ज्ञानी के लक्षण क्या है? – 14 characteristics of a wise man

निषेवते प्रशस्तानी निन्दितानी न सेवते । अनास्तिकः श्रद्धान एतत् पण्डितलक्षणम् ॥1

 भावार्थ :

सद्गुण, शुभ कर्म, भगवान् के प्रति श्रद्धा और विश्वास, यज्ञ, दान, जनकल्याण आदि, ये सब ज्ञानीजन के शुभ- लक्षण होते हैं ।

क्रोधो हर्षश्च दर्पश्च ह्रीः स्तम्भो मान्यमानिता। यमर्थान् नापकर्षन्ति स वै पण्डित उच्यते ॥2

 भावार्थ :

जो व्यक्ति क्रोध, अहंकार, दुष्कर्म, अति-उत्साह, स्वार्थ, उद्दंडता इत्यादि दुर्गुणों की और आकर्षित नहीं होते, वे ही सच्चे ज्ञानी हैं ।

यस्य कृत्यं न विघ्नन्ति शीतमुष्णं भयं रतिः । समृद्धिरसमृद्धिर्वा स वै पण्डित उच्यते ॥3

 भावार्थ :

जो व्यक्ति सरदी-गरमी, अमीरी-गरीबी, प्रेम-धृणा इत्यादि विषय परिस्थितियों में भी विचलित नहीं होता और तटस्थ भाव से अपना राजधर्म निभाता है, वही सच्चा ज्ञानी है ।

क्षिप्रं विजानाति चिरं शृणोति विज्ञाय चार्थ भते न कामात्। नासम्पृष्टो व्युपयुङ्क्ते परार्थे तत् प्रज्ञानं प्रथमं पण्डितस्य ॥4

 भावार्थ :

ज्ञानी लोग किसी भी विषय को शीघ्र समझ लेते हैं, लेकिन उसे धैर्यपूर्वक देर तक सुनते रहते हैं । किसी भी कार्य को कर्तव्य समझकर करते है, कामना समझकर नहीं और व्यर्थ किसी के विषय में बात नहीं करते ।

आत्मज्ञानं समारम्भः तितिक्षा धर्मनित्यता । यमर्थान्नापकर्षन्ति स वै पण्डित उच्यते ॥5

 भावार्थ :

जो अपने योग्यता से भली-भाँति परिचित हो और उसी के अनुसार कल्याणकारी कार्य करता हो, जिसमें दुःख सहने की शक्ति हो, जो विपरीत स्थिति में भी धर्म-पथ से विमुख नहीं होता, ऐसा व्यक्ति ही सच्चा ज्ञानी कहलाता है ।

यस्य कृत्यं न जानन्ति मन्त्रं वा मन्त्रितं परे। कृतमेवास्य जानन्ति स वै पण्डित उच्यते ॥6

 भावार्थ :

दूसरे लोग जिसके कार्य, व्यवहार, गोपनीयता, सलाह और विचार को कार्य पूरा हो जाने के बाद ही जान पाते हैं, वही व्यक्ति ज्ञानी कहलाता है ।

यथाशक्ति चिकीर्षन्ति यथाशक्ति च कुर्वते। न किञ्चिदवमन्यन्ते नराः पण्डितबुद्धयः ॥7

 भावार्थ :

विवेकशील और बुद्धिमान व्यक्ति सदैव ये चेष्ठा करते हैं की वे यथाशक्ति कार्य करें और वे वैसा करते भी हैं तथा किसी वस्तु को तुच्छ समझकर उसकी उपेक्षा नहीं करते, वे ही सच्चे ज्ञानी हैं ।

नाप्राप्यमभिवाञ्छन्ति नष्टं नेच्छन्ति शोचितुम् । आपत्सु च न मुह्यन्ति नराः पण्डितबुद्धयः ॥8

 भावार्थ :

जो व्यक्ति दुर्लभ वस्तु को पाने की इच्छा नहीं रखते, नाशवान वस्तु के विषय में शोक नहीं करते तथा विपत्ति आ पड़ने पर घबराते नहीं हैं, डटकर उसका सामना करते हैं, वही ज्ञानी हैं ।

निश्चित्वा यः प्रक्रमते नान्तर्वसति कर्मणः । अवन्ध्यकालो वश्यात्मा स वै पण्डित उच्यते ॥9

भावार्थ :

जो व्यक्ति किसी भी कार्य-व्यवहार को निश्चयपूर्वक आरंभ करता है, उसे बीच में नहीं रोकता, समय को बरबाद नहीं करता तथा अपने मन को नियंत्रण में रखता है, वही ज्ञानी है ।

आर्यकर्मणि रज्यन्ते भूतिकर्माणि कुर्वते। हितं च नाभ्यसूयन्ति पण्डिता भरतर्षभ ॥10

भावार्थ :

ज्ञानीजन श्रेष्ट कार्य करते हैं । कल्याणकारी व राज्य की उन्नति के कार्य करते हैं । ऐसे लोग अपने हितौषी मैं दोष नही निकालते ।

न हृष्यत्यात्मसम्माने नावमानेन तप्यते। गाङ्गो ह्रद ईवाक्षोभ्यो यः स पण्डित उच्यते ॥11

भावार्थ :

जो व्यक्ति न तो सम्मान पाकर अहंकार करता है और न अपमान से पीड़ित होता है । जो जलाशय की भाँति सदैव क्षोभरहित और शांत रहता है, वही ज्ञानी है।

प्रवृत्तवाक् विचित्रकथ ऊहवान् प्रतिभानवान्। आशु ग्रन्थस्य वक्ता च यः स पण्डित उच्यते ॥12

भावार्थ :

जो व्यक्ति बोलने की कला में निपुण हो, जिसकी वाणी लोगों को आकर्षित करे, जो किसी भी ग्रंथ की मूल बातों को शीघ्र ग्रहण करके बता सकता हो, जो तर्क-वितर्क में निपुण हो, वही ज्ञानी है ।

श्रुतं प्रज्ञानुगं यस्य प्रज्ञा चैव श्रुतानुगा। असम्भित्रायेमर्यादः पण्डिताख्यां लभेत सः ॥13

भावार्थ :

जो व्यक्ति गंथों-शास्त्रों से विद्या ग्रहण कर उसी के अनुरूप अपनी बुद्धि को ढलता है और अपनी बुद्धि का प्रयोग उसी प्राप्त विद्या के अनुरूप ही करता है तथा जो सज्जन पुरुषों की मर्यादा का कभी उल्लंघन नहीं करता, वही ज्ञानी है ।

अर्थम् महान्तमासाद्य विद्यामैश्वर्यमेव वा। विचरत्यसमुन्नद्धो य: स पंडित उच्यते ॥14

 भावार्थ :

जो व्यक्ति विपुल धन-संपत्ति, ज्ञान, ऐश्वर्य, श्री इत्यादि को पाकर भी अहंकार नहीं करता, वह ज्ञानी कहलाता है ।

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Nishevate prasani ninditani na sevte. anastikh shradhan eta panditalakshanam 1

gist :

Virtue, good deeds, faith and belief in God, sacrifice, charity, public welfare, etc., are all auspicious signs of a learned person.

Krodho Harshasch Darpasach Hree: Pillars of recognition. Yamarthan napakarshanti sa vai pandit uchyate 2

gist :

Those who are not attracted by the vices like anger, ego, misdeeds, over-zealousness, selfishness, arrogance, etc., are those who are truly knowledgeable.

Yasya krityam na vighnanti sheetamushnam bhayam ratih. 3

gist :

The person who does not get disturbed even in the circumstances of cold-heat, rich-poor, love-hatred etc.

Kshipram vijanati chiram shrunoti vijya chaartha bhate na kamat. Nasamprto Vyupayukte Parthee Tat Pragyanam Pratham Panditsya 4

gist :

Knowledgeable people understand any subject quickly, but keep patiently listening to it for a long time. Do any work considering it as a duty, not as a wish and do not talk about anyone in vain.

Self-knowledge Samarambh: Titiksha Dharmanityata. Yamarthannapakarshanti sa vai pandit uchyate 5

gist :

One who is well acquainted with his qualifications and does welfare work according to it, who has the power to bear sorrow, who does not deviate from the path of Dharma even in adverse situations, such a person is called a true Gnani.

Yasya krityam na jananti mantram va mantrait pare. Kritmevasya jananti sa vai pandit uchyate 6

gist :

Other people whose actions, behavior, secrecy, advice and thoughts come to know only after the work is completed, that person is called knowledgeable.

Chikirashanti as much as possible c kurvate. Na kinchidvamanyante naraha panditbuddhayah 7

gist :

Prudent and intelligent people always try to do whatever they can and they do so and do not neglect anything considering it insignificant, they are the true wise.

Naprapyambhivanchanti nishatam nechhanti shochitum. Apatsu ch na muhyanti naraha panditbuddhayah 8

gist :

The person who does not desire to have a rare thing, does not grieve about a perishable thing and does not panic when adversity strikes, faces it boldly, he is the wise.

Nishva yaha prakramate nantravasati karmanah. Avandhyakalo vashyatma sa vai pandit uchyate 9

gist :

The person who initiates any work-behavior with determination, does not stop it in the middle, does not waste time and keeps his mind under control, he is knowledgeable.

Aryakarmani Rajyante Bhutikarmani Kurvate. Hitam Cha Nabhyasuyanti Pandita Bharatarshabha 10

gist :

The wise men do great work. They work for welfare and progress of the state. Such people do not blame my own benefactors.

Na hrishyatyatma samne ne navamanen tapyate. Gango hrad evakshobhyo yaha sa pandit uchyate 11

gist :

The person who neither gets arrogance by getting respect nor suffers from humiliation. The one who is always calm and peaceful like a reservoir is the one who is knowledgeable.

Pravritvak Vichitrakatha Uhvaan Pratibhavanvan. Ashu Granthsya speaker chaya s pandit uchyate 12

gist :

A person who is adept in the art of speaking, whose speech attracts people, who can quickly grasp the basics of any book, and who is adept in reasoning, is a wise person.

Shrutam Pragyanugam Yasya Pragya Chaiva Shrutanuga. Asambhitraye Maryadah Panditakhayam Labhet Sah 13

gist :

The person who takes knowledge from the scriptures and molds his intellect accordingly and uses his intellect according to the knowledge acquired by him and who never violates the dignity of gentlemen, he is wise.