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Hastamalak Stotra

हस्तामलक स्तोत्र

दक्षिण भारत के श्रीबली नामक गाँव में प्रभाकर नाम के एक विद्वान ब्राह्मण रहते थे। उनका एक पागल सा लड़का था। वह लड़का बचपन से ही सांसारिक कार्यों के प्रति उदासीन वृत्ति रखता था। उसका व्यवहार एक गूंगे और बहले बालक के समान था। एक बार जब शंकराचार्य अपने शिष्योंसहित इस गाँव में पधारे तब प्रभाकर अपने पागल जैसे दिखने वाले पुत्र को लेकर आचार्य भगवान शंकर के समीप गये। उन्होंने आचार्य को साष्टांग दंडवत प्रणाम किये। श्री शंकराचार्य ने उन दोनों को उठाया और प्रभाकर से प्रश्न किया। उसके जवाब में प्रभाकर ने कहाः “हे स्वामिन् ! मेरा यह पुत्र बचपन से ही गूंगा और तमाम प्रकार के व्यवहार से उदासीन है। अभी इसकी आयु तेरह साल हुई है फिर भी यह हमारी बातचीत नहीं समझता है। इसको इसमें रस नहीं है। जो शास्त्र ब्राह्मणों को पढ़ने चाहिए ऐसे किसी भी शास्त्र का अभ्यास इसने नहीं किया है और न ही इसने वेद पढ़ा है। इसको अक्षरज्ञान ही नहीं है। बड़ी मुश्किल से मैंने इसके उपनयन संस्कार किये हैं। यह अपने किसी मित्र के साथ खेलने नहीं जाता है। इसका ऐसा स्वभाव देखकर कोई शरारती लड़का इसे मारता है तो उसकी मार यह सहन कर लेता है। फिर भी इसे क्रोध नहीं आता है। कभी तो यह भोजन करता है और कभी नहीं करता है। उसके बावजूद भी यह सदैव आनंदी और सुखी रहता है। इसकी यह मूढ़ दशा किस कारण से हुई है ? कृपा करके आप मेरे इस पुत्र का उद्धार कीजिये।”
शंकराचार्य ने उस बालक को प्रश्न पूछे। वह बालक बहरा या गूंगा न था। वह तो पूर्ण प्रकाशित ज्ञानी था, जीवन्मुक्त था। उस बालक ने शंकराचार्य द्वारा पूछे गये प्रश्नों के जो उत्तर दिये वे एक स्तोत्र के रूप में प्रसिद्ध हुए।
ये प्रश्नोत्तर इस प्रकार हैं-
कस्त्वं शिशो कस्य कुतोઽसि गन्ता किं नाम ते त्वं कुत आगतोઽसि।
एतन्मयोक्तं वद चार्भक त्वं मत्प्रीत्ये प्रीतिविवर्धनोઽसि।।1।।
ʹहे शिशो ! तू कौन है ? किसका पुत्र है ? तू कहाँ जा रहा है ? तेरा नाम क्या है ? तू कहाँ से आया है ? मेरी प्रीति के लिए हे बालक ! तू मेरे इन प्रश्नों का उत्तर दे। तू हमें बहुत प्रिय लगता है।ʹ
तब उस बालक ने जवाब दियाः
नाहं मनुष्यो न च देवयक्षौ न ब्राह्मणक्षत्रियवैश्यशूद्राः।
न ब्रह्मचारी न गृही वनस्थो भिक्षुर्न चाहं निजबोधरूपः।।2।।
ʹमैं मनुष्य नहीं हूँ, देव या यक्ष नहीं हूँ, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र भी नहीं हूँ। मैं ब्रह्मचारी, गृहस्थी या वानप्रस्थी भी नहीं हूँ और संन्यासी भी नहीं हूँ। मैं तो ज्ञानस्वरूप परम पवित्र परमानंदरूप ब्रह्म हूँ।ʹ
निमित्तं मनश्चक्षुरादिप्रवृत्तौ निरस्ताखिलोपाधिराकाशकल्पः।
रविर्लोकचेष्टानिमित्तं यथा यः स नित्योपलब्धिस्वरूपोઽहमात्मा।।3।।
ʹजिस प्रकार सूर्य लोगों को अपने-अपने कार्य में प्रवृत्त होने की प्रेरणा करता है, उसी प्रकार मन और इन्द्रियों को अपने-अपने कार्य में प्रवृत्त होने की प्रेरणा करने वाला एवं आकाशादि उपाधियों से रहित ऐसा शाश्वत आत्मज्ञानस्वरूप आत्मा मैं हूँ।ʹ
यमग्न्युष्णवन्नित्यबोधस्वरूपं मनश्चक्षुरादीन्यबोधात्मकानि।
प्रवर्तन्त आश्रित्य निष्कंपमेकं स नित्योपलब्धिस्वरूपोઽहमात्मा।।4।।
ʹजैसे अग्नि का स्वभाव उष्णता है, ऐसे ही अविकारी और शुद्ध चित्स्वरूपवान मैं शाश्वत आत्मज्ञानस्वरूप आत्मा हूँ, जिसका आश्रय लेकर स्थूल मन तथा इन्द्रियाँ अपने-अपने व्यवहार में प्रवृत्त रहते हैं।ʹ
मुखाभासको दर्पणो दृश्यमानो मुखत्वात्पृथक्त्वेन नैवास्तु वस्तु।
चिदाभासको धीषु जीवोઽपि तद्वत् स नित्योपलब्धिस्वरूपोઽहमात्मा।।5।।
ʹजैसे दर्पण में दिखता हुआ मुख का प्रतिबिम्ब वस्तुतः बिम्बरूप मुख से पृथक नहीं है, किन्तु बिम्बरूप ही है वैसे ही बुद्धिरूपी दर्पण में जीवरूप से प्रतीयमान चैतन्य का प्रतिबिम्ब बिम्बरूप चैतन्य से पृथक नहीं है किन्तु चैतन्य रूप ही है। वही नित्य, शुद्ध ज्ञानस्वरूप आत्मा मैं हूँ।ʹ
यथा दर्पणाभाव आभासहानौ मुखं विद्यते कल्पनाहीनमेकम्।
तथा धीवियोग निराभसको यः स न नित्योपलब्धिस्वरूपोઽहमात्मा।।6।।
ʹजिस प्रकार दर्पण के या दर्पण में दिखने वाले चेहरे के प्रतिबिम्ब के अभाव में भी चेहरे का अस्तित्व तो होता ही है, उसी प्रकार बुद्धि के अभाव में भी अस्तित्व रखने वाला मैं शाश्वत आत्मज्ञानस्वरूप आत्मा हूँ।ʹ
मनश्चुरादेर्वियुक्तः स्वयं यो मनश्चक्षुरादेर्मनश्चक्षुरादिः।
मनश्चक्षुरादेरगम्यस्वरूपः स न नित्योपलब्धिस्वरूपोઽहमात्मा।।7।।
ʹमैं शाश्वत आत्मज्ञानस्वरूप आत्मा हूँ, जो मन और चक्षु आदि से परे है, जो मन का भी मन और चक्षु आदि का भी चक्षु आदि है एवं जो मन, चक्षु आदि से प्राप्त नहीं है।ʹ
य एको विभाति स्वतःशुद्धचेताः प्रकाशस्वरूपोઽपि नानेव धीषु।
शरावोदकस्थो यथा भानुरेकः स न नित्योपलब्धिस्वरूपोઽहमात्मा।।8।।
ʹजो स्वयं अकेला ही अपने विशुद्ध स्वप्रकाश अखंड चैतन्यरूप से प्रकाशता है… जैसे जल से भरे हुए अनेक मटकों में एक ही सूर्य अनेक रूप से भासता है उसी प्रकार एक ही स्वयं ज्योति आत्मा अनेक बुद्धियों में अनेक रूप से भासता है, वही नित्य ज्ञानस्वरूप आत्मा मैं हूँ।ʹ
यथाઽनेकचक्षुः प्रकाशो रविर्न क्रमेण प्रकाशीकरोति प्रकाश्यम्।
अनेका धियो यस्तथैकः प्रबोधः स न नित्योपलब्धिस्वरूपोઽहमात्मा।।9।।
ʹजैसे सूर्यदेवता अनेक नेत्रों को क्रम से प्रकाश न करता हुआ एक साथ ही प्रकाश करता है वैसे ही अनेक बुद्धियों को एक ही साथ सत्ता-स्फूर्ति देने वाला नित्य ज्ञानस्वरूप आत्मा मैं हूँ।ʹ
विवस्वत्प्रभातं यथारूपमक्षं प्रगृह्णाति नाभातमेवं विवस्वान्।
यदाभात आभासयत्यक्षमेकः स न नित्योपलब्धिस्वरूपोઽहमात्मा।।10।।
ʹजैसे सूर्य से प्रकाशित रूप को ही नेत्र ग्रहण कर सकता है यानी देख सकता है, सूर्य से अप्रकाशित रूप को नेत्रेन्द्रिय ग्रहण नहीं कर सकती वैसे ही सूर्य भी जिस चैतन्य आत्मा से प्रकाशित हुआ ही रूप, नेत्र आदि प्रकाश देता है। आत्मा से अप्रकाशित सूर्य किसी को कभी भी प्रकाश नहीं दे सकता यानी सर्व-लोक प्रकाशक सूर्यादि ज्योति आत्मप्रकाश से प्रकाशित होती है, वही नित्य ज्ञानस्वरूप आत्मा मैं हूँ।ʹ
यथा सूर्य एकोઽप्स्वनेकश्चलासु स्थिरास्वप्यनन्यद्विभाव्स्वरूपः।
चलासु प्रभिन्नः सुधीष्वेक एव स न नित्योपलब्धिस्वरूपोઽहमात्मा।।11।।
ʹजिस प्रकार एक ही सूर्य स्थिर और अस्थिर जल के विषय में अलग-अलग प्रतिबिम्बित होता हुआ दृश्यमान होता है, उसी प्रकार चर और अचर – इन दोनों प्रकार की बुद्धियों को प्रकाशित करने वाला मैं अद्वितीय शाश्वत आत्मज्ञानस्वरूप आत्मा मैं हूँ।ʹ
धनच्छन्नदृष्टिर्घनच्छन्नमर्क यथा निष्प्रभं मन्यते चातिमूढ़ः।
तथा बद्धवद् भाति यो मूढ़दृष्टेः स न नित्योपलब्धिस्वरूपोઽहमात्मा।।12।।
ʹजिस प्रकार बादलों से ढके हुए सूर्य को मंद बुद्धिवाला पुरुष तेज और प्रकाशरहित समझता है, उसी प्रकार मूढ़ बुद्धिवाले पुरुष को जो बद्ध-स्वरूप दिखता है वह शाश्वत आत्मज्ञानस्वरूप मैं हूँ।ʹ
समस्तेषु वस्तुष्वनुस्यूतमेकं समस्तानि वस्तूनि यं न स्पृशन्ति।
वियद्वत्सदा शुद्धमच्छस्वरूपः स न नित्योपलब्धिस्वरूपोઽहमात्मा।।13।।
ʹजो सदा शुद्ध और निर्मल है तथा जो समस्त पदार्थों के अंतर्गत स्थित होते हुए भी वे पदार्थ उसे स्पर्श नहीं कर सकते या उसे दूषित नहीं कर सकते वह मैं शाश्वत आत्मज्ञानस्वरूप आत्मा हूँ।ʹ
उपाधी यथा भेदता सन्मणीनां तथा भेदता बुद्धिभेदेषु तेઽपि।
यथा चन्द्रिकाणां जले चंचलत्वं तथा चंचलत्वं तवापीह विष्णो।।14।।
ʹजिस प्रकार रंग और आकार में भेद होने के कारण भिन्न-भिन्न प्रकार के मणियों में भेद की कल्पना होती है, उसी प्रकार भिन्न-भिन्न बुद्धियों के भेद की उपाधि के कारण एक ही आत्मा भिन्न-भिन्न स्वरूप से दृश्यमान होता है। जैसे जल में चंद्र अनेक एवं चंचल दिखता है ऐसे ही हे विष्णु ! तुम भिन्न-भिन्न दिखते हो। (वस्तुतः तो तुम एक, नित्य, शुद्ध और अविकारी हो।ʹ)
ब्राह्मण पुत्र के ये उत्तर सुनकर श्रीमद् आद्य शंकराचार्य समझ गये कि यह बालक तो ब्रह्म को हस्तामकलकवत् यानी हाथ में रखे हुए आँवले की तरह स्पष्टतः जानने वाला ब्रह्मवेत्ता है। अतः उन्होंने उसका नाम भी हस्तामलक रख दिया और वह प्रश्नोत्तररूप स्तोत्र ʹहस्तामलक स्तोत्रʹ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। हस्तामलक आगे चलकर शंकराचार्य के चार पट्टशिष्यों में से एक हुए।

Be the first to comment - What do you think?  Posted by admin - December 18, 2014 at 1:30 pm

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