कश्मीरी मंदिर तोड़ने वालों के वंशज अब उन्हीं मंदिरों में दिहाड़ी लगाने को मजबूर



श्री मार्तंड मंदिर के इन स्तंभों को आक्रमणकारी तोड़ न पाए थे।

काल का चक्र तो देखिए। सदियों पहले कश्मीर में जिन हिंदू मंदिरों को आंक्रांताओं ने तोड़ा आज उनके वंशज ही इन मंदिरों में मजदूरी कर रहे हैं। कश्मीर में शायद ही कोई सबूता हिंदू मंदिर बचा हो लेकिन कुछ मंदिरों को फिर से खड़ा किया जा रहा है। रफ्तार धीमी है लेकिन 600 साल पहले तोड़े गए भारत के सबसे पुराने सूर्य मंदिर को फिर से जोड़ा जा रहा है। काम चाहे सरकार कर रही है लेकिन वहां मजदूरी मंदिरों को तोड़ने वालों के वंशज ही कर रहे हैं। बात श्री मार्तंड मंदिर की हो रही है। कश्मीर के अनंतनाग शहर से लगभग 25 किमी दूर यह मंदिर मट्टन कस्बे के ऊपर पहाड़ी पर बना है। कश्मीर यात्रा के दौरान हमने 1 जून,2018 को इस मंदिर के दर्शन किए।

विशाल मंदिर को तोड़ने के लिए एक साल बुतशिकन की सेना लगी रही। अब एएसआई (पुरातत्व विभाग) इस मंदिर को दोबारा खड़ा करने में लगी है।
जिन्होंने तोड़ा उनसे ही बनवाया जा रहा है:
भारतीय पुरातत्व विभाग के अनुसार सूर्य भगवान के इस मंदिर का निर्माण 1300 साल पहले राजा ललितादित्य ने करवाया था। इसे मुस्लिम शासक सिकंदर बुतशिकन ने 15वीं शताब्दी में तुड़वाने के आदेश दिए थे। इतिहासकारों के मुताबिक मंदिर इतना विशाल और मजबूत था कि सैकंड़ों मजदूर एक साल तक लगातार इसे तोड़ने का काम करते रहे। मगर हिंदू धर्म की ही तरह मुस्लिम आक्रांता इस मंदिर को पूरी तरह नष्ट नहीं कर पाए। आज भी चट्‌टानों पर बनीं भारतीय देवी देवताओं की मूर्तियां और कुछ बची दीवारें मुस्लिम आक्रांताओं को मुंह चिढ़ाती हैं कि देखो 600 साल बाद भी हमारे वजूद को तुम मिटा नहीं पाए हो। कश्मीरी पंडितों के हितों की लड़ाई लड़ रहे सुशील पंडित प्रबुद्ध भारत संस्था के बेलगाम कर्नाटक में हुए एक कार्यक्रम में बताते हैं कि ‘ सिकंदर बुतशिकन मार्तंड मंदिर को तोड़ नहीं पा रहा था। बड़ी बड़ी चट्टानों को तोड़ने में विफल होने पर उसने मंदिर के चारों ओर गहरी खाइयां बना दीं। उन खाइयों में आस पास के जंगल काटकर लकड़ियां भर दीं। उनमें आग लगा दी ताकि चट्टानें चटक जाएं। एक साल तक तोड़ता रहा लेकिन पूरी फिर भी तरह नष्ट नहीं कर पाया।’

फोटो में दर्जनों स्तंभ दिख रहे हैं। श्री मार्तंड मंदिर
यह वही दौर था जब कश्मीर में बड़े पैमाने पर धर्म परिवर्तन चल रहा था। हिंदूओं के तीर्थ स्थलों को तोड़ा जा रहा था और तलवार की नोक पर उन्हें इस्लाम कबूल करने पर मजबूर किया जा रहा था। कश्मीर के सभी लोग गैर मुस्लिमों से नफरत नहीं करते लेकिन मैं एक किस्सा सुनाना चाहता हूं। जैसे ही हम मार्तंड मंदिर के गेट पर पहुंचे और मैने बाइक पार्क की तो वहां लगभग 60 साल के एक बुजुर्ग ने मुझे देखते ही कहा ‘तुम इंडिया से आए हो? मैने बुजुर्ग के सवाल का उत्तर नहीं दिया। वह मेरे और करीब आया और फिर से बोला तुम इंडिया से आए हो इंडिया से? मैने भी कह दिया हजारों साल पुराने मंदिर के बाहर आप मुझसे पूछ रहे हैं कि मैं इंडिया से आया हूं। आप बताओ आप कहां से आए हो? बुजुर्ग के चेहरे की हवाइयां उड़ती मैं देख सकता था। उसे शायद मुझसे इस तरह के उत्तर की अपेक्षा नहीं थी। 2014 में भी कश्मीर यात्रा में मैं ऐसे सवालों को सुन चुका था। गैर मुस्लिमों के साथ कश्मीरियों का यह रवैया नया नहीं है। खैर मैने भी धैर्य से उससे बात की और पूछ लिया यहां कितने कश्मीरी पंडित रहते थे। बोला हमारे गांव में दो चार घर थे लेकिन मट्‌टन में बहुत रहते थे। कभी कभार जरूर आते हैं। उस दिन सुबह 8:30 बजे मंदिर में दाखिल होने वाले हम पहले श्रधालु, शायद पर्यटक थे।

श्री मार्तंड मंदिर एक विशाल सूर्य मंदिर था। टूटे हुए सदियां बीत गईं। क्या कभी दोबारा इसका गौरव वापस लौट पाएगा?
मंदिर में दाखिल हुए। लगभग 25 वर्षीय युवक हमारे पीछे पीछे चल रहा था। मुझे लगा कोई गाइड होगा लेकिन बाद में उसने परिचय दिया कि वह यहां का माली है। हम फोटोग्राफ लेने में व्यस्त थे कि वह हमें मंदिर के इतिहास के बारे में जानकारी देने लगा। मंदिर के बारे में उसने बताया कि यह भारत का पहला सूर्य मंदिर है। शायद मेरे जीवन का यह पहला मंदिर होगा जहां जूते नहीं उतारे होंगे। मंदिर की कुछ दीवारें, पत्थरों को कुरेद कर बनीं मूर्तियों और नक्काशी के अलावा यहां मंदिर जैसा कुछ नहीं दिख रहा था। लेकिन अगर हम बैजनाथ, कैदारनाथ मंदिरों को देखें तो मार्तंड मंदिर उनसे कहीं विशाल और भव्य रहा होगा। मंदिर की देखरेख अच्छे से तो हो रही है लेकिन तुरंत इसे मंदिर का स्वरूप देना भी जरूरी है। एएसआई (पुरातत्व विभाग) ने इसे दोबारा बनाने का काम शुरू कर दिया है। माली ने बताया कि रोजे चल रहे हैं इसलिए मजदूर काम पर नहीं आ रहे। मैं समय के चक्र को देख रहा था कि कभी जिन लोगों के हाथों सिकंदर बुतशिकन ने मंदिर की दीवारों को तुड़वाया होगा आज उन्हीं के वंशज इस मंदिर को बनाने के लिए मजदूरी कर रहे हैं। आतंकवाद ने कश्मीर की अर्थव्यवस्था को चौपट कर दिया है। अब मंदिर में मजदूरी कश्मीरियों की मजबूरी भी है और जरुरत भी। तब शायद उन्हें इनाम मिला होगा और आज दिहाड़ी मिल रही है। यह ऐसे ही नहीं हो गया। दिल्ली के तख्त पर अब कोई और जो बैठ गया है।

पट्टन का श्री शंकरागौरीश्वरा मंदिर। कण कण बिखरा।
मार्तंड मंदिर से हम उड़ी की ओर चल पड़े। रास्ते में पट्‌टन कस्बे में रुके। यहां 1200 साल पुराना श्री शंकरागौरीश्वरा मंदिर है। भगवान शिव के किसी भी मंदिर की ऐसी दुर्दशा पहले कभी नहीं देखी थी। जगह जगह मंदिर के पवित्र अंग बिखरे पड़े थे। मार्तंड मंदिर की बजाय यहां हालात ज्यादा खराब थे। इस मंदिर की हालत श्री मार्तंड मंदिर से इसलिए बुरी है क्योंकि यह बारामूला रोड पर है और पर्यटक यहां न बराबर आते हैं। अमरनाथ यात्रा के दौरान पहलगाम जाने वाले यात्री श्री मार्तंड मंदिर के दर्शन तो कर लेते हैं लेकिन उड़ी के रास्ते पर बने शंकरागौरीश्वरा मंदिर में कोई कोई ही आता है।

शंकरागौरीश्वरा मंदिर में कब्जा। स्थानीय लोगों ने एक मजार सी बना रखी है।
मंदिर जिन पत्थरों से बना है उन पर मूर्तियां नक्काशी कर उकेरी गई हैं। मंदिर की दीवारें हों या स्तंभ। भगवान शिव और देवी देवताओं की मूर्तियां देखी जा सकती हैं। सिर्फ अयोध्या, काशी या विदिशा में ही मंदिरों को तोड़ मस्जिदें नहीं बनाई गईं हैं। पट्‌टन के शिव मंदिर को कब्जाने के लिए इसमें एक मजार बनाई गई है। मजार में आने वाले लोग मंदिर के स्तंभ और मूर्तियों से अलंकृत शिलाओं का इस्तेमाल बैठने के लिए करते हैं।

शंकरागौरीश्वरा मंदिर पट्टन। मंदिर की पवित्र शिलाओं और स्तंभों का इस्तेमाल बैठने और जूठन बिखेरने के लिए किया जा रहा है।

शिलाओं पर बिखरी मजार आने वालों की जूठन।
मुस्लिम आक्रांताओं ने जो काम 900 वर्ष पूर्व शुरू किया था वह शायद आज 2018 में भी जारी है। मंदिर की पवित्र शिलाओं की एक लंबी सी पंक्ति बना मजार पर माथा टेकने वालों ने लंबी सी सीट बना रखी है। हालांकि मंदिर परिसर में एएसआई ने लिखा है कि इसे नुकसान पहुंचाने वाले पर 1 लाख का जुर्माना लगाया जा सकता है। जबकि उस बोर्ड को लगाने वाला अफसर यहां आते वक्त अपनी जान की सलामती जरूर मांगता होगा। यहां विरोध करने पर पत्थरों से पीट पीट कर मार जो दिया जाता है। मई 2018में यहां से 15 किमी दूर नारबल में तमिलनाडू के पर्यटक की पत्तरबाजों ने हत्या जो कर दी थी। अक्टूबर 2018 में एक सैनिक को पत्थरबाजों ने सिर पर पत्थर मारकर शहीद कर दिया।

ऐसे में मंदिर की मूर्तियों पर कोई बैठे या उनका तिरिस्कार करे यह धारा 370 वाले प्रदेश में तो होना ही है। वैसे मजार बहुत अच्छे से मैनटेन हो रही है। हम जब यहां पहुंचे तो माथा टेकने दो तीन लोग पहुंचे हुए थे। एक महिला तो काफी देर तक ध्यान मग्न थी। जो भी हो भगवान शिव इतने भोले हैं कि इनकी गलती को भी माफ कर दिया होगा। भोलेनाथ कश्मीरियों को सदबुद्धि दें।

शंकरागौरीश्वरा मंदिर की एक दुर्लभ मूर्ति। जमीन पर पड़ी मानो पूछ रही हो कि कब इस जलालत से मुक्ति मिलेगी।