Posts Tagged ‘shri’

Shri Ram Chandra Stuti

Shri Ram Chandra Stuti

Shri Ram Chandra Stuti

Shri Ram Chandra Stuti

Shri Ram Chandra Stuti

 

अरण्यकाण्ड
अत्रि मुनि द्वारा स्तुति

नमामि भक्त वत्सलम् । कृपालु शील कोमलम् ॥

भजामि ते पदांबुजम् । अकामिनाम् स्वधामदम् ॥

निकाम् श्याम् सुंदरम् । भवाम्बुनाथ मंदरम् ॥

प्रफुल्ल कंज लोचनम् । मदादि दोष मोचनम् ॥

प्रलंब बाहु विक्रमम् । प्रभोऽप्रमेय वैभवम् ॥

निषंग चाप सायकम् । धरम् त्रिलोक नायकम् ॥

दिनेश वंश मंदनम् । महेश चाप खंदनम् ॥

मुनींद्र संत रंजनम् । सुरारि वृन्द भंजनम् ॥

मनोज वैरि वंदितम् । अजादि देव सेवितम् ॥

विशुद्ध बोध विग्रहम् । समस्त दूषणापहम् ॥

नमामि इंदिरा पतिम् । सुखाकरम् सताम् गतिम् ॥

भजे सशक्ति सानुजम् । शची पति प्रियानुजम् ॥

त्वदंघ्रि मूल ये नराह । भजंति हीन मत्सराह ॥

पतंति नो भवार्णवे । वितर्क वीचि संकुले ॥

विविक्त वासिनह सदा । भजंति मुक्तये मुदा ॥

निरस्य इंद्रियादिकम् । प्रयांति ते गतिम् स्वकम् ॥

तमेकमद्भुतम् प्रभुम् । निरीहमीश्वरम् विभुम् ॥

जगद्गुरुम् च शाश्वतम् । तुरीयमेव केवलम् ॥

भजामि भाव वल्लभम् । कुयोगिनाम् सुदुर्लभम् ॥

स्वभक्त कल्प पादपम् । समम् सुसेव्यमन्वहम् ॥

अनूप रूप भूपतिम् । नतोऽहमुर्विजा पतिम् ॥

प्रसीद मे नमामि ते । पदाब्ज भक्ति देहि मे ॥

पठंति ये स्तवम् इदम् । नरादरेण ते पदम् ॥

व्रजंति नात्र संशयम् । त्वदीय भक्ति संयुताह ॥

Shri ramchandra stuti
shri ramchandra stuti mp3 free download

shri ramchandra stuti download

shri ramchandra stuti in hindi

shri ramchandra stuti lyrics
shree ramchandra stuti free download

shri ram chandra stuti free mp3 download

shri ram stuti mp3 song free download

shri ram stuti by lata mangeshkar

Be the first to comment - What do you think?  Posted by admin - August 6, 2016 at 10:38 am

Categories: Stotra   Tags: , ,

Shri Hanuman Ji Ki Aarti – श्री हनुमान जी की आरती

hanuman

Shri Hanuman Ji Ki Aarti in Hindi and English श्री हनुमान जी की आरती (Shri Hanuman Ji Ki Aarti)

आरति कीजै हनुमान लला की |
दुष्ट दलन रघुनाथ कला की ||

जाके बल से गिरिवर कांपै |
रोग – दोष जाके निकट न झांपै ||

अंजनी पुत्र महा बलदाई |
सन्तन के प्रेम सदा सहाई ||

दे बीरा रघुनाथ पठाये |
लंका जारि सिया सुधि लाये ||

लंका सो कोट समुद्र सी खाई |
जात पवनसुत बार न लाई||

लंक जारि असुर संहारे |
सिया रामजी के काज सँवारे ||

लक्ष्मण मूर्छित पड़े सकारे |
आनि सजीवन प्रान उबारे||

पैठि पताल तोरि जम – कारे |
अहिरावन की भुजा उखारे ||

बायें भुजा असुर दल मारे |
दहिने भुजा सन्तजन तारे ||

सुर नर मुनि आरती उतारे |
जै जै जै हनुमान उचारे ||

कंचन थार कपूर लौ छाई |
आरती करत अंजना माई ||

जो हनुमान जी की आरती गावै |
बसि बैकुंठ परम पद पावै ||

लंक विध्वंस किये रघुराई |
तुलसीदास स्वामी कीर्ति गाई ||

आरति कीजै हनुमान लला की |
दुष्ट दलन रघुनाथ कला की ||

 

Aarti Keeje Hanuman Lalaa Ki lyrics

Aarti keeje hanuman lalaa ki
Dusht dalan raghunath kala ki

Jake bal se girivar kape
Rog dhosh jake nikat na jhake
Anjani putra maha baldai
Santan ke prabhu sada sahai
Aarti keeje hanuman lalaa ki

De beera raghunath pathaye
Lanka jari siya sudhi laye
Lanka so kot samudar si khai
Jat pawansut dwar na layi
Aarti keeje hanuman lalaa ki

Lanka jari asur sanhare
Siyaramji ke kaaj shaware
Laxman murchit pade sakare
Aani sanjeevan pran ubare
Aarti keeje hanuman lalaa ki

Paithi patal tori jam-kare
Aahiravan ki bhuja ukhare
Baye bhuja asurdal mare
Dahine bhuja santjan tare
Aarti keeje hanuman lalaa ki

Sur nar munijan aarti utare
Jai jai jai hanuman uchare
Kanchan thar kapor lau chayi
Aarti karat anjana mai
Aarti keeje hanuman lalaa ki

Jo hanuman ji ke aarti gave
Basi baykunth param pad pave
Aarti keeje hanuman lalaa ki

 

hanuman ji ki aarti

hanuman ji ki aarti in hindi

 

Be the first to comment - What do you think?  Posted by admin - December 21, 2014 at 6:16 pm

Categories: Aarati   Tags: , ,

Hanuman, SHRI ANJANEYA SAHASRANAM STOTRAM

श्री आञ्जनेय सहस्रनामस्तोत्रम् ..

.. श्रीः..
Shri Anjaneya or Hanuman Stotra of 1000 Names
.. श्री आञ्जनेय सहस्रनामस्तोत्रम् ..
उद्यदादित्य संकाशं उदार भुज विक्रमम् .
कन्दर्प कोटि लावण्यं सर्व विद्या विशारदम् ..
श्री राम हृदयानंदं भक्त कल्प महीरुहम् .
अभयं वरदं दोर्भ्यां कलये मारुतात्मजम् ..
अथ सहस्रनाम स्तोत्रम् .
हनुमान् श्री प्रदो वायु पुत्रो रुद्रो अनघो अजरः .
अमृत्युर् वीरवीरश्च ग्रामावासो जनाश्रयः .. १..
धनदो निर्गुणः शूरो वीरो निधिपतिर् मुनिः .
पिन्गाक्षो वरदो वाग्मी सीता शोक विनाशकः .. २..
शिवः शर्वः परो अव्यक्तो व्यक्ताव्यक्तो धराधरः .
पिन्गकेशः पिन्गरोमा श्रुतिगम्यः सनातनः .. ३..
अनादिर्भगवान् देवो विश्व हेतुर् निराश्रयः .
आरोग्यकर्ता विश्वेशो विश्वनाथो हरीश्वरः .. ४..
भर्गो रामो राम भक्तः कल्याणः प्रकृति स्थिरः .
विश्वम्भरो विश्वमूर्तिः विश्वाकारश्च विश्वपाः .. ५..
विश्वात्मा विश्वसेव्यो अथ विश्वो विश्वहरो रविः .
विश्वचेष्टो विश्वगम्यो विश्वध्येयः कलाधरः .. ६..
प्लवंगमः कपिश्रेष्टो वेदवेद्यो वनेचरः .
बालो वृद्धो युवा तत्त्वं तत्त्वगम्यः सुखो ह्यजः .. ७..
अन्जनासूनुरव्यग्रो ग्राम ख्यातो धराधरः .
भूर्भुवस्स्वर्महर्लोको जनो लोकस्तपो अव्ययः .. ८..
सत्यं ओम्कार गम्यश्च प्रणवो व्यापको अमलः .
शिवो धर्म प्रतिष्ठाता रामेष्टः फल्गुणप्रियः .. ९..
गोष्पदीकृतवारीशः पूर्णकामो धरापतिः .
रक्षोघ्नः पुण्डरीकाक्षः शरणागतवत्सलः .. १०..
जानकी प्राण दाता च रक्षः प्राणापहारकः .
पूर्णसत्त्वः पीतवासा दिवाकर समप्रभः .. ११..
द्रोणहर्ता शक्तिनेता शक्ति राक्षस मारकः .
अक्षघ्नो रामदूतश्च शाकिनी जीव हारकः .. १२..
भुभुकार हतारातिर्दुष्ट गर्व प्रमर्दनः .
हेतुः सहेतुः प्रंशुश्च विश्वभर्ता जगद्गुरुः .. १३..
जगत्त्राता जगन्नथो जगदीशो जनेश्वरः .
जगत्पिता हरिः श्रीशो गरुडस्मयभंजनः .. १४..
पार्थध्वजो वायुसुतो अमित पुच्छो अमित प्रभः .
ब्रह्म पुच्छं परब्रह्मापुच्छो रामेष्ट एव च .. १५..
सुग्रीवादि युतो ज्ञानी वानरो वानरेश्वरः .
कल्पस्थायी चिरंजीवी प्रसन्नश्च सदा शिवः .. १६..
सन्नतिः सद्गतिः भुक्ति मुक्तिदः कीर्ति दायकः .
कीर्तिः कीर्तिप्रदश्चैव समुद्रः श्रीप्रदः शिवः .. १७..
उदधिक्रमणो देवः संसार भय नाशनः .
वार्धि बंधनकृद् विश्व जेता विश्व प्रतिष्ठितः .. १८..
लंकारिः कालपुरुषो लंकेश गृह भंजनः .
भूतावासो वासुदेवो वसुस्त्रिभुवनेश्वरः .. १९..
श्रीरामदूतः कृष्णश्च लंकाप्रासादभंजकः .
कृष्णः कृष्ण स्तुतः शान्तः शान्तिदो विश्वपावनः .. २०..
विश्व भोक्ता च मारघ्नो ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः .
ऊर्ध्वगो लान्गुली मालि लान्गूल हत राक्षसः .. २१..
समीर तनुजो वीरो वीरमारो जयप्रदः .
जगन्मन्गलदः पुण्यः पुण्य श्रवण कीर्तनः .. २२..
पुण्यकीर्तिः पुण्य गतिर्जगत्पावन पावनः .
देवेशो जितमारश्च राम भक्ति विधायकः .. २३..
ध्याता ध्येयो भगः साक्षी चेत चैतन्य विग्रहः .
ञानदः प्राणदः प्राणो जगत्प्राणः समीरणः .. २४..
विभीषण प्रियः शूरः पिप्पलायन सिद्धिदः .
सुहृत् सिद्धाश्रयः कालः काल भक्षक भंजनः .. २५..
लंकेश निधनः स्थायी लंका दाहक ईश्वरः .
चन्द्र सूर्य अग्नि नेत्रश्च कालाग्निः प्रलयान्तकः .. २६..
कपिलः कपीशः पुण्यराशिः द्वादश राशिगः .
सर्वाश्रयो अप्रमेयत्मा रेवत्यादि निवारकः .. २७..
लक्ष्मण प्राणदाता च सीता जीवन हेतुकः .
रामध्येयो हृषीकेशो विष्णु भक्तो जटी बली .. २८..
देवारिदर्पहा होता कर्ता हर्ता जगत्प्रभुः .
नगर ग्राम पालश्च शुद्धो बुद्धो निरन्तरः .. २९..
निरंजनो निर्विकल्पो गुणातीतो भयंकरः .
हनुमांश्च दुराराध्यः तपस्साध्यो महेश्वरः .. ३०..
जानकी घनशोकोत्थतापहर्ता परात्परः .
वाडंभ्यः सदसद्रूपः कारणं प्रकृतेः परः .. ३१..
भाग्यदो निर्मलो नेता पुच्छ लंका विदाहकः .
पुच्छबद्धो यातुधानो यातुधान रिपुप्रियः .. ३२..
चायापहारी भूतेशो लोकेश सद्गति प्रदः .
प्लवंगमेश्वरः क्रोधः क्रोध संरक्तलोचनः .. ३३..
क्रोध हर्ता ताप हर्ता भाक्ताभय वरप्रदः.
भक्तानुकंपी विश्वेशः पुरुहूतः पुरंदरः .. ३४..
अग्निर्विभावसुर्भास्वान् यमो निष्कृतिरेवच .
वरुणो वायुगतिमान् वायुः कौबेर ईश्वरः .. ३५..
रविश्चन्द्रः कुजः सौम्यो गुरुः काव्यः शनैश्वरः .
राहुः केतुर्मरुद्धाता धर्ता हर्ता समीरजः .. ३६..
मशकीकृत देवारि दैत्यारिः मधुसूदनः .
कामः कपिः कामपालः कपिलो विश्व जीवनः .. ३७..
भागीरथी पदांभोजः सेतुबंध विशारदः .
स्वाहा स्वधा हविः कव्यं हव्यवाह प्रकाशकः .. ३८..
स्वप्रकाशो महावीरो लघुश्च अमित विक्रमः .
प्रडीनोड्डीनगतिमान् सद्गतिः पुरुषोत्तमः .. ३९..
जगदात्मा जगध्योनिर्जगदंतो ह्यनंतकः .
विपाप्मा निष्कलंकश्च महान् मदहंकृतिः .. ४०..
खं वायुः पृथ्वी ह्यापो वह्निर्दिक्पाल एव च .
क्षेत्रज्ञः क्षेत्र पालश्च पल्वलीकृत सागरः .. ४१..
हिरण्मयः पुराणश्च खेचरो भुचरो मनुः .
हिरण्यगर्भः सूत्रात्मा राजराजो विशांपतिः .. ४२..
वेदांत वेद्यो उद्गीथो वेदवेदंग पारगः .
प्रति ग्रामस्थितः साध्यः स्फूर्ति दात गुणाकरः .. ४३..
नक्षत्र माली भूतात्मा सुरभिः कल्प पादपः .
चिन्ता मणिर्गुणनिधिः प्रजा पतिरनुत्तमः .. ४४..
पुण्यश्लोकः पुरारातिर्ज्योतिष्मान् शर्वरीपतिः .
किलिकिल्यारवत्रस्तप्रेतभूतपिशाचकः .. ४५..
रुणत्रय हरः सूक्ष्मः स्तूलः सर्वगतिः पुमान् .
अपस्मार हरः स्मर्ता शृतिर्गाथा स्मृतिर्मनुः .. ४६..
स्वर्ग द्वारं प्रजा द्वारं मोक्ष द्वारं कपीश्वरः .
नाद रूपः पर ब्रह्म ब्रह्म ब्रह्म पुरातनः .. ४७..
एको नैको जनः शुक्लः स्वयं ज्योतिर्नाकुलः .
ज्योतिः ज्योतिरनादिश्च सात्त्विको राजसत्तमः .. ४८..
तमो हर्ता निरालंबो निराकारो गुणाकरः .
गुणाश्रयो गुणमयो बृहत्कायो बृहद्यशः .. ४९..
बृहद्धनुर् बृहत्पादो बृहन्मूर्धा बृहत्स्वनः .
बृहत् कर्णो बृहन्नासो बृहन्नेत्रो बृहत्गलः .. ५०..
बृहध्यन्त्रो बृहत्चेष्टो बृहत् पुच्छो बृहत् करः .
बृहत्गतिर्बृहत्सेव्यो बृहल्लोक फलप्रदः ..५१..
बृहच्छक्तिर्बृहद्वांछा फलदो बृहदीश्वरः .
बृहल्लोक नुतो द्रष्टा विद्या दात जगद् गुरुः .. ५२..
देवाचार्यः सत्य वादी ब्रह्म वादी कलाधरः .
सप्त पातालगामी च मलयाचल संश्रयः .. ५३..
उत्तराशास्थितः श्रीदो दिव्य औषधि वशः खगः .
शाखामृगः कपीन्द्रश्च पुराणः श्रुति संचरः .. ५४..
चतुरो ब्राह्मणो योगी योगगम्यः परात्परः .
अनदि निधनो व्यासो वैकुण्ठः पृथ्वी पतिः .. ५५..
पराजितो जितारातिः सदानन्दश्च ईशिता .
गोपालो गोपतिर्गोप्ता कलिः कालः परात्परः .. ५६..
मनोवेगी सदा योगी संसार भय नाशनः .
तत्त्व दाता च तत्त्वज्ञस्तत्त्वं तत्त्व प्रकाशकः .. ५७..
शुद्धो बुद्धो नित्यमुक्तो भक्त राजो जयप्रदः .
प्रलयो अमित मायश्च मायातीतो विमत्सरः .. ५८..
माया-निर्जित-रक्षाश्च माया-निर्मित-विष्टपः .
मायाश्रयश्च निर्लेपो माया निर्वंचकः सुखः .. ५९..
सुखी सुखप्रदो नागो महेशकृत संस्तवः .
महेश्वरः सत्यसंधः शरभः कलि पावनः .. ६०..
रसो रसज्ञः सम्मनस्तपस्चक्षुश्च भैरवः .
घ्राणो गन्धः स्पर्शनं च स्पर्शो अहंकारमानदः .. ६१..
नेति-नेति-गम्यश्च वैकुण्ठ भजन प्रियः .
गिरीशो गिरिजा कान्तो दूर्वासाः कविरंगिराः .. ६२..
भृगुर्वसिष्टश्च यवनस्तुम्बुरुर्नारदो अमलः .
विश्व क्षेत्रं विश्व बीजं विश्व नेत्रश्च विश्वगः .. ६३..
याजको यजमानश्च पावकः पितरस्तथा .
श्रद्ध बुद्धिः क्षमा तन्द्रा मन्त्रो मन्त्रयुतः स्वरः .. ६४..
राजेन्द्रो भूपती रुण्ड माली संसार सारथिः .
नित्यः संपूर्ण कामश्च भक्त कामधुगुत्तमः .. ६५..
गणपः कीशपो भ्राता पिता माता च मारुतिः .
सहस्र शीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् .. ६६..
कामजित् काम दहनः कामः काम्य फल प्रदः .
मुद्राहारी राक्षसघ्नः क्षिति भार हरो बलः .. ६७..
नख दंष्ट्र युधो विष्णु भक्तो अभय वर प्रदः .
दर्पहा दर्पदो दृप्तः शत मूर्तिरमूर्तिमान् .. ६८..
महा निधिर्महा भोगो महा भागो महार्थदः .
महाकारो महा योगी महा तेजा महा द्युतिः .. ६९..
महा कर्मा महा नादो महा मन्त्रो महा मतिः .
महाशयो महोदारो महादेवात्मको विभुः .. ७०..
रुद्र कर्मा कृत कर्मा रत्न नाभः कृतागमः .
अम्भोधि लंघनः सिंहो नित्यो धर्मः प्रमोदनः .. ७१..
जितामित्रो जयः सम विजयो वायु वाहनः .
जीव दात सहस्रांशुर्मुकुन्दो भूरि दक्षिणः .. ७२..
सिद्धर्थः सिद्धिदः सिद्ध संकल्पः सिद्धि हेतुकः .
सप्त पातालचरणः सप्तर्षि गण वन्दितः .. ७३..
सप्ताब्धि लंघनो वीरः सप्त द्वीपोरुमण्डलः .
सप्तांग राज्य सुखदः सप्त मातृ निशेवितः .. ७४..
सप्त लोकैक मुकुटः सप्त होता स्वराश्रयः .
सप्तच्छन्दो निधिः सप्तच्छन्दः सप्त जनाश्रयः .. ७५..
सप्त सामोपगीतश्च सप्त पातल संश्रयः .
मेधावी कीर्तिदः शोक हारी दौर्भग्य नाशनः .. ७६..
सर्व वश्यकरो गर्भ दोषघ्नः पुत्रपौत्रदः .
प्रतिवादि मुखस्तंभी तुष्टचित्तः प्रसादनः .. ७७..
पराभिचारशमनो दुःखघ्नो बंध मोक्षदः .
नव द्वार पुराधारो नव द्वार निकेतनः .. ७८..
नर नारायण स्तुत्यो नरनाथो महेश्वरः .
मेखली कवची खद्गी भ्राजिष्णुर्जिष्णुसारथिः .. ७९..
बहु योजन विस्तीर्ण पुच्छः पुच्छ हतासुरः .
दुष्टग्रह निहंता च पिशाच ग्रह घातकः .. ८०..
बाल ग्रह विनाशी च धर्मो नेता कृपकरः .
उग्रकृत्यश्चोग्रवेग उग्र नेत्रः शत क्रतुः .. ८१..
शत मन्युस्तुतः स्तुत्यः स्तुतिः स्तोता महा बलः .
समग्र गुणशाली च व्यग्रो रक्षो विनाशकः .. ८२..
रक्षोघ्न हस्तो ब्रह्मेशः श्रीधरो भक्त वत्सलः .
मेघ नादो मेघ रूपो मेघ वृष्टि निवारकः .. ८३..
मेघ जीवन हेतुश्च मेघ श्यामः परात्मकः .
समीर तनयो बोध्ह तत्त्व विद्या विशारदः .. ८४..
अमोघो अमोघहृष्टिश्च इष्टदो अनिष्ट नाशनः .
अर्थो अनर्थापहारी च समर्थो राम सेवकः .. ८५..
अर्थी धन्यो असुरारातिः पुण्डरीकाक्ष आत्मभूः .
संकर्षणो विशुद्धात्मा विद्या राशिः सुरेश्वरः .. ८६..
अचलोद्धरको नित्यः सेतुकृद् राम सारथिः .
आनन्दः परमानन्दो मत्स्यः कूर्मो निधिःशमः .. ८७..
वाराहो नारसिंहश्च वामनो जमदग्निजः .
रामः कृष्णः शिवो बुद्धः कल्की रामाश्रयो हरः .. ८८..
नन्दी भृन्गी च चण्डी च गणेशो गण सेवितः .
कर्माध्यक्ष्यः सुराध्यक्षो विश्रामो जगतांपतिः .. ८९..
जगन्नथः कपि श्रेष्टः सर्वावसः सदाश्रयः .
सुग्रीवादिस्तुतः शान्तः सर्व कर्मा प्लवंगमः .. ९०..
नखदारितरक्षाश्च नख युद्ध विशारदः .
कुशलः सुघनः शेषो वासुकिस्तक्षकः स्वरः .. ९१..
स्वर्ण वर्णो बलाढ्यश्च राम पूज्यो अघनाशनः .
कैवल्य दीपः कैवल्यं गरुडः पन्नगो गुरुः .. ९२..
किल्यारावहतारातिगर्वः पर्वत भेदनः .
वज्रांगो वज्र वेगश्च भक्तो वज्र निवारकः .. ९३..
नखायुधो मणिग्रीवो ज्वालामाली च भास्करः .
प्रौढ प्रतापस्तपनो भक्त ताप निवारकः .. ९४..
शरणं जीवनं भोक्ता नानाचेष्टोह्यचंचलः .
सुस्वस्थो अस्वास्थ्यहा दुःखशमनः पवनात्मजः .. ९५..
पावनः पवनः कान्तो भक्तागस्सहनो बलः .
मेघ नादरिपुर्मेघनाद संहृतराक्षसः .. ९६..
क्षरो अक्षरो विनीतात्मा वानरेशः सतांगतिः .
श्री कण्टः शिति कण्टश्च सहायः सहनायकः .. ९७..
अस्तूलस्त्वनणुर्भर्गो देवः संसृतिनाशनः .
अध्यात्म विद्यासारश्च अध्यात्मकुशलः सुधीः .. ९८..
अकल्मषः सत्य हेतुः सत्यगः सत्य गोचरः .
सत्य गर्भः सत्य रूपः सत्यं सत्य पराक्रमः .. ९९..
अन्जना प्राणलिंगच वायु वंशोद्भवः शुभः .
भद्र रूपो रुद्र रूपः सुरूपस्चित्र रूपधृत् .. १००..
मैनाक वंदितः सूक्ष्म दर्शनो विजयो जयः .
क्रान्त दिग्मण्डलो रुद्रः प्रकटीकृत विक्रमः .. १०१..
कम्बु कण्टः प्रसन्नात्मा ह्रस्व नासो वृकोदरः .
लंबोष्टः कुण्डली चित्रमाली योगविदां वरः .. १०२..
विपश्चित् कविरानन्द विग्रहो अनन्य शासनः .
फल्गुणीसूनुरव्यग्रो योगात्मा योगतत्परः .. १०३..
योग वेद्यो योग कर्ता योग योनिर्दिगंबरः .
अकारादि क्षकारान्त वर्ण निर्मित विग्रहः .. १०४..
उलूखल मुखः सिंहः संस्तुतः परमेश्वरः .
श्लिष्ट जंघः श्लिष्ट जानुः श्लिष्ट पाणिः शिखा धरः .. १०५..
सुशर्मा अमित शर्मा च नारयण परायणः .
जिष्णुर्भविष्णू रोचिष्णुर्ग्रसिष्णुः स्थाणुरेव च .. १०६..
हरी रुद्रानुकृद् वृक्ष कंपनो भूमि कंपनः .
गुण प्रवाहः सूत्रात्मा वीत रागः स्तुति प्रियः .. १०७..
नाग कन्या भय ध्वंसी रुक्म वर्णः कपाल भृत् .
अनाकुलो भवोपायो अनपायो वेद पारगः .. १०८..
अक्षरः पुरुषो लोक नाथो रक्ष प्रभु दृडः .
अष्टांग योग फलभुक् सत्य संधः पुरुष्टुतः .. १०९..
स्मशान स्थन निलयः प्रेत विद्रावण क्षमः .
पंचाक्षर परः पंच मातृको रंजनध्वजः .. ११०..
योगिनी वृन्द वंद्यश्च शत्रुघ्नो अनन्त विक्रमः .
ब्रह्मचारी इन्द्रिय रिपुः धृतदण्डो दशात्मकः .. १११..
अप्रपंचः सदाचारः शूर सेना विदारकः .
वृद्धः प्रमोद आनंदः सप्त जिह्व पतिर्धरः .. ११२..
नव द्वार पुराधारः प्रत्यग्रः सामगायकः .
षट्चक्रधामा स्वर्लोको भयह्यन्मानदो अमदः .. ११३..
सर्व वश्यकरः शक्तिरनन्तो अनन्त मंगलः .
अष्ट मूर्तिर्धरो नेता विरूपः स्वर सुन्दरः .. ११४..
धूम केतुर्महा केतुः सत्य केतुर्महारथः .
नन्दि प्रियः स्वतन्त्रश्च मेखली समर प्रियः .. ११५..
लोहांगः सर्वविद् धन्वी षट्कलः शर्व ईश्वरः .
फल भुक् फल हस्तश्च सर्व कर्म फलप्रदः .. ११६..
धर्माध्यक्षो धर्मफलो धर्मो धर्मप्रदो अर्थदः .
पंच विंशति तत्त्वज्ञः तारक ब्रह्म तत्परः .. ११७..
त्रि मार्गवसतिर्भूमिः सर्व दुःख निबर्हणः .
ऊर्जस्वान् निष्कलः शूली माली गर्जन्निशाचरः .. ११८..
रक्तांबर धरो रक्तो रक्त माला विभूषणः .
वन माली शुभांगश्च श्वेतः स्वेतांबरो युवा .. ११९..
जयो जय परीवारः सहस्र वदनः कविः .
शाकिनी डाकिनी यक्ष रक्षो भूतौघ भंजनः .. १२०..
सध्योजातः कामगतिर् ज्ञान मूर्तिः यशस्करः .
शंभु तेजाः सार्वभौमो विष्णु भक्तः प्लवंगमः .. १२१..
चतुर्नवति मन्त्रज्ञः पौलस्त्य बल दर्पहा .
सर्व लक्ष्मी प्रदः श्रीमान् अन्गदप्रिय ईडितः .. १२२..
स्मृतिर्बीजं सुरेशानः संसार भय नाशनः .
उत्तमः श्रीपरीवारः श्री भू दुर्गा च कामाख्यक .. १२३..
सदागतिर्मातरिश्च राम पादाब्ज षट्पदः .
नील प्रियो नील वर्णो नील वर्ण प्रियः सुहृत् .. १२४..
राम दूतो लोक बन्धुः अन्तरात्मा मनोरमः .
श्री राम ध्यानकृद् वीरः सदा किंपुरुषस्स्तुतः .. १२५..
राम कार्यांतरंगश्च शुद्धिर्गतिरानमयः .
पुण्य श्लोकः परानन्दः परेशः प्रिय सारथिः .. १२६..
लोक स्वामि मुक्ति दाता सर्व कारण कारणः .
महा बलो महा वीरः पारावारगतिर्गुरुः .. १२७..
समस्त लोक साक्षी च समस्त सुर वंदितः .
सीता समेत श्री राम पाद सेवा दुरंधरः .. १२८..
इति श्री सीता समेत श्री राम पाद सेवा दुरंधर
श्री हनुमत् सहस्र नाम स्तोत्रं संपूर्णं ..

Be the first to comment - What do you think?  Posted by admin - December 19, 2014 at 11:53 am

Categories: Stotra   Tags: , , , ,

आरती श्री शनि देव जी की Shri Shani Dev Ji Ki Aarti

आरती श्री शनि देव जी की Shri Shani Dev Ji Ki Aarti

जय जय जय श्री शनि देव भक्तन हितकारी,
सूर्य पुत्र प्रभुछाया महतारी॥ जय जय जय शनि देव॥

श्याम अंग वक्र-दृष्टि चतुर्भुजा धारी,
नीलाम्बर धार नाथ गज की असवारी॥ जय ॥

क्रीट मुकुट शीश राजित दिपत है लिलारी,
मुक्तन की माल गले शोभित बलिहारी॥ जय ॥

मोदक मिष्ठान पान चढ़त हैं सुपारी,
लोहा तिल तेल उड द महिषी अति प्यारी ॥ जय ॥

देव दनुज ऋषि मुनी सुमिरत नर नारी,
विश्वनाथ धरत ध्यान शरण हैं तुम्हारी ॥ जय जय जय श्री शनि देव॥

Be the first to comment - What do you think?  Posted by admin - December 18, 2014 at 1:02 pm

Categories: Aarati   Tags: , ,

श्री रामायण जी की आरती (Aarti Shri Ramayan Ji ki)

श्री रामायण जी की आरती (Aarti Shri Ramayan Ji ki)

महर्षि वाल्मीकि

आरति श्री रामायण जी की।

कीरति कलित ललित सिय पी की॥

गावत ब्रह्‌मादिक मुनि नारद।

बाल्मीकि बिग्यान बिसारद॥

सुक सनकादि सेष अरु सारद।

बरन पवनसुत कीरति नीकी॥१॥

गावत बेद पुरान अष्टदस।

छओ सास्त्र सब ग्रंथन को रस॥

मुनि जन धन संतन को सरबस।

सार अंस संमत सबही की॥ २॥

गावत संतत संभु भवानी।

अरु घटसंभव मुनि बिग्यानी॥

ब्यास आदि कबिबर्ज बखानी।

कागभुसंडि गरुण के ही की॥३॥

कलिमल हरनि बिषय रस फीकी।

सुभग सिंगार मुक्ति जुबती की॥

दलन रोग भव मूरि अमी की।

तात मात सब बिधि तुलसी की॥४॥

आरति श्री रामायण जी की।

कीरति कलित ललित सिय पी की॥

बोलो सिया वर राम चन्द्र की जय

पवन सुत हनुमान की जय।

गोस्वामी तुलसीदास

Be the first to comment - What do you think?  Posted by admin - at 1:02 pm

Categories: Aarati   Tags: ,

आरती श्री रघुवर जी की (Aarti Shri Raghuvar Ji Ki)

आरती श्री रघुवर जी की (Aarti Shri Raghuvar Ji Ki)

आरती कीजै श्री रघुवर जी की,
सत चित आनन्द शिव सुन्दर की॥

दशरथ तनय कौशल्या नन्दन,
सुर मुनि रक्षक दैत्य निकन्दन॥

अनुगत भक्त भक्त उर चन्दन,
मर्यादा पुरुषोत्तम वर की॥

निर्गुण सगुण अनूप रूप निधि,
सकल लोक वन्दित विभिन्न विधि॥

हरण शोक-भय दायक नव निधि,
माया रहित दिव्य नर वर की॥

जानकी पति सुर अधिपति जगपति,
अखिल लोक पालक त्रिलोक गति॥

विश्व वन्द्य अवन्ह अमित गति,
एक मात्र गति सचराचर की॥

शरणागत वत्सल व्रतधारी,
भक्त कल्प तरुवर असुरारी॥

नाम लेत जग पावनकारी,
वानर सखा दीन दुख हर की॥

Be the first to comment - What do you think?  Posted by admin - at 1:01 pm

Categories: Aarati   Tags: ,

आरती श्री शिव जी की (Aarti Shri Shiv Ji Ki)

आरती श्री शिव जी की (Aarti Shri Shiv Ji Ki)

जय शिव ओंकारा, हर शिव ओंकारा,
ब्रह्‌मा विष्णु सदाशिव अर्द्धांगी धारा।

एकानन चतुरानन पंचानन राजै
हंसानन गरुणासन वृषवाहन साजै।

दो भुज चार चतुर्भुज दसभुज अति सोहै,
तीनों रूप निरखते त्रिभुवन मन मोहे।

अक्षमाला वनमाला मुण्डमाला धारी,
चन्दन मृगमद चंदा सोहै त्रिपुरारी।

श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर अंगे,
सनकादिक ब्रह्‌मादिक भूतादिक संगे।

कर मध्ये च कमंडलु चक्र त्रिशूलधारी,
सुखकारी दुखहारी जगपालन कारी।

ब्रह्‌मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका
प्रणवाक्षर में शोभित ये तीनों एका।

त्रिगुण स्वामी जी की आरती जो कोई नर गावे
कहत शिवानन्द स्वामी सुख सम्पत्ति पावे॥

Be the first to comment - What do you think?  Posted by admin - at 1:01 pm

Categories: Aarati   Tags: ,

आरती श्री सूर्यदेव जी की Aarti Shri Surya Dev Ji Ki

आरती श्री सूर्यदेव जी की Aarti Shri Surya Dev Ji Ki

जय जय जय रविदेव, जय जय जय रविदेव।

राजनीति मदहारी शतदल जीवन दाता।

षटपद मन मुदकारी हे दिनमणि ताता।

जग के हे रविदेव, जय जय जय रविदेव।

नभमंडल के वासी ज्योति प्रकाशक देवा।

निज जनहित सुखसारी तेरी हम सब सेवा।

करते हैं रवि देव, जय जय जय रविदेव।

कनक बदनमन मोहित रुचिर प्रभा प्यारी।

हे सुरवर रविदेव, जय जय जय रविदेव।।

Be the first to comment - What do you think?  Posted by admin - at 1:00 pm

Categories: Aarati   Tags: , ,

आरती श्री साईं जी की Shri Sai Baba Ki Aarti (Arti Sainath Ki), Sai Ram ki Arti

आरती श्री साईं जी की Shri Sai Baba Ki Aarti (Arti Sainath Ki), Sai Ram ki Arti

आरती श्री साईं गुरुवर की, परमानन्द सदा सुरवर की।

जा की कृपा विपुल सुखकारी, दुख शोक संकट भयहारी।

शिरडी में अवतार रचाया, चमत्कार से तत्व दिखाया।

कितने भक्त चरण पर आये, वे सुख शान्ति चिरंतन पाये।

भाव धरै जो मन में जैसा, पावत अनुभव वो ही वैसा।

गुरु की उदी लगवे तन को, समाधान लाभत उस मन को।

साईं नाम सदा जो गावे, सो फल जग में शाश्वत पावे।

गुरुवासर करि पूजा-सेवा, उस पर कृपा करत गुरुदेवा।

राम, कृष्ण, हनुमान रूप में, दे दर्शन, जानत जो मन में।

विविध धर्म के सेवक आते, दर्शन इच्छित फल पाते।

जै बोलो साईं बाबा की, जै बोलो अवधूत गुरु की।

साईंदास आरती को गावै, घर में बसि सुख, मंगल पावे।

Be the first to comment - What do you think?  Posted by admin - at 1:00 pm

Categories: Aarati   Tags: , , , ,

आरती श्री गिरिराज जी की || Shri Giriraj Ji Ki Aarti ||

आरती श्री गिरिराज जी की || Shri Giriraj Ji Ki Aarti ||

ओउम जय जय जय गिरिराज, स्वामी जय जय जय गिरिराज।

संकट में तुम राखौ, निज भक्तन की लाज।। ओउम जय ।।

इन्द्रादिक सब सुर मिल तुम्हरौ ध्यान धरैं।

रिषि मुनिजन यश गावें, ते भव सिन्धु तरैं।। ओउम जय ।।

सुन्दर रूप तुम्हारौ श्याम सिला सोहें।

वन उपवन लखि-लखि के भक्तन मन मोहे।। ओउम जय।।

मध्य मानसी गंग कलि के मल हरनी।

तापै दीप जलावें, उतरें वैतरनी।। ओउम जय।।

नवल अप्सरा कुण्ड सुहावन-पावन सुखकारी।

बायें राधा कुण्ड नहावें महा पापहारी।। ओउम जय।।

तुम्ही मुक्ति के दाता कलियुग के स्वामी।

दीनन के हो रक्षक प्रभु अन्तरयामी।। ओउम जय।।

हम हैं शरण तुम्हारी, गिरिवर गिरधारी।

देवकीनन्दन कृपा करो, हे भक्तन हितकारी।। ओउम जय।।

जो नर दे परिकम्मा पूजन पाठ करें।

गावें नित्य आरती पुनि नहिं जनम धरें।। ओउम जय।।

Be the first to comment - What do you think?  Posted by admin - at 12:58 pm

Categories: Uncategorized   Tags: , ,

Next Page »

© 2010 Complete Hindu Gods and Godesses Chalisa and Mantras Collection