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ऋषि, मुनि, साधु और संन्यासी में अंतर

ऋषि, मुनि, साधु और संन्यासी में अंतर

ऋषियों के सम्बन्ध में मान्यता थी कि वे अपने योग से परमात्मा को उपलब्ध हो जाते थे और जड़ के साथ साथ चैतन्य को भी देखने में समर्थ होते थे। वे भौतिक पदार्थ के साथ साथ उसके पीछे छिपी ऊर्जा को भी देखने में सक्षम होते थे।

 

भारत में प्राचीन काल से ही ऋषि मुनियों का बहुत महत्त्व रहा है। ऋषि मुनि समाज के पथ प्रदर्शक माने जाते थे और वे अपने ज्ञान और साधना से हमेशा ही लोगों और समाज का कल्याण करते आये हैं। आज भी वनों में या किसी तीर्थ स्थल पर हमें कई साधु देखने को मिल जाते हैं। धर्म कर्म में हमेशा लीन रहने वाले इस समाज के लोगों को ऋषि, मुनि, साधु और संन्यासी आदि नामों से पुकारते हैं। ये हमेशा तपस्या, साधना, मनन के द्वारा अपने ज्ञान को परिमार्जित करते हैं। ये प्रायः भौतिक सुखों का त्याग करते हैं हालाँकि कुछ ऋषियों ने गृहस्थ जीवन भी बिताया है। आईये आज देखते हैं ऋषि, मुनि, साधु और संन्यासी में कौन होते हैं और इनमे क्या अंतर है ?

ऋषि कौन होते हैं

भारत हमेशा से ही ऋषियों का देश रहा है। हमारे समाज में ऋषि परंपरा का विशेष महत्त्व रहा है। आज भी हमारे समाज और परिवार किसी न किसी ऋषि के वंशज माने जाते हैं।

ऋषि वैदिक परंपरा से लिया गया शब्द है जिसे श्रुति ग्रंथों को दर्शन करने वाले लोगों के लिए प्रयोग किया गया है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है वैसे व्यक्ति जो अपने विशिष्ट और विलक्षण एकाग्रता के बल पर वैदिक परंपरा का अध्ययन किये और विलक्षण शब्दों के दर्शन किये और उनके गूढ़ अर्थों को जाना और प्राणी मात्र के कल्याण हेतु उस ज्ञान को लिखकर प्रकट किये ऋषि कहलाये। ऋषियों के लिए इसी लिए कहा गया है “ऋषि: तु मन्त्र द्रष्टारा : न तु कर्तार : अर्थात ऋषि मंत्र को देखने वाले हैं न कि उस मन्त्र की रचना करने वाले। हालाँकि कुछ स्थानों पर ऋषियों को वैदिक ऋचाओं की रचना करने वाले के रूप में भी व्यक्त किया गया है।

ऋषि शब्द का अर्थ

ऋषि शब्द “ऋष” मूल से उत्पन्न हुआ है जिसका अर्थ देखना होता है। इसके अतिरिक्त ऋषियों के प्रकाशित कृत्य को आर्ष कहा जाता है जो इसी मूल शब्द की उत्पत्ति है। दृष्टि यानि नज़र भी ऋष से ही उत्पन्न हुआ है। प्राचीन ऋषियों को युग द्रष्टा माना जाता था और माना जाता था कि वे अपने आत्मज्ञान का दर्शन कर लिए हैं।

ऋषियों के सम्बन्ध में मान्यता थी कि वे अपने योग से परमात्मा को उपलब्ध हो जाते थे और जड़ के साथ साथ चैतन्य को भी देखने में समर्थ होते थे। वे भौतिक पदार्थ के साथ साथ उसके पीछे छिपी ऊर्जा को भी देखने में सक्षम होते थे।

ऋषियों के प्रकार

ऋषि वैदिक संस्कृत भाषा से उत्पन्न शब्द माना जाता है। अतः यह शब्द वैदिक परंपरा का बोध कराता है जिसमे एक ऋषि को सर्वोच्च माना जाता है अर्थात ऋषि का स्थान तपस्वी और योगी से श्रेष्ठ होता है। अमरसिंहा द्वारा संकलित प्रसिद्ध संस्कृत समानार्थी शब्दकोष के अनुसार ऋषि सात प्रकार के होते हैं ब्रह्मऋषि, देवर्षि, महर्षि, परमऋषि, काण्डर्षि, श्रुतर्षि और राजर्षि।

सप्त ऋषि

पुराणों में सप्त ऋषियों का केतु, पुलह, पुलत्स्य, अत्रि, अंगिरा, वशिष्ठ और भृगु का वर्णन है। इसी तरह अन्य स्थान पर सप्त ऋषियों की एक अन्य सूचि मिलती है जिसमे अत्रि, भृगु, कौत्स, वशिष्ठ, गौतम, कश्यप और अंगिरस तथा दूसरी में कश्यप, अत्रि, वशिष्ठ, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि, भरद्वाज को सप्त ऋषि कहा गया है।

मुनि किसे कहते हैं

मुनि भी एक तरह के ऋषि ही होते थे किन्तु उनमें राग द्वेष का आभाव होता था। भगवत गीता में मुनियों के बारे में कहा गया है जिनका चित्त दुःख से उद्विग्न नहीं होता, जो सुख की इच्छा नहीं करते और जो राग, भय और क्रोध से रहित हैं, ऐसे निस्चल बुद्धि वाले संत मुनि कहलाते हैं।

मुनि शब्द मौनी यानि शांत या न बोलने वाले से निकला है। ऐसे ऋषि जो एक विशेष अवधि के लिए मौन या बहुत कम बोलने का शपथ लेते थे उन्हीं मुनि कहा जाता था। प्राचीन काल में मौन को एक साधना या तपस्या के रूप में माना गया है। बहुत से ऋषि इस साधना को करते थे और मौन रहते थे। ऐसे ऋषियों के लिए ही मुनि शब्द का प्रयोग होता है। कई बार बहुत कम बोलने वाले ऋषियों के लिए भी मुनि शब्द का प्रयोग होता था। कुछ ऐसे ऋषियों के लिए भी मुनि शब्द का प्रयोग हुआ है जो हमेशा ईश्वर का जाप करते थे और नारायण का ध्यान करते थे जैसे नारद मुनि।

मुनि शब्द का चित्र,मन और तन से गहरा नाता है। ये तीनों ही शब्द मंत्र और तंत्र से सम्बन्ध रखते हैं। ऋग्वेद में चित्र शब्द आश्चर्य से देखने के लिए प्रयोग में लाया गया है। वे सभी चीज़ें जो उज्जवल है, आकर्षक है और आश्चर्यजनक है वे चित्र हैं। अर्थात संसार की लगभग सभी चीज़ें चित्र शब्द के अंतर्गत आती हैं। मन कई अर्थों के साथ साथ बौद्धिक चिंतन और मनन से भी सम्बन्ध रखता है। अर्थात मनन करने वाले ही मुनि हैं। मन्त्र शब्द मन से ही निकला माना जाता है और इसलिए मन्त्रों के रचयिता और मनन करने वाले मनीषी या मुनि कहलाये। इसी तरह तंत्र शब्द तन से सम्बंधित है। तन को सक्रीय या जागृत रखने वाले योगियों को मुनि कहा जाता था।

जैन ग्रंथों में भी मुनियों की चर्चा की गयी है। वैसे व्यक्ति जिनकी आत्मा संयम से स्थिर है, सांसारिक वासनाओं से रहित है, जीवों के प्रति रक्षा का भाव रखते हैं, अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह, ईर्या (यात्रा में सावधानी ), भाषा, एषणा(आहार शुद्धि ) आदणिक्षेप(धार्मिक उपकरणव्यवहार में शुद्धि ) प्रतिष्ठापना(मल मूत्र त्याग में सावधानी )का पालन करने वाले, सामायिक, चतुर्विंशतिस्तव, वंदन, प्रतिक्रमण, प्रत्याख्यान और कायतसर्ग करने वाले तथा केशलोच करने वाले, नग्न रहने वाले, स्नान और दातुन नहीं करने वाले, पृथ्वी पर सोने वाले, त्रिशुद्ध आहार ग्रहण करने वाले और दिन में केवल एक बार भोजन करने वाले आदि 28 गुणों से युक्त महर्षि ही मुनि कहलाते हैं।

मुनि ऋषि परंपरा से सम्बन्ध रखते हैं किन्तु वे मन्त्रों का मनन करने वाले और अपने चिंतन से ज्ञान के व्यापक भंडार की उत्पति करने वाले होते हैं। मुनि शास्त्रों का लेखन भी करने वाले होते हैं

साधु कौन होते हैं

किसी विषय की साधना करने वाले व्यक्ति को साधु कहा जाता है। प्राचीन काल में कई व्यक्ति समाज से हट कर या कई बार समाज में ही रहकर किसी विषय की साधना करते थे और उस विषय में विशिष्ट ज्ञान प्राप्त करते थे। विषय को साधने या उसकी साधना करने के कारण ही उन्हें साधु कहा गया।

कई बार अच्छे और बुरे व्यक्ति में फर्क करने के लिए भी साधु शब्द का प्रयोग किया जाता है। इसका कारण है कि सकारात्मक साधना करने वाला व्यक्ति हमेशा सरल, सीधा और लोगों की भलाई करने वाला होता है। आम बोलचाल में साध का अर्थ सीधा और दुष्टता से हीन होता है। संस्कृत में साधु शब्द से तात्पर्य है सज्जन व्यक्ति। लघुसिद्धांत कौमुदी में साधु का वर्णन करते हुए लिखा गया है कि “साध्नोति परकार्यमिति साधु : अर्थात जो दूसरे का कार्य करे वह साधु है। साधु का एक अर्थ उत्तम भी होता है ऐसे व्यक्ति जिसने अपने छह विकार काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह और मत्सर का त्याग कर दिया हो, साधु कहलाता है।

साधु के लिए यह भी कहा गया है “आत्मदशा साधे ” अर्थात संसार दशा से मुक्त होकर आत्मदशा को साधने वाले साधु कहलाते हैं। वर्तमान में वैसे व्यक्ति जो संन्यास दीक्षा लेकर गेरुआ वस्त्र धारण करते हैं और जिनका मूल उद्द्येश्य समाज का पथ प्रदर्शन करते हुए धर्म के मार्ग पर चलते हुए मोक्ष को प्राप्त करते हैं, साधु कहलाते हैं।

संन्यासी किसे कहते हैं

सन्न्यासी धर्म की परम्परा प्राचीन हिन्दू धर्म से जुडी नहीं है। वैदिक काल में किसी संन्यासी का कोई उल्लेख नहीं मिलता। सन्न्यासी या सन्न्यास की अवधारणा संभवतः जैन और बौद्ध धर्म के प्रचलन के बाद की है जिसमे सन्न्यास की अपनी मान्यता है। हिन्दू धर्म में आदि शंकराचार्य को महान सन्न्यासी माना गया है।

सन्न्यासी शब्द सन्न्यास से निकला हुआ है जिसका अर्थ त्याग करना होता है। अतः त्याग करने वाले को ही सन्न्यासी कहा जाता है। सन्न्यासी संपत्ति का त्याग करता है, गृहस्थ जीवन का त्याग करता है या अविवाहित रहता है, समाज और सांसारिक जीवन का त्याग करता है और योग ध्यान का अभ्यास करते हुए अपने आराध्य की भक्ति में लीन हो जाता है।

हिन्दू धर्म में तीन तरह के सन्न्यासियों का वर्णन है

परिव्राजकः सन्न्यासी : भ्रमण करने वाले सन्न्यासियों को परिव्राजकः की श्रेणी में रखा जाता है। आदि शंकराचार्य और रामनुजनाचार्य परिव्राजकः सन्यासी ही थे।

परमहंस सन्न्यासी : यह सन्न्यासियों की उच्चत्तम श्रेणी है।

यति : सन्यासी : उद्द्येश्य की सहजता के साथ प्रयास करने वाले सन्यासी इस श्रेणी के अंतर्गत आते हैं।

वास्तव में संन्यासी वैसे व्यक्ति को कह सकते हैं जिसका आतंरिक स्थिति स्थिर है और जो किसी भी परिस्थिति या व्यक्ति से प्रभावित नहीं होता है और हर हाल में स्थिर रहता है। उसे न तो ख़ुशी से प्रसन्नता मिलती है और न ही दुःख से अवसाद। इस प्रकार निरपेक्ष व्यक्ति जो सांसारिक मोह माया से विरक्त अलौकिक और आत्मज्ञान की तलाश करता हो संन्यासी कहलाता है।

उपसंहार

ऋषि, मुनि, साधु या फिर संन्यासी सभी धर्म के प्रति समर्पित जन होते हैं जो सांसारिक मोह के बंधन से दूर समाज कल्याण हेतु निरंतर अपने ज्ञान को परिमार्जित करते हैं और ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति हेतु तपस्या, साधना, मनन आदि करते हैं।

Be the first to comment - What do you think?  Posted by admin - October 29, 2021 at 2:43 pm

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लाल किताब के 7 उपाय अपनाएं, इस बार दिवाली पर अपार धन पाएं

लाल किताब में शुक्र ग्रह के देवी-देवताओं में लक्ष्मी माता को उसका अधिपति देव माना गया है। शुक्रवार देवी लक्ष्मी का वार है। आओ जानते हैं लाल किताब इस संबंध में क्या कहती है और क्या 7 उपाय करना चाहिए।

अशुभ की निशानी : शुक्र के साथ राहु का होना अर्थात स्त्री तथा दौलत का असर खत्म। यदि शनि मंदा अर्थात नीच का हो तब भी शुक्र का बुरा असर होता है। इसके अलावा भी ऐसी कई स्थितियां हैं जिससे शुक्र को मंदा माना गया है। जैसे अंगूठे में दर्द का रहना या बिना रोग के ही अंगूठा बेकार हो जाता है। त्वचा में विकार। गुप्त रोग। पत्नी से अनावश्यक कलह।
शुभ की निशानी : सुंदर शरीर वाला पुरुष या स्त्री में आत्मविश्वास भरपूर रहता है। स्त्रियां स्वत: ही आकर्षित होने लगती हैं। व्यक्ति धनवान और साधन-सम्पन्न होता है। कवि चरित्र, कामुक प्रवृत्ति यदि शनि मंद कार्य करे तो शुक्र साथ छोड़ देता है। शुक्र का बल हो तो ऐसा व्यक्ति ऐशो-आराम में अपना जीवन बिताता है। फिल्म या साहित्य में रुचि रहती है।
अब यदि यह शुक्र अशुभ है तो करें ये
7
उपाय:-
1.लक्ष्मी की उपासना करें। शुक्रवार का व्रत रखें, खटाई न खाएं और महालक्ष्मी मंदिर में जाकर देवी लक्ष्मी को कमल के फूल अर्पित करें। मां लक्ष्‍मी की तस्‍वीर के आगे घी का नौ बत्तियों वाला दीया जलाएं।
2. स्वयं को और घर को साफ-सुथरा रखें और हमेशा साफ कपड़े पहनें। नित्य नहाएं। शरीर को जरा भी गंदा न रखें। सुगन्धित इत्र या सेंट का उपयोग करें। पवित्र बने रहें।
3. सफेद वस्त्र दान करें। भोजन का कुछ हिस्सा गाय, कौवे, और कुत्ते को दें। दो मोती लेकर एक पानी में बहा दें और एक जिंदगीभर अपने पास रखें।
4.दीपावली के दिन किसी भी मंदिर में झाड़ू का दान करें। यदि आपके घर के आसपास कहीं महालक्ष्मी का मंदिर हो तो वहां गुलाब की सुगंध वाली अगरबत्ती का दान करें।
5.नौ वर्ष से कम आयु की पांच कन्‍याओं को 21 शुक्रवार तक मिश्री युक्‍त खीर खिलाएं।
6. मिट्टी के घड़े पर लाल रंग करें और उसके ऊपर लाल रंग का धागा बांधें। अब इसमें जटायुक्‍त नारियल रखकर इसे बहते जल में प्रवाहित कर दें।
7.प्रति शनिवार पीपल के पेड़ के नीचे किसी लोहे के बर्तन में पानी, शक्‍कर, घी और दूध मिलाकर पीपल के पेड़ की जड़ में चढ़ाएं। घी का दीपक जलाएं और सुगंधित अगरबत्ती भी लगाएं।

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लाल किताब के अनुसार क्यों- कब छिदवाएं नाक, क्या होगा फायदा और क्या रखें सावधानी, जानिए

Lal kitab remedies
लाल किताब के ज्योतिष में अक्सर किसी जातक की कुंडली या हाथ देखकर उसको नाक छिदवाकर उसमें 43 दिनों तक चांदी का तार डालने की सलाह देते हैं। आखिर नाक क्यों और कब छिदवाते हैं और क्या है इसकी सावधानी आओ जानते हैं।

क्यों छिदवाते हैं नाक : यदि आपकी कुंडली में बुध या चंद्र छठे या आठवें भाव में होकर पीड़ित है या किसी भी अन्य भाव में दूषित हो रहे हैं तो नाक छिदवाते हैं। मूलत: यह उपाय बुध को ठीक करने के लिए किया जाता है। बुध खाना नंबर 9 में हो या बुध खाना नंबर 12 में बैठा हो तो नाक छिदवाते हैं। हालांकि यहां लाल किताब के अनुसार इससे बुध नष्ट होकर चंद्र स्थापित हो जाता है।
लाल किताब अनुसार नाक का अगला सिरा बुध का और पूरी नाक ही बृहस्पति की होती है। नाक से जो वायु का आवागमन हो रहा है वह बृहस्पति की वायु है। इसीलिए नाक का साफ सुथरा होना जरूरी है। आपकी सांसों में रुकावट है तो यह रुकावट गुरु की है। इससे बुध पर भी बुरा असर होता है। सांसों को या गुरु को रोकने वाला राहु होता है। बुध का खराब होना व्यापार और नौकरी में नुकसान और गुरु का खराब होगा भग्य और प्रगति में बाधा मानी जाती है। अत: नौकरी या व्यापार में उन्नति के लिए नाक छिदवाते हैं।
बुध के दूषित होने से अक्ल पर ताले लग जाते हैं और व्यापार एवं नौकरी में हानी होती है और चंद्र के दूषित होने से सभी तरह का सुख और शांति का नाश हो जाता है। गुरु के दूषित होने से भाग्य में रुकावट आती है और बनते कार्य भी बिगड़ जाते हैं। इसीलिए यह नाक छिदवाते हैं।
कब छिदवाते हैं : मुहूर्त और नक्षत्र देखकर बुधवार की शाम को नाक छेदकर उसमें चांदी का तार डालें और फिर बृस्पति के दिन मंगल का दान यानी की पताशे की मीठाई, लड्डू इनका दान करना भी जरूरी है।
सावधानी : यदि आपका कारोबार ही बुध या राहु से संबंधित है और राहु आपका उच्च का है तो आपको किसी लाल किताब के ज्योतिष के पूछकर ही यह उपाय करना चाहिए। का उपाय कुंडली में राहु और बुध की स्थिति को देखकर ही करना चाहिए अन्यथा नुकसान हो सकता है।

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भगवान कार्तिकेय के 70 चमत्कारी दिव्‍य नाम

कार्तिकेय जी के दिव्‍य नाम दिए जा रहे हैं। जो इनका पाठ करता है, वह धन, कीर्ति तथा स्‍वर्गलोक प्राप्‍त कर लेता है, इसमें संशय नहीं है। कार्तिकेय के प्रसिद्ध नामों की सूची इस प्रकार है। आइए जानें…

भगवान कार्तिकेय के चमत्कारी नाम :-
1. कार्तिकेय,
2. महासेन,
3. शरजन्मा,
4. षडानन,
5. पार्वतीनन्दन,
6. स्कन्दम्,
7. सेनानी,
8. अग्निभू,
9. गुह,
10. बाहुलेय,
11. तारकजित्,
12. शिखिवाहन,
13. शक्तिश्वर,
14. कुमार,
15. क्रौंचदारण,
16. आग्‍नेय,
17. स्‍कन्‍द,
18. दीप्तकीर्ति,
19. अनामय,
20. मयूरकेतु,
21. धर्मात्‍मा,
22. भूतेश,
23. महिषमर्दन,
24. कामजित्,
25. कामद,
26. कान्‍त,
27. सत्यवाक,
28. भुनेश्‍वर,
29. शिशु,
30. शीघ्र,
31. शुचि,
32. चण्‍ड,
33. दीप्‍तवर्ण,
34. शुभानन,
35. अमोघ
36. अनघ,
37. रौद्र,
38. प्रिय,
39. चन्‍द्रानन,
40. दीप्‍तशक्ति,
41. प्रशान्‍तात्‍मा,
42. भद्रकृत्,
43. कूटमोहन,
44. षष्‍ठीप्रिय,
45. धर्मात्‍मा,
46. पवित्र,
47. मातृवत्‍सल,
48. कन्‍याभर्ता,
49. विभक्‍त,
50. स्‍वाहेय,
51. रेवतीसुत,
52. प्रभु,
53. नेता,
54. विशाख,
55. नैगमेय,
56. सुदुश्रर,
57. सुव्रत,
58. बालक्रीडनकप्रिय,
59. आकाश्‍चारी,
60. ब्रह्मचारी,
61. शूर,
62. शखणोद्भव,
63. विश्‍वामित्रप्रिय,
64. देवसेनाप्रिय,
65. वासुदेवप्रिय,
66. स्कंद,
67. प्रिय
68. प्रियकृत्
69. मुरुगन
70. सुंदर
ये कार्तिकेय जी के 70 दिव्‍य नाम हैं।

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धन्वंतरि के पौराणिक स्तोत्र, स्तुति, मंत्र, आरती, पढ़ें सब एक साथ, पाएं धन, आरोग्य, सुंदरता और समृद्धि का आशीर्वाद

Dhanteras 2021
भगवान धन्वंतरि चिकित्सा के देवता माने जाते हैं। दीपावली पर्व के पहले दिन यानी धनतेरस को भगवान धन्वंतरि की पूजा-अर्चना होती है। मान्यतानुसार धनतेरस के दिन भगवान धन्वंतरि अखंड लक्ष्मी का वरदान और स्थायी समृद्धि, आरोग्य, सुदंरता और समृद्धि का आशीर्वाद का आशीष देते हैं।

यहां पाठकों के लिए हम लाए हैं भगवान धन्वंतरि पौराणिक मंत्र, स्तोत्र, आरती, स्तुति-

धन्वंतरि स्तोत्र
शंखं चक्रं जलौकादधतम्-
अमृतघटम् चारूदौर्भिश्चतुर्भि:।
सूक्ष्म स्वच्छ अति-हृद्यम् शुक-
परि विलसन मौलिसंभोजनेत्रम्।।
कालांभोदोज्वलांगं कटितटविल-
स: चारूपीतांबराढ़यम्।
वंदे धन्वंतरीम् तम् निखिल
गदम् इवपौढदावाग्रिलीलम्।।
यो विश्वं विदधाति पाति-
सततं संहारयत्यंजसा।
सृष्ट्वा दिव्यमहोषधींश्च-
विविधान् दूरीकरोत्यामयान्।।
विंभ्राणों जलिना चकास्ति-
भुवने पीयूषपूर्ण घटम्।
तं धन्वंतरीरूपम् इशम्-
अलम् वन्दामहे श्रेयसे।।

भगवान धन्वंतरि जी की आरती
जय धन्वंतरि देवा, जय धन्वंतरि जी देवा।
जरा-रोग से पीड़ित, जन-जन सुख देवा।।जय धन्वं.।।
तुम समुद्र से निकले, अमृत कलश लिए।
देवासुर के संकट आकर दूर किए।।जय धन्वं.।।
आयुर्वेद बनाया, जग में फैलाया।
सदा स्वस्थ रहने का, साधन बतलाया।।जय धन्वं.।।
भुजा चार अति सुंदर, शंख सुधा धारी।
आयुर्वेद वनस्पति से शोभा भारी।।जय धन्वं.।।
तुम को जो नित ध्यावे, रोग नहीं आवे।
असाध्य रोग भी उसका, निश्चय मिट जावे।।जय धन्वं.।।
हाथ जोड़कर प्रभुजी, दास खड़ा तेरा।
वैद्य-समाज तुम्हारे चरणों का घेरा।।जय धन्वं.।।
धन्वंतरिजी की आरती जो कोई नर गावे।
रोग-शोक न आए, सुख-समृद्धि पावे।।जय धन्वं.।।

पौराणिक मंत्र-
ॐ नमो भगवते महासुदर्शनाय वासुदेवाय धन्वंतराये:
अमृतकलश हस्ताय सर्व भयविनाशाय सर्व रोगनिवारणाय
त्रिलोकपथाय त्रिलोकनाथाय श्री महाविष्णुस्वरूप
श्री धनवंतरी स्वरूप श्री श्री श्री औषधचक्र नारायणाय नमः॥
सरल मंत्र- ॐ धन्वंतराये नमः॥

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दीपावली मनाने के 15 खास कारण, साल भर की खुशियों का मिलता है वरदान

Diwali Deepawali 2021: भारतीय संस्कृति और धर्म में कार्तिक मास के दिन आने वाल अमावस्या का खास महत्व है। इस दिन दीपावली का पर्व मनाया जाता है। हिन्दू के साथ ही इस दिन का जैन, बौद्ध और सिख धर्म में भी खास महत्व है। आओ जानते हैं कि किन कारणों से मनाई जाती है दिवाली।

दीपावली मनाने के 15 खास कारण ( 15 special reasons to celebrate Diwali )
1. इस दिन भगवान विष्णु ने राजा बलि को पाताल लोक का स्वामी बनाया था और इन्द्र ने स्वर्ग को सुरक्षित जानकर प्रसन्नतापूर्वक दीपावली मनाई थी।
2. इस दिन भगवान विष्णु ने नरसिंह रुप धारणकर हिरण्यकश्यप का वध किया था।
3. इसी दिन समुद्रमंथन के पश्चात लक्ष्मी व धन्वंतरि प्रकट हुए थे। इसी दिन माता काली भी प्रकट हुई थी इसलिए बंगाल में दीपावली के दिन कालिका की पूजा का प्रचलन है।
4. इसी दिन भगवान राम 14 वर्ष के वनवास के बाद अयोध्या लौटे थे। कहते हैं कि श्रीराम रावण का वध करने के 21 दिन बाद अयोध्या लौटे थे। इसीलिए इस दिन राम विजयोत्सव के रूप में दीप जलाए जाते हैं।
Ram krishna married life
5. इस दिन के ठीक एक दिन पहले श्रीकृष्ण ने नरकासुर नामक राक्षस का वध किया था। इस खुशी के मौके पर दूसरे दिन दीप जलाए गए थे।
6. यह दिन भगवान महावीर स्वामी का निर्वाण दिवस भी है। जैन मंदिरों में निर्वाण दिवस मनाया जाता है।
7. गौतम बुद्ध के अनुयायियों ने 2500 वर्ष पूर्व गौतम बुद्ध के स्वागत में लाखों दीप जला कर दीपावली मनाई थी।
8. इसी दिन उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य का राजतिलक हुआ था।
9. इसी दिन गुप्तवंशीय राजा चंद्रगुप्त विक्रमादित्य ने ‘विक्रम संवत’ की स्थापना करने के लिए धर्म, गणित तथा ज्योतिष के दिग्गज विद्वानों को आमन्त्रित कर मुहूर्त निकलवाया था।
10. इसी दिन अमृतसर में 1577 में स्वर्ण मन्दिर का शिलान्यास हुआ था।
11. दिवाली ही के दिन सिक्खों के छ्टे गुरु हरगोबिन्द सिंह जी को कारागार से रिहा किया गया था।
12. इसी दिन आर्यसमाज के संस्थापक महर्षि दयानंद सरस्वती का निर्वाण हुआ था।
13. इस दिन से नेपाल संवत में नया वर्ष आरम्भ होता है।
14. भगवान विष्णु के 24 अवतारों में 12वां अवतार धन्वंतरि का था। उन्हें आयुर्वेद का जन्मदाता और देवताओं का चिकित्सक माना जाता है। धनतेरस के दिन उनका जन्म हुआ था। इस दिन यम पूजा भी होती है।
15. भाई दूज को यम द्वीतीया भी कहते हैं। यम के निमित्त धन तेरस, नरक चतुर्दशी, दीपावली, गोवर्धन पूजा और भाई दूज पांचों दिन दीपक लगाना जाहिए। कहते हैं कि यमराज के निमित्त जहां दीपदान किया जाता है, वहां अकाल मृत्यु नहीं होती है। इस दिन यम के मुंशी भगवान चित्रगुप्त की पूजा का भी प्रचलन है। इस दिन श्रीकृष्ण ने इंद्रोत्सव की जगह गोवर्धन पूजा को प्रारंभ किया था।
उक्त सभी कारणों से हमारी सांझा संस्कृति दीपावली का त्योहार मनाती हैं।

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Diwali 2021 and Vastu : दीपावली पर वास्तु के ये 10 टिप्स अपना लिए तो माता लक्ष्मी आपके घर में तुरंत प्रवेश करेंगी

diwali 2021

diwali 2021
Diwali 2021: दीवाली पर माता लक्ष्मी प्रसन्न करने के लिए यह प्रयास करना चाहिए, क्योंकि यही मौका रहता है जबकि आप अपने जीवन से आर्थिक परेशानी को दूर करके सुख और समृद्धि का जीवन यापन करते हैं। ऐसे में पूजा पाठ के साथ ही दिवाली पर वास्तु के खास टिप्स ( 10 Vastu Tips for Diwali ) भी अपनाना चाहिए।
दीपावली के लिए वास्तु के ये 10 टिप्स ( 10 Vastu Tips for Diwali )
1. रंग रोगन : दिवाली की पुताई के दौरान किस दिशा में कौनसा रंग करें यह जानना जरूरी है। उत्तर- हरा, पिस्ता या आसमानी, ईशान- पीला आसमानी या सपेद , पूर्व- सफेद या हल्का नीला, आग्नेय- नारंगी, पीला, सफेद या सिल्वर, दक्षिण- नारंगी, गुलाबी या लाल, नैऋत्य- भूरा या हरा, पश्‍चिम- नीला या हल्का नीला, वायव्य- हल्का स्लेटी, क्रीम या सफेद।
2. वंदनवार : आम या पीपल के नए कोमल पत्तों की माला को वंदनवार कहा जाता है। इसे अकसर दीपावली के दिन द्वार पर बांधा जाता है। वंदनवार इस बात का प्रतीक है कि देवगण इन पत्तों की भीनी-भीनी सुगंध से आकर्षित होकर घर में प्रवेश करते हैं। इसे इस बार वास्तु अनुसार ही सजाएं। नकली फूलों से या नकली वस्तुओं से ना सजाएं। वंदनवार सजाने के बाद दरवाजे के आसपास शुभ लाभ लिखें और स्वस्तिक का चिन्ह बनाएं। द्वार के उपर गणेशजी का चित्र या मूर्ति लगएं।
3. देहरी पूजा : वास्तु के अनुसार दहलीज़ टूटी-फूटी या खंडित नहीं होना चाहिए। बेतरतीब तरह से बनी दहलीज नहीं होना चाहिए यह भी वास्तुदोष निर्मित करती है। द्वार की देहली (डेली) बहुत ही मजबूत और सुंदर होना चाहिए। कई जगह दहलीज होती ही नहीं जो कि वास्तुदोष माना जाता है। देहरी पर कभी पैर नहीं रखे जाते हैं। जो नित्य देहरी की पूजा करते हैं उनके घर में स्थायी लक्ष्मी निवास करती है। दीपावली के अलावा विशेष अवसरों पर देहरी के आसपास घी का दीपक लगाना चाहिए। इससे घर में लक्ष्मी का प्रवेश सरल होगा।
4. रंगोली या मांडना : दिपावली के पांच दिनी उत्सव में रंगोली और मांडना बनाना ‘चौंसठ कलाओं’ में से एक है जिसे ‘अल्पना’ कहा गया है। वास्तुशास्त्र में इसका बहुत महत्व है। रंगोली और मांडनों को श्री और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। यह माना जाता है कि जिसके घर में इसका सुंदर अंकन होता रहता है, वहां लक्ष्मी निवास करती है। मांडना में चौक, चौपड़, संजा, श्रवण कुमार, नागों का जोड़ा, डमरू, जलेबी, फेणी, चंग, मेहंदी, केल, बहू पसारो, बेल, दसेरो, सातिया (स्वस्तिक), पगल्या, शकरपारा, सूरज, केरी, पान, कुंड, बीजणी (पंखे), पंच कारेल, चंवर छत्र, दीपक, हटड़ी, रथ, बैलगाड़ी, मोर, फूल व अन्य पशु-पक्षी आदि बनाया जाता है।
vandanvar toran
5. दीपक जलाना : दीए मिट्टी के ही होना चाहिए और तेल के दीये का महत्व जानना जरूरी है। असंख्य दीपों की रंग-बिरंगी रोशनियां मन को मोह लेती हैं। दुकानों, बाजारों और घरों की सजावट दर्शनीय रहती है। धनतेरस से भाईदूज तक अगल अलग तरीके से दीपक जलाया जाता है जिससे घर का वास्तु दोष दूर होता है और सभी तरह के संकट समाप्त हो जाते हैं। दीपावली पर दीये लगाते समय उनकी संख्या पर ध्यान देना बेहद जरूरी है।
6. कबाड़ कर दें बाहर : दीपावली के पूर्व ही हम टूटा-फूटा फर्नीचर, पुराने कपड़े, रद्दी पेपर, पुरानी मैग्जीन, टूटे कांच, चीनी के टूटे बर्तन आदि को घर से बाहर निकाल देते हैं। घर में इलेक्ट्रिक का कोई भी खराब या बंद उपकरण ना रखें। इसे कबाड़ में बेच दें। सफाई की सभी वस्तुएं जैसे झाडू, डस्टबिन, डस्टपान, डोरमेट आदि नए इस्तेमाल करें।
7. ईशान कोण और तिजोरी हो वास्तु अनुसार : स्थायी लक्ष्मी की प्राप्ति के लिए घर के ईशान कोण में एक चांदी, तांबा या स्टील के बर्तन में पानी भरकर रखें। तिजोरी ऐसी रखें कि वह उत्तर की दिशा में खुले। तिजोरी में स्वर्ण को पीले या लाल वस्त्र में लपेटकर रखें। दोनों ही जगहों पर सुगंध फैलाने के लिए इत्र का उपयोग कर सकते हैं, परंतु इत्र ना रखें। दीपावली के पांचों दिन रोज एक कम का फूल लाएं और उसे उत्तर या ईशान दिशा में रखकर उसकी पूजा करें।
8. सेंधा नमक का पौंछा लगाएं : नमक या सेंधा नमक का पौंछा लगाएं। इससे घर की नकारात्मक ऊर्जा बाहर निकल जाएगी। इसमें चुटकी भर हल्दी डाल लेंगे तो सोने पर सुहाग समझो। इसके बाद घर में गुग्गल या चंदन से वातावरण को सुंगंधित बनाएं।
9. कर्पूर जलाएं : घर में सुबह और शाम को कर्पूर जरूर जलाएं। यह हर तरह के वास्तु दोष को समाप्त कर देता है और इसके कई लाभ हैं।
10. उत्तर दिशा और पीले या लाल वस्त्र : दीवाली की पूजा उत्तर दिशा या फिर उत्तर-पूर्व दिशा में ही करनी चाहिए। इसके अनुसार पूजा करने वाले का मुख घर की उत्तर या पूर्व दिशा में होना चाहिए। साथ ही पूजा के समय पीले या लाल रंग के वस्त्र पहनें। घर के सभी सदस्य मिलकर ही पूजा करें।

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Diwali 2021 Niyam : दीपावली की रात इन 20 जगहों पर जरूर रखें दीप जलाकर, जानिए मिलने वाले लाभ

दीपावली पर अकसर द्वार, तुलसी या पूजा स्थान पर दीपक जलाकर रखे जाते हैं। हालांकि कुछ ऐसी भी जगहें हैं जहां पर कुछ लोग ही दीये जलाकर रखते होंगे। आओ जानते हैं कि दीवाली की रा‍त को कितनी जगहों पर दीपक जलाकर रखना चाहिए। जानिए इससे मिलने वाला लाभ के बारे में भी।

1. दिपावली के दिन लक्ष्‍मी की पूजा करने के लिए एक दीपक जलाया जाता है। वह दीपक पीतल या स्टील का होता है। यह सात मुखी दीपक होता है जिससे माता लक्ष्मी प्रसन्न होती है।
2. कहते हैं कि दीपावली की रात को देवालय में गाय के दूध का शुद्ध घी का दीपक जलाना चाहिए। इससे तुरंत ही कर्ज से छुटकारा मिलता है और आर्थिक तंगी दूर हो जाती है।
3. दीपावली की रात को तीसरा दीया तुलसी के पास जलाया जाता है। आपके घर में तुलसी नहीं है तो और किसी पौधे के पास यह दीया रख सकते हैं। इसे भगवान विष्णु और माता तुली प्रसन्न होकर आशीर्वाद देते हैं।
4. चौथा दीपक दरवाजे के बाहर दहलीज़ के दाएं और बाएं रखा जाता है और बनाई गई रांगोली के बीच में भी रखते हैं। इसे धन की मनोकामना पूर्ण होती है।
5. पांचवां दीया पीपल के पेड़ के नीचे रखकर आते हैं। इससे यम और शनि के दोष नहीं लगते हैं। साथ ही इससे धन की समस्या भी दूर होती है।
6. छठा दीपक पास के किसी मंदिर में रखना जरूरी होता है। इससे सभी देवी और देवता प्रसन्न होते हैं।
7. सातवां दीपक कचरा रखने वाले स्थान पर रखते हैं। इससे घर की नाकारात्मकता बाहर निकल जाती है।
8. आठवां बाथरूम के कोने में रखते हैं। इससे राहु और चंद्र के दोष समाप्त हो जाते हैं।
9. नौवां दीपक मुंडेर पर या आपके घर में गैलरी हो तो वहां रखते हैं।
10. दसवां घर की दिवारों पर की मुंडेर पर या बॉउंड्रीवाल पर रखते हैं।
11. ग्यारहां दीपक खिड़की में रखते हैं।
12. बारहवां दीपक छत पर रखते हैं।
13. तेरहवां दीपक किसी चौराहे पर रखकर आते हैं। ऐसा करने पर पैसों से जुड़ी समस्याएं समाप्त हो सकती हैं।
14. चौदहवां दीपक दीपावली पर कुल देवी या देवता, यम और पितरों के लिए भी जलाया जाता है।
15. पंद्रहवां दीपक गौशाला में रखते हैं। इससे गायों की माता सुरभी और भगवान श्रीकृष्‍ण प्रसप्न होते हैं।
16. किसी बिल्व पत्र के पेड़ के नीचे दीपावली की शाम दीपक लगाएं। यहां दीपक लगाने पर भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है।
17. घर के पास कोई नदी, तालब या जलाशय हो तो वहां पर रा‍त्रि के समय दीपक लगाने से सभी तरह के दोषों से मुक्ति मिलती है।
18. कई लोग शमशान में या किसी सुनसान मंदिर में भी दीया रखकर आते हैं। इससे आसमानी शक्तियों की मदद मिलती है।
19. पितरों का आशीवार्द प्राप्त करने के लिए घर के दक्षिण भाग में दीया लगाएं।
20. घर के हर कोने में दीपक जलाना चाहिए।

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History Of Diwali : दीपावली का पौराणिक और प्राचीन इतिहास, जानिए कब से मनाया जा रहा है यह पर्व

प्रतिवर्ष कार्तिक मास की अमावस्या को दीपावली का त्योहार मनाया जाता है। वक्त के साथ इस त्योहार को मनाने के तरीके भी बदले हैं। माना जाता है कि दिवली के यह पर्व प्राचीन काल से ही मनाया जाता रहा हैं। इस उत्सव के प्रारंभ होने को लेकर कई तरह के तथ्‍य सामने आते हैं। आओ जानते हैं कि
दीपावली का पौराणिक और प्राचीन इतिहास क्या है।
पौराणिक तथ्य
यक्ष और दिवाली : कहते हैं कि प्रारंभ में दीवाली के पर्व यक्ष और गंधर्व जाति का उत्सव था। मान्यता है कि दीपावली की रात्रि को यक्ष अपने राजा कुबेर के साथ हास-विलास में बिताते व अपनी यक्षिणियों के साथ आमोद-प्रमोद करते थे। बाद में यह त्योहार सभी जातियों का प्रमुख त्योहार बन गया।
लक्ष्मी और दिवाली : सभ्याता के विकासक्रम के चलते बाद में धन के देवता कुबेर की बजाय धन की देवी लक्ष्मी की इस अवसर पर पूजा होने लगी, क्योंकि कुबेर जी की मान्यता सिर्फ यक्ष जातियों में थी पर लक्ष्मीजी की देव तथा मानव जातियों में मान्यता थी।
गणेश और दिवाली : कहते हैं कि लक्ष्मी, कुबेर के साथ बाद में गणेशजी की पूजा का प्रचलन भौव-सम्प्रदाय के लोगों ने किया। ऋद्धि-सिद्धि के दाता के रूप में उन्होंने गणेशजी को प्रतिष्ठित किया।
diwali lakshmi puja
कुबेर, लक्ष्मी और गणेशजी की दिवाली : तार्किक आधार पर देखें तो कुबेर जी मात्र धन के अधिपति हैं जबकि गणेश जी संपूर्ण ऋद्धि-सिद्धि के दाता माने जाते हैं। इसी प्रकार लक्ष्मी जी मात्र धन की स्वामिनी नहीं वरन ऐश्वर्य एवं सुख-समृद्धि की भी स्वामिनी मानी जाती हैं। अत: कालांतर में लक्ष्मी-गणेश का संबध लक्ष्मी-कुबेर की बजाय अधिक निकट प्रतीत होने लगा।
लक्ष्मी विवाह का दिन : दीपावली के साथ लक्ष्मी पूजन के जुड़ने का कारण लक्ष्मी और विष्णुजी का इसी दिन विवाह सम्पन्न होना भी माना गया है।
लक्ष्मी और काली : कहते हैं कि इस दिन एक ओर जहां समुद्रमंथन के पश्चात लक्ष्मी व धन्वंतरि प्रकट हुए थे, वहीं इसी दिन माता काली भी प्रकट हुई थी इसलिए इस दिन काली और लक्ष्मी दोनों की ही पूजा होती है और इसी कारण दीपोत्सव मनाया जाता है।
बली और दिवाली : कहते हैं कि दीपावली का पर्व सबसे पहले राजा महाबली के काल से प्रारंभ हुआ था। विष्णु ने तीन पग में तीनों लोकों को नाप लिया। राजा बली की दानशीलता से प्रभावित होकर भगवान विष्णु ने उन्हें पाताल लोक का राज्य दे दिया, साथ ही यह भी आश्वासन दिया कि उनकी याद में भू लोकवासी प्रत्येक वर्ष दीपावली मनाएंगे। तभी से दीपोत्सव का पर्व प्रारंभ हुआ।
इंद्र और दिवाली : यह भी कहा जाता है कि इस दिन भगवान विष्णु ने राजा बली को पाताल लोक का स्वामी बनाया था और इन्द्र ने स्वर्ग को सुरक्षित जानकर प्रसन्नतापूर्वक दीपावली मनाई थी।
श्री राम और दिवाली :
कहते हैं कि भगवान श्रीराम अपना 14 वर्ष का वनवास पूरा करने के बाद पुन: लौट आए थे। कहते हैं कि वे सीधे अयोध्या न जाते हुए पहले नंदीग्राम गए थे और वहां कुछ दिन रुकने के बाद दीपावली के दिन उन्होंने अयोध्या में प्रवेश किया था। इस दौरान उनके लिए खासतौर पर नगर को दीपों से सजाया गया था। तभी से दिवाली के दिन दीपोत्सव मनाने का प्रचलन हुआ।
श्री कृष्ण और दिवाली : ऐसा कहा जाता है कि दीपावली के एक दिन पहले श्रीकृष्ण ने अत्याचारी नरकासुर का वध किया था जिसे नरक चतुर्दशी कहा जाता है। इसी खुशी में अगले दिन अमावस्या को गोकुलवासियों ने दीप जलाकर खुशियां मनाई थीं। दूसरी घटना श्रीकृष्ण द्वारा सत्यभामा के लिए पारिजात वृक्ष लाने से जुड़ी है। श्री कृष्ण ने इंद्र पूजा का विरोध करके गोवर्धन पूजा के रूप में अन्नकूट की परंपरा प्रारंभ की थी।
ऐतिहासिक तथ्‍य
सिंधु घाटी और दिवाली : नवीनतम शोधानुसार सिंधु घाटी की सभ्यता लगभग 8000 वर्ष पुरानी है। अर्थात ईसा से 6 हजार वर्ष पूर्व सिंधु घाटी के लोग रहते थे। मतलब रामायण काल के भी पूर्व। सिंधु घाटी सभ्यता की खुदाई में पकी हुई मिट्टी के दीपक प्राप्त हुए हैं और 3500 ईसा वर्ष पूर्व की मोहनजोदड़ो सभ्यता की खुदाई में प्राप्त भवनों में दीपकों को रखने हेतु ताख बनाए गए थे। मुख्य द्वार को प्रकाशित करने हेतु आलों की शृंखला थी मोहनजोदड़ो सभ्यता के प्राप्त अवशेषों में मिट्टी की एक मूर्ति के अनुसार उस समय भी दीपावली मनाई जाती थी। उस मूर्ति में मातृ-देवी के दोनों ओर दीप जलते दिखाई देते हैं। इससे यह सिद्ध स्वत: ही हो जाता है कि यह सभ्यता हिन्दू सभ्यता थी जो दीपावली का पर्व मनाती थी।

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dhanteras : धनतेरस के दिन इन 6 देवों की पूजा होती है, पढ़ें नई जानकारी

हिन्दू कैलेंडर के अनुसार कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को धनतेरस का त्योहार मनाया जाता है। यह 5 दिन चलने वाले दीपावली उत्सव का पहला दिन होता है। धनतेरस से ही तीन दिन तक चलने वाला गोत्रिरात्र व्रत भी शुरू होता है। इस दिन पांच देवों की पूजा होती है।
1. धन्वंतरि पूजा: हिन्दू मान्यता अनुसार धन तेरस के दिन समुद्र मंथन से आयुर्वेद के जनक भगवान धन्वंतरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। अमृत कलश के अमृत का पान करके देवता अमर हो गए थे। इसीलिए आयु और स्वस्थता की कामना हेतु धनतेरस पर भगवान धन्वंतरि का पूजन किया जाता है।
2. यम पूजा: धनतेरस के दिन यम पूजा का भी महत्व है। कहते हैं कि धनतेरस के दिन यमराज के निमित्त जहां दीपदान किया जाता है, वहां अकाल मृत्यु नहीं होती है।
3. कुबेर पूजा: धन के देवता कुबेर की इस दिन विशेष पूजा होती है। कुबेर भी आसुरी प्रवृत्तियों का हरण करने वाले देव हैं इसीलिए उनकी भी पूजा का प्रचलन है।
4. लक्ष्मी पूजा: इस दिन लक्ष्मी पूजा का भी महत्व है। श्रीसूक्त में वर्णन है कि लक्ष्मीजी भय और शोक से मुक्ति दिलाती हैं तथा धन-धान्य और अन्य सुविधाओं से युक्त करके मनुष्य को निरोगी काया और लंबी आयु देती हैं।
5. गणेश पूजा: गणेशजी की पूजा प्रत्येक मांगलिक कार्य और त्योहार में की जाती है क्योंकि वे प्रथम पूज्य हैं। सभी के साथ गणेश पूजा की जाना जरूरी होती है।
6. पशु पूजा: धनतेरस के दिन ग्रामीण क्षेत्र में मवेशियों को अच्छे से सजाकर उनकी पूजा करते हैं, क्योंकि ग्रामीणों के लिए पशु धन का सबसे ज्यादा महत्व होता है। दक्षिण भारत में लोग गायों को देवी लक्ष्मी के अवतार के रूप में मानते हैं इसलिए वहां के लोग गाय का विशेष सम्मान और आदर करते हैं।

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