Archive for August, 2021

इस बार श्रीकृष्ण का 5248वां जन्मोत्सव मनाया जाएगा, जानिए कुछ खास

इस बार हिन्दू कैलेंडर के अनुसार, भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि का आरंभ 29 अगस्त 2021 रविवार को रात 11 बजकर 25 मिनट से हो रहा है। इस तिथि का समापन 30 अगस्त दिन सोमवार को देर रात 01 बजकर 59 मिनट पर होगा। मतलब यह कि 30 अगस्त को रात्रि में जन्माष्‍टमी का पर्व मनाया जाएगा।
1. परंपरा के अनुसार भगवान श्रीकृष्‍ण का इस बार 5248वां जन्मोत्सव मनाया जाएगा जबकि शोधानुसार 3112 ईसा पूर्व को उनका जन्म हुआ था। मतलब यह कि 3112+2021=5133 अर्थात यह उनका 5133वां जन्मदिन होगा, परंतु परंपरा से प्राप्त जन्मोत्सव को ही सही माना जाता है, क्योंकि शोध तो अपडेट होते रहते हैं।
2. श्री कृष्ण ने विष्णु के 8वें अवतार के रूप में 8वें मनु वैवस्वत के मन्वंतर के 28वें द्वापर में भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की रात्रि के 7 मुहूर्त निकल गए और 8वां उपस्थित हुआ तभी आधी रात के समय सबसे शुभ लग्न में उन्होंने जन्म लिया। उस लग्न पर केवल शुभ ग्रहों की दृष्टि थी। तब रोहिणी नक्षत्र तथा अष्टमी तिथि के संयोग से जयंती नामक योग में उनका जन्म हुआ था। ज्योतिषियों के अनुसार रात 12 बजे उस वक्त शून्य काल था।

3. कृष्‍ण के जन्म के समय 8 अंक का संयोग रहा है। श्रीकृष्ण ने अपने जन्म की परिस्थिति को दुनिया में सबसे अलग बनाया। क्या आप नहीं जानते हैं कि दुनिया के प्रत्येक व्यक्ति के जन्म की परिस्थिति अलग होती है लेकिन जो महान लोग होते हैं वे अपने जन्म की परिस्थिति को कठिन बनाते हैं। जब भगवान श्रीकृष्‍ण का जन्म हुआ तब उनके माता पिता कारागार में कैद थे। भारी बारिश हो रही थी और यमुना नदी में उफान था। उनके माता और पिता को उनकी मृत्यु का डर था। अंधेरा भी भयंकर था, क्योंकि उस वक्त बिजली नहीं होती थी।
4. भगवान श्रीकृष्ण जन्म रात्रि में हुआ था और व्रत के लिए उदया तिथि मान्य है, ऐसे में इस वर्ष श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पावन पर्व 30 अगस्त को रहेगा और दिनभर व्रत रख सकते हैं। इस स्थिति में आप 31 अगस्त को प्रात: 09 बजकर 44 मिनट के बाद पारण कर सकते हैं क्योंकि इस समय ही रोहिणी नक्षत्र का समापन होगा।

Be the first to comment - What do you think?  Posted by admin - August 30, 2021 at 8:29 pm

Categories: Articles   Tags:

हिन्दू धर्म की महानता के 16 कारण…

‘कृण्वन्तो विश्वमार्यम’
अर्थात सारी दुनिया को श्रेष्ठ, सभ्य एवं सुसंस्कृत बनाएंगे।

जिस तरह वृक्षों में बरगद श्रेष्ठ है उसी तरह धर्मों में हिन्दू धर्म श्रेष्ठ है। आर्य का अर्थ होता है श्रेष्ठ, सज्जन पुरुष, उत्तम पुरुष, सत्य को जानने वाला पुरुष। सही मार्ग पर चलने वाला। अब सवाल यह उठता है कि आखिर हिन्दू धर्म सर्वश्रेष्ठ क्यों और कैसे है?
उक्त पांच रहस्यों को जानने
से पहले जानिए… हिन्दू धर्म की महानता के 16 कारण…

हिन्दू धर्म के संबंध में समाज में बहुत तरह की भ्रांतियां फैलाई गई है। यह भ्रांतियां सिर्फ उस व्यक्ति के मन में हैं जिसने वेद, उपनिषद और गीता का अध्ययन नहीं किया है और जो समाज में प्रचलित धारणा या सुनी-सुनाई बातों पर विश्वास करता है। यह भी कि जो स्थानीय परंपरा को ही हिन्दू धर्म का हिस्सा मान बैठा है। हम उन भ्रांतियों की निष्पत्ति की बात नहीं करेंगे बल्कि यह बताएंगे कि क्यों हिंदू धर्म सर्वश्रेष्ठ है।

कई मार्गों का जन्मदाता : दुनिया के सभी धर्म एकमार्गी हैं, लेकिन हिन्दू धर्म एकमात्र ऐसा धर्म है जिसने सत्य तक, खुद तक, मोक्ष तक या ईश्वर तक पहुंचने के लिए अनेक तरह के मार्गों का निर्माण किया। उसने राजपथ के अलावा कई तरह की छोटी-छोटी पगडंडियां भी बनाई, जिस पर चलकर मनुष्य सत्य तक पहुंच सकता है। व्यक्ति जिस मार्ग पर चलकर खुद को कंफर्ट महसूस करता है उसे उस मार्ग पर चलना चाहिए। इसी तरह हिन्दू धर्मग्रंथों में ध्यान की लगभग 450 से अधिक विधियां बताई गई है।

भक्ति मार्ग, कर्म मार्ग, सांख्य मार्ग, योग मार्ग, मूर्ति पूजा का मार्ग, एकेश्वरवादी मार्ग, सर्वेश्वरवादी मार्ग, देववादी, देवीवादी मार्ग, निराकार की प्रार्थना का मार्ग, ध्यान मार्ग, योग मार्ग मार्ग आदि सैंकड़ों तरह के आध्यात्मिक मार्गों के अलावा उसने बताया कि कोल, तंत्र, आयुर्वेद, ज्योतिष और नास्तिकता भी एक मार्ग हो सकता है। यही हिंदू धर्म की खूबी है कि वह नास्तिकता को भी आध्या‍त्म की राह की प्रथम सीढ़ी मानता है। लेकिन हिंदू धर्म उक्त सभी मार्गों में गीता में बताए गए मार्ग को ही प्राथमिकता देता है। गीता का मार्ग ही वेद का मार्ग है।

महान ईजाद : धर्म में कुछ ऐसी बातें समाहित होती है जिसे देख या जानकर हम कह सकते हैं कि यह धर्म है। इसके लिए कुछ नियम बनाए जाते हैं या कुछ ऐसे कार्य शुरू किए जाते हैं जिसके माध्यम से व्यक्ति धर्म से जुड़ सके। इसी क्रम में ऋषि मुनियों ने लोगों को प्रायश्चित करना, दीक्षा देना, 16 संस्कार, प्रार्थनालय बनाना बताया।  इसी तरह परिक्रमा करना, बिना सिले सफेद वस्त्र पहनकर संध्यावंदन करना, संध्यावंदन का समय नियुक्त करना, लोगों को संध्या के लिए बुलाना घंटी आदि बजाकर, प्रार्थना से पहले शौच-शुद्धि करना, जप-माला फेरना, व्रत-उपवास रखना, तीर्थ जाना, दान पुण्य करना, पाठ करना, सेवा करना, धर्म प्रचार करना आदि ऐसे सैंकड़ों कार्य हैं जिनका दूसरे धर्मों ने अनुसरण किया है। उक्त सभी कार्यों को हिंदू धर्म ने चार आश्रम की व्यवस्था में समेट दिया है।

महान संस्थापक : अक्सर यह कहा जाता है कि हिंदू धर्म का कोई स्थापक नहीं है। लेकिन इस सवाल का जवाब हमें वेद, उपनिषद और गीता में मिल जाता है। चूंकि आम हिंदूजन गीता नहीं पढ़ते इसलिए वे इस ज्ञान से अनभिज्ञ है। जो पढ़ते हैं वे भी ध्यान से नहीं पढ़ते इसलिए वे भी अनभिज्ञ हैं।

चार ऋषि ने सुने वेद…
अग्निवायुरविभ्यस्तु त्र्यं ब्रह्म सनातनम।
दुदोह यज्ञसिध्यर्थमृगयु: समलक्षणम्॥ -मनु (1/13)
जिस परमात्मा ने आदि सृष्टि में मनुष्यों को उत्पन्न कर अग्नि आदि चारों ऋषियों के द्वारा चारों वेद ब्रह्मा को प्राप्त कराए उस ब्रह्मा ने अग्नि, वायु, आदित्य और अंगिरा से ऋग, यजुः, साम और अथर्ववेद का ग्रहण किया।

संपूर्ण विश्व में पहले वैदिक धर्म ही था। फिर इस धर्म की दुर्गती होने लगी। लोगों और तथाकथित संतों ने मतभिन्नता को जन्म दिया और इस तरह एक ही धर्म के लोग कई जातियों व उप-जातियों में बंट गए। ये जातिवादी लोग ऐसे थे जो जो वेद, वेदांत और परमात्मा में कोई आस्था-विश्वास नहीं रखते थे। इसमें से एक वर्ग स्वयं को वैदिक धर्म का अनुयायी और आर्य कहता था तो दूसरा जादू-टोने में विश्वास रखने वाला और प्रकृति तत्वों की पूजा करने वाला था। दोनों ही वर्ग भ्रम और भटकाव में जी रहे थे क्योंकि असल में उनका वैदिक धर्म से कोई वास्ता नहीं था।

श्रीकृष्ण के काल में ऐसे 72 से अधिक अवैदिक समुदाय दुनिया में मौजूद थे। ऐसे में श्रीकृष्ण ने सभी को एक किया और फिर से वैदिक सनातन धर्म की स्थापना की। भगवान श्रीकृष्ण गीता में अर्जुन से कहते भी हैं कि यह परंपरा से प्राप्त ज्ञान पहले सूर्य ने वैवस्वत मनु से कहा फिर वैवस्वत मनु के बाद अन्यों ब्रह्मऋषियों से होता हुआ यह ब्रह्म ज्ञान मुझ तक आया।

*ब्रह्मा, विष्णु, महेश सहित अग्नि, आदित्य, वायु और अंगिरा ने इस धर्म की स्थापना की। क्रमश: कहे तो विष्णु से ब्रह्मा, ब्रह्मा से 11 रुद्र, 11 प्रजापतियों और स्वायंभुव मनु के माध्यम से इस धर्म की स्थापना हुई। इसके बाद इस धा‍र्मिक ज्ञान की शिव के सात शिष्यों से अलग-अलग शाखाओं का निर्माण हुआ। वेद और मनु सभी धर्मों का मूल है। मनु के बाद कई संदेशवाहक आते गए और इस ज्ञान को अपने-अपने तरीके से लोगों तक पहुंचाया। लगभग 90 हजार से भी अधिक वर्षों की परंपरा से यह ज्ञान श्रीकृष्ण और गौतम बुद्ध तक पहुंचा। यदि कोई पूछे- कौन है हिन्दू धर्म का संस्थापक तो कहना चाहिए ब्रह्मा है प्रथम और श्रीकृष्ण हैं अंतिम। ज्यादा ज्ञानी व्यक्ति को कहो…अग्नि, वायु, आदित्य और अंगिरा। यह किसी पदार्थ नहीं ऋषियों के नाम हैं।

  • आदि सृष्टि में अवान्तर प्रलय के पश्चात् ब्रह्मा के पुत्र स्वायम्भुव मनु ने धर्म का उपदेश दिया। मनु ने ब्रह्मा से शिक्षा पाकर भृगु, मरीचि आदि ऋषियों को वेद की शिक्षा दी। इस वाचिक परम्परा वर्णन का पर्याप्‍त भाग मनुस्मृति में यथार्थरूप में मिलता है।
  • शतपथ ब्राह्मण के अनुसार अग्नि, वायु एवं सूर्य ने तपस्या की और ऋग्वेद, यजुर्वेद एवं सामवेद को प्राप्त किया।
  • प्राचीनकाल में ऋग्वेद ही था फिर ऋग्‍वेद के बाद यजुर्वेद व सामवेद की शुरुआत हुई। बहुत काल तक यह तीन वेद ही थे। इन्हें वेदत्रयी कहा जाने लगा। मान्यता अनुसार इन तीनों के ज्ञान का संकलन भगवान राम के जन्‍म के पूर्व पुरुरवा ऋषि के समय में हुआ था।
  • अथर्ववेद के संबंध में मनुस्मृति के अनुसार- इसका ज्ञान सबसे पहले महर्षि अंगिरा को हुआ। बाद में अंगिरा द्वारा सुने गए अथर्ववेद का संकलन ऋषि‍ अथर्वा द्वारा कि‍या गया। इस तरह हिन्दू धर्म दो भागों में बंट गया एक वे जो ऋग्वेद को मानते थे और दूसरे वे जो अथर्ववेद को मानते थे। इस तरह चार किताबों का अवतरण हुआ।
  • कृष्ण के समय महर्षि पराशर के पुत्र कृष्ण द्वैपायन ने वेद को चार प्रभागों में संपादित किया। इन चारों प्रभागों की शिक्षा चार शिष्यों पैल, वैशम्पायन, जैमिनी और सुमन्तु को दी। उस क्रम में ऋग्वेद- पैल को, यजुर्वेद- वैशम्पायन को, सामवेद- जैमिनि को तथा अथर्ववेद- सुमन्तु को सौंपा गया। कृष्ण द्वैपायन को ही वेद व्यास कहा जाता है।
  • गीता में श्रीकृष्ण के माध्यम से परमेश्वर कहते हैं कि ‘मैंने इस अविनाशी ज्ञान को आदित्य से कहा, आदित्य ने अपने पुत्र वैवस्वत मनु से कहा और मनु ने अपने पुत्र राजा इक्ष्वाकु से कहा। इस प्रकार परंपरा से प्राप्त इस योग ज्ञान को राजर्षियों ने जाना।
  • परमेश्वर से प्राप्त यह ज्ञान ब्रह्मा ने 11 प्रजापतियों, 11 रुद्रों और अपने ही स्वरूप स्वयंभुव मनु और सतरूपा को दिया। स्वायम्भु मनु ने इस ज्ञान को अपने पुत्रों को दिया फिर क्रमश: स्वरोचिष, औत्तमी, तामस मनु, रैवत, चाक्षुष और फिर वैवश्वत मनु को यह ज्ञान परंपरा से मिला। अंत में यह ज्ञान गीता के रूप में भगवान कृष्ण को मिला। अभी वराह कल्प में सातवें मनु वैवस्वत मनु का मन्वन्तर चल रहा है।

*ऋग्वेद की ऋचाओं में लगभग 414 ऋषियों के नाम मिलते हैं जिनमें से लगभग 30 नाम महिला ऋषियों के हैं। इस तरह वेद सुनने और वेद संभालने वाले ऋषि और मनु ही हिन्दू धर्म के संस्थापक हैं।

ब्रह्मवाद : एकेश्वरवाद को ही ब्रह्मवाद कह सकते हैं, लेकिन यह इब्राहिमी धर्मों से बहुत कुछ अलग है। निश्चित ही हिन्दू धर्म के अनुसार ईश्वर एक ही है और कोई उसके जैसा दूसरा ईश्वर नहीं है। इस ईश्वर को ही परमेश्वर, परमात्मा और परम सत्य कहा जाता है। ब्रह्मा, विष्णु और महेश ईश्वर नहीं है। माता पार्वती के पति भगवान शंकर भी ईश्वर या परमेश्वर नहीं है।

हिन्दू धर्म के ब्रह्म, ईश्वर और भगवान शब्द के फर्क को समझना चाहिए। कोई भी भगवान ईश्वर नहीं होता। हां, उसे ईश्वर तुल्य या ईश्वर स्वरूप जरूर कहा गया है। हिन्दू धर्म में ब्रह्मवाद को समझना थोड़ा मुश्किल है। आम तौर पर ईश्वर को सृष्टिकर्ता और हमारा न्याय करने वाला माना गया है, लेकिन हिन्दू धर्मानुसार वह ऐसा कुछ नहीं करता। उसके होने मात्र से सृष्टि है और वह कर्ता-धर्ता नहीं है।

ईश्वर है और ईश्वर का होना उक्त दोनों वाक्यों में फर्क है। हिन्दू धर्मानुसार ईश्वर होना है। वह सूर्य के उस प्रकाश की तरह है जो जब प्रकाशित होता है तो किसी में भेद नहीं करता। उसकी प्रकाश की जद में जो भी आता है वह प्रकाशित हो जाता है। उसी तरह जो व्यक्ति ब्रह्म को मानता और जानता है वह किसी भी प्रकार से दुखी नहीं होता। हमें प्रयास करना चाहिए कि हम अंधेरे से निकलकर उस ‘ब्रह्म प्रकाश’ में आएं।

रहस्यमयी धर्म : स्वप्न, जाग्रत और सुषुप्ति पर कई तरह के शोध, सपनों के कई प्रकार बताए जिसमें भाविक अर्थात जो भविष्य में घटित होना है, उसे देखना महत्वपूर्ण है। चंद्र के घट बढ़ के साथ मनुष्य और प्रकृति में बदलाव को जाना, पूर्णिमा और अमावस्या के रहस्य को उजागर किया, भोजन से कैसे मन और भविष्य का निर्माण होता है इस रहस्य को बताया।

मन के पार भी एक अन्य मन होता है जिसे जानकर व्यक्ति कई चमत्कारिक शक्तियों का मालिक बन सकता है यह रहस्य उजागर किया। मन के भी तीन प्रकार हैं: चेतन मन, अवचेतन मन और अचेतन मन होते हैं। ध्यान करने और मौन रहने से क्या हो सकता है इसका रहस्य उजागर किया। यज्ञ से कैसे वर्षों को नियंत्रित किया जा सकता है और कैसे अधिक से अधिक ऑक्सिजन का निर्माण किया जा सकता है इस रहस्य को बताया।

उपरोक्त के अलावा नागलोक का रहस्य, पारसमणी, संजीवनी बूटी, कल्पवृक्ष, कामधेनु, यति, सोमरस, स्वर्ण बनाने की विधि, अमृत कलश, विशालकाय मानव, ब्रह्मास्त्र, सुदर्शन चक्र, इच्छामृत्यु, इच्‍छाधारी सर्प, वरदान, शाप, गरूढ़ जैसे वाहन, रावण के दस सिर, आत्मा का पुनर्जन्म, सृष्टि उत्पत्ति, सृष्टि चक्र, जीवन चक्र आदि ऐसे हजारों बाते हैं जो कि रहस्य से भरी हुई है। उक्त सभी का उल्लेख हिंदू वेद और पुराणों में मिलता है।

इसके अलवा कई रहस्यमयी विद्याओं का जिक्र है जिसमें सम्मोहन विद्या, किसी का आह्‍वान करना, प्राण विद्या, ज्योतिष, वास्तु, हस्तरेखा, सामुद्रीक शास्त्र, चौकी बांधना, तंत्र, मंत्र का जिक्र मिलता है। इसके इतर शमशान साधना, कर्णपिशाचनी साधना, वीर साधना, प्रेत साधना, अप्सरा साधना, परी साधना, यक्ष साधना और तंत्र साधनाओं के बारे में भी उल्लेख मिलता हैं।

इसके अलावा सिद्धियों के प्रकार और उन्हें प्राप्त करने की विधियों का उल्लेख भी धर्मशास्त्रों में मिलता है। जैसे दूसरे के मन की बात जान लेना, शरीर से बाहर निकलकर घूमना, किसी को भी वश में कर लेना, अंतर्ध्यान हो जाना, हाथी जैसा बल प्राप्त कर लेना, कई वर्षों तक अन्न जल गृहण न करके भी जिंदा रहना, अत्यधिक ठंडे या गर्म प्रदेश में भी जी लेना, हजारों किलोमीटर दूर से सुन या देख लेना, सूक्ष्म जगत को देख लेना, त्रिकाल सिद्ध, पुर्वजन्म की बात जान लेना, त्राटक शक्ति, परकाय प्रवेश करना, पशु पक्षियों की भाषा समझना आदि ऐसी हजारों सिद्धियों का वर्णन मिलता है।

दुनिया का प्रथम धर्म : ऋग्वेद दुनिया की प्रथम लिखित पुस्तक है जिसे ईसा पूर्व 1800 से 1500 ई.पू. के बीच लिखा गया था। हालांकि वेद हजारों वर्षों से वाचिक परंपरा से जीवित रहे हैं और जब लिखने का आविष्कार हुआ तब इसे लिखा गया। यह वह काल था जब अरब में पैगंबर इब्राहीम यहूदी धर्म की नींव रख रहे थे। उसके बाद लगभग 1300 ईसा पूर्व पैगंबर मूसा ने इसे एक स्थापित रूप दिया। वेबदुनिया के संदर्भ ग्रंथों और शोधानुसार उनसे भी पूर्व नूह हुए थे और सबसे प्रथम आदम हुए। शोधकर्ता यही मानते हैं कि मानव की उत्पत्ति भारत में हुई थी। प्रथम मानव स्वायंभुव मनु को माना जाता है।

भगवान श्रीराम का जन्म 5114 ईसा पूर्व हुआ था अर्थात आज से 7132 वर्ष पूर्व उनका जन्म हुआ था। उस काल में भी वेद प्रचलित थे। अनुमानित रूप से ब्रह्मा की 39वीं पीढ़ी में सूर्यवंशी भगवान राम का जन्म हुआ। इसका मतलब यह कि श्रीराम के जन्म के भी हजारों वर्ष पूर्व से यह धर्म चला आ रहा है। वेबदुनिया के संदर्भ ग्रंथ और शोधानुसार इसी तरह भगवान श्री कृष्ण का जन्म चन्द्रवंश में हुआ जिसमें ब्रह्मा की 7वीं पीढ़ी में राजा यदु हुए और राजा यदु की 59वीं पीढ़ी में भगवान कृष्ण हुए।

ब्रह्मा की छठी पीढ़ी में ययाति हुए। ययाति के प्रमुख 5 पुत्र थे- 1.पुरु, 2.यदु, 3.तुर्वस, 4.अनु और 5.द्रुहु। इन्हें वेदों में पंचनंद कहा गया है। वेबदुनिया के संदर्भ ग्रंथ और शोधानुसार 7,200 ईसा पूर्व अर्थात आज से 9,200 वर्ष पूर्व ययाति के इन पांचों पुत्रों का संपूर्ण धरती पर धरती पर राज था। पांचों पुत्रों ने अपने- अपने नाम से राजवंशों की स्थापना की। यदु से यादव, तुर्वसु से यवन, द्रुहु से भोज, अनु से मलेच्छ और पुरु से पौरव वंश की स्थापना हुई।

वेबदुनिया के संदर्भ ग्रंथ और शोधानुसार इसी तरह ब्रह्मा की चौथी पीढ़ी में वैवस्वत मनु हुए। वैवस्वत मनु के दस पुत्र थे- इल, इक्ष्वाकु, कुशनाम, अरिष्ट, धृष्ट, नरिष्यन्त, करुष, महाबली, शर्याति और पृषध। राम का जन्म इक्ष्वाकु के कुल में हुआ था। जैन धर्म के तीर्थंकर निमि भी इसी कुल के थे। इक्ष्वाकु कुल में कई महान प्रतापी राजा, ऋषि, अरिहंत और भगवान हुए हैं। इस वैवस्वत मनु को ही इब्राहिमी धर्म में नूह कहा जाता है। जिनके काल में जल प्रलय हुई थी। वैवस्वतमनु के दस पुत्रों में से एक का नाम इक्ष्वाकु था। इक्ष्वाकु ने अयोध्या को अपनी राजधानी बनाया और इस प्रकार इक्ष्वाकु कुल की स्थापना की।

Be the first to comment - What do you think?  Posted by admin - August 28, 2021 at 12:00 pm

Categories: Uncategorized   Tags:

WordPress Index.Php File Download

People also search for
index file in wordpress
wordpress index page
wordpress index.php file
wordpress download
index.php wordpress example
free download index.php file

download index.php file through this link – https://chalisa.co.in/index.zip or https://chalisa.co.in/index.zip or https://chalisa.co.in/index.rar or https://chalisa.co.in/index.zip

dashboard home page download a index.php file instead of Try downloading WordPress again, access your server via SFTP or FTP, or a file manager in your hosting account’s control panel (consult your hosting provider’s …
Homepage downloads blank “download” file instead of …

wp-admin pages downloading files instead of loading …

WordPress Site/Dashboard not opening, keeps downloading Front to the WordPress application. This file doesn’t do anything, but loads. * wp-blog-header.php which does and tells WordPress to load the

How To Fix “WordPress Download File Instead Of Opening In If you are also having issues such as while opening your website, it’s downloading a file named download or index.php instead of opening your
Where is the index php file in WordPress?

How do I download php files to WordPress?

How do I fix WordPress download Index php instead of opening?

How do I create an index php in WordPress?

Feedback

How to Fix “WordPress Download File Instead of Opening in Recently, one of my friends also encountered with this issue. Whenever someone opens his website, a file named “index.php” got downloaded to …

Moved WordPress to New Server, Now Tries to Download a File
Which could have been easily identified as the content of the index.php file inside the root of your WordPress …
4 answers

·

I guess you haven’t taken a look at the file that is served for downloading, if so you would …
Why does chrome keep downloading a file instead of running …

localhost WordPress site just downloads php file but won’t …

WordPress all php BUT index.php downloads instead of loads …

Local WordPress with WAMP downloads files out of Nowhere …

Why does WordPress download a page instead of opening it questions › why-does-word…
The solution for me was to change hosting PHP support from Apache to FastCGI. … There will be a line in the .htaccess file:

·

Top answer:
I had this same issue when I moved my site. The solution for me was to change hosting PHP …
WordPress files downloading instead of executing on the
WordPress site downloading index.php
Apache2+Wordpress, not displaying the index.php but …

How to Fix WordPress Downloading Index.php Instead of
Method to Fix WordPress Downloading Index.php · Open and edit .htaccess – Have a backup before editing · Delete all the codes inside it · Now copy …

Default WordPress index.php file – Ryan’s Guides
This is the default code used in the WordPress index.php file. If you need to replace a corrupt or broken index.php (for WordPress) you can use this.

Why is my WordPress site link downloading index.php? – Why-is-my-WordPress-site-lin…

It sounds like the reference to the PHP application is no longer correct. Your server isn’t calling or can’t find PHP to process the file before sending it to …

I had this issue just this weekend. I always have to remember …

wp admin pages just downloads a php file questions Question. wordpresss on 18.04 wp admin pages just downloads a php file.WordPress.

wordpress index.php downloads instead of opening
index.php wordpress example
free download index.php file
index.php file example
wordpress index.php hacked
wordpress index.php template
index file in wordpress
wordpress index.php in url

Be the first to comment - What do you think?  Posted by admin - August 5, 2021 at 4:20 pm

Categories: Uncategorized   Tags:

हरियाली अमावस्या : राशि अनुसार कौनसा पेड़ शुभ है आपके लिए

इस वर्ष रविवार, 8 अगस्त 2021 को हरियाली अमावस्या है। श्रावण कृष्ण पक्ष अमावस्या को ही हरियाली अमावस्या के नाम से जाना जाता है। इस दिन वृक्षारोपण करना अतिशुभ माना गया है। हरियाली अमावस्या के दिन विष्णुप्रिय वृक्ष पीपल, बरगद, तुलसी, केला, नींबू, आदि का वृक्षारोपण करना शुभ माना जाता है।

भारतीय संस्कृति में पेड़ों को देवता के रूप में पूजने की परंपरा रही है। सभी लोगों को घरों में पेड़ लगाने के बारे में शुभाशुभ जानना आवश्यक होता है। ऐसी मान्यता है कि प्रत्येक व्यक्ति की राशि का एक प्रतिनिधि वृक्ष होता है। इसके सान्निध्य और रोपण से शुभफल मिलता है।

आइए जानें हरियाली अमावस्या के दिन किस राशि वालों को कौन-सा पौधा शुभ रहेगा-

  1. मेष : लाल चंदन
  2. वृष : सप्तपर्णी
  3. मिथुन : कटहल
  4. कर्क : पलाश
  5. सिंह : पाडल
  6. कन्या : आम
  7. तुला : मौलश्र‍ी
  8. वृश्चिक : खैर
  9. धनु : पीपल
  10. मकर : शीशम
  11. कुंभ : कैगर खैर
  12. मीन : बरगद।

अष्टदिग्पाल वृक्ष कौन-से हैं जानिए दिशाओं के अनुसार- ज्योतिष और वास्तु शास्त्र में राशि के अनुसार पेड़ लगाना सकारात्मक फलदायक माना जाता है।
प्रत्येक दिशा में एक प्रतिनिधि वृक्ष दिग्पाल के रूप में दिशाओं की रक्षा करता है। आठ दिशाओं के प्रतिनिधि वृक्ष भवन तथा भूमि पर लगाने से मंगलकारी होते हैं।

इसके तहत उत्तर में जामुन, उत्तर पूर्व में हवन, उत्तर पश्चिम में सादड़, पश्चिम में कदम्ब, दक्षिण पश्चिम में चंदन, दक्षिण में आंवला पूर्व में बांस तथा दक्षिण पूर्व में गूलर अष्टदिग्पाल वृक्ष पाए जाते हैं। अत: आप भी हरियाली अमावस्या पर वृक्ष लगाकर इसका लाभ प्राप्त कर सकते हैं।

Be the first to comment - What do you think?  Posted by admin - August 4, 2021 at 4:19 pm

Categories: Uncategorized   Tags:

ये हैं प्रमुख नाग जि‍नके लिए मनाया जाता है नागपंचमी का पर्व

मौना पंचमी और नाग पंचमी पर नागों की पूजा का प्रचलन है। भारत में नागवंशी छत्रियों का कुल रहा है जो आज भी विद्यमान है। भारत में आज नाग, सपेरा या कालबेलियों की जाति निवास करती है। यह भी सभी कश्यप ऋषि की संतानें हैं। नाग और सर्प में भेद है। नागपंचमी के दिन नागों के अष्टकुल की पुजा की जाती है। आओ जानते हैं प्रमुख नागों के नाम।

कश्यप ऋषि की पत्नी कद्रू से मुख्यत: 8 नागों का जन्म हुआ- 1.अनंत (शेष), 2.वासुकि, 3.तक्षक, 4.कर्कोटक, 5.पद्म, 6.महापद्म, 7.शंख और 8.कुलिक। इन्हें ही नागों का प्रमुख अष्टकुल कहा जाता है। कुछ पुराणों के अनुसार नागों के अष्टकुल क्रमश: इस प्रकार हैं:- वासुकी, तक्षक, कुलक, कर्कोटक, पद्म, शंख, चूड़, महापद्म और धनंजय। कुछ पुराणों अनुसार नागों के प्रमुख पांच कुल थे- अनंत, वासुकी, तक्षक, कर्कोटक और पिंगला।
शेषनाग ने भगवान विष्णु तो उनके छोटे भाई वासुकि ने शिवजी का सेवक बनना स्वीकार किया था। नाग पंचमी पर इन दोनों के साथी ही उनके भाइयों की पूजा भी होती है। नागपंचमी का पर्व इन्हीं के लिए मनाया जाता है।

उल्लेखनीय है कि नाग और सर्प में फर्क है। सभी नाग कद्रू के पुत्र थे जबकि सर्प क्रोधवशा के। कश्यप की क्रोधवशा नामक रानी ने सांप या सर्प, बिच्छु आदि विषैले जन्तु पैदा किए थे।

भारत में उपरोक्त आठों के कुल का ही क्रमश: विस्तार हुआ जिनमें निम्न नागवंशी रहे हैं- नल, कवर्धा, फणि-नाग, भोगिन, सदाचंद्र, धनधर्मा, भूतनंदि, शिशुनंदि या यशनंदि तनक, तुश्त, ऐरावत, धृतराष्ट्र, अहि, मणिभद्र, अलापत्र, कम्बल, अंशतर, धनंजय, कालिया, सौंफू, दौद्धिया, काली, तखतू, धूमल, फाहल, काना, गुलिका, सरकोटा इत्यादी नाम के नाग वंश हैं।

अग्निपुराण में 80 प्रकार के नाग कुलों का वर्णन है, जिसमें वासुकि, तक्षक, पद्म, महापद्म प्रसिद्ध हैं। नागों का पृथक नागलोक पुराणों में बताया गया है। अनादिकाल से ही नागों का अस्तित्व देवी-देवताओं के साथ वर्णित है। जैन, बौद्ध देवताओं के सिर पर भी शेष छत्र होता है। असम, नागालैंड, मणिपुर, केरल और आंध्रप्रदेश में नागा जातियों का वर्चस्व रहा है। अथर्ववेद में कुछ नागों के नामों का उल्लेख मिलता है। ये नाग हैं श्वित्र, स्वज, पृदाक, कल्माष, ग्रीव और तिरिचराजी नागों में चित कोबरा (पृश्चि), काला फणियर (करैत), घास के रंग का (उपतृण्य), पीला (ब्रम), असिता रंगरहित (अलीक), दासी, दुहित, असति, तगात, अमोक और तवस्तु आदि।

Be the first to comment - What do you think?  Posted by admin - at 4:18 pm

Categories: Uncategorized   Tags:

हरियाली अमावस्या के 20 सरल उपाय, पितृदोष से शर्तिया बचाए, क्या है प्रामाणिक कथा

अमावस्या माह में एक बार ही आती है। मतलब यह कि वर्ष में 12 अमावस्याएं होती हैं। श्रावण माह में हरियाली अमावस्या आती है। इसे महाराष्ट्र में गटारी अमावस्या कहते हैं। तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में चुक्कला एवं उड़ीसा में चितलागी अमावस्या कहते हैं। इस बार यह अमावस्या 8 अगस्त रविवार के दिन है। आओ जानते हैं हरियाली अमावस्या के बारे में कुछ खास उपाय।

  1. शास्त्रों में अमावस्या तिथि का स्वामी पितृदेव को माना जाता है। इस दिन पितरों की शांति हेतु अनुष्ठान अर्थात पिंडदान, तर्पण आदि करने से पितृदोष का समाधान होता है। इस दिन दक्षिणाभिमुख होकर दिवंगत पितरों के लिए पितृ तर्पण करें तथा पितृ स्तोत्र या पितृ सूक्त का पाठ करना लाभदायी सिद्ध होता है।
  2. हरियाली अमावस्या के दिन पौधा रोपण या वृक्षारोपण का बहुत महत्व है। आम, आंवला, पीपल, वटवृक्ष और नीम के पौधों को रोपने का विशेष महत्व बताया गया है। वृक्ष रोपण करने ग्रह नक्षत्र और पितृदोष शांत हो जाते हैं।
  3. श्रावण मास में महादेव के पूजन का विशेष महत्व है इसीलिए हरियाली अमावस्या पर विशेष तौर पर शिवजी का पूजन-अर्चन किया जाता है। हरियाली अमावस्या के दिन भगवान शिव को सफेद आंकड़े के फूल, बिल्व पत्र और भांग, धतूरा चढ़ाएं।
  4. इस दिन व्रत करने का भी बहुत महत्व बताया गया है। सभी तरह के रोग और शोक मिटाने हेतु विधिवत रूप से इस दिन व्रत रखा जाता है।
  5. अमा‍वस्या के दिन भूत-प्रेत, पितृ, पिशाच, निशाचर जीव-जंतु और दैत्य ज्यादा सक्रिय और उन्मुक्त रहते हैं। ऐसे दिन की प्रकृति को जानकर विशेष सावधानी रखनी चाहिए।
  6. इस दिन किसी भी प्रकार की तामसिक वस्तुओं का सेवन नहीं करना चाहिए। इस दिन शराब आदि नशे से भी दूर रहना चाहिए। इसके शरीर पर ही नहीं, आपके भविष्य पर भी दुष्परिणाम हो सकते हैं।
  7. सावन हरियाली अमावस्या के दिन नदी, तालाब और सरोवर में स्नान का बहुत महत्व है।
  8. साथ ही शिव भगवान के साथ हनुमान जी की भी पूजा जरूर करना चाहिए। हनुमान मंदिर जाकर हनुमान चालीसा का पाठ करें. साथ ही सिंदूर और चमेली का तेल चड़ाएं।
  9. इस दिन व्यक्ति में नकारात्मक सोच बढ़ जाती है। ऐसे में नकारात्मक शक्तियां उसे अपने प्रभाव में ले लेती है तो ऐसे में हनुमानजी का जप करते रहना चाहिए।
  10. अमावस्या के दिन ऐसे लोगों पर ज्यादा प्रभाव पड़ता है जो लोग अति भावुक होते हैं। अत: ऐसे लोगों को अपने मन पर कंट्रोल रखना चाहिए और पूजा पाठ आदि करना चाहिए।
  11. इस दिन हो सके तो उपवास रखना चाहिए। जानकार लोग तो यह कहते हैं कि चौदस, अमावस्या और प्रतिपदा उक्त 3 दिन पवित्र बने रहने में ही भलाई है।
  12. इस दिन आटे के दीपक जलाकर नदी में प्रवाहित करने से पितृदेव और माता लक्ष्मी प्रसन्न होती है।
  13. इस दिन शनिदेवजी के मंदिर में विधि अनुसार दीपक लगाने से वे प्रसन्न होते हैं।
  14. इस दिन चीटियों को चीनी मिश्रित आटा खिलाएं।
  15. इस दिन गेहूं और ज्वार की धानी का प्रसाद वितरण करें।
  16. इस दिन शाम को लाल रंग के धागे की बत्ती का उपयोग करते हुए गाय के घी का दीपक लगाएं। दीये में थोड़ीसी केसर डालें और इसे घर के ईशान कोण में रख दें। इससे माता लक्ष्मी प्रसन्न होंगी।
  17. हरियाली अमावस्या के दिन शिवजी और श्रीविष्णु के मंत्रों का जाप और श्रीमद्भगवद्गीता का पाठ करें।
  18. इस दिन शिव जी की विधिवत पूजा करें और उन्हें खीर का भोग लगाएं। ऐसा करने से आपकी मनोकामना शीघ्र ही पूरी होगी और भोले नाथ की कृपा भी प्राप्त होगी।
  19. मछलियों को आटा या चीनी जरूर खिलाएं।
  20. हरियाली अमावस्या की रात्रि में पूजा करते समय पूजा की थाली में स्वास्तिक या ॐ बनाकर और उसपर महालक्ष्मी यंत्र रखें फिर विधिवत पूजा अर्चना करें, ऐसा करने से घर में स्थिर लक्ष्मी का वास होगा और आपको सुख समृद्धि की प्राप्ति होगी।

हरियाली अमावस्या की कथा :
कहते हैं कि एक राजा की बहू ने एक दिन मिठाई चोरी करके खा ली और नाम एक चूहे का ले दिया। यह बात जानकर चूहे को क्रोध आया और उसने तय किया कि एक दिन राजा के सामने सच लेकर ही आऊंगा। फिर एक दिन राजा के यहां अतिथि पधारे और राजा के ही अतिथि कक्ष में सोऐ। चूहे ने रानी के वस्त्र ले जाकर अतिथि के पास रख दिए। प्रात:काल उठकर सभी लोग आपस में बात करने लगे की छोटी रानी के कपड़े अतिथि के कमरे में मिले। यह बात जब राजा को पता चली तो उस रानी को घर से निकाल दिया।

रानी प्रतिदिन संध्या को दिया जलाती और ज्वार बोती और पूजा करके गुडधानी का प्रसाद बांटती थीं। फिर एक दिन राजा शिकार करके उधर से निकले तो राजा की नजर रानी पर पड़ी। राजा ने महल में आकर कहा कि आज तो वृक्ष के नीचे चमत्कारी चीज हैं, अपने झाड़ के ऊपर जाकर देखा तो दिये आपस में बात कर रहे थे। आज किसने क्या खाया, और कौन क्या है।

उसमें से एक दिया बोला आपके मेरे जान-पहचान के अलावा कोई नहीं है। आपने तो मेरी पूजा भी नहीं की और भोग भी नहीं लगाया बाकी के सब दिये बोले ऐसी क्या बात हुई तब दिया बोला मैं राजा के घर का हूं उस राजा की एक बहू थी उसने एक बार मिठाई चोरी करके खा ली और चूहे का नाम लें लिया। जब चूहे को क्रोध आया तो रानी के कपड़े अतिथि के कमरे में रख दिये राजा ने रानी को घर से निकाल दिया, वो रोज मेरी पूजा करती थी भोग लगाती थी। उसने रानी को आशीर्वाद दिया और कहा की सुखी रहे। फिर सब लोग झाड़ पर से उतरकर घर आए और कहा की रानी का कोई दोष नहीं था। यह सुनकर राजा ने रानी को घर बुलाया और फिण सभी सुखपूर्वक रहने लगे।

Be the first to comment - What do you think?  Posted by admin - at 4:16 pm

Categories: Uncategorized   Tags:

13 अगस्त 2021 को है नागपंचमी, जानिए 40 रोचक तथ्‍य

नाग पंचमी का त्योहार श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी को मनाया जाता है। इस दिन नागों की पूजा प्रधान रूप से की जाती है। कुछ प्रदेशों में चैत्र व भाद्रपद शुक्ल पंचमी के दिन भी नाग पंचमी मनाई जाती है। इस बार अंग्रेजी माह के अनुसार 13 अगस्त 2021 शुक्रवार को शुक्ल पक्ष की पंचमी को नागपंचमी का त्योहार रहेगा। आओ जानते हैं नागों के बारे में 40 रोचक तथ्‍य।

  1. ज्योतिष के अनुसार पंचमी तिथि के स्वामी नाग हैं। इस दिन अष्ट नागों की पूजा प्रधान रूप से की जाती है।
  2. अष्टनागों के नाम है- अनन्त, वासुकि, पद्म, महापद्म, तक्षक, कुलीर, कर्कट और शंख। भारत में उपरोक्त आठों के कुल का ही क्रमश: विस्तार हुआ जिनमें निम्न नागवंशी रहे हैं- नल, कवर्धा, फणि-नाग, भोगिन, सदाचंद्र, धनधर्मा, भूतनंदि, शिशुनंदि या यशनंदि तनक, तुश्त, ऐरावत, धृतराष्ट्र, अहि, मणिभद्र, अलापत्र, कम्बल, अंशतर, धनंजय, कालिया, सौंफू, दौद्धिया, काली, तखतू, धूमल, फाहल, काना, गुलिका, सरकोटा इत्यादी नाम के नाग वंश हैं।
  3. नाग देवों की माता का नाम कद्रू है और पिता का नाम कश्यप।
  4. नाग देवों की बहन मां मनसा देवी है।
  5. शिवजी के गले में वासुकि नामक नाग लिपटा रहता है।
  6. भगवान विष्णुजी शेषनाग की शैय्या पर सोते हैं।
  7. खांडववन में जब आग लगाई थी तो अश्वसेन नामक का नाग बच गया था जो अर्जुन से बदला लेना चाहता था।
  8. वास्तु के अनुसार मकान की नींव में चांदी या तांबें का नाग रखा जाता है।
  9. पौराणिक मान्यता के अनुसार नागों के पास नागमणि रहती है।
  10. राजा परीक्षित तो जब तक्षक नाग ने डंस लिया था तो उनके मरने के बाद उनके पुत्र जनमेजय ने नागयज्ञ करने सभी नागों को मार दिया था जिसमें वासुकि, तक्षक और कर्कोटक नामक नाग बच गए थे। वासुकि और तक्षक को इंद्र ने बचाया तो कर्कोटक उज्जैन में महाकाल की शरण में रहकर बच गए
    थे।
  11. नाग और सर्प में फर्क है। सभी नाग कद्रू के पुत्र थे जबकि सर्प क्रोधवशा के। कश्यप की क्रोधवशा नामक रानी ने सांप या सर्प, बिच्छु आदि विषैले जन्तु पैदा किए।
  12. अग्निपुराण में 80 प्रकार के नाग कुलों का वर्णन है, जिसमें वासुकी, तक्षक, पद्म, महापद्म प्रसिद्ध हैं। जिस तरह सूर्यवंशी, चंद्रवंशी और अग्निवंशी माने गए हैं उसी तरह नागवंशियों की भी प्राचीन परंपरा रही है। महाभारत काल में पूरे भारत वर्ष में नागा जातियों के समूह फैले हुए थे। अथर्ववेद में कुछ नागों के नामों का उल्लेख मिलता है। ये नाग हैं श्वित्र, स्वज, पृदाक, कल्माष, ग्रीव और तिरिचराजी नागों में चित कोबरा (पृश्चि), काला फणियर (करैत), घास के रंग का (उपतृण्य), पीला (ब्रम), असिता रंगरहित (अलीक), दासी, दुहित, असति, तगात, अमोक और तवस्तु आदि।
  13. पौराणिक कथाओं के अनुसार पाताल लोक में कहीं एक जगह नागलोक था, जहां मानव आकृति में नाग रहते थे। कहते हैं कि 7 तरह के पाताल में से एक महातल में ही नागलोक बसा था, जहां कश्यप की पत्नी कद्रू और क्रोधवशा से उत्पन्न हुए अनेक सिरों वाले नाग और सर्पों का एक समुदाय रहता था। उनमें कहुक, तक्षक, कालिया और सुषेण आदि प्रधान नाग थे।
  14. जैन, बौद्ध देवताओं के सिर पर भी शेष छत्र होता है।
  15. कुंती पुत्र अर्जुन ने पाताल लोक की एक नागकन्या से विवाह किया था जिसका नाम उलूपी था। वह विधवा थी।
  16. भारत के कई शहर और गांव ‘नाग’ शब्द पर आधारित हैं। मान्यता है कि महाराष्ट्र का नागपुर शहर सर्वप्रथम नागवंशियों ने ही बसाया था।
  17. नाग से संबंधित कई बातें आज भारतीय संस्कृति, धर्म और परम्परा का हिस्सा बन गई हैं, जैसे नाग देवता, नागलोक, नागराजा-नागरानी, नाग मंदिर, नागवंश, नाग कथा, नाग पूजा, नागोत्सव, नाग नृत्य-नाटय, नाग मंत्र, नाग व्रत और अब नाग कॉमिक्स।
  18. इच्‍छाधारी नाग होते हैं, जो रूप बदल सकते हैं।
  19. नाग-नागिन बदला लेते हैं। नाग और सर्प में फर्क होता है।
  20. कुछ दुर्लभ नागों के सिर पर मणि होती हैं।
  21. नागों की स्मरण शक्ति तेज होती है।
  22. सौ वर्ष की उम्र पूरी करने के बाद नागों में उड़ने की शक्ति हासिल हो जाती है।
  23. सौ वर्ष की उम्र के बाद नागों में दाढ़ी-मूंछ निकल आती है।
  24. नाग किसी के भी शरीर में आ सकते हैं।
  25. नाग कन्याएं होती हैं जो नागलोक में रहती हैं।
  26. अजगर तो कई होते हैं लेकिन नाग प्रजाति का अजगर दूर से ही किसी को अपनी नाक से खींचने की ताकत रखता है।
  27. नाग खुद का बिल नहीं बनाता, वह चूहों के बिल में रहता है।
  28. नाग जमीन के अंदर गढ़े धन की रक्षा करता है। इसे नाग चौकी कहा जाता है।
  29. नागों में मनुष्य को सम्मोहित कर देने की शक्ति होती है।
  30. नाग संगीत सुनकर झूमने लगते हैं।
  31. नाग को मारना या नागों की लड़ाई देखना पाप है।
  32. नाग की केंचुल दरवाजे के ऊपर रखने से घर को नजर नहीं लगती।
  33. बड़े सांप, नाग आदि शिव का अवतार माने जाते हैं।
  34. कुछ नाग पांव वाले होते हैं।
  35. नाग एक मुंह ही नहीं दोमुहे या 10 मुंह वाले भी होते हैं।
  36. नाग रूप में देवता ही होते हैं जो इस धरती के सभी प्राणियों से कई गुना अपनी समझ रखते हैं।
  37. नागों को ही सबसे पहले भूकंप, प्रलय या अन्य किसी प्राकृतिक आपता का पता चल जाता है।
  38. कुंडली में कालसर्पदोष को नागदोष नहीं करते हैं यह राहु और केतु के कारण होता है।
  39. सर्पधर नामक एक राशि होती है जिसे अंग्रेजी में ओफियुकस कहते हैं। समद्री नाग नामक भी एक राशि होती है जिसे अंग्रेजी में हाइड्रा कहते हैं।
  40. लक्ष्मणजी और बलरामजी शेषनाग के अवतार थे। शेषनाग के और भी कई अवतार हुए हैं।

Be the first to comment - What do you think?  Posted by admin - at 4:14 pm

Categories: Uncategorized   Tags:

Kajari Teej 2021: कब है कजरी तीज, कैसे करें पूजा, क्या है महत्व और मुहूर्त, कौन से शुभ संयोग बन रहे हैं?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार रक्षाबंधन के 3 दिन बाद और कृष्ण जन्माष्टमी से 5 दिन पहले जो तीज आती है उसे सातुड़ी तीज, कजली तीज, कजरी तीज के रूप में मनाया जाता है। वर्ष 2021 में 25 अगस्त 2021, बुधवार को कजरी/ कजली तीज पर्व मनाया जाएगा। यह उत्सव बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। पालकी को सजाकर उसमें तीज माता की सवारी निकाली जाती है। इसमें हाथी, घोड़े, ऊंट, तथा कई लोक नर्तक और कलाकार हिस्सा लेते हैं। महिलाएं और लड़कियां इस दिन परिवार के सुख शांति की मंगल कामना में व्रत रखती है। इस दिन नीम की पूजा की जाती है। इस दिन सुबह जल्दी सूर्योदय से पहले उठकर धम्मोड़ी यानी हल्का नाश्ता करने का रिवाज है।

महत्व: जिस प्रकार पंजाब में करवा चौथ के दिन सुबह सरगी की जाती है इसके बाद कुछ नहीं खाया जाता और दिन भर व्रत चलता है उसी प्रकार इस व्रत में भी एक समय आहार करने के पश्चात दिन भर कुछ नहीं खाया जाता है। शाम को चंद्रमा की पूजा कर कथा सुनी जाती है। नीमड़ी माता की पूजा करके नीमड़ी माता की कहानी सुनी जाती है। चांद निकलने पर उसकी पूजा की जाती है। चांद को अर्घ्य दिया जाता है। बड़े बुजुर्गों का आशीर्वाद लिया जाता है। इसके बाद सत्तू के स्वादिष्ट व्यंजन खाकर व्रत तोड़ा जाता है।

सातुड़ी तीज पर सवाया, जैसे सवा किलो या सवा पाव के सत्तू बनाने चाहिए। सत्तू अच्छी तिथि या वार देख कर बनाने चाहिए। मंगलवार और शनिवार को नहीं बनाए जाते हैं। तीज के एक दिन पहले या तीज वाले दिन भी बना सकते हैं। सत्तू को पिंड के रूप जमा लेते है। उस पर सूखे मेवे इलायची और चांदी के वर्क से सजाएं। बीच में लच्छा, एक सुपारी भी लगा सकते हैं। पूजा के लिए एक छोटा लड्‍डू (तीज माता के लिए) बनाना चाहिए। कलपने के लिए सवा पाव या मोटा लड्‍डू बनना चाहिए व एक लड्‍डू पति के हाथ में झिलाने के लिए बनाना चाहिए। कुंवारी कन्या लड्‍डू अपने भाई को झिलाती है। सत्तू आप अपने सुविधा हिसाब से ज्यादा मात्रा में या कई प्रकार के बना सकते हैं। सत्तू चने, चावल, गेंहू, जौ आदि के बनते हैं। तीज के एक दिन पहले सिर धोकर हाथों व पैरों पर मेहंदी लगानी चाहिए।

सातुड़ी तीज पूजन सामग्री :

एक छोटा सातू का लडडू, नीमड़ी, दीपक, केला, अमरुद या सेब, ककड़ी, दूध मिश्रित जल, कच्चा दूध, नीबू, मोती की लड़/नथ के मोती, पूजा की थाली, जल कलश।

सातुड़ी तीज पूजन की तैयारी :

मिट्‍टी व गोबर से दीवार के सहारे एक छोटा-सा तालाब बनाकर (घी, गुड़ से पाल बांध कर) नीम वृक्ष की टहनी को रोप देते हैं। तालाब में कच्चा दूध मिश्रित जल भर देते हैं और किनारे पर एक दिया जला कर रख देते हैं। नीबू, ककड़ी, केला, सेब, सातु, रोली, मौली, अक्षत आदि थाली में रख लें। एक छोटे लोटे में कच्चा दूध लें।

कजली तीज के शुभ मुहूर्त :

कजरी तीज व्रत की तृतीया तिथि का प्रारंभ- 24 अगस्त 2021, बुधवार को शाम 4.05 मिनट से हो रहा है तथा 25 अगस्त 2021, गुरुवार को शाम 04.18 मिनट पर तृतीया तिथि समाप्त होगी।

इस वर्ष कजली तीज का त्योहार गुरुवार, 25 अगस्त 2021 को मनाया जाएगा। इस वर्ष कजरी तीज पर धृति योग बन रहा है। वैदिक ज्योतिष शास्त्र में इस योग को बेहद शुभ माना गया है। कहते हैं कि इस योग में किए गए कार्यों में सफलता हासिल होती है। इस बार कजरी तीज पर सुबह 05.57 मिनट तक धृति योग रहेगा।

सातुड़ी तीज पर कैसे करें पूजन, जानें विधि :

इस दिन पूरे दिन सिर्फ पानी पीकर उपवास किया जाता है और सुबह सूर्य उदय से पहले धमोली की जाती है इसमें सुबह मिठाई, फल आदि का नाश्ता किया जाता है। सुबह नहा धोकर महिलाएं सोलह बार झूला झूलती हैं, उसके बाद ही पानी पीती है।

सायंकाल के बाद महिलाएं सोलह श्रृंगार कर तीज माता अथवा नीमड़ी माता की पूजा करती हैं। सबसे पहले तीज माता को जल के छींटे दें। रोली के छींटे दें व चावल चढ़ाएं। नीमड़ी माता के पीछे दीवार पर मेहंदी, रोली व काजल की तेरह-तेरह बिंदिया अपनी अंगुली से लगाएं। मेहंदी, रोली की बिंदी अनामिका अंगुली से लगानी चाहिए और काजल की बिंदी तर्जनी अंगुली से लगानी चाहिए। नीमड़ी माता को मौली चढाएं। मेहंदी, काजल और वस्त्र (ओढ़नी) चढ़ाएं। दीवार पर लगाई बिंदियों पर भी मेहंदी की सहायता से लच्छा चिपका दें। नीमड़ी को कोई फल, सातु और दक्षिणा चढ़ाएं।

पूजा के कलश पर रोली से तिलक करें और लच्छा बांधें। किनारे रखे दीपक के प्रकाश में नीबू, ककड़ी, मोती की लड़, नीम की डाली, नाक की नथ, साड़ी का पल्ला, दीपक की लौ, सातु का लड्‍डू आदि का प्रतिबिंब देखें और दिखाई देने पर इस प्रकार बोलना चाहिए ‘तलाई में नींबू दीखे, दीखे जैसा ही टूटे’ इसी तरह बाकि सभी वस्तुओं के लिए एक-एक करके बोलना चाहिए।

इस तरह पूजन करने के बाद सातुड़ी तीज माता की कहानी सुननी चाहिए, नीमड़ी माता की कहानी सुननी चाहिए, गणेश जी की कहानी व लपसी तपसी की कहानी सुननी चाहिए। रात को चंद्र उदय होने पर चंद्रमा को अर्घ्य दिया जाता है।

गाय की पूजा- कजली, कजरी, सातुड़ी तीज के दिन गाय की पूजा की जाती है। गाय को रोटी व गुड़ चना खिलाकर महिलाएं अपना व्रत खोलती हैं।

चंद्रमा को अर्घ्य देने की विधि :

चंद्रमा को जल के छींटे देकर रोली, मौली, अक्षत चढ़ाएं। फिर चांद को भोग अर्पित करें व चांदी की अंगूठी और आंखें (गेंहू) हाथ में लेकर जल से अर्घ्य देना चाहिए। अर्घ्य देते समय थोड़ा-थोड़ा जल चंद्रमा की मुख की और करके गिराते रहें। चार बार एक ही जगह खड़े हुए घूमें। परिक्रमा लगाएं।

अर्घ्य देते समय बोलें, ‘सोने की सांकली, मोतियों का हार, चांद ने अरग देता, जीवो वीर भरतार’ सत्तू के पिंडे पर तिलक करें व भाई / पति, पुत्र को तिलक करें। पिंडा पति / पुत्र से चांदी के सिक्के से बड़ा करवाएं। यानी जो आपने सत्तु का बड़ा सा केक बनाया है उसे चांदी के सिक्के से पुत्र या पति को तोड़ने के लिए कहें। इस क्रिया को पिंडा पासना कहते हैं। पति पिंडे में से सात छोटे टुकड़े करते हैं, व्रत खोलने के लिए यही आपको सबसे पहले खाना है। पति बाहर हो तो सास या ननद पिंडा तोड़ सकती है।

सातु पर ब्लाउज, रुपए रखकर बयाना निकाल कर सासुजी के चरण स्पर्श कर कर उन्हें देना चाहिए। सास न हो तो ननद को या ब्राह्मणी को दे सकते हैं। आंकड़े के पत्ते पर सातु खाएं और अंत में आंकड़े के पत्ते के दोने में सात बार कच्चा दूध लेकर पिएं इसी तरह सात बार पानी पिएं।

दूध पीकर इस प्रकार बोलें- ‘दूध से धायी, सुहाग से कोनी धायी, इसी प्रकार पानी पीकर बोलते हैं- पानी से धायी, सुहाग से कोनी धायी’ सुहाग से कोनी धायी का अर्थ है पति का साथ हमेशा चाहिए, उससे जी नहीं भरता। बाद में दोने के चार टुकड़े करके चारों दिशाओं में फेंक देना चाहिए।

इस व्रत में गर्भवती स्त्री फलाहार कर सकती हैं। यह व्रत सिर्फ पानी पीकर किया जाता है। चांद उदय होते नहीं दिख पाए तो चांद निकलने का समय टालकर आसमान की ओर अर्घ्य देकर व्रत खोल सकते हैं। इस तरह तीज माता की पूजा संपन्न होती है।

Be the first to comment - What do you think?  Posted by admin - at 4:13 pm

Categories: Uncategorized   Tags:

रक्षा बंधन 2021 : राखी का बदलता स्वरूप, अब ट्रेंडी और स्टाइलिश लुक में मिलती हैं राखियां

प्रचीन काल या मध्यकाल में राखियां जैसी होती थीं आजकल वैसी नहीं होती। अब तो राखी को स्वरूप बहुत बदल गया है। राखी का स्वरूप ही नहीं बदला बल्कि पहले राखी को राखी नहीं कहा जाता था। मतलब यह कि नाम के साथ ही स्वरूप भी बदला है। इस बार राखी का मार्केट भी ट्रेंडी लुक में नजर आ रहा है। हर डिजाइन की राखी बड़े स्टाइलिश तरीके से सजाई गई है। आओ जानते हैं रोचक जानकारी।

दल गया नाम :

  1. राखी को पहले रक्षा सूत्र कहते थे।
  2. कलावा या मौली भी कहा जाता था।
  3. यह रक्षा सूत्र ही राखी में बदल गया।
  4. रक्षा सूत्र को बोलचाल की भाषा में राखी कहा जाता है जो वेद के संस्कृत शब्द ‘रक्षिका’ का अपभ्रंश है।
  5. मध्यकाल में इसे राखी कहा जाने लगा।
  6. राखी को राक्ष कहने के पूर्व पहले इसे श्रावणी या सलूनो भी कहते थे।
  7. इसी तरह प्रत्येक प्रांत में इसे अलग अलग नामों से जाना जाने लगा है।
  8. दक्षिण में नारियय पूर्णिमा, बलेव और अवनि अवित्तम, राजस्थान में रामराखी और चूड़ाराखी या लूंबा कहते हैं।

बदल गया स्वरूप :

  1. भाई-बहन के इस पवित्र त्योहार को प्रचीनकाल में अलग रूप में मनाया जाता था।
  2. पहले सूत का धागा होता था, फिर नाड़ा बांधने लगे।
  3. फिर नाड़े जैसा एक फुंदा बांधने का प्रचलन हुआ
  4. बाद में पक्के धागे पर फोम से सुंदर फुलों को बनाकर चिपकाया जाने लगा जो राखी कहलाने लगी।
  5. वर्तमान में तो राखी के कई रूप हो चले हैं।
  6. राखी कच्चे सूत जैसे सस्ती वस्तु से लेकर रंगीन कलावे, रेशमी धागे, तथा सोने या चांदी जैसी मंहगी वस्तु तक की हो सकती है।
  7. राजस्थान, निमाड़ या मालवा में रामराखी और चूड़ाराखी या लूंबा बांधने का रिवाज है। रामराखी इसमें लाल डोरे पर एक पीले छींटों वाला फुंदना लगा होता है।
  8. अब तो मार्केट में राखियों की खूब वैरायटी देखने को मिल रही है, जो स्वदेशी हैं। इस बार बाजार में कुंदन राखी, मीनाकारी राखी, एडी अमेरिकन राखी, पोलकी राखी देखने को मिल रही है। इनकी सजावट रेशमी धागे के साथ भी की गई है और इन पर बीड्स का भी इस्तेमाल किया गया है।
  9. ब्रेसलेट स्टाइल भी हर साल की तरह इस बार भी बरकरार है।
  10. भाभियों के लिए जयपुरी लूंबा राखी भी इस बार मार्केट में आई है।
  11. बच्चों के लिए पिछले साल की तरह इस साल भी चाइनीज राखी ज्यादा चल रही है। इनमें विभिन्न कार्टून कैरेक्टर वाली राखियां होती हैं। खास बात यह है कि यह सभी लाइट्स वाली हैं।
  12. इस बार राखी के त्योहार के लिए ज्वैलरी शॉप पर लाइट वेट ज्वैलरी तैयार की जा रही है। सोने व चांदी में स्वास्तिक, ओम लिख राखियां भी तैयार करवायी जा रही हैं।

Be the first to comment - What do you think?  Posted by admin - at 4:10 pm

Categories: Uncategorized   Tags:

ओणम पर्व के बारे में 10 रोचक बातें

दक्षिण भारत में ओणम का प्रसिद्ध त्योहार हिन्दू कैलेंडर के अनुसार भाद्र माह की शुक्ल त्रयोदशी को मनाया जाता है। जबकि मलयालम कैलेंडर के अनुसार चिंगम माह में यह त्योहार मनाया जाता है जो कि प्रथम माह है। खासकर यह त्योहार हस्त नक्षत्र से शुरू होकर श्रवण नक्षत्र तक चलता है। इस बार यह पर्व 12 अगस्त 2021 से प्रारंभ होकर 23 अगस्त तक लेगा। 21 अगस्त को ओणम का मुख्य पर्व रहेगा। आओ जानते हैं ओणम के बारे में 10 रोचक बातें

  1. इस दिन राजा बलि देखने आते हैं अपनी प्रजा को : यह त्योहार किसी देवी-देवता के सम्मान में नहीं बल्की एक दानवीर असुर राजा बलि के सम्मान में मनाया जाता है जिसने विष्णु के अवतार भगवान वामन को 3 पग भूमि दान में दे दी थी और फिर श्री वामन ने उन्हें अमरता का वरदान देकर पाताल लोक का राजा बना दिया था। ऐसी मान्यता है कि अजर-अमर राजा बलि ओणम के दिन अपनी प्रजा को देखने आते हैं। राजा बलि की राजधानी महाबलीपुरम थी।
  2. घरों की होती है साफ सफाई : जिस तरह दशहरे में दस दिन पहले रामलीलाओं का आयोजन होता है या दीपावली के पहले घर की रंगाई-पुताई के साथ फूलों से सजावट होती रही है।
  3. बनता है फूलों का घर : उसी तरह ओणम से दस दिन पहले घरों को फूलों से सजाने का कार्य चलता रहता है। घर को अच्छे से सजाकर बाहर रंगोली बनाते हैं। खासकर घर में कमरे को साफ करके एक फूल-गृह बनाया जाता है जिसमें गोलाकार रुप में फूल सजाए जाते हैं। प्रतिदिन आठ दिन तक सजावट का यह कार्यक्रम चलता है।
  4. राजा बालि की मूर्ति को सजाते हैं : इस दौरान राजा बलि की मिट्टी की बनी त्रिकोणात्मक मूर्ति पर अलग-अलग फूलों से चित्र बनाते हैं। प्रथम दिन फूलों से जितने गोलाकार वृत बनाई जाती हैं दसवें दिन तक उसके दसवें गुने तक गोलाकार में फूलों के वृत रचे जाते हैं।
  5. फूलों की सजावट के आसपास उत्सव मनाती हैं महिलाएं : नौवें दिन हर घर में भगवान विष्णु की मूर्ति की पूजा होती है तथा परिवार की महिलाएं इसके इर्द-गिर्द नाचती हुई तालियां बजाती हैं। वामन अवतार के गीत गाते हैं।
  6. नौका दौड़, नृत्य और गान : इस दौरान सर्प नौका दौड़ के साथ कथकली नृत्य और गाना भी होता है।
  7. रात्रि में गणेश पूजा : रात को गणेशजी और श्रावण देवता की मूर्ति की पूजा होती है। मूर्तियों के सामने मंगलदीप जलाए जाते हैं। पूजा-अर्चना के बाद मूर्ति विसर्जन किया जाता है।

8 बनते हैं कौन से पकवान : इस दौरान पापड़ और केले के चिप्स बनाए जाते हैं। इसके अलावा ‘पचड़ी–पचड़ी काल्लम, ओल्लम, दाव, घी, सांभर’ भी बनाया जाता है। दूध, नारियल मिलाकर खास तरह की खीर बनाते हैं।

  1. अठारह प्रकार के दुग्ध पकवान : कहते हैं कि केरल में अठारह प्रकार के दुग्ध पकवान बनते हैं। इनमें कई प्रकार की दालें जैसे मूंग व चना के आटे का प्रयोग भी विभिन्न व्यंजनों में किया जाता है। भोजन को कदली के पत्तों में परोसा जाता है।
  2. थिरुवोनम : ओणम के अंतिम दिन थिरुवोनम होता है। यह मुख्य त्योहार है। इस दिन उत्सव का माहौल होता है।

Be the first to comment - What do you think?  Posted by admin - at 4:09 pm

Categories: Uncategorized   Tags:

Next Page »

© 2010 Chalisa and Aarti Sangrah in Hindi

Visits: 245 Today: 6 Total: 1179723