Spiritual Journey

महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग

महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग
आकाशे तारकं लिंगं, पाताले हाटकेश्वरम्।
मृत्युलोके च महाकालौ: लिंगत्रय नमोस्तुते।।





अर्थात् ब्रह्मांड में सर्वपूज्य माने गए तीनों लिंगों में भूलोक में स्‍थित भगवान महाकाल प्रधान हैं। 12 ज्योतिर्लिंगों में इनकी गणना होती है। उज्जैन के प्रथम और शाश्वत शासक भी महाराजाधिराज श्री महाकाल ही हैं, तभी तो उज्जैन को महाकाल की नगरी कहा जाता है। दक्षिणमुखी होने से इनका विशेष तांत्रिक महत्व भी है। ये कालचक्र के प्रवर्तक हैं तथा भक्तों की मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाले बाबा महाकालेश्वर के दर्शन मात्र से ही प्राणिमात्र की काल मृत्यु से रक्षा होती है, ऐसी शास्त्रों की मान्यता है। 
भारत के नाभिस्थल में, कर्क रेखा पर स्थित श्री महाकाल का वर्णन रामायण, महाभारत आदि पुराणों एवं संस्कृत साहित्य के अनेक काव्य ग्रंथों में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। कहा जाता है कि इस अतिप्राचीन मंदिर का जीर्णोद्धार राजा भोज के पु‍त्र उदयादित्य ने करवाया था। उसके पश्चात पुन: जीर्ण होने पर 1734 में तत्कालीन दीवान रामचन्द्रराव शेणवी ने इसका फिर से जीर्णोद्धार करवाया। मंदिर के तल मंजिल पर महाकाल का विशाल लिंग स्थित है जिसकी जलाधारी का मुख पूर्व की ओर है। साथ ही पहली मंजिल पर ओंकारेश्वर तथा दूसरी मंजिल पर नागचन्द्रेश्वर की प्रतिमाएं स्थित हैं। 
स्मरण रहे कि भगवान नागचन्द्रेश्वर के दर्शन वर्ष में केवल 1 ही बार, अर्थात नागपंचमी पर होते हैं। महाकाल के दक्षिण में वृद्धकालेश्वर, अनादि कल्पेश्वर तथा सप्तऋषियों के मंदिर स्‍थित हैं, जबकि इसके उत्तर में चन्द्रादित्येश्वर, देवी अवन्तिका, बृहस्पतेश्वर, स्वप्नेश्वर तथा समर्थ रामदास द्वारा स्था‍पित श्री हनुमानजी का मंदिर है। इसके पश्चिम में कौटितीर्थ नामक कुंड है एवं समीप ही रुद्र-सरोवर भी स्थित है।
पूरे भारतवर्ष में यह एकमात्र ज्योतिर्लिंग है, जहां ताजी चिताभस्म से प्रात: 4 बजे भस्म आरती होती है। उस समय पूरा वातावरण अत्यंत मनोहारी एवं शिवमय हो जाता है। 





श्रावण मास तथा महाशिवरात्रि के अवसर पर यहां पर विशेष उत्सव होते हैं। श्रावण मास के प्रत्येक सोमवार को महाराजाधिराज महाकालेश्वर की सवारी निकाली जाती है। पूरे शहर को इस अवसर पर वंदनवारों एवं विद्युत बल्बों से सजाया जाता है। यह सवारी मंदिर प्रांगण से निकलकर शिप्रा तट तक जाती है। देश के कोने-कोने से लोग महाकाल के दर्शन हेतु उज्जैन आते रहते हैं। महापर्वों एवं विशेष अवसरों पर भीड़ अधिक होती है। इस ज्योतिर्लिंग की विशेषता यह है कि मुस्लिम समुदाय के बैंड-बाजे वाले भी श्री महाकाल की सवारी में अपना नि:शुल्क योगदान देते हैं। यह हिन्दू-मुस्लिम सौहार्द का अनूठा उदाहरण है। 



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Be the first to comment - What do you think?  Posted by admin - April 14, 2016 at 9:48 am

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Story of Sri Lakshmana from Ramayan – A great Devotee of Ram

लक्ष्मण जी के त्याग की अदभुत कथा ।

एक अनजाने सत्य से परिचय— -हनुमानजी की रामभक्ति की गाथा संसार में भर में गाई जाती है।लक्ष्मणजी की भक्ति भी अद्भुत थी. लक्ष्मणजी की कथा के बिना श्री रामकथा पूर्ण नहीं है अगस्त्य मुनि अयोध्या आए और लंका युद्ध का प्रसंग छिड़ गया -भगवान श्रीराम ने बताया कि उन्होंने कैसे रावण और कुंभकर्ण जैसे प्रचंड वीरों का वध किया और लक्ष्मण ने भी इंद्रजीत और अतिकाय जैसे शक्तिशाली असुरों को मारा॥

अगस्त्य मुनि बोले- श्रीराम बेशक रावण और कुंभकर्ण प्रचंड वीर थे, लेकिन सबसे बड़ा वीर तो मेघनाध ही था ॥ उसने अंतरिक्ष में स्थित होकर इंद्र से युद्ध किया था और बांधकर लंका ले आया था॥ब्रह्मा ने इंद्रजीत से दान के रूप में इंद्र को मांगा तब इंद्र मुक्त हुए थे ॥लक्ष्मण ने उसका वध किया इसलिए वे सबसे बड़े योद्धा हुए ॥श्रीराम को आश्चर्य हुआ लेकिन भाई की वीरता की प्रशंसा से वह खुश थे॥ फिर भी उनके मन में जिज्ञासा पैदा हुई कि आखिर अगस्त्य मुनि ऐसा क्यों कह रहे हैं कि इंद्रजीत का वध रावण से ज्यादा मुश्किल था ॥

अगस्त्य मुनि ने कहा- प्रभु इंद्रजीत को वरदान था कि उसका वध वही कर सकता था जो ? चौदह वर्षों तक न सोया हो,? जिसने चौदह साल तक किसी स्त्री का मुख न देखा हो और ? चौदह साल तक भोजन न किया हो ॥

श्रीराम बोले- परंतु मैं बनवास काल में चौदह वर्षों तक नियमित रूप से लक्ष्मण के हिस्से का फल-फूल देता रहा ॥ मैं सीता के साथ एक कुटी में रहता था, बगल की कुटी में लक्ष्मण थे, फिर सीता का मुख भी न देखा हो, और चौदह वर्षों तक सोए न हों, ऐसा कैसे संभव है ॥अगस्त्य मुनि सारी बात समझकर मुस्कुराए॥

प्रभु से कुछ छुपा है भला! दरअसल, सभी लोग सिर्फ श्रीराम का गुणगान करते थे लेकिन प्रभु चाहते थे कि लक्ष्मण के तप और वीरता की चर्चा भी अयोध्या के घर-घर में हो ॥ अगस्त्य मुनि ने कहा – क्यों न लक्ष्मणजी से पूछा जाए ॥लक्ष्मणजी आए प्रभु ने कहा कि आपसे जो पूछा जाए उसे सच-सच कहिएगा॥प्रभु ने पूछा- हम तीनों चौदह वर्षों तक साथ रहे फिर तुमने सीता का मुख कैसे नहीं देखा ?फल दिए गए फिर भी अनाहारी कैसे रहे ? और 14 साल तक सोए नहीं ?यह कैसे हुआ ?

लक्ष्मणजी ने बताया- भैया जब हम भाभी को तलाशते ऋष्यमूक पर्वत गए तो सुग्रीव ने हमें उनके आभूषण दिखाकर पहचानने को कहा ॥आपको स्मरण होगा मैं तो सिवाए उनके पैरों के नुपूर के कोई आभूषण नहीं पहचान पाया था क्योंकि मैंने कभी भी उनके चरणों के ऊपर देखा ही नहीं.चौदह वर्ष नहीं सोने के बारे में सुनिए – आप औऱ माता एक कुटिया में सोते थे. मैं रातभर बाहर धनुष पर बाण चढ़ाए पहरेदारी में खड़ा रहता था. निद्रा ने मेरी आंखों पर कब्जा करने की कोशिश की तो मैंने निद्रा को अपने बाणों से बेध दिया था॥निद्रा ने हारकर स्वीकार किया कि वह चौदह साल तक मुझे स्पर्श नहीं करेगी लेकिन जब श्रीराम का अयोध्या में राज्याभिषेक हो रहा होगा और मैं उनके पीछे सेवक की तरह छत्र लिए खड़ा रहूंगा तब वह मुझे घेरेगी ॥

आपको याद होगा राज्याभिषेक के समय मेरे हाथ से छत्र गिर गया था.अब मैं 14 साल तक अनाहारी कैसे रहा! मैं जो फल-फूल लाता था आप उसके तीन भाग करते थे. एक भाग देकर आप मुझसे कहते थे लक्ष्मण फल रख लो॥ आपने कभी फल खाने को नहीं कहा- फिर बिना आपकी आज्ञा के मैं उसे खाता कैसे?मैंने उन्हें संभाल कर रख दिया॥सभी फल उसी कुटिया में अभी भी रखे होंगे ॥

प्रभु के आदेश पर लक्ष्मणजी चित्रकूट की कुटिया में से वे सारे फलों की टोकरी लेकर आए और दरबार में रख दिया॥ फलों कीगिनती हुई, सात दिन के हिस्से के फल नहीं थे॥प्रभु ने कहा-इसका अर्थ है कि तुमने सात दिन तो आहार लिया था?लक्ष्मणजी ने सात फल कम होने के बारे बताया- उन सात दिनों में फल आए ही नहीं,

1. जिस दिन हमें पिताश्री के स्वर्गवासी होने की सूचना मिली, हम निराहारी रहे॥

2. जिस दिन रावण ने माता का हरण किया उस दिन फल लाने कौन जाता॥

3. जिस दिन समुद्र की साधना कर आप उससे राह मांग रहे थे,

4. जिस दिन आप इंद्रजीत के नागपाश में बंधकर दिनभर अचेत रहे,

5. जिस दिन इंद्रजीत ने मायावी सीता को काटा था और हम शोक मेंरहे,

6. जिस दिन रावण ने मुझे शक्ति मारी

7. और जिस दिन आपने रावण-वध किया ॥

इन दिनों में हमें भोजन की सुध कहां थी॥ विश्वामित्र मुनि से मैंने एक अतिरिक्त विद्या का ज्ञान लिया था- बिना आहार किए जीने की विद्या. उसके प्रयोग से मैं चौदह साल तक अपनी भूख को नियंत्रित कर सका जिससे इंद्रजीत मारा गया ॥भगवान श्रीराम ने लक्ष्मणजी की तपस्या के बारे में सुनकर उन्हें ह्रदय से लगा लिया.? राम ? राम ?

1 comment - What do you think?  Posted by admin - September 29, 2015 at 6:20 am

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तमाचे की करामात

मुंबई के नजदीक गणेशपुरी है। गणेशपुरी, वज्रेश्वरी में नाना औलिया नाम के एक महापुरुष रहा करते थे। वे मुक्तानंदजी के आश्रम के नजदीक की सड़क पर मैले कुचैले कपड़े पहने पड़े रहते थे अपनी निजानंद की मस्ती में। वे दिखने में तो सादे-सूदे थे पर बड़ी ऊँची पहुँच के धनी थे।

उस समय घोड़ागाड़ी चलती थी, ऑटोरिक्शा गिने गिनाये होते थे। एक बार एक डिप्टी कलेक्टर (उपजिलाधीश) घोड़ागाड़ी पर कहीं जा रहा था। रास्ते में बीच सड़क पर नाना औलिया टाँग पर टाँग चढ़ाये बैठे थे।
कलेक्टर ने गाड़ीवान को कहाः “हॉर्न बजा, इस भिखारी को हटा दे।”

गाड़ीवान बोलाः “नहीं, ये तो नाना बाबा हैं ! मैं इनको नहीं हटाऊँगा।”

कलेक्टरः “अरे ! क्यों नहीं हटायेगा, सड़क क्या इसके बाप की है ?” वह गाड़ी से उतरा और नाना बाबा की डाँटने लगाः “तुम सड़क के बीच बैठे हो, तुमको अच्छा लगता है ? शर्म नहीं आती ?” बाबा दिखने में दुबले पतले थे लेकिन उनमें ऐसा जोश आया कि उठकर खड़े हुए और उस कलेक्टर का कान पकड़कर धड़ाक से एक ने तमाचा जड़ दिया। आस पास के सभी लोग देख रहे थे कि नाना बाबा ने कलेक्टर को तमाचा मार दिया। अब तो पुलिस नाना बाबा का बहुत बुरा हाल करेगी।

लेकिन ऐसा सुहावना हाल हुआ कि ‘साधूनां दर्शनं लोके सर्वसिद्धकरं परम्।’ की तरह ‘साधूनां थप्पड़ं सर्वसिद्धिकरं परं… महापातकनाशनं… परं विवेकं जागृतम्।’ पंजा मार दिया तो उसके पाँचों विकारों का प्रभाव कम हो गया। कलेक्टर ने सिर नीचे करके दबी आवाज में गाड़ीवान को कहाः “गाड़ी वापस लो।” जहाँ ऑडिट करने जा रहा था वहाँ न जाकर वापस गया अपने दफ्तर में और त्यागपत्र लिखा। सोचा, “अब यह बंदों की गुलामी नहीं करनी है। संसार की चीजों को इकट्ठा कर-करके छोड़कर नहीं मरना है, अपनि अमर आत्मा की जागृति करनी है। मैं आज से सरकारी नौकरी को सदा के लिए ठुकराता हूँ और अब असली खजाना पाने के लिए जीवन जीऊँगा।’ बन गये फकीर एक थप्पड़ से।

कहाँ तो एक भोगी डिप्टी कलेक्टर और नाना साहब औलिया का तमाचा लगा तो ईश्वर के रास्ते चलकर बन गया सिद्धपुरुष !

तुम में से भी कोई चल पड़े ईश्वर के रास्ते, हो जाय सिद्धपुरुष ! नानासाहब ने एक ही थप्पड़ मारा और कलेक्टर ने अपना काम बना लिया। अब मैं क्या करूँ ? थप्पड़ से तुम्हारा काम होता हो तो मैं उसके लिए भी तैयार हूँ और कहानी-कथा, सत्संग सुनाने से तुम्हारा काम होता हो तो भी मैं तैयार हूँ लेकिन तुम अपना काम बनाने का इरादा कर लो। लग जाय तो एक वचन भी लग जाता है।

Be the first to comment - What do you think?  Posted by admin - September 18, 2015 at 11:46 am

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These 10 tendencies make you like dead

 

ये 10 वृत्तियां बना देती हैं आपको मृत समान

 

1. मनुष्य जीवन नियमों के पालन से सुखी तथा सरल बन जाता है। जो व्यक्ति नियम के पालन में होने वाले आरम्भिक कष्ट पर विजय प्राप्त करके उन्हें साधना में परिवर्तित कर लेते हैं वो जीवन भर आनन्द का अनुभव करते हैं।

 

2. इस लेख में हम कुछ ऐसी वृत्तियों के विषय के बारे में विचार करेंगे जो किसी भी पुरुष या स्त्री को मृत समान बना सकती हैं। ये वृत्तियां जीवन में ना पालें तो जीवन सुखमय रहता है।

3. कामवासना मानवीय जीवन का एक सहज स्वभाव है परन्तु इस वृत्ति के अधीन जो व्यक्ति अत्यन्त भोग-विलास में पड़ जाता है वो मृत के समान ही है।

4. निःसंदेह अपना मार्ग स्वयं निकालने वाला ही पथ प्रदर्शक बनता है पर जो व्यक्ति संसार की हर बात में नकारात्मकता खोजता हो वो वाम मार्गी कहलाता है। ऐसा मनुष्य सकारात्मक कार्यों में संलग्न नहीं हो सकता। इसलिए वो भी मृत समान ही है।

5. धन का प्रयोग संयम से किया जाना अच्छा माना जाता है परन्तु अति कंजूस व्यक्ति कभी भी संसार में सराहना प्राप्त नहीं करता। धन का प्रयोग अच्छे कार्यों में लगाने वाला सभी की आंखों में आदर तथा सम्मान प्राप्त करता है।

 

6. मनुष्य एक ऐसा प्राणी है जिसके पास विवेक तथा बुद्धि है। परन्तु यदि मनुष्य विमूढ़ता को ना त्यागे तथा स्वयं कोई कार्य न करे, वो मृत समान ही है।

7. पुरातन काल से ही यश को मनुष्य की सबसे बड़ी प्राप्ति माना जाता है। अपयश मिलने पर कोई भी व्यक्ति मृत के समान ही है।

8. क्रोध मनुष्य के सबसे प्रबल शत्रुओं में आता है। जिसने अपने क्रोध पर नियन्त्रण प्राप्त नहीं किया वह व्यक्ति अपनी समूची संरचनात्मक शक्ति का नाश कर लेता है तथा मृत समान हो जाता है।

 

9. सत्कर्म से अर्जित किया गया धन भले ही लघु मात्रा में हो परन्तु सर्वदा आनन्द का कारण होता है। परन्तु जो व्यक्ति पाप कर्मों से धन अर्जित कर अपनों का पेट भरता है उसे मृत ही माना जाता है।

10. केवल स्वयं को मुख्य रख कर जीवन यापन करने वाला, दूसरों के दुखों तथा विपदाओं के बारे में उदासीन व्यक्ति समाज में रह कर भी समाज को किसी भी प्रकार का लाभ नहीं पहुंचाता। ऐसा व्यक्ति मृत समान ही है।

जो अपने अवगुणों की अपेक्षा दूसरों की निन्दा करता रहता है तथा दूसरों के गुणों को कभी भी मान्य नहीं समझता वो मनुष्य घृणा का भागी बनता है। समाज में सभी द्वारा घृणित व्यक्ति भी मृत ही है।

 

मनुष्य जीवन का लक्ष्य भगवान को प्राप्त करना है। यदि मनुष्य भगवान वैरि हो कर जीवन व्यतीत करे तो मृत के अतिरिक्त और कुछ नहीं माना जा सकता।

ये प्रसंग तुलसी रामायण में पाया जाता है तथा ये बातें अंगद द्वारा रावण को कही जाती हैं। आशा है कि आप भी इनको पढ़कर लाभान्वित होंगे।

 

Be the first to comment - What do you think?  Posted by admin - August 24, 2015 at 6:20 am

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Naga sadhus flock to Nashik ahead of the first shahi snaan

 

The Peshwai rally of the Anand Akhada took place amidst much fervour at Trimbakeshwar recently . Naga sadhus clad in loincloths, garlands and rudraksh beads with bhasma smeared over their bodies walked in the rally . For many onlookers, this was their first time watching the dumru and trishul-carrying sadhus walking on the streets.

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Naga sadhus

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Naga sadhus

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Naga sadhus

The Nagas were well-guarded by other sadhus amidst all the excitement around. Many people rushed to click a quick photo with the sadhus and one of the sadhus even turned into a photographer for a while as he clicked photos of his companions. The rally also had other volunteer groups shouting slogans and spreading awareness about harassment of women. Monika Kadam, a volunteer, said, “It’s high time men stop treating women as slaves and learn to respect them.“

 

Be the first to comment - What do you think?  Posted by admin - August 21, 2015 at 5:50 pm

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A visit to Mumba Devi Temple

Be the first to comment - What do you think?  Posted by admin - August 4, 2013 at 1:08 pm

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A visit to Trimbakeshwar Jyotirlinga

Be the first to comment - What do you think?  Posted by admin - at 1:07 pm

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A visit to Golden Temple- Amritsar

Be the first to comment - What do you think?  Posted by admin - at 1:06 pm

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Yatra at Ashtavinayaka temples

Be the first to comment - What do you think?  Posted by admin - at 1:05 pm

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A visit at Krishna’s Brij

Be the first to comment - What do you think?  Posted by admin - at 1:04 pm

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