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Dwadasha Stotram

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Be the first to comment - What do you think?  Posted by admin - November 8, 2016 at 10:34 am

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Shree Durga Ashtottar Shat Nam Stotram

मां दुर्गा के 108 नाम: पांच मिनट की साधना दिखाएगी कमाल

हिंदू धर्म में मां दुर्गा को शक्ति स्वरूपा माना गया है। मां दुर्गा की आराधना जीवन में आने वाली हर परेशानी से आपका बचाव करती हैं। नवरात्र में शक्ति की देवी मां दुर्गा की उपासना का विशेष महत्व होता है। इस बार शारदीय नवरात्र एक अक्तूबर से शुरू हो रहे हैं।

ऐसे में हम आपको बता रहे हैं मां दुर्गा की ऐसी उपासना, जिसे नवरात्र में प्रत्येक दिन पांच मिनट करने से आपकी हर इच्छा पूरी होगी। उपासना के बारे में जानने के लिए आगे पढ़ें।

नौ दिन करें ब्रह्मचर्य का पालन
ऐसा कहा जाता है कि नवरात्र में तो मां का स्मरण करने से ही सारे कष्ट दूर हो जाते हैं। इन नौ दिनों में भक्तों को मां भगवती की आराधना पूरे ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए करनी चाहिए। शुद्ध मन से मां की पूजा करने से भक्तों को उनकी तपस्या का सबसे ज्यादा फल मिलता है। इन नौ दिनों में आप बिना किसी मुहुर्त के मंगल कार्य शुरू कर सकते हैं।

ऐसे करें आराधना
शास्त्रों में मां दुर्गा के 108 नाम बताए गए हैं। ऐसी मान्यता है कि नवरात्र में प्रतिदिन सभी 108 नामों का उच्चारण करने से आपकी सभी इच्छाएं पूरी होती है। इसके लिए नवरात्र में प्रतिदिन स्नान करने के बाद शुद्ध आसन पर बैठकर मां दुर्गा के इन सभी नामों का स्मरण करें और बाद में आरती कर मौजूद भक्तनों में प्रसाद वितरित करें।

 

श्री दुर्गाष्टोत्तरशतनामस्तोत्र || श्री दुर्गाष्टोत्तरशतनामावली

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1. सती : अग्नि में जल कर भी जीवित होने वाली
2. साध्वी : आशावादी
3. भवप्रीता : भगवान् शिव पर प्रीति रखने वाली
4. भवानी : ब्रह्मांड की निवास
5. भवमोचनी : संसार बंधनों से मुक्त करने वाली
6. आर्या : देवी
7. दुर्गा : अपराजेय
8. जया : विजयी
9. आद्य : शुरूआत की वास्तविकता
10. त्रिनेत्र : तीन आँखों वाली
11. शूलधारिणी : शूल धारण करने वाली
12. पिनाकधारिणी : शिव का त्रिशूल धारण करने वाली
13. चित्रा : सुरम्य, सुंदर
14. चण्डघण्टा : प्रचण्ड स्वर से घण्टा नाद करने वाली, घंटे की आवाज निकालने वाली
15. महातपा : भारी तपस्या करने वाली
16. मन : मनन- शक्ति
17. बुद्धि : सर्वज्ञाता
18. अहंकारा : अभिमान करने वाली
19. चित्तरूपा : वह जो सोच की अवस्था में है
20. चिता : मृत्युशय्या
21. चिति : चेतना
22. सर्वमन्त्रमयी : सभी मंत्रों का ज्ञान रखने वाली
23. सत्ता : सत्-स्वरूपा, जो सब से ऊपर है
24. सत्यानन्दस्वरूपिणी : अनन्त आनंद का रूप
25. अनन्ता : जिनके स्वरूप का कहीं अन्त नहीं
26. भाविनी : सबको उत्पन्न करने वाली, खूबसूरत औरत
27. भाव्या : भावना एवं ध्यान करने योग्य
28. भव्या : कल्याणरूपा, भव्यता के साथ
29. अभव्या : जिससे बढ़कर भव्य कुछ नहीं
30. सदागति : हमेशा गति में, मोक्ष दान
31. शाम्भवी : शिवप्रिया, शंभू की पत्नी
32. देवमाता : देवगण की माता
33. चिन्ता : चिन्ता
34. रत्नप्रिया : गहने से प्यार
35. सर्वविद्या : ज्ञान का निवास
36. दक्षकन्या : दक्ष की बेटी
37. दक्षयज्ञविनाशिनी : दक्ष के यज्ञ को रोकने वाली
38. अपर्णा : तपस्या के समय पत्ते को भी न खाने वाली
39. अनेकवर्णा : अनेक रंगों वाली
40. पाटला : लाल रंग वाली
41. पाटलावती : गुलाब के फूल या लाल परिधान या फूल धारण करने वाली
42. पट्टाम्बरपरीधाना : रेशमी वस्त्र पहनने वाली
43. कलामंजीरारंजिनी : पायल को धारण करके प्रसन्न रहने वाली
44. अमेय : जिसकी कोई सीमा नहीं
45. विक्रमा : असीम पराक्रमी
46. क्रूरा : दैत्यों के प्रति कठोर
47. सुन्दरी : सुंदर रूप वाली
48. सुरसुन्दरी : अत्यंत सुंदर
49. वनदुर्गा : जंगलों की देवी
50. मातंगी : मतंगा की देवी
51. मातंगमुनिपूजिता : बाबा मतंगा द्वारा पूजनीय
52. ब्राह्मी : भगवान ब्रह्मा की शक्ति
53. माहेश्वरी : प्रभु शिव की शक्ति
54. इंद्री : इन्द्र की शक्ति
55. कौमारी : किशोरी
56. वैष्णवी : अजेय
57. चामुण्डा : चंड और मुंड का नाश करने वाली
58. वाराही : वराह पर सवार होने वाली
59. लक्ष्मी : सौभाग्य की देवी
60. पुरुषाकृति : वह जो पुरुष धारण कर ले
61. विमिलौत्त्कार्शिनी : आनन्द प्रदान करने वाली
62. ज्ञाना : ज्ञान से भरी हुई
63. क्रिया : हर कार्य में होने वाली
64. नित्या : अनन्त
65. बुद्धिदा : ज्ञान देने वाली
66. बहुला : विभिन्न रूपों वाली
67. बहुलप्रेमा : सर्व प्रिय
68. सर्ववाहनवाहना : सभी वाहन पर विराजमान होने वाली
69. निशुम्भशुम्भहननी : शुम्भ, निशुम्भ का वध करने वाली
70. महिषासुरमर्दिनि : महिषासुर का वध करने वाली
71. मधुकैटभहंत्री : मधु व कैटभ का नाश करने वाली
72. चण्डमुण्ड विनाशिनि : चंड और मुंड का नाश करने वाली
73. सर्वासुरविनाशा : सभी राक्षसों का नाश करने वाली
74. सर्वदानवघातिनी : संहार के लिए शक्ति रखने वाली
75. सर्वशास्त्रमयी : सभी सिद्धांतों में निपुण
76. सत्या : सच्चाई
77. सर्वास्त्रधारिणी : सभी हथियारों धारण करने वाली
78. अनेकशस्त्रहस्ता : हाथों में कई हथियार धारण करने वाली
79. अनेकास्त्रधारिणी : अनेक हथियारों को धारण करने वाली
80. कुमारी : सुंदर किशोरी
81. एककन्या : कन्या
82. कैशोरी : जवान लड़की
83. युवती : नारी
84. यति : तपस्वी
85. अप्रौढा : जो कभी पुराना ना हो
86. प्रौढा : जो पुराना है
87. वृद्धमाता : शिथिल
88. बलप्रदा : शक्ति देने वाली
89. महोदरी : ब्रह्मांड को संभालने वाली
90. मुक्तकेशी : खुले बाल वाली
91. घोररूपा : एक भयंकर दृष्टिकोण वाली
92. महाबला : अपार शक्ति वाली
93. अग्निज्वाला : मार्मिक आग की तरह
94. रौद्रमुखी : विध्वंसक रुद्र की तरह भयंकर चेहरा
95. कालरात्रि : काले रंग वाली
96. तपस्विनी : तपस्या में लगे हुए
97. नारायणी : भगवान नारायण की विनाशकारी रूप
98. भद्रकाली : काली का भयंकर रूप
99. विष्णुमाया : भगवान विष्णु का जादू
100. जलोदरी : ब्रह्मांड में निवास करने वाली
101. शिवदूती : भगवान शिव की राजदूत
102. कराली : हिंसक
103. अनन्ता : विनाश रहित
104. परमेश्वरी : प्रथम देवी
105. कात्यायनी : ऋषि कात्यायन द्वारा पूजनीय
106. सावित्री : सूर्य की बेटी
107. प्रत्यक्षा : वास्तविक
108. ब्रह्मवादिनी : वर्तमान में हर जगह वास करने वाली

 

Shree Durga Ashtottar Shat Nam Stotram
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Sri Durga Ashtottara Sata Nama Stotram Sanskrit … Durga Mantra| Durga Stuti| Shri Durga Ashtottara Shatanamavali Stotram Duration: 13.55 min.
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Be the first to comment - What do you think?  Posted by admin - October 22, 2016 at 12:50 pm

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Sri vishnu Asta Vishanti Nam Stotram

Sri vishnu Asta Vishanti Nam Stotram – Devotional songs sanskrit for Vishnu – Twenty Eight names of lord vishnu in hindi, by chanting these Vishunu names, man free from sins.

Sri vishnu Asta Vishanti Nam Stotram

Be the first to comment - What do you think?  Posted by admin - September 22, 2015 at 12:27 pm

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Angaraka Stotram

॥ अङ्गारकस्तोत्रम् ॥
अस्य श्री अङ्गारकस्तोत्रस्य ।
विरूपाङ्गिरस ऋषिः ।
अग्निर्देवता ।
गायत्री छन्दः ।
भौमप्रीत्यर्थं जपे विनियोगः ।
अङ्गारकः शक्तिधरो लोहिताङ्गो धरासुतः ।
कुमारो मङ्गलो भौमो महाकायो धनप्रदः ॥ १॥

ऋणहर्ता दृष्टिकर्ता रोगकृद्रोगनाशनः ।
विद्युत्प्रभो व्रणकरः कामदो धनहृत् कुजः ॥ २॥

सामगानप्रियो रक्तवस्त्रो रक्तायतेक्षणः ।
लोहितो रक्तवर्णश्च सर्वकर्मावबोधकः ॥ ३॥

रक्तमाल्यधरो हेमकुण्डली ग्रहनायकः ।
नामान्येतानि भौमस्य यः पठेत्सततं नरः ॥ ४॥

ऋणं तस्य च दौर्भाग्यं दारिद्र्यं च विनश्यति ।
धनं प्राप्नोति विपुलं स्त्रियं चैव मनोरमाम् ॥ ५॥

वंशोद्द्योतकरं पुत्रं लभते नात्र संशयः ।
योऽर्चयेदह्नि भौमस्य मङ्गलं बहुपुष्पकैः ॥ ६॥

सर्वा नश्यति पीडा च तस्य ग्रहकृता ध्रुवम् ॥ ७॥

॥ इति श्रीस्कन्दपुराणे अङ्गारकस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

 

Angaraka Stotram

Asya Shri A~Ngarakastotrasya .
Virupangirasa Rushih .
Agnirdevata .
Gayatri Chhandah .
Bhaumaprityartham Jape Viniyogah .
Angarakah Shaktidharo Lohita~Ngo Dharasutah .
Kumaro Mangalo Bhaumo Mahakayo Dhanapradah .. 1..
R^Inaharta Dr^Ishtikarta Rogakr^Idroganashanah .
Vidyutprabho Vranakarah Kamado Dhanahr^It Kujah .. 2..
Samaganapriyo Raktavastro Raktayatexanah .
Lohito Raktavarnashcha Sarvakarmavabodhakah .. 3..
Raktamalyadharo Hemakundali Grahanayakah .
Namanyetani Bhaumasya Yah Pathetsatata.N Narah .. 4..
R^Ina.N Tasya Cha Daurbhagya.N Daridrya.N Cha Vinashyati .
Dhana.N Prapnoti Vipula.N Striya.N Chaiva Manoramam .. 5..
Va.Nshoddyotakara.N Putra.N Labhate Natra Sa.Nshayah .
Yo.Archayedahni Bhaumasya Ma~Ngala.N Bahupushpakaih .. 6..
Sarva Nashyati Pida Cha Tasya Grahakr^Ita Dhruvam .. 7..
.. Iti Shriskandapurane A~Ngarakastotra.N Sa.Npurnam ..

 

Be the first to comment - What do you think?  Posted by admin - February 11, 2015 at 7:59 am

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Lord Dattatrey stotram ( Narad Puran )

Shri Dattatrey stotram ( Narad Puran )॥ श्रीदत्तात्रेयस्तोत्रम् ( नारदपुराण ) ॥
|| श्री गणेशाय नमः ||
|| ॐ द्रां दत्तात्रयाय नमः ||
अथ ध्यानम
जटाधरं पांडूरंगं शूलहस्तं कृपानिधिम् ।
सर्वरोगहरं देवं दत्तात्रेयमहं भजे ॥ १॥
अथ न्यासं
अस्य श्रीदत्तात्रेयस्तोत्रमन्त्रस्य
भगवान् नारदऋषिः ।
अनुष्टुप् छन्दः ।
श्रीदत्तपरमात्मा देवता ।
श्रीदत्तप्रीत्यर्थे जपे विनियोगः ॥
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अथ स्तोत्रम
जगदुत्पत्तिकर्त्रे च स्थितिसंहार हेतवे ।
भवपाशविमुक्ताय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ १॥
जराजन्मविनाशाय देहशुद्धिकराय च ।
दिगम्बरदयामूर्ते दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ २॥
कर्पूरकान्तिदेहाय ब्रह्ममूर्तिधराय च ।
वेदशास्त्रपरिज्ञाय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ ३॥
-हस्वदीर्घकृशस्थूल, नामगोत्रविवर्जित ।
पञ्चभूतैकदीप्ताय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ ४॥यज्ञभोक्ते च यज्ञाय यज्ञरूपधराय च ।
यज्ञप्रियाय सिद्धाय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ ५॥आदौ ब्रह्मा मध्ये विष्णुरन्ते देवः सदाशिवः ।
मूर्तित्रयस्वरूपाय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ ६॥

भोगालयाय भोगाय योगयोग्याय धारिणे ।
जितेन्द्रियजितज्ञाय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ ७॥

दिगम्बराय दिव्याय दिव्यरूपधरायच ।
सदोदितपरब्रह्म दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ ८॥

जम्बुद्वीपमहाक्षेत्रे मातापुरनिवासिने ।
जयमानसतां देव दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ ९॥

भिक्षाटनं गृहे ग्रामे पात्रं हेममयं करे ।
नानास्वादमयी भिक्षा दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ १०॥

ब्रह्मज्ञानमयी मुद्रा वस्त्रे चाकाशभूतले ।
प्रज्ञानघनबोधाय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ ११॥

अवधूतसदानन्द परब्रह्मस्वरूपिणे ।
विदेहदेहरूपाय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ १२॥

सत्यरूपसदाचारसत्यधर्मपरायण ।
सत्याश्रयपरोक्षाय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ १३॥

शूलहस्तगदापाणे वनमालासुकन्धर ।
यज्ञसूत्रधरब्रह्मन् दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ १४॥

क्षराक्षरस्वरूपाय परात्परतराय च ।
दत्तमुक्तिपरस्तोत्र दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ १५॥

दत्त विद्याढ्यलक्ष्मीश दत्त स्वात्मस्वरूपिणे ।
गुणनिर्गुणरूपाय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ १६॥

शत्रुनाशकरं स्तोत्रं ज्ञानविज्ञानदायकम् ।
सर्वपापं शमं याति दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ १७॥

इदं स्तोत्रं महाद्दिव्यं दत्तप्रत्यक्षकारकम् ।
दत्तात्रेयप्रसादाच्च नारदेन प्रकीर्तितम् ॥ १८॥

॥ इति श्रीनारदपुराणे नारदविरचितं दत्तात्रेयस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

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Dattatreya Stotram Lyrics
1) Jatadharam, Pandurangam,
Shoolahastam Krupanidhim,
Sarvaroga Haram Devam,
Dattatreyam aham Bhaje
My salutations to Dattatreya,
Who is with matted hair,
Who is Lord Vishnu,
Who holds soola in his hand,
Who is store house of mercy,
And who is the panacea for all illness.2) Jagat Utapatti Karthre Cha,
Sthithi Samhara Hethave,
Bhava Pasa Vimukthaya,
Dattatreya NamosthutheMy salutations to Dattatreya,
Who created all the worlds,
Who looks after the worlds,
Who destroys the worlds,
And who grants redemption,
From the bonds of sorrow of domestic life.

3) Jara Janma Vinasaya,
Deha Shuddhi Karaya Cha,
Digambara Daya Moorthe
Dattatreya Namosthuthe

My salutations to Dhattatreya,
Who destroys sorrow of birth and old age,
Who cleans our body and soul,
Who wears the directions as cloths,
And who is the lord of mercy.

4) Karpoora Kanthi Dehaya,
Brhma Moorthy Daraya Cha,
Veda Sasthra Parignaya,
Dattatreya Namosthuthe

My salutations to Dattatreya,
Who has a colour of burning camphor,
Who takes up the role of the creator,
And who is master of the holy Vedas.

5) Hruswa Deergha Krutha Sthula,
Nama Gothra Vivarjitha,
Pancha Boothaika Deepthaya,
Dattatreya Namosthuthe

My salutations to Dattatreya,
Who is much beyond, thin, thick, short and tall,
Who cannot be limited by name or caste,
And who shines in the five spirits of the world.

6) Yagna Bhokthre Cha Yagnaya,
Yagna Roopa Daraya Cha,
Yagna Priyaya Sidhaya,
Dattatreya Namosthuthe

My salutations to Dattatreya,
Who is the result of fire sacrifices.
Who is fire sacrifice himself.
Who takes the form of the fire sacrifice,
And who is the saint who likes fire sacrifices.

7) Adhou Brhama Madhye Vishnur,
Anthe Deva Sada Shiva,
Moorthy Thraya Swaroopaya,
Dattatreya Namosthuthe

My salutations to Dattatreya,
Who in the beginning is the creator,
Who in the middle is Vishnu who takes care,
Who in the end is Shiva the destroyer,
And who is the lord who represents the trinity.

8) Bhogaalayaya Bhogaaya,
Yoga Yoyaya Dharine,
Jithendriya Jithagnaya,
Dattatreya Namosthuthe

My salutations to Dattatreya,
Who is the place where pleasure resides,
Who is the pleasures himself,
Who is the great wearer of Yoga,
Who has perfect control of his senses,
And who is greater than any scholar.

9) Brhma Jnana Mayee Mudhra,
Vasthre Cha Akasa Bhoothale,
Prgnana Gana Bhodaya,
Dattatreya Namosthuthe

My salutations to Dattatreya,
Whose stamp is the knowledge of ultimate,
Who wears the sky and earth as his cloths,
And who is the three states of wakefulness,
Sleep and dream.

10) Sathya Roopa Sadachara,
Sathya Dharma Parayana,
Sathyasraya Parokshaya,
Dattatreya Namosthuthe

My salutations to Dattatreya,
Who is truth personified,
Whose conduct is perfect,
Who follows truth as his dharma,
Who depends wholly on truth,
And who is not in visible form.

11) Shoola Hasta Gada Pane,
Vana Mala Sukundara,
Yagna Soothra Dara Brahman,
Dattatreya Namosthuthe

My salutations to Dattatreya,
Who has in his hands he spear and the mace,
Who wears garland of scented flowers of the wild,
And who is the prime executor of fire sacrifices.

12) Datta Vidhyadya Lakshmeesa,
Datta Swathma Swaroopine,
Guna Nirguna Roopaya,
Dattatreya Namosthuthe

My salutations to Dattatreya,
Who is the great knowledge,
Who is the lord of Lakshmi
Who has the form of the soul of Datta
And who has the form with and without properties

Phalasruthi

Sathru Nasa Karam Sthothram,
Jnana Vijnana Dhayakam,
Sarva Papam Samam Yathi,
Dattatreya Namosthuthe.

My salutations to Dattatreya,
Which would destroy my enemies,
Which would give me knowledge of religion and science,
And which would destroy all my sins

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Be the first to comment - What do you think?  Posted by admin - February 10, 2015 at 1:48 pm

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HANUMAN RAKSHA STOTRAM

॥ श्रीहनुमद्रक्षास्तोत्रम् ॥

HANUMAN RAKSHA STOTRAM

वामे करे वैरिभिदं वहन्तं शैलं परे शृङ्खलहारटङ्कम् ।
ददानमच्छाच्छसुवर्णवर्णं भजे ज्वलत्कुण्डलमाञ्जनेयम् ॥ १ ॥
पद्मरागमणिकुण्डलत्विषा पाटलीकृतकपोलमस्तकम् ।
दिव्यहेमकदलीवनान्तरे भावयामि पवमाननन्दनम् ॥ २ ॥
उद्यदादित्यसङ्काशमुदारभुजविक्रमम् ।
कन्दर्पकोटिलावण्यं सर्वविद्याविशारदम् ॥ ३ ॥
श्रीरामहृदयानन्दं भक्तकल्पमहीरुहम् ।
अभयं वरदं दोर्भ्यां कलये मारुतात्मजम् ॥ ४ ॥
वामहस्ते महाकृच्छ्रदशास्यकरमर्दनम् ।
उद्यद्वीक्षणकोदण्डं हनूमन्तं विचिन्तयेत् ॥ ५ ॥
स्फटिकाभं स्वर्णकान्तिं द्विभुजं च कृताञ्जलिम् ।
कुण्डलद्वयसंशोभिमुखाम्भोजं हरिं भजे ॥ ६ ॥
From Hanumat stuti manjari

Be the first to comment - What do you think?  Posted by admin - December 19, 2014 at 12:14 pm

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Hanuman, HANUMAN VADVANAL STOTRAM

॥ श्री हनुमद्वाडवानलस्तोत्रम् ॥
श्रीगणेशाय नमः ।
ॐ अस्य श्रीहनुमद्वाडवानलस्तोत्रमन्त्रस्य
श्रीरामचन्द्र ऋषिः, श्रीवडवानलहनुमान् देवता,
मम समस्तरोगप्रशमनार्थं, आयुरारोग्यैश्वर्याभिवृद्ध्यर्थं,
समस्तपापक्षयार्थं, सीतारामचन्द्रप्रीत्यर्थं च
हनुमद्वाडवानलस्तोत्रजपमहं करिष्ये ॥
ॐ ह्रां ह्रीं ॐ नमो भगवते श्री महाहनुमते प्रकटपराक्रम
सकलदिङ्मण्डलयशोवितानधवलीकृतजगत्त्रितय वज्रदेह
रुद्रावतार लङ्कापुरीदहन उमाअमलमन्त्र उदधिबन्धन
दशशिरःकृतान्तक सीताश्वसन वायुपुत्र अञ्जनीगर्भसम्भूत
श्रीरामलक्ष्मणानन्दकर कपिसैन्यप्राकार सुग्रीवसाह्य
रणपर्वतोत्पाटन कुमारब्रह्मचारिन् गभीरनाद
सर्वपापग्रहवारण सर्वज्वरोच्चाटन डाकिनीविध्वंसन
ॐ ह्रां ह्रीं ॐ नमो भगवते महावीरवीराय सर्वदुःखनिवारणाय
ग्रहमण्डलसर्वभूतमण्डलसर्वपिशाचमण्डलोच्चाटन
भूतज्वरएकाहिकज्वरद्व्याहिकज्वरत्र्याहिकज्वरचातुर्थिकज्वर-
सन्तापज्वरविषमज्वरतापज्वरमाहेश्वरवैष्णवज्वरान् छिन्धि छिन्धि
यक्षब्रह्मराक्षसभूतप्रेतपिशाचान् उच्चाटय उच्चाटय
ॐ ह्रां ह्रीं ॐ नमो भगवते श्रीमहाहनुमते
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ह्रौं ह्रः आं हां हां हां औं सौं एहि एहि एहि
ॐहं ॐहं ॐहं ॐहं ॐनमो भगवते श्रीमहाहनुमते
श्रवणचक्षुर्भूतानां शाकिनीडाकिनीनां विषमदुष्टानां
सर्वविषं हर हर आकाशभुवनं भेदय भेदय छेदय छेदय
मारय मारय शोषय शोषय मोहय मोहय ज्वालय ज्वालय
प्रहारय प्रहारय सकलमायां भेदय भेदय
ॐ ह्रां ह्रीं ॐ नमो भगवते महाहनुमते सर्व ग्रहोच्चाटन
परबलं क्षोभय क्षोभय सकलबन्धनमोक्षणं कुरु कुरु
शिरःशूलगुल्मशूलसर्वशूलान्निर्मूलय निर्मूलय
नागपाशानन्तवासुकितक्षककर्कोटककालियान्
यक्षकुलजलगतबिलगतरात्रिञ्चरदिवाचर
सर्वान्निर्विषं कुरु कुरु स्वाहा ॥
राजभयचोरभयपरमन्त्रपरयन्त्रपरतन्त्रपरविद्याच्छेदय छेदय
स्वमन्त्रस्वयन्त्रस्वतन्त्रस्वविद्याः प्रकटय प्रकटय
सर्वारिष्टान्नाशय नाशय सर्वशत्रून्नाशय नाशय
असाध्यं साधय साधय हुं फट् स्वाहा ॥
॥ इति श्रीविभीषणकृतं हनुमद्वाडवानलस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
As the stotra itself says it is helpful in the control of all illness and
enhances wealth. It can be recited by women. The only strange thing I heard
about it is that it is not to be recited on hanumAna’s regular days ie.
Tuesdays and Saturdays. It is to be recited on Wednesdays. But I have not come
across this in any written book, just hearsay.
To be under a “protective cover” I would suggest panchamukhI hanumat kavacham
and ekAdasha mukhI hanumat kavacham

Hanuman, HANUMAN VADVANAL STOTRAM

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Hanuman, SHRI ANJANEYA SAHASRANAM STOTRAM

श्री आञ्जनेय सहस्रनामस्तोत्रम् ..

.. श्रीः..
Shri Anjaneya or Hanuman Stotra of 1000 Names
.. श्री आञ्जनेय सहस्रनामस्तोत्रम् ..
उद्यदादित्य संकाशं उदार भुज विक्रमम् .
कन्दर्प कोटि लावण्यं सर्व विद्या विशारदम् ..
श्री राम हृदयानंदं भक्त कल्प महीरुहम् .
अभयं वरदं दोर्भ्यां कलये मारुतात्मजम् ..
अथ सहस्रनाम स्तोत्रम् .
हनुमान् श्री प्रदो वायु पुत्रो रुद्रो अनघो अजरः .
अमृत्युर् वीरवीरश्च ग्रामावासो जनाश्रयः .. १..
धनदो निर्गुणः शूरो वीरो निधिपतिर् मुनिः .
पिन्गाक्षो वरदो वाग्मी सीता शोक विनाशकः .. २..
शिवः शर्वः परो अव्यक्तो व्यक्ताव्यक्तो धराधरः .
पिन्गकेशः पिन्गरोमा श्रुतिगम्यः सनातनः .. ३..
अनादिर्भगवान् देवो विश्व हेतुर् निराश्रयः .
आरोग्यकर्ता विश्वेशो विश्वनाथो हरीश्वरः .. ४..
भर्गो रामो राम भक्तः कल्याणः प्रकृति स्थिरः .
विश्वम्भरो विश्वमूर्तिः विश्वाकारश्च विश्वपाः .. ५..
विश्वात्मा विश्वसेव्यो अथ विश्वो विश्वहरो रविः .
विश्वचेष्टो विश्वगम्यो विश्वध्येयः कलाधरः .. ६..
प्लवंगमः कपिश्रेष्टो वेदवेद्यो वनेचरः .
बालो वृद्धो युवा तत्त्वं तत्त्वगम्यः सुखो ह्यजः .. ७..
अन्जनासूनुरव्यग्रो ग्राम ख्यातो धराधरः .
भूर्भुवस्स्वर्महर्लोको जनो लोकस्तपो अव्ययः .. ८..
सत्यं ओम्कार गम्यश्च प्रणवो व्यापको अमलः .
शिवो धर्म प्रतिष्ठाता रामेष्टः फल्गुणप्रियः .. ९..
गोष्पदीकृतवारीशः पूर्णकामो धरापतिः .
रक्षोघ्नः पुण्डरीकाक्षः शरणागतवत्सलः .. १०..
जानकी प्राण दाता च रक्षः प्राणापहारकः .
पूर्णसत्त्वः पीतवासा दिवाकर समप्रभः .. ११..
द्रोणहर्ता शक्तिनेता शक्ति राक्षस मारकः .
अक्षघ्नो रामदूतश्च शाकिनी जीव हारकः .. १२..
भुभुकार हतारातिर्दुष्ट गर्व प्रमर्दनः .
हेतुः सहेतुः प्रंशुश्च विश्वभर्ता जगद्गुरुः .. १३..
जगत्त्राता जगन्नथो जगदीशो जनेश्वरः .
जगत्पिता हरिः श्रीशो गरुडस्मयभंजनः .. १४..
पार्थध्वजो वायुसुतो अमित पुच्छो अमित प्रभः .
ब्रह्म पुच्छं परब्रह्मापुच्छो रामेष्ट एव च .. १५..
सुग्रीवादि युतो ज्ञानी वानरो वानरेश्वरः .
कल्पस्थायी चिरंजीवी प्रसन्नश्च सदा शिवः .. १६..
सन्नतिः सद्गतिः भुक्ति मुक्तिदः कीर्ति दायकः .
कीर्तिः कीर्तिप्रदश्चैव समुद्रः श्रीप्रदः शिवः .. १७..
उदधिक्रमणो देवः संसार भय नाशनः .
वार्धि बंधनकृद् विश्व जेता विश्व प्रतिष्ठितः .. १८..
लंकारिः कालपुरुषो लंकेश गृह भंजनः .
भूतावासो वासुदेवो वसुस्त्रिभुवनेश्वरः .. १९..
श्रीरामदूतः कृष्णश्च लंकाप्रासादभंजकः .
कृष्णः कृष्ण स्तुतः शान्तः शान्तिदो विश्वपावनः .. २०..
विश्व भोक्ता च मारघ्नो ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः .
ऊर्ध्वगो लान्गुली मालि लान्गूल हत राक्षसः .. २१..
समीर तनुजो वीरो वीरमारो जयप्रदः .
जगन्मन्गलदः पुण्यः पुण्य श्रवण कीर्तनः .. २२..
पुण्यकीर्तिः पुण्य गतिर्जगत्पावन पावनः .
देवेशो जितमारश्च राम भक्ति विधायकः .. २३..
ध्याता ध्येयो भगः साक्षी चेत चैतन्य विग्रहः .
ञानदः प्राणदः प्राणो जगत्प्राणः समीरणः .. २४..
विभीषण प्रियः शूरः पिप्पलायन सिद्धिदः .
सुहृत् सिद्धाश्रयः कालः काल भक्षक भंजनः .. २५..
लंकेश निधनः स्थायी लंका दाहक ईश्वरः .
चन्द्र सूर्य अग्नि नेत्रश्च कालाग्निः प्रलयान्तकः .. २६..
कपिलः कपीशः पुण्यराशिः द्वादश राशिगः .
सर्वाश्रयो अप्रमेयत्मा रेवत्यादि निवारकः .. २७..
लक्ष्मण प्राणदाता च सीता जीवन हेतुकः .
रामध्येयो हृषीकेशो विष्णु भक्तो जटी बली .. २८..
देवारिदर्पहा होता कर्ता हर्ता जगत्प्रभुः .
नगर ग्राम पालश्च शुद्धो बुद्धो निरन्तरः .. २९..
निरंजनो निर्विकल्पो गुणातीतो भयंकरः .
हनुमांश्च दुराराध्यः तपस्साध्यो महेश्वरः .. ३०..
जानकी घनशोकोत्थतापहर्ता परात्परः .
वाडंभ्यः सदसद्रूपः कारणं प्रकृतेः परः .. ३१..
भाग्यदो निर्मलो नेता पुच्छ लंका विदाहकः .
पुच्छबद्धो यातुधानो यातुधान रिपुप्रियः .. ३२..
चायापहारी भूतेशो लोकेश सद्गति प्रदः .
प्लवंगमेश्वरः क्रोधः क्रोध संरक्तलोचनः .. ३३..
क्रोध हर्ता ताप हर्ता भाक्ताभय वरप्रदः.
भक्तानुकंपी विश्वेशः पुरुहूतः पुरंदरः .. ३४..
अग्निर्विभावसुर्भास्वान् यमो निष्कृतिरेवच .
वरुणो वायुगतिमान् वायुः कौबेर ईश्वरः .. ३५..
रविश्चन्द्रः कुजः सौम्यो गुरुः काव्यः शनैश्वरः .
राहुः केतुर्मरुद्धाता धर्ता हर्ता समीरजः .. ३६..
मशकीकृत देवारि दैत्यारिः मधुसूदनः .
कामः कपिः कामपालः कपिलो विश्व जीवनः .. ३७..
भागीरथी पदांभोजः सेतुबंध विशारदः .
स्वाहा स्वधा हविः कव्यं हव्यवाह प्रकाशकः .. ३८..
स्वप्रकाशो महावीरो लघुश्च अमित विक्रमः .
प्रडीनोड्डीनगतिमान् सद्गतिः पुरुषोत्तमः .. ३९..
जगदात्मा जगध्योनिर्जगदंतो ह्यनंतकः .
विपाप्मा निष्कलंकश्च महान् मदहंकृतिः .. ४०..
खं वायुः पृथ्वी ह्यापो वह्निर्दिक्पाल एव च .
क्षेत्रज्ञः क्षेत्र पालश्च पल्वलीकृत सागरः .. ४१..
हिरण्मयः पुराणश्च खेचरो भुचरो मनुः .
हिरण्यगर्भः सूत्रात्मा राजराजो विशांपतिः .. ४२..
वेदांत वेद्यो उद्गीथो वेदवेदंग पारगः .
प्रति ग्रामस्थितः साध्यः स्फूर्ति दात गुणाकरः .. ४३..
नक्षत्र माली भूतात्मा सुरभिः कल्प पादपः .
चिन्ता मणिर्गुणनिधिः प्रजा पतिरनुत्तमः .. ४४..
पुण्यश्लोकः पुरारातिर्ज्योतिष्मान् शर्वरीपतिः .
किलिकिल्यारवत्रस्तप्रेतभूतपिशाचकः .. ४५..
रुणत्रय हरः सूक्ष्मः स्तूलः सर्वगतिः पुमान् .
अपस्मार हरः स्मर्ता शृतिर्गाथा स्मृतिर्मनुः .. ४६..
स्वर्ग द्वारं प्रजा द्वारं मोक्ष द्वारं कपीश्वरः .
नाद रूपः पर ब्रह्म ब्रह्म ब्रह्म पुरातनः .. ४७..
एको नैको जनः शुक्लः स्वयं ज्योतिर्नाकुलः .
ज्योतिः ज्योतिरनादिश्च सात्त्विको राजसत्तमः .. ४८..
तमो हर्ता निरालंबो निराकारो गुणाकरः .
गुणाश्रयो गुणमयो बृहत्कायो बृहद्यशः .. ४९..
बृहद्धनुर् बृहत्पादो बृहन्मूर्धा बृहत्स्वनः .
बृहत् कर्णो बृहन्नासो बृहन्नेत्रो बृहत्गलः .. ५०..
बृहध्यन्त्रो बृहत्चेष्टो बृहत् पुच्छो बृहत् करः .
बृहत्गतिर्बृहत्सेव्यो बृहल्लोक फलप्रदः ..५१..
बृहच्छक्तिर्बृहद्वांछा फलदो बृहदीश्वरः .
बृहल्लोक नुतो द्रष्टा विद्या दात जगद् गुरुः .. ५२..
देवाचार्यः सत्य वादी ब्रह्म वादी कलाधरः .
सप्त पातालगामी च मलयाचल संश्रयः .. ५३..
उत्तराशास्थितः श्रीदो दिव्य औषधि वशः खगः .
शाखामृगः कपीन्द्रश्च पुराणः श्रुति संचरः .. ५४..
चतुरो ब्राह्मणो योगी योगगम्यः परात्परः .
अनदि निधनो व्यासो वैकुण्ठः पृथ्वी पतिः .. ५५..
पराजितो जितारातिः सदानन्दश्च ईशिता .
गोपालो गोपतिर्गोप्ता कलिः कालः परात्परः .. ५६..
मनोवेगी सदा योगी संसार भय नाशनः .
तत्त्व दाता च तत्त्वज्ञस्तत्त्वं तत्त्व प्रकाशकः .. ५७..
शुद्धो बुद्धो नित्यमुक्तो भक्त राजो जयप्रदः .
प्रलयो अमित मायश्च मायातीतो विमत्सरः .. ५८..
माया-निर्जित-रक्षाश्च माया-निर्मित-विष्टपः .
मायाश्रयश्च निर्लेपो माया निर्वंचकः सुखः .. ५९..
सुखी सुखप्रदो नागो महेशकृत संस्तवः .
महेश्वरः सत्यसंधः शरभः कलि पावनः .. ६०..
रसो रसज्ञः सम्मनस्तपस्चक्षुश्च भैरवः .
घ्राणो गन्धः स्पर्शनं च स्पर्शो अहंकारमानदः .. ६१..
नेति-नेति-गम्यश्च वैकुण्ठ भजन प्रियः .
गिरीशो गिरिजा कान्तो दूर्वासाः कविरंगिराः .. ६२..
भृगुर्वसिष्टश्च यवनस्तुम्बुरुर्नारदो अमलः .
विश्व क्षेत्रं विश्व बीजं विश्व नेत्रश्च विश्वगः .. ६३..
याजको यजमानश्च पावकः पितरस्तथा .
श्रद्ध बुद्धिः क्षमा तन्द्रा मन्त्रो मन्त्रयुतः स्वरः .. ६४..
राजेन्द्रो भूपती रुण्ड माली संसार सारथिः .
नित्यः संपूर्ण कामश्च भक्त कामधुगुत्तमः .. ६५..
गणपः कीशपो भ्राता पिता माता च मारुतिः .
सहस्र शीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् .. ६६..
कामजित् काम दहनः कामः काम्य फल प्रदः .
मुद्राहारी राक्षसघ्नः क्षिति भार हरो बलः .. ६७..
नख दंष्ट्र युधो विष्णु भक्तो अभय वर प्रदः .
दर्पहा दर्पदो दृप्तः शत मूर्तिरमूर्तिमान् .. ६८..
महा निधिर्महा भोगो महा भागो महार्थदः .
महाकारो महा योगी महा तेजा महा द्युतिः .. ६९..
महा कर्मा महा नादो महा मन्त्रो महा मतिः .
महाशयो महोदारो महादेवात्मको विभुः .. ७०..
रुद्र कर्मा कृत कर्मा रत्न नाभः कृतागमः .
अम्भोधि लंघनः सिंहो नित्यो धर्मः प्रमोदनः .. ७१..
जितामित्रो जयः सम विजयो वायु वाहनः .
जीव दात सहस्रांशुर्मुकुन्दो भूरि दक्षिणः .. ७२..
सिद्धर्थः सिद्धिदः सिद्ध संकल्पः सिद्धि हेतुकः .
सप्त पातालचरणः सप्तर्षि गण वन्दितः .. ७३..
सप्ताब्धि लंघनो वीरः सप्त द्वीपोरुमण्डलः .
सप्तांग राज्य सुखदः सप्त मातृ निशेवितः .. ७४..
सप्त लोकैक मुकुटः सप्त होता स्वराश्रयः .
सप्तच्छन्दो निधिः सप्तच्छन्दः सप्त जनाश्रयः .. ७५..
सप्त सामोपगीतश्च सप्त पातल संश्रयः .
मेधावी कीर्तिदः शोक हारी दौर्भग्य नाशनः .. ७६..
सर्व वश्यकरो गर्भ दोषघ्नः पुत्रपौत्रदः .
प्रतिवादि मुखस्तंभी तुष्टचित्तः प्रसादनः .. ७७..
पराभिचारशमनो दुःखघ्नो बंध मोक्षदः .
नव द्वार पुराधारो नव द्वार निकेतनः .. ७८..
नर नारायण स्तुत्यो नरनाथो महेश्वरः .
मेखली कवची खद्गी भ्राजिष्णुर्जिष्णुसारथिः .. ७९..
बहु योजन विस्तीर्ण पुच्छः पुच्छ हतासुरः .
दुष्टग्रह निहंता च पिशाच ग्रह घातकः .. ८०..
बाल ग्रह विनाशी च धर्मो नेता कृपकरः .
उग्रकृत्यश्चोग्रवेग उग्र नेत्रः शत क्रतुः .. ८१..
शत मन्युस्तुतः स्तुत्यः स्तुतिः स्तोता महा बलः .
समग्र गुणशाली च व्यग्रो रक्षो विनाशकः .. ८२..
रक्षोघ्न हस्तो ब्रह्मेशः श्रीधरो भक्त वत्सलः .
मेघ नादो मेघ रूपो मेघ वृष्टि निवारकः .. ८३..
मेघ जीवन हेतुश्च मेघ श्यामः परात्मकः .
समीर तनयो बोध्ह तत्त्व विद्या विशारदः .. ८४..
अमोघो अमोघहृष्टिश्च इष्टदो अनिष्ट नाशनः .
अर्थो अनर्थापहारी च समर्थो राम सेवकः .. ८५..
अर्थी धन्यो असुरारातिः पुण्डरीकाक्ष आत्मभूः .
संकर्षणो विशुद्धात्मा विद्या राशिः सुरेश्वरः .. ८६..
अचलोद्धरको नित्यः सेतुकृद् राम सारथिः .
आनन्दः परमानन्दो मत्स्यः कूर्मो निधिःशमः .. ८७..
वाराहो नारसिंहश्च वामनो जमदग्निजः .
रामः कृष्णः शिवो बुद्धः कल्की रामाश्रयो हरः .. ८८..
नन्दी भृन्गी च चण्डी च गणेशो गण सेवितः .
कर्माध्यक्ष्यः सुराध्यक्षो विश्रामो जगतांपतिः .. ८९..
जगन्नथः कपि श्रेष्टः सर्वावसः सदाश्रयः .
सुग्रीवादिस्तुतः शान्तः सर्व कर्मा प्लवंगमः .. ९०..
नखदारितरक्षाश्च नख युद्ध विशारदः .
कुशलः सुघनः शेषो वासुकिस्तक्षकः स्वरः .. ९१..
स्वर्ण वर्णो बलाढ्यश्च राम पूज्यो अघनाशनः .
कैवल्य दीपः कैवल्यं गरुडः पन्नगो गुरुः .. ९२..
किल्यारावहतारातिगर्वः पर्वत भेदनः .
वज्रांगो वज्र वेगश्च भक्तो वज्र निवारकः .. ९३..
नखायुधो मणिग्रीवो ज्वालामाली च भास्करः .
प्रौढ प्रतापस्तपनो भक्त ताप निवारकः .. ९४..
शरणं जीवनं भोक्ता नानाचेष्टोह्यचंचलः .
सुस्वस्थो अस्वास्थ्यहा दुःखशमनः पवनात्मजः .. ९५..
पावनः पवनः कान्तो भक्तागस्सहनो बलः .
मेघ नादरिपुर्मेघनाद संहृतराक्षसः .. ९६..
क्षरो अक्षरो विनीतात्मा वानरेशः सतांगतिः .
श्री कण्टः शिति कण्टश्च सहायः सहनायकः .. ९७..
अस्तूलस्त्वनणुर्भर्गो देवः संसृतिनाशनः .
अध्यात्म विद्यासारश्च अध्यात्मकुशलः सुधीः .. ९८..
अकल्मषः सत्य हेतुः सत्यगः सत्य गोचरः .
सत्य गर्भः सत्य रूपः सत्यं सत्य पराक्रमः .. ९९..
अन्जना प्राणलिंगच वायु वंशोद्भवः शुभः .
भद्र रूपो रुद्र रूपः सुरूपस्चित्र रूपधृत् .. १००..
मैनाक वंदितः सूक्ष्म दर्शनो विजयो जयः .
क्रान्त दिग्मण्डलो रुद्रः प्रकटीकृत विक्रमः .. १०१..
कम्बु कण्टः प्रसन्नात्मा ह्रस्व नासो वृकोदरः .
लंबोष्टः कुण्डली चित्रमाली योगविदां वरः .. १०२..
विपश्चित् कविरानन्द विग्रहो अनन्य शासनः .
फल्गुणीसूनुरव्यग्रो योगात्मा योगतत्परः .. १०३..
योग वेद्यो योग कर्ता योग योनिर्दिगंबरः .
अकारादि क्षकारान्त वर्ण निर्मित विग्रहः .. १०४..
उलूखल मुखः सिंहः संस्तुतः परमेश्वरः .
श्लिष्ट जंघः श्लिष्ट जानुः श्लिष्ट पाणिः शिखा धरः .. १०५..
सुशर्मा अमित शर्मा च नारयण परायणः .
जिष्णुर्भविष्णू रोचिष्णुर्ग्रसिष्णुः स्थाणुरेव च .. १०६..
हरी रुद्रानुकृद् वृक्ष कंपनो भूमि कंपनः .
गुण प्रवाहः सूत्रात्मा वीत रागः स्तुति प्रियः .. १०७..
नाग कन्या भय ध्वंसी रुक्म वर्णः कपाल भृत् .
अनाकुलो भवोपायो अनपायो वेद पारगः .. १०८..
अक्षरः पुरुषो लोक नाथो रक्ष प्रभु दृडः .
अष्टांग योग फलभुक् सत्य संधः पुरुष्टुतः .. १०९..
स्मशान स्थन निलयः प्रेत विद्रावण क्षमः .
पंचाक्षर परः पंच मातृको रंजनध्वजः .. ११०..
योगिनी वृन्द वंद्यश्च शत्रुघ्नो अनन्त विक्रमः .
ब्रह्मचारी इन्द्रिय रिपुः धृतदण्डो दशात्मकः .. १११..
अप्रपंचः सदाचारः शूर सेना विदारकः .
वृद्धः प्रमोद आनंदः सप्त जिह्व पतिर्धरः .. ११२..
नव द्वार पुराधारः प्रत्यग्रः सामगायकः .
षट्चक्रधामा स्वर्लोको भयह्यन्मानदो अमदः .. ११३..
सर्व वश्यकरः शक्तिरनन्तो अनन्त मंगलः .
अष्ट मूर्तिर्धरो नेता विरूपः स्वर सुन्दरः .. ११४..
धूम केतुर्महा केतुः सत्य केतुर्महारथः .
नन्दि प्रियः स्वतन्त्रश्च मेखली समर प्रियः .. ११५..
लोहांगः सर्वविद् धन्वी षट्कलः शर्व ईश्वरः .
फल भुक् फल हस्तश्च सर्व कर्म फलप्रदः .. ११६..
धर्माध्यक्षो धर्मफलो धर्मो धर्मप्रदो अर्थदः .
पंच विंशति तत्त्वज्ञः तारक ब्रह्म तत्परः .. ११७..
त्रि मार्गवसतिर्भूमिः सर्व दुःख निबर्हणः .
ऊर्जस्वान् निष्कलः शूली माली गर्जन्निशाचरः .. ११८..
रक्तांबर धरो रक्तो रक्त माला विभूषणः .
वन माली शुभांगश्च श्वेतः स्वेतांबरो युवा .. ११९..
जयो जय परीवारः सहस्र वदनः कविः .
शाकिनी डाकिनी यक्ष रक्षो भूतौघ भंजनः .. १२०..
सध्योजातः कामगतिर् ज्ञान मूर्तिः यशस्करः .
शंभु तेजाः सार्वभौमो विष्णु भक्तः प्लवंगमः .. १२१..
चतुर्नवति मन्त्रज्ञः पौलस्त्य बल दर्पहा .
सर्व लक्ष्मी प्रदः श्रीमान् अन्गदप्रिय ईडितः .. १२२..
स्मृतिर्बीजं सुरेशानः संसार भय नाशनः .
उत्तमः श्रीपरीवारः श्री भू दुर्गा च कामाख्यक .. १२३..
सदागतिर्मातरिश्च राम पादाब्ज षट्पदः .
नील प्रियो नील वर्णो नील वर्ण प्रियः सुहृत् .. १२४..
राम दूतो लोक बन्धुः अन्तरात्मा मनोरमः .
श्री राम ध्यानकृद् वीरः सदा किंपुरुषस्स्तुतः .. १२५..
राम कार्यांतरंगश्च शुद्धिर्गतिरानमयः .
पुण्य श्लोकः परानन्दः परेशः प्रिय सारथिः .. १२६..
लोक स्वामि मुक्ति दाता सर्व कारण कारणः .
महा बलो महा वीरः पारावारगतिर्गुरुः .. १२७..
समस्त लोक साक्षी च समस्त सुर वंदितः .
सीता समेत श्री राम पाद सेवा दुरंधरः .. १२८..
इति श्री सीता समेत श्री राम पाद सेवा दुरंधर
श्री हनुमत् सहस्र नाम स्तोत्रं संपूर्णं ..

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Hanuman, ANJANEYA EVAM HANUMAT BHUJANGAPRAYAR STOTRAM

॥ श्रीमदाञ्जनेय भुजङ्गप्रयार स्तोत्रम् १ ॥

मनोजवं मारुततुल्यवेगम्
जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम् ।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यम्
श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये ॥

बुद्दिर्बलं यशो धैर्यं निर्भयत्वं अरोगता ।
अजाड्यं वाक्पटुत्वं च हनुमत्स्मरणाद् भवेत् ॥

ॐ आञ्जनेयाय विद्महे वायुपुत्राय धीमहि तन्नो हनुमत् प्रचोदयात् ॥

ॐ फ्रौं ।

ॐ नमो हनुमते आवेषे आवेषे स्वाहा ।
ॐ हूं हनुमते रुद्रात्मकाये हूं फट् स्वाहा ।
ॐ ऐं भ्रीं हनुमते श्रीरामदूताय नमः ।
ॐ ह्रीं हरि मर्कट मर्कटाय स्वाहा ।

अथ स्तोत्रम् ।

प्रपन्नानुरागं प्रभाकाञ्चनाभं
जगद्भीतिशौर्यं तुषाराद्रिधैर्यम् ।
तृणीभूतहेतिं रणोद्यद्विभूतिं
भजे वायुपुत्रं पवित्राप्तमित्रम् ॥ १ ॥

भजे पावनं भावनानित्यवासं
भजे बालभानु प्रभाचारुभासम् ।
भजे चन्द्रिकाकुन्द मन्दारहासं
भजे सन्ततं रामभूपाल दासम् ॥ २ ॥

भजे लक्ष्मणप्राणरक्षातिदक्षं
भजे तोषितानेक गीर्वाणपक्षम् ।
भजे घोरसङ्ग्राम सीमाहताक्षं
भजे रामनामाति सम्प्राप्तरक्षम् ॥ ३ ॥

कृताभीलनादं क्षितिक्षिप्तपादं
घनक्रान्त भृङ्गं कटिस्थोरु जङ्घम् ।
वियद्व्याप्तकेशं भुजाश्लेषिताश्मं
जयश्री समेतं भजे रामदूतम् ॥ ४ ॥

चलद्वालघातं भ्रमच्चक्रवालं
कठोराट्टहासं प्रभिन्नाब्जजाण्डम् ।
महासिंहनादा द्विशीर्णत्रिलोकं
भजे चाञ्जनेयं प्रभुं वज्रकायम् ॥ ५ ॥

रणे भीषणे मेघनादे सनादे
सरोषे समारोपिते मित्रमुख्ये ।
खगानां घनानां सुराणां च मार्गे
नटन्तं वहन्तं हनूमन्त मीडे ॥ ६ ॥

कनद्रत्न जम्भारि दम्भोलिधारं
कनद्दन्त निर्धूतकालोग्र दन्तम् ।
पदाघातभीताब्धि भूतादिवासं
रणक्षोणिदक्षं भजे पिङ्गलाक्षम् ॥ ७ ॥

महागर्भपीडां महोत्पातपीडां
महारोगपीडां महातीव्रपीडाम् ।
हरत्याशु ते पादपद्मानुरक्तो
नमस्ते कपिश्रेष्ठ रामप्रियोयः ॥ ८ ॥

सुधासिन्धुमुल्लङ्घ्य नाथोग्र दीप्तः
सुधाचौषदीस्ताः प्रगुप्तप्रभावम् ।
क्षणद्रोणशैलस्य सारेण सेतुं
विना भूःस्वयं कस्समर्थः कपीन्द्रः ॥ ९ ॥

निरातङ्कमाविश्य लङ्कां विशङ्को
भवानेन सीतातिशोकापहारी ।
समुद्रान्तरङ्गादि रौद्रं विनिद्रं
विलङ्घ्योरु जङ्घस्तुताऽमर्त्यसङ्घः ॥ १० ॥

रमानाथ रामः क्षमानाथ रामः
अशोकेन शोकं विहाय प्रहर्षम् ।
वनान्तर्घनं जीवनं दानवानां
विपाट्य प्रहर्षात् हनूमत् त्वमेव ॥ ११ ॥

जराभारतो भूरिपीडां शरीरे
निराधारणारूढ गाढ प्रतापे ।
भवत्पादभक्तिं भवद्भक्तिरक्तिं
कुरु श्रीहनूमत्प्रभो मे दयालो ॥ १२ ॥

महायोगिनो ब्रह्मरुद्रादयो वा
न जानन्ति तत्त्वं निजं राघवस्य ।
कथं ज्ञायते मादृशे नित्यमेव
प्रसीद प्रभो वानरेन्द्रो नमस्ते ॥ १३ ॥

नमस्ते महासत्त्ववाहाय तुभ्यं
नमस्ते महावज्र देहाय तुभ्यम् ।
नमस्ते परीभूत सूर्याय तुभ्यं
नमस्ते कृतमर्त्य कार्याय तुभ्यम् ॥ १४ ॥

नमस्ते सदा ब्रह्मचर्याय तुभ्यं
नमस्ते सदा वायुपुत्राय तुभ्यम् ।
नमस्ते सदा पिङ्गलाक्षाय तुभ्यं
नमस्ते सदा रामभक्ताय तुभ्यम् ॥ १५ ॥

हनुमद्भुजङ्गप्रयातं प्रभाते
प्रदोषेऽपि वा चार्धरात्रेऽप्यमर्त्यः ।
पठन्नश्नतोऽपि प्रमुक्ताघजालं
सदा सर्वदा रामभक्तिं प्रियाति ॥ १६ ॥

सम्पूर्णं

Hanuman, ANJANEYA EVAM HANUMAT BHUJANGAPRAYAR STOTRAM

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Hanuman, ANJANEYA DVADASHANAM STOTRAM

॥ श्री आंजनेय द्वादशनाम स्तोत्रम् ॥

हनुमानंजनासूनुः वायुपुत्रो महाबलः । रामेष्टः फल्गुणसखः पिंगाक्षोऽमितविक्रमः ॥ १ ॥ उदधिक्रमणश्चैव सीताशोक विनाशकः । लक्ष्मण प्राणदाताच दशग्रीवस्य दर्पहा ॥ २ ॥ द्वादशैतानि नामानि कपींद्रस्य महात्मनः । स्वापकाले पठेन्नित्यं यात्राकाले विशेषतः । तस्यमृत्यु भयंनास्ति सर्वत्र विजयीभवेत् ॥

Hanuman, ANJANEYA DVADASHANAM STOTRAM

 

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