ठीदेव्यै नमो नमः ।धनं देहि प्रियां देहि पुत्रं देहि सुरेश्वरि ॥ ८॥
धर्मं देहि यशो देहि षष्ठीदेव्यै नमो नमः ।भूमिं देहि प्रजां देहि देहि विद्यां सुपूजिते ॥ ९॥
कल्याणं च जयं देहि षष्ठीदेव्यै नमो नमः ।॥ फलश‍ृति ॥इति देवीं च संस्तूय लेभे पुत्रं प्रियव्रतः ॥ १०॥
यशस्विनं च राजेन्द्रं षष्ठीदेवीप्रसादतः ।षष्ठीस्तोत्रमिदं ब्रह्मन्यः श‍ृणोति च वत्सरम्॥ ११।
अपुत्रो लभते पुत्रं वरं सुचिरजीविनम् ।वर्षमेकं च या भक्त्या संयत्तेदं श‍ृणोति च ॥ १२॥
सर्वपापाद्विनिर्मुक्ता महावन्ध्या प्रसूयते ।वीरपुत्रं च गुणिनं विद्यावन्तं यशस्विनम् ॥ १३॥
सुचिरायुष्मन्तमेव षष्ठीमातृप्रसादतः ।काकवन्ध्या च या नारी मृतापत्या च या भवेत् ॥ १४॥
वर्षं श‍ृत्वा लभेत्पुत्रं षष्ठीदेवीप्रसादतः ।रोगयुक्ते च बाले च पिता माता श‍ृणोति चेत् ॥ १५॥
मासं च मुच्यते बालः षष्ठीदेवी प्रसादतः ।
॥ इति श्रीब्रह्मवैवर्ते महापुराणे इतिखण्डे नारदनारायणसंवादेषष्ठ्युपाख्याने श्रीषष्ठीदेविस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

व.दा. भट ह्यांनी त्यांच्या ‘पंचमस्थान ‘ ह्या पुस्तकात षष्टीदेवीचे स्तोत्र दिले आहे . त्यात त्यांनी असे दिले आहे कि जे लोक संतति प्राप्तीबद्दल पूर्ण निराश झालेले असतात किंवा ज्यांना वारंवार गर्भपाताचा त्रास होतो अशांना ह्या स्तोत्राचा उपयोग होऊ शकतो .

मराठी अर्थ:षष्ठीदेवी स्तोत्र भगवान नारायण म्हणाले, हे मुनिश्रेष्ट नारदा! सर्व कामना शुभ व पूर्ण करणारे व सर्वांचे मनोरथ पूर्ण करणारे वेदांनाही गुप्त असणारे हे स्तोत्र ऐक. देवीला नमस्कार असो. महादेवीला नमस्कार असो. भगवती सिद्धी तसेच शांतीला नमस्कार असो. शुभा, देवसेना तसेच वरदा, पुत्रदा, धनदा, सुखदा तसेच मोक्षदा भगवती षष्ठीला मी वारंवार नमस्कार करतो. मूल प्रकृतिच्या सहाव्या अंशापासून प्रकट होणार्या भगवती सिद्धाला नमस्कार असो. माया, सिद्धयोगिनी, सारा, शारदा आणि परादेवी नावांनी शोभणारी भगवती षष्ठीला मी वारंवार नमस्कार करतो. बालकांची अधिष्टात्री, त्यांचे कल्याण करणारी, कल्याण स्वरूपिणी तसेच कर्मांचे फल देणारी भगवती षष्ठीला मी वारंवार नमस्कार करतो. आपल्या भक्तांना प्रत्यक्ष दर्शन देणारी तसेच सर्वांसाठी संपूर्ण कार्यांमध्ये पूजेचा मान असलेली स्वामी कार्तिकेयाची प्राणप्रिया भगवती षष्ठीला मी वारंवार नमस्कार करतो. मनुष्य जीला नेहमी वंदन करतो, जी देवतांच्या रक्षणासाठी नेहमी सज्ज असते त्या शुद्धसत्वस्वरूप भगवती षष्ठीला मी वारंवार नमस्कार करतो. हिंसा आणि क्रोध यापासून रहित असलेल्या भगवती षष्ठीला मी वारंवार नमस्कार करतो. हे सुरेश्वरि ! तू मला धन दे, प्रिय पत्नी दे आणि पुत्र देण्याची कृपा कर. हे महेश्वरी ! तू मला जगांत सन्मान मिळवून दे, मला विजयी कर आणि माझ्या शत्रुंचा संहार कर. सुधर्म आणि यश देणार्या भगवती षष्ठीला मी वारंवार नमस्कार करतो. हे सुपूजीते ! तू मला भूमी दे, प्रजा दे, विद्या दे आणि माझे कल्याण कर व मला जय दे. भगवती षष्ठीला मी वारंवार नमस्कार करतो. अशा प्रकारे स्तुती करून राजा प्रियव्रताने षष्ठीदेवीच्या आशीर्वादाने यशस्वी पुत्र प्राप्त करून घेतला. हे ब्रह्मन् ! जो मनुष्य भगवति षष्टिच्या या स्तोत्राचे एक वर्षपर्यन्त श्रवण करतो त्याला जर पुत्र नसेल तर त्यास दीर्घजीवी, सुन्दर पुत्र प्राप्त होतो. जो एक वर्षपर्यन्त भक्तिपूर्वक देवीची पूजा करून हे स्तोत्र ऐकतो त्याची सर्व पापे नष्ट होतात. मोठी वन्ध्या नारीसुद्धा भगवती षष्टीदेवीच्या आशीर्वादाने संतान प्रसूती करण्याच्या योग्यतेची होते. ती भगवती देवसेनेच्या कृपेने गुणी, विद्वान, यशस्वी, दीर्घायू तसेच श्रेष्ट पुत्राची माता होते. काकवंध्या अगर मृतवत्सा नारी या स्तोत्राचे एक वर्षपर्यन्त श्रवण करून भगवती षष्टीदेवीच्या आशीर्वादाने पुत्रवती होते. बालक आजारी असेल तर त्याच्या माता-पित्यांनी हे स्तोत्र एक महिनापर्यन्त श्रवण केले तर भगवती षष्टीदेवीच्या आशीर्वादाने त्या बालकाचा आजार बरा होतो. अशा प्रकारे श्री देवी महाभागवतांतील नवव्या स्कधांतील षष्टीदेवी स्तोत्र संपूर्ण झाले.

षष्ठीदेवी स्तोत्र

नारायण उवाच

स्तोत्रं श्रुणु मुनिश्रेष्ट सर्वकामशुभावहम् I
वांछाप्रदं च सर्वेषां गूढं वेदेषु नारद I
नमो देव्यै महादेव्यै सिद्धयै शांत्यै नमो नमः II
शुभायै देवसेनायै षष्ठयै देव्यै नमो नमः I
वरदायै पुत्रदायै धनदायै नमो नमः II
सुखदायै मोक्षदायै षष्ठयै देव्यै नमो नमः I
सृष्टयै षष्ठाशरूपायै सिद्धायै च नमो नमः II
मायायै सिद्धयोगिन्यै षष्ठीदेव्यै नमो नमः I
सारायै सारदायै च परादेव्यै नमो नमः II
बालाधिष्टातृदेव्यै च षष्ठीदेव्यै नमो नमः I
कल्याणदायै कल्याण्यै फ़लदायै च कर्मणाम् II
प्रत्यक्षायै स्वभक्तानां षष्ठयै देव्यै नमो नमः I
पूज्यायै स्कंदकान्तायै सर्वेषां सर्वकर्मसु II
देवरक्षणकारिण्यै षष्ठीदेव्यै नमो नमः I
शुद्धसत्वस्वरुपायै वन्दितायै नृणां सदा II
हिंसाक्रोधवर्जितायै षष्ठीदेव्यै नमो नमः I
धनं देहि प्रियां देहि पुत्रं देहि सुरेश्वरि II
मानं देहि जयं देहि द्विषो जहि महेश्वरि I
धर्मं देहि यशो देहि षष्ठीदेव्यै नमो नमः II
देहि भूमिं प्रजां देहि विद्यां देहि सुपूजिते I
कल्याणं च जयं देहि षष्ठीदेव्यै नमो नमः II
इति देवीं च संस्तूय लेभे पुत्रं प्रियव्रतः I
यशस्विनं च राजेन्द्रः षष्टिदेव्याः प्रसादतः II
षष्टिस्त्रोत्रमिदं ब्रह्मन् यः श्रुणोति तु वत्सरम् I
अपुत्रो लभते पुत्रं परं सुचिरजीविनम् II
वर्षंमेकं च यो भक्त्या संपूज्येदं श्रुणोति च I
सर्वपापाद्विनिर्मुक्तो महावन्ध्या प्रसूयते II
वीरं पुत्रं च गुणिनं विद्यावन्तं यशस्विनम् I
सुचिरायुष्यवन्तं च सूते देवीप्रसादतः II
काकवन्ध्या च या नारी मृतवत्सा च या भवेत् I
वर्षं श्रुत्वा लभेत्पुत्रं षष्ठीदेवीप्रसादतः II
रोगयुक्ते च बाले च पिता माता श्रुणोति चेत् I
मासेन मुच्यते बालः षष्ठीदेवीप्रसादतः II
II इति श्री देवीभागवते महापुराणे नवम स्कन्दे श्री षष्ठीदेवी स्तोत्रं संपूर्णं II

guru shaki
Gurushakti
Stotra
Devi (Deity)
Shashthi Devi
Shashthi Devi Stotra
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stotra for protection
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Posted by admin - March 16, 2020 at 7:00 pm

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Parshuram stotra in English and Sanskrit – परशुराम स्तोत्र

|| परशुरामस्तोत्रम् ||

कराभ्यां परशुं चापं दधानं रेणुकात्मजम्
जामदग्न्यं भजे रामं भार्गवं क्षत्रियान्तकम् ||१||

नमामि भार्गवं रामं रेणुकाचित्तनंदनम्
मोचिताम्बार्तिमुत्पातनाशनं क्षत्रनाशनम् || २ ||

भयार्तस्वजनत्राणतत्परं धर्मतत्परम्
गतवर्गप्रियं शूरं जमदग्निसुतं मतम् || ३ ||

वशीकृतमहादेवं दृप्तभूपकुलान्तकम्
तेजस्विनं कार्तवीर्यनाशनं भवनाशनम् || ४ ||

परशुं दक्षिणे हस्ते वामे च दधतं धनु:
रम्यं भृगुकुलोत्तंसं घनश्यामं मनोहरम् || ५ ||

शुद्धं बुद्धं महाप्रज्ञामंडितं रणपण्डितं
रामं श्रीदत्तकरुणाभाजनं विप्ररंजनं || ६ ||

मार्गणाशोषिताब्ध्यंशं पावनं चिरजीवनं
य एतानि जपेद्रामनामानि स कृती भवेत || ७ ||

|| इति श्री प.प. वासुदेवानंदसरस्वतीविरचितं श्री परशुरमस्तोत्रं संपूर्णम् ||

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॥ परशुरामसहस्रनामस्तोत्र ॥

पुरा दाशरथी रामः कृतोद्वाहः सबान्धवः ।
गच्छन् अयोध्यां राजेन्द्रः पितृमातृसुहृद्धतः ॥ १॥

ददर्श यान्तं मार्गेण क्षत्रियान्तकरं विभुम् ।
रामं तं भार्गवं दृष्टवाभितस्तुष्टाव राघवः ।
रामः श्रीमान्महाविष्णुरिति नामसहस्रतः ॥ २॥

अहं त्वत्तः परं राम विचरामि स्वलीलया ।
इत्युक्तवन्तमभ्यर्च प्रणिपत्य कृतान्जलिः ॥ ३॥

श्री राघव उवाच –

यन्नामग्रहणाज्जन्तुः प्राप्नुयात्र भवापदम् ।
यस्य पादार्चनात्सिद्धिः स्वेप्सिता नौमि भार्गवम् ॥ ४॥

निह्स्पृहो यः सदा देवो भूम्यां वसति माधवः ।
आत्मबोधोदधिं स्वच्छं योगिनं नौमि भार्गवम् ॥ ५॥

यस्मादेतज्जगत् सर्वं जायते यत्र लीलया ।
स्थितिं प्राप्नोति देवेशं जामदग्न्यं नमाम्यहम् ॥ ६॥

यस्य भ्रूभङ्गमात्रेण ब्रह्माद्याः सकलाः सुराः ।
शतवारं भवन्यत्र भवन्ति न भवन्ति च ॥ ७॥

तप उग्रं चचारादौ यमुद्दिश्य च रेणुका ।
आद्या शक्तिर्महादेवी रामं तं प्रणमाम्यहम् ॥ ८॥

॥ अथ विनियोगः ॥

ॐ अस्य श्रीजामदग्न्यसहस्रनामस्तोत्रमहामन्त्रस्य । श्री राम ऋषिः ।
जामदग्न्यः परमात्मा देवता ।
अनुष्टुप् छन्दः । श्रीमदविनाशिरामप्रीत्यर्थम्
चतुर्विधपुरुषार्थसिद्ध्यर्थं जपे विनियोगः ॥

॥ अथ करन्यासः ॥

ॐ ह्रां गोविन्दात्मने अन्गुष्ठाभ्यां नमः ।
ॐ ह्रीं महीधरात्मने तर्जनीभ्यां नमः ।
ॐ ह्रूं हृषीकेशात्मने मध्यमाभ्यां नमः ।
ॐ ह्रैं त्रिविक्रमात्मन्ने अनामिकाभ्यां नमः ।
ॐ ह्रौं विष्णवात्मने कनिष्ठिकाभ्यां नमः ।
ॐ ह्रः माधवात्मने करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ॥

॥ अथ हृदयन्यासः ॥

ॐ ह्रां गोविन्दात्मने हृदयाय नमः ।
ॐ महीधरात्मने शिरसे स्वाहा ।
ॐ ह्रौं हृषीकेशात्मने शिखायै वशट् ।
ॐ ह्रैं त्रिविक्रमात्मने कवचाय हुम् ।
ॐ ह्रौं विष्णवात्मने नेत्रत्रयाय वौशट् ।
ॐ ह्रः माधवात्मने अस्त्राय फट् ।

॥ अथ ध्यानम् ॥

शुद्धजाम्बूनदनिभं ब्रह्माविष्णुशिवात्मकम् ।
सर्वाभरणसंयुक्तं कृष्णाजीनाधरं विभुम् ॥ ९॥

बाणचापौ च परशुमभयं च चतुर्भुजैः ।
प्रकोष्ठशोभिरुदाक्षैर्दधानं भृगुनन्दनम् ॥ १०॥

हेमयज्ञोपवीतं च स्निग्धस्मितमुखाम्बुजम् ।
दर्भाञ्जितकरं देवं क्षत्रियक्षयदीक्षितम् ॥ ११॥

श्रीवत्सवक्षसं रामं ध्यायेद्वै ब्रह्मचारिणम् ।
हृत्पुन्डरीकमध्यस्थं सनकाद्यैरभिष्टुतम् ॥ १२॥

सहस्रमिव सूर्याणामेकीभूय पुरःस्थितम् ।
तपसामिव सन्मूर्तिं भृगुवंशतपस्विनम् ॥ १३॥

चूडाचुम्बितकङ्कपत्रमभिस्तूणीद्वयपृष्ठतो ।
भस्मस्निग्धपवित्रलाञ्छनवपुर्धत्ते त्वचं रौरवीम् ॥ १४॥

मौञ्ज्या मेखलया नियन्त्रितमधो वासस्च माञ्जिष्ठकम् ।
पाणौ कार्मुकमक्षसूत्रवलयं दण्डं पा पैप्पलः ॥ १५॥

रेणुकाहृदयानन्दं भृगुवंशतपस्विनम् ।
क्षत्रियाणामन्तकं पूर्णं जामदग्न्यं नमाम्यहम् ॥ १६॥

अव्यक्तव्यक्तरूपाय निर्गुणाय गुणात्मने ।
समस्तजगदाधारमूर्तये ब्रह्मणे नमः ॥ १७॥

॥ श्री परशुराम द्वादश नामानि ॥

हरिः परशुधारी च रामः च भृगुनन्दनः ।
एकवीरात्मजो विष्णुः जामदग्न्यः प्रतापवान् ॥ १८॥

सहयाद्रिवासी वीरः च क्षत्रजित्पृथिवीपतिः ।
इति द्वादशनामानि भार्गवस्य महात्मनः ।
यस्त्रिकाले पठेन्नित्यं सर्वत्र विजयी भवेत् ॥ १९॥

॥ अथ श्री परशुराम सहस्रनाम ॥

ॐ रामः श्रीमान्महाविष्णुर्भार्गवो जमदग्निजः ।
तत्त्वरूपी परं ब्रह्म शाश्वतः सर्वशक्तिधृक् ॥ १॥

वरेण्यो वरदः सर्वसिद्धिदः कञ्जलोचनः ।
राजेन्द्रश्च सदाचारो जामदग्न्यः परात्परः ॥ २॥

परमार्थैकनिरतो जितामित्रो जनार्दनः ।
ऋषिप्रवरवन्द्यश्च दान्तः शत्रुविनाशनः ॥ ३॥

सर्वकर्मा पवित्रश्च च अदीनो दीनसाधकः ।
अभिवाद्यो महावीरस्तपस्वी नियमप्रियः ॥ ४॥

स्वयम्भूः सर्वरूपश्च सर्वात्मा सर्वदृक्प्रभुः ।
ईशानः सर्वदेवादिर्वरीयान्सर्वगोऽच्युतः ॥ ५॥

सर्वज्ञः सर्ववेदादि शरण्यः परमेश्वरः ।
ज्ञानभाव्योऽपरिछेद्यः शुचिर्वाग्मी प्रतापवान् ॥ ६॥

जितक्रोधो गुडाकेशो द्युतिमानरिमर्दनः ।
रेणुकातनयः साक्षात्दजितोऽव्यय एव च ॥ ७॥

विपुलांसो महोरस्कोऽतीन्द्रो वन्द्यो दयानिधिः ।
अनादिर्भगवानिन्द्रः सर्वलोकारिमर्दनः ॥ ८॥

सत्यः सत्यव्रतः सत्यसन्धः परमधार्मिकः ।
लोकात्मा लोककृल्लोकवन्द्यः सर्वमयो निधिः ॥ ९॥

वश्यो दया सुधीर्गोप्ता दक्षः सर्वैकपावनः ।
ब्रह्मण्यो ब्रह्मचारी च ब्रह्म ब्रह्मप्रकाशकः ॥ १०॥

सुदरोऽजिनवासाः च ब्रह्मसूत्रधरः समः ।
सौम्यो महर्शिः शान्तश्च मौञ्जीभृद्दन्डधारकः ॥ ११॥

कोदन्डी सर्वजिच्छत्रुदर्पहा पुण्यवर्धनः ।
कविर्ब्रह्मर्शीर्वरदः कमन्डलुधरः कृती ॥ १२॥

महोदारोऽतुलोभाव्यो जितषड्वर्गमन्डलः ।
कान्तः पुण्यः सुकीर्तिश्च द्विभुजस्चातिपुरुशः ॥ १३॥

अकल्मशो दुराराध्यः सर्वावासः कृतागमः ।
वीर्यवान् स्मितभाशी च निवृत्तात्मा पुनर्वसुः ॥ १४॥

आध्यात्मयोगकुशलः सर्वायुधविशारदः ।
यज्ञस्वरूपी यज्ञेशो यज्ञपालः सनातनः ॥ १५॥

घनश्यामः स्मृतिः शूरो जरामरणवर्जितः ।
धीरोदात्तः सुरूपश्च सर्वतीर्थमयो विधिः ॥ १६॥

वर्णी वर्णाश्रमगुरुः सर्वजित्पुरुशोऽव्ययः ।
शिवशिक्षापरो युक्तः परमात्मा परायणः ॥ १७॥

प्रमाणरूपो दुर्ज्ञेयः पूर्णः क्रूरः कृतुर्विभुः ।
आनन्दोऽथ गुणश्रेष्ठोऽनन्तदृष्टीर्गुणाकरः ॥ १८॥

धनुर्धरो धनुर्वेदः सच्चिदानन्दविग्रहः ।
जनेश्वरोऽविनीतात्मा महाकायस्तपस्विराट् ॥ १९॥

अखिलाद्यो विश्वकर्मा विनीतात्मा विशारदः ।
अक्षरः केशवः साक्षी मरीचिः सर्वकामदः ॥ २०॥

कल्याणः प्रकृतिः कल्पः सर्वेशः पुरुशोत्तमः ।
लोकाध्यक्षो गभीरोऽथ सर्वभक्तवरप्रदः ॥ २१॥

ज्योतिरानन्दरूपश्च वह्नीरक्षय आश्रमी ।
भूर्भुवःस्वस्तपोमूर्ती रविः परशुधृक् स्वराट् ॥ २२॥

बहुश्रुतः सत्यवादी भ्राजिष्णुः सहनो बलः ।
सुखदः कारनं भोक्ता भवबन्ध विमोक्षकृत् ॥ २३॥

संसारतारको नेता सर्वदुःखविमोक्षकृत् ।
देवचूडामणिः कुन्दः सुतपा ब्रह्मवर्धनः ॥ २४॥

नित्योऽनियतकल्याणः शुद्धात्माथ पुरातनः ।
दुःस्वप्ननाशनो नीतिः किरीटीस्कन्ददर्पहृत् ॥ २५॥

अर्जुनप्राणहा वीरः सहस्रभुजजितद्धारीः ।
क्षत्रियान्तकरः शूरः क्षितिभारकरान्तकृत् ॥ २६॥

परश्वधधरो धन्वी रेणुकावाक्यतत्परः ।
वीरहा विशमो वीरः पितृवाक्यपरायणः ॥ २७॥

मातृप्राणद ईशश्च धर्मतत्त्वविशारदः ।
पितृक्रोधहरः क्रोधः सप्तजिह्वसमप्रभः ॥ २८॥

स्वभावभद्रः शत्रुघ्नः स्थाणुः शम्भुश्च केशवः ।
स्थविष्ठः स्थविरो बालः सूक्ष्मो लक्ष्यद्युतिर्महान् ॥ २९॥

ब्रह्मचारी विनीतात्मा रुद्राक्षवलयः सुधीः ।
अक्षकर्णः सहस्रांशुर्दीप्तः कैवल्यतत्परः ॥ ३०॥

आदित्यः कालरुद्रश्च कालचक्र प्रवर्तकः ।
कवची कुन्डली खड्गी चक्री भीम पराक्रमः ॥ ३१॥

मृत्युञ्जयो वीरसिंहो जगदात्मा जगत्गुरुः ।
अमृत्युः जन्मरहितः कालज्ञानी महापटुः ॥ ३२॥

निष्कलङ्को गुणग्रामोऽनिर्विण्णः स्मररूपधृक् ।
अनिर्वेद्यः शतावर्तो दण्डो दमयिता दमः ॥ ३३॥

प्रधानस् तारको धीमांस् तपस्वी भूतसारथिः ।
अहः संवत्सरो योगी संवत्सरकरो द्विजः ॥ ३४॥

शाश्वतो लोकनाथश्च शाखी दण्डी बली जटी ।
कालयोगी महानन्दः तिग्ममन्युः सुवर्चसः ॥ ३५॥

अमर्षणो मर्षणात्मा प्रशान्तात्मा हुताशनः ।
सर्ववासाः सर्वचारी सर्वाधारो विरोचनः ॥ ३६॥

हैमो हेमकरो धर्मो दुर्वासा वासवो यमः ।
उग्रतेजा महातेजा जयो विजयः कालजित् ॥ ३७॥

सह्स्रहस्तो विजयो दुर्धरो यज्ञभागभुक् ।
अग्निर्ज्वाली महाज्वालस्त्वतिधूमो हुतो हविः ॥ ३८॥

स्वस्तिदः स्वस्तिभागश्च महान्भर्गपरो युवा ।
महत्पादो महाहस्तो बृहत्कायो महायशाः ॥ ३९॥

महाकटिर्महाग्रीवो महाबाहुर्महाकरः ।
महानासो महाकम्बुर्महामायः पयोनिधिः ॥ ४०।
महावक्षा महौजाश्च महाकेशो महाजनः ।
महामूर्धा महामात्रो महाकर्णो महाहनुः ॥ ४१॥

वृक्षाकारो महाकेतुर्महादम्ष्ट्रो महामुखः ।
एकवीरो महावीरो वसुदः कालपूजितः ॥ ४२॥

महामेघनिनादी च महाघोषो महाद्युतिः ।
शैवः शैवागमाचारी हैहयानां कुलान्तकः ॥ ४३॥

सर्वगुह्यमयो वज्री बहुलः कर्मसाधनः ।
कामी कपिः कामपालः कामदेवः कृतागमः ॥ ४४॥

पञ्चविंशतितत्त्वज्ञः सर्वज्ञः सर्वगोचरः ।
लोकनेता महानादः कालयोगी महाबलः ॥ ४५॥

असङ्ख्येयोऽप्रमेयात्मा वीर्यकृद्वीर्यकोविदः ।
वेदवेद्यो वियद्गोप्ता सर्वा अमर मुनीश्वरः ॥ ४६॥

सुरेशः शरणं शर्म शब्दब्रह्म सताङ्गतिः ।
निर्लेपो निष्रप्रपन्चात्मा निर्व्यग्रो व्यग्रनाशनः ॥ ४७॥

शुद्धः पूतः शिवारम्भः सहस्रभुजजिद्ध्हरिः ।
निरवद्यपदोपाय सिद्धिदः सिद्धिसाधनः ॥ ४८॥

चतुर्भुजो महादेवो व्यूढरस्को जनेश्वरः ।
द्युतिमणिस्तरणिर्धन्यः कार्तवीर्य बलापहा ॥ ४९॥

लक्ष्मणाग्रजवन्द्यश्च नरो नारायणः प्रियः ।
एकज्योतिर्निरातञ्को मत्स्यरूपी जनप्रियः ॥ ५०॥

सुप्रीतः सुमुखः सूक्ष्मः कूर्मो वाराहकस्तथा ।
व्यापको नारसिंहश्च बलजिन्मधुसूदनः ॥ ५१॥

अपराजितः सर्वसहो भूषणो भूतवाहनः ।
निवृत्तः संवृत्तः शिल्पी क्षुद्रहा नित्यसुन्दरः ॥ ५२॥

स्तव्यः स्तवप्रियः स्तोता व्यासमूर्तिरनाकुलः ।
प्रशान्तबुद्धिरक्षुद्रः सर्वसत्त्वावलम्बनः ॥ ५३॥

परमार्थगुरुर्देवो माली संसारसारथिः ।
रसो रसज्ञः सारज्ञः कङ्कणीकृतवासुकिः ॥ ५४॥

कृष्णः कृष्णस्तुतो धीरो मायातीतो विमत्सरः ।
महेश्वरो महीभर्ता शाकल्यः शर्वरीपतिः ॥ ५५॥

तटस्थः कर्णदीक्षादः सुराध्यक्षः सुरारिहा ।
ध्येयोऽग्रधुर्यो धात्रीशो रुचिर्त्रिभुवनेश्वरः ॥ ५६॥

कर्माध्यक्षो निरालम्बः सर्वकाम्यः फलप्रदः ।
अव्यक्तलक्षणो व्यक्तो व्यक्ताव्यक्तो विशाम्पतिः ॥ ५७॥

त्रिलोकात्मा त्रिलोकेशो जगन्नाथो जनेश्वरः ।
ब्रह्मा हंसश्च रुद्रश्च स्रष्टा हर्ता चतुर्मुखः ॥ ५८॥

निर्मदो निरहन्कारो भृगुवंशोद्वहः शुभः ।
वेधा विधाता दृहिणो देवज्ञो देवचिन्तनः ॥ ५९॥

कैलासशिखरवासो ब्राह्मणो ब्राह्मणप्रियः ।
अर्थोऽनर्थो महाकोषो ज्येष्ठः श्रेष्ठः शुभाकृतिः ॥ ६०॥

बाणारिर्दमनो यज्वा स्निग्धप्रकृतिरग्नि यः ।
वरशीलो वरगुणः सत्यकीर्तिः कृपाकरः ॥ ६१॥

सत्त्ववान् सात्त्विको धर्मी बुद्धः कल्की सदाश्रयः ।
दर्पणो दर्पहा दर्पातीतो दृप्तः प्रवर्तकः ॥ ६२॥

अमृताशो अंऋतवपुर्वाङ्मयः सदसन्मयः ।
निधानगर्भो भूशायी कपिलो विश्वभोजनः ॥ ६३॥

प्रभविष्णुर्ग्रसिष्णुश्च चतुर्वर्गफलप्रदः ।
नारसिंहो महाभीमः शरभः कलिपावनः ॥ ६४॥

उग्रः पशुपतिर्भर्गो वैद्यः केशीनिशूदनः ।
गोविन्दो गोपतिर्गोप्ता गोपालो गोपवल्लभः ॥ ६५॥

भूतावासो गुहावासः सत्यवासः श्रुतागमः ।
निष्कङ्टकः सहस्रार्चिः स्निग्धः प्रकृति दक्षिणः ॥ ६६॥

अकम्पनू गुणग्राही सुप्रीतः प्रीतिवर्धनः ।
पद्मगर्भो महागर्भो वज्रगर्भो जलोद्भवः ॥ ६७॥

गभस्तिर्ब्रह्मकृद्ब्रह्म राजराजः स्वयम्भुवः ।
सेनानीरग्रणी साधुर्बलस्तालिकरो महान् ॥ ६८॥

पृथिवी वायुरापश्च तेजः खं बहुलोचनः ।
सहस्रमूर्द्धा देवेन्द्रः सर्वगुह्यमयो गुरुः ॥ ६९॥

अविनाशी सुखारामस्त्रिलोकी प्राणधारकः ।
निद्रारूपं क्षमा तन्द्रा धृतिर्मेधा स्वधा रविः ॥ ७०॥

होता नेता शिवस्त्राता सप्तजिह्वो विशुद्धपात् ।
स्वाहा हव्यश्च कव्यश्च शतघ्नी शतपाशधृक् ॥ ७१॥

आरोहश्च निरोहश्च तीर्थः तीर्थकरो हरः ।
चराचरात्मा सूक्ष्मस्तु विवस्वान् सवितामृतम् ॥ ७२॥

तुष्टीः पुष्टीः कला काष्ठा मासः पक्षस्तु वासरः ।
ऋतुर्युगादिकालस्तु लिङ्गंआत्माथ शाश्वतः ॥ ७३॥

छिरञ्जीवी प्रसन्नात्मा नकुलः प्राणधारणः ।
स्वर्गद्वारं प्रजाद्वारं मोक्षद्वारं त्रिविष्टपम् ॥ ७४॥

मुक्तिर्लक्ष्मीस्तथा भुक्तिर्विरजाविरजाम्बरः ।
विश्वक्षेत्रं सदाबीजं पुण्य श्रवण कीर्तनः ॥ ७५॥

भिक्षुर्भैक्ष्यं गृहं दारा यजमानश्च याचकः ।
पक्षी च पक्षवाहश्च मनोवेगो निशाचरः ॥ ७६॥

गजहा दैत्यहा नाकः पुरुभूउतः पुरुष्टुतः ।
बान्धवो बन्धुवर्गश्च पिता माता सखा सुतः ॥ ७७॥

गायत्री वल्लभः प्रांशुरमान्धाता भूतभावनः ।
सिद्धार्थकारी सर्वार्थदश्छन्दो व्याकरण श्रुतिः ॥ ७८॥

स्मृतिर्गाथोपशान्तिश्च पुराणः प्राणचञ्चुरः ।
वामनश्च जगत्कालः सकृतश्च युगाधिपः ॥ ७९॥

उद्गीथः प्रणवो भानुः स्कन्दो वैश्रवणस्तथा ।
अन्तरात्मा हृशीकेशः पद्मनाभः स्तुतिप्रियः ॥ ८०॥

परश्वधायुधः शाखी सिंहगः सिंहवाहनः ।
सिंहनादः सिंहदम्ष्ट्रो नगो मन्दरधृक्सरः ॥ ८१॥

सह्याचलनिवासी च महेन्द्रकृतसंश्रयः ।
मनोबुद्धिर् अहन्कारः कमलानन्दवर्धनः ॥ ८२॥

सनातनतमः स्रग्वी गदी शन्खी रथाङ्गभृत् ।
निरीहो निर्विकल्पश्च समर्थोऽनर्थनाशनः ॥ ८३॥

अकायो भक्तकायश्च माधवोऽथ सुरार्चितः ।
योद्धा जेता महावीर्यः शङ्करः सन्ततः स्तुतः ॥ ८४॥

विश्वेश्वरो विश्वमूर्तिर्विश्वरामोऽथ विश्वकृत् ।
आजानुबाहुः सुलभः परं ज्योतिः सनातनः ॥ ८५॥

वैकुण्ठः पुण्डरीकाक्षः सर्वभूताशय स्थितः ।
सहस्रशीर्शा पुरुशः सहस्राक्षः सहस्रपात् ॥ ८६॥

ऊर्ध्वरेताः ऊर्ध्वलिङ्गः प्रवरो वरदो वरः ।
उन्मत्तवेशः प्रच्छन्नः सप्तद्वीपमहीप्रदः ॥ ८७॥

द्विजधर्मप्रतिष्ठाता वेदात्मा वेदकृच्छ्रयः ।
नित्यः सम्पूर्णकामाश्च सर्वज्ञः कुशलागमः ॥ ८८॥

कृपापीयूषजलधिर्धाता कर्ता परात्परः ।
अचलो निर्मलस्तृप्तः स्वे महिम्नि प्रतिष्ठितः ॥ ८९॥

असहायः सहायश्च जगद्धेतुर कारणः ।
मोक्षदः कीर्तिश्चैव प्रेरकः कीर्तिनायकः ॥ ९०॥

अधर्मं शत्रुरक्षोभ्यो वामदेवो महाबलः ।
विश्ववीर्यो महावीर्यो श्रीनिवासः सतां गतिः ॥ ९१॥

स्वर्णवर्णो वराङ्गश्च सद्योगी च द्विजोत्तमः ।
नक्षत्रमाली सुरभिर्विमलो विश्वपावनः ॥ ९२॥

वसन्तो माधवो ग्रीष्मो नभस्यो बीजवाहनः ।
निदाघस्तपनो मेघो नभो योनिः पराशरः ॥ ९३॥

सुखानिलः सुनिष्पन्नः शिशिरो नरवाहनः ।
श्रीगर्भः कारणं जप्यो दुर्गः सत्यपराक्रमः ॥ ९४॥

आत्मभूरनिरुद्धश्च दत्तत्रेयस्त्रिविक्रमः ।
जमदग्निः बलनिधिः पुलस्त्यः पुलहोऽनिगराः ॥ ९५॥

वर्णी वर्णगुरुस्चण्डः कल्पवृक्षः कलाधरः ।
महेन्द्रो दुर्भरः सिद्धो योगाचार्यो बृहस्पतिः ॥ ९६॥

निराकारो विशुद्धश्च व्याधिहर्ता निरामयः ।
अमोघोऽनिष्टमथनो मुकुन्दो विगतज्वरः ॥ ९७॥

स्वयञ्ज्योतिर्गुरूत्तमः सुप्रसादोऽचलस्तथा ।
चन्द्रः सूर्यः शनिः केतुर्भूमिजः सोमनन्दनः ॥ ९८॥

भृगुर्महातपा दीर्घतपा सिद्धो महागुरुः ।
मन्त्री मन्त्रयिता मन्त्रो वाग्मी वसुमनाः स्थिरः ॥ ९९॥

अद्रिरद्रिशयो शम्भुर्माङ्गल्यो मङ्गलोवृतः ।
जयस्तम्भो जगत्स्तम्भो बहुरूपो गुणोत्तमः ॥ १००॥

सर्वदेवमयोऽचिन्त्यो देवात्मा विरूपधृक् ।
चतुर्वेदस्चतुर्भावस्चतुरः चतुरप्रियः ॥ १०१॥

आद्यन्तशून्यो वैकुण्ठः कर्मसाक्षी फलप्रदः ।
दृढायुधः स्कन्दगुरुः परमेष्ठीपरायणः ॥ १०२॥

कुबेरबन्धुः श्रीकण्ठो देवेशः सूर्यतापनः ।
अलुब्धः सर्वशास्त्रज्ञः शास्त्रार्थः परमः पुमान् ॥ १०३॥

अग्न्यास्यः पृथिवीपादो द्विमूर्धा दिक्ष्रुतिः परः ।
सोमान्तःकरणो ब्रह्ममुखः क्षत्रभुजस्तथा ॥ १०४॥

वैश्योरू शूद्रपादस्तु नदी सर्वाङ्ग सन्धिकः ।
जीमूतकेशोऽब्धिकुक्षिस्तु वैकुन्ठो विष्टरश्रवाः ॥ १०५॥

क्षेत्रज्ञः तमसः पारी भृगुवंशोद्भवोऽवनिः ।
आत्मयोनी रेणुकेयो महादेवो गुरुः सुरः ॥ १०६॥

Eको नैकोऽक्षरः श्रीशः श्रीपतिर्दुःखभेषजम् ।
हृशीकेशोऽथ भगवान सर्वात्मा विश्वपावनः ॥ १०७॥

विश्वकर्मापवर्गोऽथ लम्बोदरशरीरधृक् ।
अक्रोधोऽद्रोह मोहश्च सर्वतोऽनन्तधृक्तथा ॥ १०८॥

कैवल्यदीपः कैवल्यः साक्षी चेताः विभावसुः ।
एकवीरात्मजो भद्रोऽभद्रहा कैटभार्दनः ॥ १०९॥

विबुधोऽग्रवरः श्रेष्ठः सर्वदेवोत्तमोत्तमः ।
शिवध्यानरतो दिव्यो नित्ययोगी जितेन्द्रियः ॥ ११०॥

कर्मसत्यं व्रतञ्चैव भक्तानुग्रहकृद्धरिः ।
सर्गस्थित्यन्तकृत् रामो विद्याराशिः गुरूत्तमः ॥ १११॥

रेणुकाप्राणलिङ्गं च भृगुवंश्यः शतक्रतुः ।
श्रुतिमानेकबन्धुश्च शान्तभद्रः समञ्जसः ॥ ११२॥

आध्यात्मविद्यासारश्च कालभक्षो विशृङ्खलः ।
राजेन्द्रो भूपतिर्योगी निर्मायो निर्गुणो गुणी ॥ ११३॥

हिरण्मयः पुराणश्च बलभद्रो जगत्प्रदः ।
वेदवेदाङ्गपारज्ञः सर्वकर्मा महेश्वरः ॥ ११४॥

॥ फलश्रुतिः ॥

एवं नाम्नां सहस्रेण तुष्टाव भृगुवंशजम् ।
श्रीरामः पूजयामास प्रणिपातपुरःसरम् ॥ १॥

कोटिसूर्यप्रतीकाशो जटामुकुटभूषितः ।
वेदवेदाङ्गपारज्ञः स्वधर्मनिरतः कविः ॥ २॥

ज्वालामालावृतो धन्वी तुष्टः प्राह रघूत्तमम् ।
सर्वैश्वर्यसमायुक्तं तुभ्यं प्रणति रघूत्तमम् ॥ ३॥

स्वतेजो निर्गतं तस्मात् प्राविशद् राघवं ततः ।
यदा विनिर्गतं तेजः ब्रह्माद्याः सकलाः सुराः ॥ ४॥

चेलुश्च ब्रह्मसदनं च कम्पे च वसुन्धरा ।
ददाह भार्गवं तेजः प्रान्ते वै शतयोजनाम् ॥ ५॥

अधस्तादूर्ध्वतश्चैव हाहेति कृतवाञ्जनः ।
तदा प्राह महायोगी प्रहसन् इव भार्गवः ॥ ६॥

श्रीभार्गव उवाच –
मा भैष्ट सैनिका रामो मत्तो भिन्नो न नामतः ।
रूपेणाप्रतिमेनापि महदाश्चर्यमद्भुतम् ॥। ७॥

श्रीराम उवाच –
यद्रूपं भवतो लब्धं सर्वलोकभयन्करम् ।
हितं च जगतां तेन देवानां दुःखशातनम् ॥ ८॥

जनार्दनकरोम्यद्य विष्णो भृगुकुलोद्वः ।
आशीषो देहि विप्रेन्द्र भार्गवस्तदनन्तरम् ॥ ९॥

उवाचाशीर्वचो योगी राघवाय महात्मने ।
परं प्रहर्षमापन्नो भगवान राममब्रवीत् ॥ १०॥

श्रीभार्गव उवाच –
धर्मे दृढत्वं युधि शत्रुघातो यशस्तथाद्यं परमं बलञ्च ।
योगप्रियत्वं मम सन्निकर्शः सदास्तु ते राघव राघवेशः ॥ ११॥

तुष्टोऽथ राघवः प्राह मया प्रोक्तं स्तवं तव ।
यः पठेच्छृणुयाद्वापि श्रावयेद्वा द्विजोत्तमान् ॥ १२॥

द्विजेश्वकोपं पितृतः प्रसादं शतं समानं उपभोगयुक्तम् ।
कुले प्रसूतिं मातृतः प्रसादं समां प्राप्तिं प्राप्नुयाच्चापि दाक्ष्यम् ॥ १३॥

प्रीतिं चाग्र्यां बान्धवानां निरोगम् ।
कुलं प्रसूतैः पौत्रवर्गैः समेतम् ॥ १४॥

अश्वमेधसहस्रेण फलं भवति तस्य वै ।
धृताद्यैः स्नापयेद्रामं स्थाल्यां वै कलशे स्थितम् ॥ १५॥

नाम्नां सहस्रेणानेन श्रद्धया भार्गवं हरिम् ।
सोऽपि यज्ञसहस्रस्य फलं भवति वाञ्छितम् ॥ १६॥

पूज्यो भवति रुद्रस्य मम चापि विशेषतः ।
तस्मान् नाम्नां सहस्रेण पूजयेत् यो जगत्गुरुम् ॥ १७॥

जपन्नाम्नां सहस्रं च स याति परमां गतिम् ।
श्रीः कीर्तिर्धीर्धृतिस्तुष्टिः सन्ततिश्च निरामया ॥ १८॥

अणिमा लघिमा प्राप्तिरैश्वर्याद्याश्च च सिद्धयः ।
सर्वभूतसुहृत्वं च लोके वृद्धीः परामतिः ॥ १९॥

भवेत्प्रातस्च मध्यान्हे सायं च जगतो हरेः ।
नामानि ध्यायतो राम सान्निध्यं च हरेर्भवेत् ॥ २०॥

अयने विषुवे चैव जपन्त्वालिख्य पुस्तकम् ।
दद्याद्वै यो वैष्णवेभ्यो नष्टबन्धो न जायते ॥ २१॥

न भवेच्च कुले तस्य कश्चिल्लक्ष्मीविवर्जितः ।
वरदो भार्गवस्तस्य लभते च सतां गतिम् ॥ २२॥

॥ इति श्री अग्निपुराणे दाशरथिरामप्रोक्तं
श्रीपरशुरामसहस्रनामस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

॥ श्रीपरशुरामाष्टकम् ॥

शुभ्रदेहं सदा क्रोधरक्तेक्षणम्
भक्तपालं कृपालुं कृपावारिधिम्
विप्रवंशावतंसं धनुर्धारिणम्
भव्ययज्ञोपवीतं कलाकारिणम्
यस्य हस्ते कुठारं महातीक्ष्णकम्
रेणुकानन्दनं जामदग्न्यं भजे ॥ १॥

सौम्यरुपं मनोज्ञं सुरैर्वन्दितम्
जन्मतः ब्रह्मचारिव्रते सुस्थिरम्
पूर्णतेजस्विनं योगयोगीश्वरम्
पापसन्तापरोगादिसंहारिणम्
दिव्यभव्यात्मकं शत्रुसंहारकम्
रेणुकानन्दनं जामदग्न्यं भजे ॥ २॥

ऋद्धिसिद्धिप्रदाता विधाता भुवो
ज्ञानविज्ञानदाता प्रदाता सुखम्
विश्वधाता सुत्राताऽखिलं विष्टपम्
तत्वज्ञाता सदा पातु माम् निर्बलम्
पूज्यमानं निशानाथभासं विभुम्
रेणुकानन्दनं जामदग्न्यं भजे ॥ ३॥

दुःख दारिद्र्यदावाग्नये तोयदम्
बुद्धिजाड्यं विनाशाय चैतन्यदम्
वित्तमैश्वर्यदानाय वित्तेश्वरम्
सर्वशक्तिप्रदानाय लक्ष्मीपतिम्
मङ्गलं ज्ञानगम्यं जगत्पालकम्
रेणुकानन्दनं जामदग्न्यं भजे ॥ ४॥

यश्च हन्ता सहस्रार्जुनं हैहयम्
त्रैगुणं सप्तकृत्वा महाक्रोधनैः
दुष्टशून्या धरा येन सत्यं कृता
दिव्यदेहं दयादानदेवं भजे
घोररूपं महातेजसं वीरकम्
रेणुकानन्दनं जामदग्न्यं भजे ॥ ५॥

मारयित्वा महादुष्ट भूपालकान्
येन शोणेन कुण्डेकृतं तर्पणम्
येन शोणीकृता शोणनाम्नी नदी
स्वस्य देशस्य मूढा हताः द्रोहिणः
स्वस्य राष्ट्रस्य शुद्धिःकृता शोभना
रेणुकानन्दनं जामदग्न्यं भजे ॥ ६॥

दीनत्राता प्रभो पाहि माम् पालक!
रक्ष संसाररक्षाविधौ दक्षक!
देहि संमोहनी भाविनी पावनी
स्वीय पादारविन्दस्य सेवा परा
पूर्णमारुण्यरूपं परं मञ्जुलम्
रेणुकानन्दनं जामदग्न्यं भजे ॥ ७॥

ये जयोद्घोषकाः पादसम्पूजकाः
सत्वरं वाञ्छितं ते लभन्ते नराः
देहगेहादिसौख्यं परं प्राप्य वै
दिव्यलोकं तथान्ते प्रियं यान्ति ते
भक्तसंरक्षकं विश्वसम्पालकम्
रेणुकानन्दनं जामदग्न्यं भजे ॥ ८॥

॥ इति श्रीपरशुरामाष्टकं सम्पूर्णम् ॥

॥ परशुरामाष्टाविंशतिनामस्तोत्रम् ॥

श्री गणेशाय नमः ।
ऋषिरुवाच ।
यमाहुर्वासुदेवांशं हैहयानां कुलान्तकम् ।
त्रिःसप्तकृत्वो य इमां चक्रे निःक्षत्रियां महीम् ॥ १॥

दुष्टं क्षत्रं भुवो भारमब्रह्मण्यमनीनशत् ।
तस्य नामानि पुण्यानि वच्मि ते पुरुषर्षभ ॥ २॥

भूभारहरणार्थाय मायामानुषविग्रहः ।
जनार्दनांशसम्भूतः स्थित्युत्पत्त्यप्ययेश्वरः ॥ ३॥

भार्गवो जामदग्न्यश्च पित्राज्ञापरिपालकः ।
मातृप्राणप्रदो धीमान् क्षत्रियान्तकरः प्रभुः ॥ ४॥

रामः परशुहस्तश्च कार्तवीर्यमदापहः ।
रेणुकादुःखशोकघ्‍नो विशोकः शोकनाशनः ॥ ५॥

नवीननीरदश्यामो रक्‍तोत्पलविलोचनः ।
घोरो दण्डधरो धीरो ब्रह्मण्यो ब्राह्मणप्रियः ॥ ६॥

तपोधनो महेन्द्रादौ न्यस्तदण्डः प्रशान्तधीः ।
उपगीयमानचरितः सिद्धगन्धर्वचारणैः ॥ ७॥

जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखशोकभयातिगः ।
इत्यष्टाविंशतिर्नाम्नामुक्‍ता स्तोत्रात्मिका शुभा ॥ ८॥

अनया प्रीयतां देवो जामदग्न्यो महेश्वरः ।
नेदं स्तोत्रमशान्ताय नादान्तायातपस्विने ॥ ९॥

नावेदविदुषे वाच्यमशिष्याय खलाय च ।
नासूयकायानृजवे न चानिर्दिष्टकारिणे ॥ १०॥

इदं प्रियाय पुत्राय शिष्यायानुगताय च ।
रहस्यधर्मो वक्‍तव्यो नान्यस्मै तु कदाचन ॥ ११॥

॥ इति परशुरामाष्टाविंशतिनामस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

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Posted by admin - March 16, 2020 at 5:57 pm

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श्रीरामरक्षास्तोत्र Shree Ram Raksha Stotram

श्रीरामरक्षास्तोत्र का पाठ समस्त विघ्न बाधाओं से रक्षा!

विनियोगः
अस्य श्रीरामरक्षास्तोत्रमन्त्रस्य बुधकौशिक ऋषिः। श्री सीतारामचंद्रो देवता । अनुष्टुप्‌ छंदः। सीता शक्तिः। श्रीमान हनुमान्‌ कीलकम्‌। श्री सीतारामचंद्रप्रीत्यर्थे रामरक्षास्तोत्रजपे विनियोगः।

अथ ध्यानम्‌:
ध्यायेदाजानुबाहुं धृतशरधनुषं बद्धपद्मासनस्थं पीतं वासो वसानं नवकमलदलस्पर्धिनेत्रं प्रसन्नम्‌। वामांकारूढसीतामुखकमलमिलल्लोचनं नीरदाभं नानालंकार दीप्तं दधतमुरुजटामंडलं रामचंद्रम।

चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरम्‌ ।
एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम्‌ ॥1॥
ध्यात्वा नीलोत्पलश्यामं रामं राजीवलोचनम्‌ ।
जानकीलक्ष्मणोपेतं जटामुकुटमंडितम्‌ ॥2॥
सासितूणधनुर्बाणपाणिं नक्तंचरांतकम्‌ ।
स्वलीलया जगत्त्रातुमाविर्भूतमजं विभुम्‌ ॥3॥
रामरक्षां पठेत्प्राज्ञः पापघ्नीं सर्वकामदाम्‌ ।
शिरो मे राघवः पातु भालं दशरथात्मजः ॥4॥
कौसल्येयो दृशौ पातु विश्वामित्रप्रियः श्रुती ।
घ्राणं पातु मखत्राता मुखं सौमित्रिवत्सलः ॥5॥
जिह्वां विद्यानिधिः पातु कण्ठं भरतवंदितः ।
स्कंधौ दिव्यायुधः पातु भुजौ भग्नेशकार्मुकः ॥6॥
करौ सीतापतिः पातु हृदयं जामदग्न्यजित्‌ ।
मध्यं पातु खरध्वंसी नाभिं जाम्बवदाश्रयः ॥7॥
सुग्रीवेशः कटी पातु सक्थिनी हनुमत्प्रभुः ।
उरू रघूत्तमः पातु रक्षःकुलविनाशकृत्‌ ॥8॥
जानुनी सेतुकृत्पातु जंघे दशमुखान्तकः ।
पादौ विभीषणश्रीदः पातु रामोऽखिलं वपुः ॥9॥
एतां रामबलोपेतां रक्षां यः सुकृती पठेत्‌ ।
स चिरायुः सुखी पुत्री विजयी विनयी भवेत्‌ ॥10॥
पातालभूतलव्योमचारिणश्छद्मचारिणः ।
न दृष्टुमति शक्तास्ते रक्षितं रामनामभिः ॥11॥
रामेति रामभद्रेति रामचन्द्रेति वा स्मरन्‌ ।
नरो न लिप्यते पापैर्भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति ॥12॥
जगज्जैत्रैकमन्त्रेण रामनाम्नाऽभिरक्षितम्‌ ।
यः कण्ठे धारयेत्तस्य करस्थाः सर्वसिद्धयः ॥13॥
वज्रपंजरनामेदं यो रामकवचं स्मरेत्‌ ।
अव्याहताज्ञः सर्वत्र लभते जयमंगलम्‌ ॥14॥
आदिष्टवान्यथा स्वप्ने रामरक्षामिमां हरः ।
तथा लिखितवान्प्रातः प्रबुद्धो बुधकौशिकः ॥15॥
आरामः कल्पवृक्षाणां विरामः सकलापदाम्‌ ।
अभिरामस्रिलोकानां रामः श्रीमान्स नः प्रभुः ॥16॥
तरुणौ रूप सम्पन्नौ सुकुमारौ महाबलौ ।
पुण्डरीकविशालाक्षौ चीरकृष्णाजिनाम्बरौ ॥17॥
फलमूलाशिनौ दान्तौ तापसौ ब्रह्मचारिणौ ।
पुत्रौ दशरथस्यैतौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥18॥
शरण्यौ सर्र्र्वसत्त्वानां श्रेष्ठौ सर्वधनुष्मताम्‌ ।
रक्षःकुलनिहन्तारौ त्रायेतां नो रघूत्तमौ ॥19॥
आत्तसज्जधनुषाविषुस्पृशावक्षयाशुगनिषंगसंगिनौ ।
रक्षणाय मम रामलक्ष्मणावग्रतः पथि सदैव गच्छताम्‌ ॥20॥
सन्नद्धः कवची खड्गी चापबाणधरो युवा ।
गच्छन्मनोरथान्नश्च रामः पातु सलक्ष्मणः ॥21॥
रामो दाशरथिः शूरो लक्ष्मणानुचरो बली ।
काकुत्स्थः पुरुषः पूर्णः कौसल्येयो रघूत्तमः ॥22॥
वेदान्तवेद्यो यज्ञेशः पुराणपुरुषोत्तमः ।
जानकीवल्लभः श्रीमानप्रमेयपराक्रमः ॥23॥
इत्येतानि जपन्नित्यं मद्भक्तः श्रद्धयाऽन्वितः ।
अश्वमेधाधिकं पुण्यं सम्प्राप्नोति न संशयः ॥24॥
रामं दूवार्दलश्यामं पद्माक्षं पीतवाससम्‌ ।
स्तुवन्ति नामभिर्दिव्यैर्न ते संसारिणो नराः ॥25॥
रामं लक्ष्मणपूर्वजं रघुवरं सीतापतिं सुन्दरं
काकुत्स्थं करुणार्णवं गुणनिधिं विप्रप्रियं धार्मिकम्‌ ।
राजेन्द्रं सत्यसंधं दशरथतनयं श्यामलं शान्तमूर्तिं
वन्दे लोकाभिरामं रघुकुलतिलकं राघवं रावणारिम्‌ ॥26॥
रामाय रामभद्राय रामचन्द्राय वेधसे ।
रघुनाथाय नाथाय सीतायाः पतये नमः ॥27॥
श्रीराम राम रघुनन्दनराम राम
श्रीराम राम भरताग्रज राम राम ।
श्रीराम राम रणकर्कश राम राम
श्रीराम राम शरणं भव राम राम ॥28॥
श्रीरामचन्द्रचरणौ मनसा स्मरामि
श्रीरामचन्द्रचरणौ वचंसा गृणामि ।
श्रीरामचन्द्रचरणौ शिरसा नमामि
श्रीरामचन्द्रचरणौ शरणं प्रपद्ये ॥29॥
माता रामो मत्पिता रामचन्द्रः
स्वामी रामो मत्सखा रामचन्द्रः ।
सर्वस्वं मे रामचन्द्रो दयलुर्नान्यं
जाने नैव जाने न जाने ॥30॥
दक्षिणे लक्ष्मणो यस्य वामे तु जनकात्मजा ।
पुरतो मारुतिर्यस्य तं वंदे रघुनन्दनम्‌ ॥31॥
लोकाभिरामं रणरंगधीरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम ।
कारुण्यरूपं करुणाकरं तं श्रीरामचंद्रं शरणं प्रपद्ये ॥32॥
मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्‌ ।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये ॥33॥
कूजन्तं राम रामेति मधुरं मधुराक्षरम्‌ ।
आरुह्य कविताशाखां वन्दे वाल्मीकिकोकिलम्‌ ॥34॥
आपदामपहर्तारं दातारं सर्वसम्पदाम्‌ ।
लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम्‌ ॥35॥
भर्जनं भवबीजानामर्जनं सुखसम्पदाम्‌ ।
तर्जनं यमदूतानां राम रामेति गर्जनम्‌ ॥36॥
रामो राजमणिः सदा विजयते रामं रामेशं भजे
रामेणाभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मै नमः ।
रामान्नास्ति परायणं परतरं रामस्य दासोऽस्म्यहं
रामे चित्तलयः सदा भवतु मे भो राम मामुद्धर ॥37॥
राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे ।
सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने ॥38॥

॥ श्री बुधकौशिकविरचितं श्रीरामरक्षास्तोत्रं सम्पूर्ण ॥

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पाठ विधि
कहा जाता है कि ए‍क दिन भगवान शंकर ने बुधकौशिक ऋषि को स्वप्न में दर्शन देकर, उन्हें रामरक्षास्‍त्रोत सुनाया था. और प्रातःकाल उठने पर उन्होंने इस स्‍त्रोत को लिख लिया. ये स्‍त्रोत संस्कृत में है और इसके पाठ को काफी प्रभावी माना जाता है। इसकी पाठ विधि इस प्रकार है। ** पहले हाथ में जल लेकर इसे पढ़ें… विनियोग: “अस्य श्रीरामरक्षास्त्रोतमन्त्रस्य बुधकौशिक ऋषिः। श्री सीतारामचंद्रो देवता। अनुष्टुप छंदः। सीता शक्तिः। श्रीमान हनुमान कीलकम। श्री सीतारामचंद्रप्रीत्यर्थे रामरक्षास्त्रोतजपे विनियोगः।”

अब जल को जमीन पर छोड़ दें और फिर भगवान राम का ध्‍यान करें… “ध्यायेदाजानुबाहुं धृतशरधनुषं बद्धपदमासनस्थं पीतं वासो वसानं नवकमल दल स्पर्धिनेत्रम् प्रसन्नम। वामांकारूढ़ सीता मुखकमलमिलल्लोचनम् नीरदाभम् नानालंकारदीप्तं दधतमुरुजटामण्डलम् रामचंद्रम ।।” ध्यान के पश्चात श्रीरामरक्षा स्रोत का पाठ करें। नवरात्रियों में प्रतिदिन ग्यारह पाठ करने से यह सिद्ध हो जाता है।

श्रीरामरक्षास्तोत्र का महत्व

  • सभी तरह की विपत्तियों से रक्षा करता है। – इसका पाठ करने से मनुष्य भय रहित हो जाता है। – इसके नित्य पाठ से कष्ट दूर होते हैं। – जो इसका पाठ करता है वह दीर्घायु, सुखी, संततिवान, विजयी तथा विनयसंपन्न होता है। – इससे मंगल का कुप्रभाव समाप्त होता है। – मान्‍यता है कि इसके प्रभाव से व्यक्ति के चारों और सुरक्षा कवच बनता है, जिससे हर प्रकार की विपत्ति से रक्षा होती है। – इसके पाठ से भगवान राम के साथ पवनपुत्र हनुमान भी प्रसन्न होते हैं।

चमत्कारी है राम रक्षा स्त्रोत ——–मुर्दे में भी जान डाल देता है राम रक्षा स्त्रोत

राम रक्षा स्त्रोत को ग्यारह बार एक बार में पढ़ लिया जाए तो पूरे दिन तक इसका प्रभाव रहता है। अगर आप रोज ४५ दिन तक राम रक्षा स्त्रोत का पाठ करते हैं तो इसके फल की अवधि बढ़ जाती है। इसका प्रभाव दुगुना तथा दो दिन तक रहने लगता है और भी अच्छा होगा यदि कोई राम रक्षा स्त्रोत को नवरात्रों में प्रतिदिन ११ बार पढ़े ।
सरसों के दाने एक कटोरी में दाल लें। कटोरी के नीचे कोई ऊनी वस्त्र या आसन होना चाहिए। राम रक्षा मन्त्र को ११ बार पढ़ें और इस दौरान आपको अपनी उँगलियों से सरसों के दानों को कटोरी में घुमाते रहना है। ध्यान रहे कि आप किसी आसन पर बैठे हों और राम रक्षा यंत्र आपके सम्मुख हो या फिर श्री राम कि प्रतिमा या फोटो आपके आगे होनी चाहिए जिसे देखते हुए आपको मन्त्र पढ़ना है। ग्यारह बार के जाप से सरसों सिद्ध हो जायेगी और आप उस सरसों के दानों को शुद्ध और सुरक्षित पूजा स्थान पर रख लें। जब आवश्यकता पड़े तो कुछ दाने लेकर आजमायें। सफलता अवश्य प्राप्त होगी।
वाद विवाद या मुकदमा हो तो उस दिन सरसों के दाने साथ लेकर जाएँ और वहां दाल दें जहाँ विरोधी बैठता है या उसके सम्मुख फेंक दें। सफलता आपके कदम चूमेगी।
खेल या प्रतियोगिता या साक्षात्कार में आप सिद्ध सरसों को साथ ले जाएँ और अपनी जेब में रखें।
अनिष्ट की आशंका हो तो भी सिद्ध सरसों को साथ में रखें।
यात्रा में साथ ले जाएँ आपका कार्य सफल होगा।
राम रक्षा स्त्रोत से पानी सिद्ध करके रोगी को पिलाया जा सकता है परन्तु पानी को सिद्ध करने कि विधि अलग है। इसके लिए ताम्बे के बर्तन को केवल हाथ में पकड़ कर रखना है और अपनी दृष्टि पानी में रखें और महसूस करें कि आपकी सारी शक्ति पानी में जा रही है। इस समय अपना ध्यान श्री राम की स्तुति में लगाये रखें। मन्त्र बोलते समय प्रयास करें कि आपको हर वाक्य का अर्थ ज्ञात रहे।
॥ श्रीरामरक्षास्तोत्रम्‌ ॥
श्रीगणेशायनम: ।
अस्य श्रीरामरक्षास्तोत्रमन्त्रस्य ।
बुधकौशिक ऋषि: ।
श्रीसीतारामचंद्रोदेवता ।
अनुष्टुप्‌ छन्द: । सीता शक्ति: ।
श्रीमद्‌हनुमान्‌ कीलकम्‌ ।
श्रीसीतारामचंद्रप्रीत्यर्थे जपे विनियोग: ॥
अर्थ: — इस राम रक्षा स्तोत्र मंत्र के रचयिता बुध कौशिक ऋषि हैं, सीता और रामचंद्र देवता हैं, अनुष्टुप छंद हैं, सीता शक्ति हैं, हनुमान जी कीलक है तथा श्री रामचंद्र जी की प्रसन्नता के लिए राम रक्षा स्तोत्र के जप में विनियोग किया जाता हैं |
॥ अथ ध्यानम्‌ ॥
ध्यायेदाजानुबाहुं धृतशरधनुषं बद्दद्पद्‌मासनस्थं ।
पीतं वासोवसानं नवकमलदलस्पर्धिनेत्रं प्रसन्नम्‌ ॥
वामाङ्‌कारूढसीता मुखकमलमिलल्लोचनं नीरदाभं ।
नानालङ्‌कारदीप्तं दधतमुरुजटामण्डनं रामचंद्रम्‌ ॥
ध्यान धरिए — जो धनुष-बाण धारण किए हुए हैं,बद्द पद्मासन की मुद्रा में विराजमान हैं और पीतांबर पहने हुए हैं, जिनके आलोकित नेत्र नए कमल दल के समान स्पर्धा करते हैं, जो बाएँ ओर स्थित सीताजी के मुख कमल से मिले हुए हैं- उन आजानु बाहु, मेघश्याम,विभिन्न अलंकारों से विभूषित तथा जटाधारी श्रीराम का ध्यान करें |
॥ इति ध्यानम्‌ ॥
चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरम्‌ ।
एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम्‌ ॥१॥
श्री रघुनाथजी का चरित्र सौ करोड़ विस्तार वाला हैं | उसका एक-एक अक्षर महापातकों को नष्ट करने वाला है |
ध्यात्वा नीलोत्पलश्यामं रामं राजीवलोचनम्‌ ।
जानकीलक्ष्मणॊपेतं जटामुकुटमण्डितम्‌ ॥२॥
नीले कमल के श्याम वर्ण वाले, कमलनेत्र वाले , जटाओं के मुकुट से सुशोभित, जानकी तथा लक्ष्मण सहित ऐसे भगवान् श्री राम का स्मरण करके,
सासितूणधनुर्बाणपाणिं नक्तं चरान्तकम्‌ ।
स्वलीलया जगत्त्रातुमाविर्भूतमजं विभुम्‌ ॥३॥
जो अजन्मा एवं सर्वव्यापक, हाथों में खड्ग, तुणीर, धनुष-बाण धारण किए राक्षसों के संहार तथा अपनी लीलाओं से जगत रक्षा हेतु अवतीर्ण श्रीराम का स्मरण करके,
रामरक्षां पठॆत्प्राज्ञ: पापघ्नीं सर्वकामदाम्‌ ।
शिरो मे राघव: पातु भालं दशरथात्मज: ॥४॥
मैं सर्वकामप्रद और पापों को नष्ट करने वाले राम रक्षा स्तोत्र का पाठ करता हूँ | राघव मेरे सिर की और दशरथ के पुत्र मेरे ललाट की रक्षा करें |
कौसल्येयो दृशौ पातु विश्वामित्रप्रिय: श्रुती ।
घ्राणं पातु मखत्राता मुखं सौमित्रिवत्सल: ॥५॥
कौशल्या नंदन मेरे नेत्रों की, विश्वामित्र के प्रिय मेरे कानों की, यज्ञरक्षक मेरे घ्राण की और सुमित्रा के वत्सल मेरे मुख की रक्षा करें |
जिव्हां विद्दानिधि: पातु कण्ठं भरतवंदित: ।
स्कन्धौ दिव्यायुध: पातु भुजौ भग्नेशकार्मुक: ॥६॥
मेरी जिह्वा की विधानिधि रक्षा करें, कंठ की भरत-वंदित, कंधों की दिव्यायुध और भुजाओं की महादेवजी का धनुष तोड़ने वाले भगवान् श्रीराम रक्षा करें |
करौ सीतपति: पातु हृदयं जामदग्न्यजित्‌ ।
मध्यं पातु खरध्वंसी नाभिं जाम्बवदाश्रय: ॥७॥
मेरे हाथों की सीता पति श्रीराम रक्षा करें, हृदय की जमदग्नि ऋषि के पुत्र (परशुराम) को जीतने वाले, मध्य भाग की खर (नाम के राक्षस) के वधकर्ता और नाभि की जांबवान के आश्रयदाता रक्षा करें |
सुग्रीवेश: कटी पातु सक्थिनी हनुमत्प्रभु: ।
ऊरू रघुत्तम: पातु रक्ष:कुलविनाशकृत्‌ ॥८॥
मेरे कमर की सुग्रीव के स्वामी, हडियों की हनुमान के प्रभु और रानों की राक्षस कुल का विनाश करने वाले रघुश्रेष्ठ रक्षा करें |
जानुनी सेतुकृत्पातु जङ्‌घे दशमुखान्तक: ।
पादौ बिभीषणश्रीद: पातु रामोSखिलं वपु: ॥९॥
मेरे जानुओं की सेतुकृत, जंघाओं की दशानन वधकर्ता, चरणों की विभीषण को ऐश्वर्य प्रदान करने वाले और सम्पूर्ण शरीर की श्रीराम रक्षा करें |
एतां रामबलोपेतां रक्षां य: सुकृती पठॆत्‌ ।
स चिरायु: सुखी पुत्री विजयी विनयी भवेत्‌ ॥१०॥
शुभ कार्य करने वाला जो भक्त भक्ति एवं श्रद्धा के साथ रामबल से संयुक्त होकर इस स्तोत्र का पाठ करता हैं, वह दीर्घायु, सुखी, पुत्रवान, विजयी और विनयशील हो जाता हैं |
पातालभूतलव्योम चारिणश्छद्‌मचारिण: ।
न द्र्ष्टुमपि शक्तास्ते रक्षितं रामनामभि: ॥११॥
जो जीव पाताल, पृथ्वी और आकाश में विचरते रहते हैं अथवा छद्दम वेश में घूमते रहते हैं , वे राम नामों से सुरक्षित मनुष्य को देख भी नहीं पाते |
रामेति रामभद्रेति रामचंद्रेति वा स्मरन्‌ ।
नरो न लिप्यते पापै भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति ॥१२॥
राम, रामभद्र तथा रामचंद्र आदि नामों का स्मरण करने वाला रामभक्त पापों से लिप्त नहीं होता. इतना ही नहीं, वह अवश्य ही भोग और मोक्ष दोनों को प्राप्त करता है |
जगज्जेत्रैकमन्त्रेण रामनाम्नाभिरक्षितम्‌ ।
य: कण्ठे धारयेत्तस्य करस्था: सर्वसिद्द्दय: ॥१३॥
जो संसार पर विजय करने वाले मंत्र राम-नाम से सुरक्षित इस स्तोत्र को कंठस्थ कर लेता हैं, उसे सम्पूर्ण सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं |
वज्रपंजरनामेदं यो रामकवचं स्मरेत्‌ ।
अव्याहताज्ञ: सर्वत्र लभते जयमंगलम्‌ ॥१४॥
जो मनुष्य वज्रपंजर नामक इस राम कवच का स्मरण करता हैं, उसकी आज्ञा का कहीं भी उल्लंघन नहीं होता तथा उसे सदैव विजय और मंगल की ही प्राप्ति होती हैं |
आदिष्टवान्यथा स्वप्ने रामरक्षामिमां हर: ।
तथा लिखितवान्‌ प्रात: प्रबुद्धो बुधकौशिक: ॥१५॥
भगवान् शंकर ने स्वप्न में इस रामरक्षा स्तोत्र का आदेश बुध कौशिक ऋषि को दिया था, उन्होंने प्रातः काल जागने पर उसे वैसा ही लिख दिया |
आराम: कल्पवृक्षाणां विराम: सकलापदाम्‌ ।
अभिरामस्त्रिलोकानां राम: श्रीमान्‌ स न: प्रभु: ॥१६॥
जो कल्प वृक्षों के बगीचे के समान विश्राम देने वाले हैं, जो समस्त विपत्तियों को दूर करने वाले हैं (विराम माने थमा देना, किसको थमा देना/दूर कर देना ? सकलापदाम = सकल आपदा = सारी विपत्तियों को) और जो तीनो लोकों में सुंदर (अभिराम + स्+ त्रिलोकानाम) हैं, वही श्रीमान राम हमारे प्रभु हैं |
तरुणौ रूपसंपन्नौ सुकुमारौ महाबलौ ।
पुण्डरीकविशालाक्षौ चीरकृष्णाजिनाम्बरौ ॥१७॥
जो युवा,सुन्दर, सुकुमार,महाबली और कमल (पुण्डरीक) के समान विशाल नेत्रों वाले हैं, मुनियों की तरह वस्त्र एवं काले मृग का चर्म धारण करते हैं |
फलमूलशिनौ दान्तौ तापसौ ब्रह्मचारिणौ ।
पुत्रौ दशरथस्यैतौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥१८॥
जो फल और कंद का आहार ग्रहण करते हैं, जो संयमी , तपस्वी एवं ब्रह्रमचारी हैं , वे दशरथ के पुत्र राम और लक्ष्मण दोनों भाई हमारी रक्षा करें |
शरण्यौ सर्वसत्वानां श्रेष्ठौ सर्वधनुष्मताम्‌ ।
रक्ष:कुलनिहन्तारौ त्रायेतां नो रघुत्तमौ ॥१९॥
ऐसे महाबली – रघुश्रेष्ठ मर्यादा पुरूषोतम समस्त प्राणियों के शरणदाता, सभी धनुर्धारियों में श्रेष्ठ और राक्षसों के कुलों का समूल नाश करने में समर्थ हमारा त्राण करें |
आत्तसज्जधनुषा विषुस्पृशा वक्षया शुगनिषङ्‌ग सङि‌गनौ ।
रक्षणाय मम रामलक्ष्मणा वग्रत: पथि सदैव गच्छताम्‌ ॥२०॥
संघान किए धनुष धारण किए, बाण का स्पर्श कर रहे, अक्षय बाणों से युक्त तुणीर लिए हुए राम और लक्ष्मण मेरी रक्षा करने के लिए मेरे आगे चलें |
संनद्ध: कवची खड्‌गी चापबाणधरो युवा ।
गच्छन्‌मनोरथोSस्माकं राम: पातु सलक्ष्मण: ॥२१॥
हमेशा तत्पर, कवचधारी, हाथ में खडग, धनुष-बाण तथा युवावस्था वाले भगवान् राम लक्ष्मण सहित आगे-आगे चलकर हमारी रक्षा करें |
रामो दाशरथि: शूरो लक्ष्मणानुचरो बली ।
काकुत्स्थ: पुरुष: पूर्ण: कौसल्येयो रघुत्तम: ॥२२॥
भगवान् का कथन है की श्रीराम, दाशरथी, शूर, लक्ष्मनाचुर, बली, काकुत्स्थ , पुरुष, पूर्ण, कौसल्येय, रघुतम,
वेदान्तवेद्यो यज्ञेश: पुराणपुरुषोत्तम: ।
जानकीवल्लभ: श्रीमानप्रमेय पराक्रम: ॥२३॥
वेदान्त्वेघ, यज्ञेश,पुराण पुरूषोतम , जानकी वल्लभ, श्रीमान और अप्रमेय पराक्रम आदि नामों का
इत्येतानि जपेन्नित्यं मद्‌भक्त: श्रद्धयान्वित: ।
अश्वमेधाधिकं पुण्यं संप्राप्नोति न संशय: ॥२४॥
नित्यप्रति श्रद्धापूर्वक जप करने वाले को निश्चित रूप से अश्वमेध यज्ञ से भी अधिक फल प्राप्त होता हैं |
रामं दूर्वादलश्यामं पद्‌माक्षं पीतवाससम्‌ ।
स्तुवन्ति नामभिर्दिव्यैर्न ते संसारिणो नर: ॥२५॥
दूर्वादल के समान श्याम वर्ण, कमल-नयन एवं पीतांबरधारी श्रीराम की उपरोक्त दिव्य नामों से स्तुति करने वाला संसारचक्र में नहीं पड़ता |
रामं लक्शमण पूर्वजं रघुवरं सीतापतिं सुंदरम्‌ ।
काकुत्स्थं करुणार्णवं गुणनिधिं विप्रप्रियं धार्मिकम्‌
राजेन्द्रं सत्यसंधं दशरथनयं श्यामलं शान्तमूर्तिम्‌ ।
वन्दे लोकभिरामं रघुकुलतिलकं राघवं रावणारिम्‌ ॥२६॥
लक्ष्मण जी के पूर्वज , सीताजी के पति, काकुत्स्थ, कुल-नंदन, करुणा के सागर , गुण-निधान , विप्र भक्त, परम धार्मिक , राजराजेश्वर, सत्यनिष्ठ, दशरथ के पुत्र, श्याम और शांत मूर्ति, सम्पूर्ण लोकों में सुन्दर, रघुकुल तिलक , राघव एवं रावण के शत्रु भगवान् राम की मैं वंदना करता हूँ |
रामाय रामभद्राय रामचंद्राय वेधसे ।
रघुनाथाय नाथाय सीताया: पतये नम: ॥२७॥
राम, रामभद्र, रामचंद्र, विधात स्वरूप , रघुनाथ, प्रभु एवं सीताजी के स्वामी की मैं वंदना करता हूँ |
श्रीराम राम रघुनन्दन राम राम ।
श्रीराम राम भरताग्रज राम राम ।
श्रीराम राम रणकर्कश राम राम ।
श्रीराम राम शरणं भव राम राम ॥२८॥
हे रघुनन्दन श्रीराम ! हे भरत के अग्रज भगवान् राम! हे रणधीर, मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ! आप मुझे शरण दीजिए |
श्रीरामचन्द्रचरणौ मनसा स्मरामि ।
श्रीरामचन्द्रचरणौ वचसा गृणामि ।
श्रीरामचन्द्रचरणौ शिरसा नमामि ।
श्रीरामचन्द्रचरणौ शरणं प्रपद्ये ॥२९॥
मैं एकाग्र मन से श्रीरामचंद्रजी के चरणों का स्मरण और वाणी से गुणगान करता हूँ, वाणी द्धारा और पूरी श्रद्धा के साथ भगवान् रामचन्द्र के चरणों को प्रणाम करता हुआ मैं उनके चरणों की शरण लेता हूँ |
माता रामो मत्पिता रामचंन्द्र: ।
स्वामी रामो मत्सखा रामचंद्र: ।
सर्वस्वं मे रामचन्द्रो दयालु ।
नान्यं जाने नैव जाने न जाने ॥३०॥
श्रीराम मेरे माता, मेरे पिता , मेरे स्वामी और मेरे सखा हैं | इस प्रकार दयालु श्रीराम मेरे सर्वस्व हैं. उनके सिवा में किसी दुसरे को नहीं जानता |
दक्षिणे लक्ष्मणो यस्य वामे तु जनकात्मजा ।
पुरतो मारुतिर्यस्य तं वन्दे रघुनंदनम्‌ ॥३१॥
जिनके दाईं और लक्ष्मण जी, बाईं और जानकी जी और सामने हनुमान ही विराजमान हैं, मैं उन्ही रघुनाथ जी की वंदना करता हूँ |
लोकाभिरामं रनरङ्‌गधीरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम्‌ ।
कारुण्यरूपं करुणाकरंतं श्रीरामचंद्रं शरणं प्रपद्ये ॥३२॥
मैं सम्पूर्ण लोकों में सुन्दर तथा रणक्रीड़ा में धीर, कमलनेत्र, रघुवंश नायक, करुणा की मूर्ति और करुणा के भण्डार की श्रीराम की शरण में हूँ |
मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्‌ ।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये ॥३३॥
जिनकी गति मन के समान और वेग वायु के समान (अत्यंत तेज) है, जो परम जितेन्द्रिय एवं बुद्धिमानों में श्रेष्ठ हैं, मैं उन पवन-नंदन वानारग्रगण्य श्रीराम दूत की शरण लेता हूँ |
कूजन्तं रामरामेति मधुरं मधुराक्षरम्‌ ।
आरुह्य कविताशाखां वन्दे वाल्मीकिकोकिलम्‌ ॥३४॥
मैं कवितामयी डाली पर बैठकर, मधुर अक्षरों वाले ‘राम-राम’ के मधुर नाम को कूजते हुए वाल्मीकि रुपी कोयल की वंदना करता हूँ |
आपदामपहर्तारं दातारं सर्वसंपदाम्‌ ।
लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम्‌ ॥३५॥
मैं इस संसार के प्रिय एवं सुन्दर उन भगवान् राम को बार-बार नमन करता हूँ, जो सभी आपदाओं को दूर करने वाले तथा सुख-सम्पति प्रदान करने वाले हैं |
भर्जनं भवबीजानामर्जनं सुखसंपदाम्‌ ।
तर्जनं यमदूतानां रामरामेति गर्जनम्‌ ॥३६॥
‘राम-राम’ का जप करने से मनुष्य के सभी कष्ट समाप्त हो जाते हैं | वह समस्त सुख-सम्पति तथा ऐश्वर्य प्राप्त कर लेता हैं | राम-राम की गर्जना से यमदूत सदा भयभीत रहते हैं |
रामो राजमणि: सदा विजयते रामं रमेशं भजे ।
रामेणाभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मै नम: ।
रामान्नास्ति परायणं परतरं रामस्य दासोSस्म्यहम्‌ ।
रामे चित्तलय: सदा भवतु मे भो राम मामुद्धर ॥३७॥
राजाओं में श्रेष्ठ श्रीराम सदा विजय को प्राप्त करते हैं | मैं लक्ष्मीपति भगवान् श्रीराम का भजन करता हूँ | सम्पूर्ण राक्षस सेना का नाश करने वाले श्रीराम को मैं नमस्कार करता हूँ | श्रीराम के समान अन्य कोई आश्रयदाता नहीं | मैं उन शरणागत वत्सल का दास हूँ | मैं हमेशा श्रीराम मैं ही लीन रहूँ | हे श्रीराम! आप मेरा (इस संसार सागर से) उद्धार करें |
राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे ।
सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने ॥३८॥
(शिव पार्वती से बोले –) हे सुमुखी ! राम- नाम ‘विष्णु सहस्त्रनाम’ के समान हैं | मैं सदा राम का स्तवन करता हूँ और राम-नाम में ही रमण करता हूँ |
इति श्रीबुधकौशिकविरचितं श्रीरामरक्षास्तोत्रं संपूर्णम्‌ ॥
॥ श्री सीतारामचंद्रार्पणमस्तु ॥

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Posted by admin - March 16, 2020 at 3:43 pm

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