Shri Mahalakshmi Panchakam

Shri Mahalakshmi Panchakam

Shri Mahalakshmi Panchakam

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Posted by admin - May 7, 2018 at 2:22 pm

Categories: Stotra   Tags:

Need help – stuck after installing opencart

Questions:

Hi, I am really a newb to opencart CMS. I installed opencart according to the instruction given in the opencart installation documentation. I visit the url – yourdomain.com/admin and fill my login details. Then I get the “upgrade” page with the following instructions. There are two options on the right corner – upgrade and finished.

When I login am on the upgrade page though I have installed the latest version of opencart –

Follow these steps carefully!

Post any upgrade script errors problems in the forums
After upgrade, clear any cookies in your browser to avoid getting token errors.
Load the admin page & press Ctrl+F5 twice to force the browser to update the css changes.
Goto Admin -> Users -> User Groups and Edit the Top Adminstrator group. Check All boxes.
Goto Admin and Edit the main System Settings. Update all fields and click save, even if nothing changed.
Load the store front & press Ctrl+F5 twice to force the browser to update the css changes.

Then I click the continue button at the bottom and it goes to “Finished” where I can get two options either to go to admin dashboard and other to front ” online shop’ , then I click on admin dashboard or ” Login to your Administration” option and

I am being redirected to upgrade page. Please help what’s the problem as I am not able to login to the admin dashboard.

Please help.

Thanks

 

 


Answer:

Just for kicks try going instead to the store, then clearing all of your cookies, then going back at the admin log-in screen. Presumably the installer will see that you exited.

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Posted by admin - April 15, 2018 at 3:59 pm

Categories: Articles   Tags:

किस माह में हुआ है आपके बच्चे का जन्म, इससे जानिए उसके बारे में रोचक बातें

किस माह में हुआ है आपके बच्चे का जन्म, इससे जानिए उसके बारे में रोचक बातें

बर्थ मंथ के रहस्य
पैरेंट्स अपने बच्चों के बारे में जानने के लिए हरदम इच्छुक होते हैं। उन्हें क्या पसंद है, क्या नहीं, किस तरह से उनकी सही परवरिश हो, इन बातों पर गौर करते रहते हैं। तो चलिए आज हम आपको आपके बच्चे के बारे में रोचक जानकारी देंगे। ये जानकारी उनके जन्म के माह से संबंधित है। विशेषज्ञों ने विभिन्न शोध के बाद यह बताया है कि एक बच्चे का जिस महीने में जन्म होता है, उसका उस पर विशेष प्रभाव पड़ता है। यह महीना उसके स्वभाव को निर्धारित करता है, उसकी पसंद-नापसंद इसी से संचालित होती है। तो देर किस बात की… आगे की स्लाइड्स में जानिए आपके बच्चे का बर्थ मंथ उसके बारे में क्या कहता है।

जनवरी बेबीज
अगर आपके बच्चे का जन्म जनवरी के महीने में हुआ है, तो आपको उसके भविष्य की चिंता करना छोड़ देना चाहिए। क्योंकि ये बच्चे अपने भविष्य को एक सफल आकार देने में सक्षम होते हैं। आप बस देखते रह जाएंगे और ये सफलता की सीढ़ियां चढ़ जाएंगे। जनवरी में जन्मे बच्चे स्मार्ट होते हैं, ये हैंडसम बच्चे कहलाते हैं। अपने भविष्य को लेकर गंभीर होते हैं लेकिन साथ ही स्वभाव से हंसमुख भी होते हैं, मगर थोड़ी ही देर में बोर हो जाते हैं। जनवरी में जन्मे बच्चे जिद्दी और अड़ियल भी होते हैं, अगर कोई काम करना पसंद नहीं करते तो इन्हें मनाना असंभव सी बात है।

फरवरी बेबीज
दिल की सुनते हैं, दिल की करते हैं, किसी के कहे पर नहीं चलते… बस ऐसे ही होते हैं फरवरी में जन्मे बच्चे। ये जैसे हैं, वैसे ही आपके सामने रहेंगे, बनावटी बनना इन्हें आता नहीं, दिल इनका शीशे की तरह साफ होता है और दूसरों से भी ऐसी ही अपेक्षा रखते हैं। नई चीजें सीखने में काफी तेज होते हैं ये बच्चे। इमोशनल होते हैं और कोई भी बात इनके दिल को जल्दी छू जाती है। भावनाओं की बाड़ होती है इनके अंदर, इसलिए तुरंत गुस्सा हो जाते हैं और फिर इन्हें कंट्रोल करना मुश्किल होता है।

मार्च बेबीज
मार्च में जन्मे बच्चों की सबसे बड़ी बात, ये काफी भावात्मक होते हैं। इसलिए इनका इनके अभिभावकों को अधिक ध्यान रखना चाहिए। छोटी-छोटी बातें इनके दिल को छू जाती हैं। रिश्तों से जुड़ी भावनाएं क्या होती हैं, इन्हें ये बचपन में ही सीख जाते हैं। लेकिन स्वभाव की बात करें तो मार्च में जन्मे बच्चे सबको प्यार करने वाले होते हैं। लोग अपने आप इनकी ओर आकर्षित होने लगते हैं। आप इन बच्चों पर आंख बंद करके भरोसा कर सकते हैं, ये दिल के साफ होते हैं और झूठ बोलना इनकी आदत नहीं होती।

अप्रैल बेबीज
निडर होकर जीना, अप्रैल में जन्मे बच्चों की एक खासियत है। जो मन में आ गया, बस वो करके दिखाना है। इनकी इस बात पर कई बार इनके माता-पिता परेशानी में आ जाते हैं। ये बच्चे एक जगह शांति से नहीं बैठते, हर समय हरकत में रहना इनकी आदत होती है।
लेकिन अप्रैल में जन्मे बच्चे स्वभाव के निराले होते हैं, अगर समझाया जाए, तो बात जल्दी समझ जाते हैं। भरोसे के लायक होते हैं, शरारती होते हैं लेकिन शांतिपूर्वक बात मान भी जाते हैं। ये बच्चे सकारात्म्क मानसिकता वाले होते हैं और यही कारण है कि ये जीवन में सफल बनते हैं।

मई बेबीज
इन बच्चों की चिंता माता-पिता को छोड़ देनी चाहिए, क्योंकि ये अपना ही नहीं, दूसरों का ख्याल रखना भी जानते हैं। भावनात्मक, संवेदनशील एवं साथ ही भरोसेमंद होते हैं ये बच्चे। लेकिन इसके चलते इन्हें बोरिंग ना समझें, इन्हें धूमना-फिरना, मौज-मस्ती करना बेहद पसंद है। संगीत और नाच-गाना, दोनों का शौक रखते हैं ये बच्चे। दूसरों का आकर्षण खींच सकते हैं और उनके लिए आकर्षण का केंद्र बने रहना भी इन्हें पसंद है। स्वभाव के जिद्दी होते हैं, जब अपनी जिद्द पर आ जाएं तो फिर किसी की नहीं सुनते।

जून बेबीज
बहुत बोलते हैं ये बच्चे और दिमाग तो इनका घोड़े की तरह दौड़ता है। अगर आप इन्हें मौका दें, तो ये अपने शब्दों से किसी का भी दिल जीत सकते हैं। बड़े होकर ऐसे ही बच्चे बेस्ट सेल्समैन एवं प्रवक्ता बन सकते हैं। एक ही समय पर कई काम कर सकते हैं और जल्दी बोर भी नहीं होते। दोस्त बनाना, उनसे गपशप करते रहना इन्हें पसंद है। दुनिया की सैर करना इन्हें पसंद है। ये हरपल लोगों का मनोरंजन करने के लिए तैयार रहते हैं, लेकिन अगर ये किसी काम से बोर हो रहे हैं तो इनकी बोरियत गुस्से में तब्दील होकर दिखाई देती है।

जुलाई बेबीज
क्या आपने अपने आस-पड़ोस में ऐसे बच्चे देखे हैं जो राह चलते बच्चों को दोस्त बना लेते हैं, गली में घूम रहे जानवरों को उठाकर घर ले आते हैं, उन्हें पालने का विचार बना लेते हैं। जुलाई में जन्मे बच्चे बस ऐसे ही होते हैं। इन्हें जानवरों से बेहर प्यार होता है। अगर जानवर ना मिलें, तो गुड्डे-गुड़ियों से अपना दिल बहला लेते हैं। लेकिन इनके व्यवहार की बात करें तो मन के सच्चे होते हैं। इन्हें बड़ों का खूब प्यार मिलता है। अधिक नहीं बोलते, लेकिन संगत अपने अनुसार मिलने पर इनकी शरारती हरकतें सामने आने लगती हैं।

अगस्त बेबीज
खुद को किसी राजा-महाराज की संतान समझते हैं ये बच्चे। ये इनका निगेटिव नहीं, पॉजिटिव प्वाइंट ही है। इन बच्चों को कम चीजों में गुजारा करना नहीं पसंद। अपने अनुसार वातावरण पसंद करते हैं। जिद्दी होते हैं और चाहते हैं कि लोग इनकी ही सुनें। अगर इनकी तारीफ करो तो बेहद खुश होते हैं। ऐसे लोगों के साथ ही इनकी अधिक बनती है जो इन्हें पसंद करते हैं। ये बच्चे तेज होते हैं, जल्दी चीजें समझते हैं और अच्छा रिजल्ट देते हैं। जहां दिमाग अधिक लगता है, उन एक्टिविटीज में ज्यादा रुचि लेते हैं।

सितंबर बेबीज
ये हैं परफेक्ट बच्चे… जी हां अगर आपके बच्चे को जन्म सितंबर के महीने का है तो यह मान लीजिए कि आपका बच्चा हर रूप से सर्वश्रेष्ठ है। अपनी चीजों को खुद समेटना, उनका ध्यान रखना, इन बच्चों के खिलौने कभी आप बाहर बिखरे नहीं देखेंगे। सबसे अच्छे-से बात करना, पढ़ाई में भी अच्छे होते हैं ये बच्चे। इनका दिमाग बहुत तेजी से चलता है। हर काम में आगे रहते हैं, फिर वह स्कूल की कोई एक्टिविटी हो या फिर घर का ही कोई काम। आकर्षक, प्यारे लेकिन कभी-कभी जिद्दी भी होते हैं ये बच्चे।

अक्टूबर बेबीज
अगर आपके बच्चे का जन्म अक्टूबर महीने का है, तो आप भाग्यशाली पैरेंट्स हैं। ये समझदार बच्चे होते हैं, इनकी बोली मीठी होती है और ये आसानी से हर किसी को आकर्षित कर लेते हैं। ये बच्चे बड़े होकर कलाकार बनते हैं। बातें करना इन्हें पसंद हैं, आप इनके माता-पिता हैं तो ये आपसे हर पल बातें करने के लिए उत्सुक रहते होंगे। अपने सपनों में खोए रहते हैं, इन्हें कोई भी बात जल्दी चुभ जाती है, जल्दी भावुक हो जाते हैं।

नवंबर बेबीज
अपने लक्ष्य को कैसे प्राप्त करना है, ये इनसे बेहतर कोई नहीं जानता। अगर आपके बच्चे का जन्म नवंबर महीने का है, तो आपका बच्चा वाकई तेज-तर्रार है। अगर एक बार इनके दिमाग में कोई लक्ष्य बैठा दिया जाए, तो ये उसे जीत कर ही चैन की सांस लेते हैं। भरोसेमंद और हर किसी के अच्छे दोस्त बनते हैं। दिल के साफ होते हैं ये बच्चे। सबको प्यार से बुलाते हैं, तहज़ीब से बात करते हैं। ऐसे बच्चे बड़े होकर अच्छे पार्टनर सिद्ध होते हैं। इन्हें आप भविष्य में एक रोमांटिक पार्टनर के रूप में देख पाएंगे।

दिसंबर बेबीज
नवंबर बेबीज की तरह ही, दिसंबर में जन्म वाले लोग भी अपने लक्ष्य को लेकर गंभीर रहते हैं। उत्साह, उमंग और खुशहाली से भरे होते हैं ये बच्चे। इन्हें ‘सच्चाई’ पसंद है और उसे दुनिया के सामने लाने के लिए कुछ भी कर जाएंगे। ये सच्चे देशभक्त बनते हैं, संस्कारों और रीति-रिवाजों में विश्वास रखने वाले होते हैं। ये बच्चे भावुक होते हैं, छोटी-छोटी बातें दिल को लगा लेते हैं। लेकिन समझाने पर उस जख़्म को आसानी से भर भी लेते हैं।

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Posted by admin - April 9, 2018 at 10:16 am

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जानिए क्या है माथे पर तिलक धारण करने का सही नियम

 

1 परंपराएं
हिन्दू धर्म में कुछ ऐसी परंपराएं हैं जिनका महत्व तो बहुत है, लेकिन समय के साथ-साथ वह धूमिल पड़ती जा रही हैं।

2 आधुनिकता और चकाचौंध
सिर पर चोटी रखना, पांव में बिछिया पहनना, कान छिदवाना आदि। लेकिन जैसे-जैसे हम आधुनिकता और चकाचौंध की तरफ बढ़ रहे हैं ये सभी परंपराएं पीछे छूटती जा रही हैं।

3 तिलक धारण करना
इन्हीं परंपराओं में से एक है माथे पर तिलक धारण करना, जिसे एक समय पहले तक धार्मिक तौर पर बहुत जरूरी माना जाता था।

4 लाभ
यूं तो आजकल तिलक धारण करना कम ही देखा जाता है, लेकिन इसका लाभ बहुत अधिक है बशर्ते सही तरीके से नियमानुसार धारण किया हो तो।

5 12 स्थानों पर तिलक
हिन्दू परंपराओं में सिर, मस्तक, गले, हृदय, दोनों बाजू, नाभि, पीठ, दोनों बगल आदि मिलाकर शरीर के कुल 12 स्थानों पर तिलक लगाने का विधान है।

6 शास्त्र
हमारे शास्त्रों में जीवन जीने के सही तरीकों का वर्णन किया गया है, संबंधों, शिष्टाचार और परंपराओं को बड़ी बारीकी के साथ उकेरा गया है। चलिए जानते हैं हमारे शास्त्र तिलक लगाने को लेकर क्या कहते हैं।

7 हनुमान जी
जब भी हम मंदिर जाते हैं तो हनुमान जी, देवी मां के चरणों से सिंदूर लेकर माथे पर लगाते हैं। ऐसा करना बहुत लाभदायक है क्योंकि सिंदूर उष्ण होता है।

8 कस्तूरी रंग
शास्त्रों के अनुसार महिलाओं को अपने माथे पर कस्तूरी रंग की बिंदी अथवा सिंदूर लगाना चाहिए।

9 उत्तर दिशा
शास्त्रों के अनुसार सिंदूर धारण करने से पहले कुछ बातों का ध्यान अवश्य रखना चाहिए जैसे नहा धोकर वस्त्र धारण करने के पश्चात उत्तर दिशा की ओर मुख करके माथे पर तिलक लगाया जाना चाहिए।

10 संध्या का हवन
ऐसा कहा गया है कि श्वेत चंदन, लाल चंदन, कुमकुम, विल्वपत्र, भस्म, आदि का तिलक करना शुभ है। जो भी व्यक्ति बिना तिलक लगाए भोर या संध्या का हवन करता है उसे इसका फल नहीं प्राप्त होता।

11 मुख्य नियम
तिलक लगाने का एक और मुख्य नियम यह है कि एक ही व्यक्ति या साधक को उर्ध्व पुण्डर और भस्म से त्रिपुंड नहीं लगाना चाहिए।

12 भस्म से त्रिपुंड
चंदन से एक ही साधक को उर्ध्व पुण्डर तथा भस्म से त्रिपुंड नहीं लगाना चाहिए।

13 ललाट बिंदु
माथे के ठीक बीच के हिस्से को ललाट बिंदु कहते हैं, यह भौहों का भी मध्य भाग है। तिलक हमेशा इसी स्थान पर धारण किया जाना चाहिए।

14 भिन्न-भिन्न अंगुलियां
तिलक लगाने के लिए भिन्न-भिन्न अंगुलियां का प्रयोग अलग-अलग फल प्रदान करता है। अगर तिलक अनामिका अंगुली से लगाया जाता है तो इससे शांति मिलती है।

15 मध्यमा अंगुली
मध्यमा अंगुली से तिलक करने पर आयु में बढ़ोत्तरी होती है, इसके अलावा अंगूठे से तिलक करना पुष्टिदायक माना गया है।

16 विष्णु संहिता
विष्णु संहिता में इस बात का उल्लेख है कि किस प्रकार के कार्य में किस अंगुली से तिलक लगाना उचित होता है।

17 वैदिक कार्य
किसी भी तरह के शुभ और वैदिक कार्य में अनामिका अंगुली, पितृ कार्य में मध्यमा, ऋषि कार्य में कनिष्ठिका तथा तांत्रिक क्रियाओं में प्रथम यानि तर्जनी अंगुली का प्रयोग किया जाना चाहिए।

18 विधान
उपरोक्त विधान हिन्दू रीति-रिवाजों से संबंधित हैं, इनका सही पालन जीवन को सहज बना देता है।

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Posted by admin - April 5, 2018 at 5:50 pm

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Baba Balak Nath Chalisa Lyrics

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Posted by admin - April 5, 2018 at 12:57 pm

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Baba Balak Nath Aarti

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Posted by admin - April 5, 2018 at 12:44 pm

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Old weapons names and pictures – Part 3

इस्रायलची नेगेव्ह मशीनगन

इस्रायलच्या संरक्षण उद्योगाने विकसित केलेल्या शस्त्रांमध्ये नेगेव्ह लाइट मशीनगनचा क्रमांकही वरचा आहे. आधुनिक काळातील प्रगत शस्त्रांमध्ये नगेव्हचा समावेश होतो.

इस्रायली वेपन इंडस्ट्रीजने (आयडब्ल्यूआय) १९९०च्या दशकात गलिल रायफलच्या पुढील आवृत्ती विकसित करण्यास सुरुवात केली. त्यातून नेगेव्ह मशीनगन आकारास आली. या बंदुकीची मूळ आवृत्ती नॉर्थ अटलांटिक ट्रिटी ऑर्गनायझेशनच्या (नाटो) सैन्याकडून वापरण्यात येणाऱ्या ५.५६ मिमी व्यासाच्या आणि ४५ मिमी लांबीच्या गोळ्या वापरण्यासाठी तयार केली होती. नंतर तिची ७.६२ मिमी व्यासाच्या गोळ्या झाडणारी नेगेव्ह एनजी ७ ही आवृत्तीही बनवली गेली. मूळ बंदूक लाइट मशीनगन या प्रकारातील होती. पण तिच्या जनरल पर्पज मशीनगन, हेलिकॉप्टरवर आणि जीपवर बसवता येणारी आणि नौदलातर्फे वापरता येणारी मशीनगन अशा आवृत्तीही तयार करण्यात आल्या. मूळ नेगेव्ह लाइट मशीनगन इस्रायली सैन्याने १९९७ साली स्वीकारली. तर २०१२ साली नेगेव्ह एनजी ७ ही इस्रायली सैन्याची स्टँडर्ड जनरल पर्पज मशीनगन म्हणून स्वीकारण्यात आली.

नेगेव्ह लाइट मशीनगनचे वजन साधारण साडेसात किलोग्रॅम असून ती जगातील सर्वात कमी वजनाची लाइट मशीनगन असल्याचे मानले जाते. तसेच या वर्गवारीत सेमी-ऑटोमॅटिक आणि फुल-ऑटोमॅटिक पद्धतीने गोळ्या झाडण्याची क्षमता प्रदान करणारी ही एकमेव बंदूक आहे. नेगेव्ह सेमी-ऑटोमॅटिक प्रकारे वापरली तर कमी अंतरावरील लढायांमध्ये (क्लोझ क्वार्टर बॅटल) ती अधिक प्रभावी ठरते. तसेच फुल-ऑटोमॅटिक प्रकारे वापरल्यास शत्रूला थोपवण्याची प्रभावी क्षमता (स्टॉपिंग फायरपॉवर) प्रदान करते. नेगेव्ह एका मिनिटात ८५० ते १०५० गोळ्या साधारण १००० मीटर अंतरापर्यंत झाडू शकते. तिच्या ७.६२ मिमीच्या गोळ्या हलके चिलखत आणि बिनकाँक्रीटच्या भिंतीही भेदू शकतात. ही बंदूक हातात उचलून असॉल्ट रायफलप्रमाणेही वापरता येते.

नेगेव्हची उत्कृष्ट टार्गेट अक्विझिशन प्रणाली तिची अचूकता वाढवण्यास मदत करते. सामान्यत: मशीनगन मोठय़ा प्रमाणात गोळ्या झाडत असल्याने त्यांचे बॅरल तापते आणि वरचेवर बदलावे लागते. नेगेव्हच्या बाबतीत हे काम एका हाताने, काही क्षणांत करता येते. या बंदुकीत धूळ, मातीपासून संरक्षणासाठी खास सोय आहे. अनेक भाग क्रोमियमचा मुलामा असलेले आहेत. त्यामुळे कोणत्याही हवामानात आणि पाणी, चिखलमाती आदी असतानाही ती तितक्याच खात्रीलायकपणे वापरता येते. तिचा दस्ता व अन्य भाग सैनिकांच्या शारीरिक रचनेनुसार जुळवून घेता येतात. त्यामुळे ती अधिकच प्रभावी बनते.

भारतीय लष्करानेही या बंदुका काही प्रमाणात घेतल्या असून त्यांचे भारतात उत्पादन करण्यासाठी प्रयत्न सुरू आहेत.

जर्मन एमजी ३ मशीनगन

दुसऱ्या महायुद्धानंतर मशीनगन या शस्त्रप्रकारात काही बदल येऊ घातले. तत्पूर्वी लाइट, मिडियम आणि हेवी असे मशीनगनचे साधारण प्रकार असत आणि आजही ते अस्तित्वात आहेत. पण या सर्व प्रकारांचे काम करणारी, तसेच हेलिकॉप्टर आणि जीपवर बसवता येणारी सर्वसमावेशक मशीनगन विकसित करण्याचे प्रयत्न होऊ लागले. त्यातून जनरल पर्पज मशीनगन (जीपीएमजी) तयार झाली. मूळ शस्त्रात थोडेफार बदल करून ते विविध कामांसाठी वापरता येते. या प्रकारात जर्मन ऱ्हाइनमेटल कंपनीची एमजी-३ ही मशीनगन विशेष गाजली. १९६० च्या दशकात तयार झालेली मशीनगन शीतयुद्धाच्या काळात युरोपसह अन्य ३० देशांच्या लष्कराने वापरली आणि काही देशांत ती आजही वापरात आहे. इटली, स्पेन, पाकिस्तान, ग्रीस, इराण, सुदान आणि तुर्कस्तान या देशांत तिची निर्मितीही होते.

एमजी-३ मशीनगनचे मूळ दुसऱ्या महायुद्धात जर्मनीत वापरात असलेल्या एमजी ४२ या मशीगनमध्ये आहे. दुसऱ्या महायुद्धानंतर जर्मनीची पूर्व आणि पश्चिम जर्मनीत विभागणी झाली आणि पश्चिम जर्मनीच्या सैन्याला नव्या मशीनगनची गरज भासू लागली. त्यातून एमजी- ३ मशीनगन आकारास आली. तिच्यामध्ये नॉर्थ अटलांटिक ट्रिटी ऑर्गनायझेशन (नाटो) संघटनेच्या सैन्यातर्फे वापरण्यात येणाऱ्या ७.६२ मिमी व्यासाच्या गोळ्या वापरल्या जातात. त्या बेल्टने मशीनगनमध्ये भरल्या जातात. एमजी-३ मिनिटाला ७०० ते १३०० च्या वेगाने साधारण १२०० मीटर अंतरापर्यंत गोळ्या झाडू शकते. मशीनगन दोन किंवा तीन पायांच्या स्टँडवर बसवली असता तिच्या पल्ल्यात थोडा फरक पडतो. तो वाढवता येतो. एमजी-३ चे बॅरल क्रोमियमचे आवरण असलेले असते. त्यामुळे त्याची झीज तर कमी होतेच शिवाय ते कमी तापते. त्यामुळे अधिक वापरानंतर बॅरल बदलणे सोपे जाते.

महत्त्वाच्या बातम्या
आता ‘न्यूड सीन’ शिवाय गत्यंतर नाहीआता ‘न्यूड सीन’ शिवाय गत्यंतर नाहीआरबीआयपेक्षा तिरूपती देवस्थानात वेगाने पैसे मोजले जातात: पी. चिदंबरमआरबीआयपेक्षा तिरूपती देवस्थानात वेगाने पैसे मोजले जातात: पी. चिदंबरमफुलांची परडीफुलांची परडी‘मला वाटलं’‘मला वाटलं’कथा : हरवलेला महाराष्ट्रकथा : हरवलेला महाराष्ट्रआता ‘न्यूड सीन’ शिवाय गत्यंतर नाहीआता ‘न्यूड सीन’ शिवाय गत्यंतर नाहीआरबीआयपेक्षा तिरूपती देवस्थानात वेगाने पैसे मोजले जातात: पी. चिदंबरमआरबीआयपेक्षा तिरूपती देवस्थानात वेगाने पैसे मोजले जातात: पी. चिदंबरमफुलांची परडीफुलांची परडी‘मला वाटलं’‘मला वाटलं’
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बंदुकीच्या बॅरलच्या टोकाला असलेले उपकरण मझल ब्रेक, फ्लॅश सप्रेसर आणि मझल बुस्टर म्हणून काम करते. त्यामुळे बंदुकीचा मागे बसणारा धक्का कमी होतो, गोळ्या झाडताना बॅरल वर उचलले जाण्याचा परिणाम कमी होतो आणि बाहेर पडणारे गरम वायू आणि आग नियंत्रणात राहते. त्यामुळे बंदुकीची अचूकता वाढण्यास मदत होते.

एमजी-३ मशीनगनचा वापर जर्मनीशिवाय नाटो संघटनेतील आणि अन्य देशांनीही केला. या मशीनगनचा वापर इराण-इराक युद्ध, इराक, अफगाणिस्तान, सीरिया, लेबॅनन, येमेन येथील संघर्षांमध्येही झाला. पाकिस्तानने त्यांच्या वायव्य सरहद्द प्रांतातीत दहशतवाद्यांविरोधी मोहिमेतही या मशीनगनचा वापर केला. जर्मन उत्पादनातील दर्जा एमजी-३ मशीनगनमध्येही अनुभवण्यास मिळतो. याच काळात अमेरिकेने एम-६० ही जनरल पर्पज मशीनगन उपयोगात आणली. पण तिच्यात अनेक त्रुटी असल्याने ती एमजी-३ इतकी प्रभावी ठरली नाही.

स्टर्लिंग कार्बाइन

दुसऱ्या महायुद्धाच्या उत्तरार्धात ब्रिटनने घाईगडबडीत, मिळेल त्या साधनांनिशी तयार केलेल्या स्टेन गनने वेळ मारून नेली होती. पण महायुद्ध संपल्यानंतर स्टेन गनच्या जागी नवी चांगली सब-मशीनगन किंवा कार्बाइन तयार करण्याची गरज भासू लागली. त्यातून स्टर्लिग सब-मशीनगन किंवा कार्बाइन तयार झाली. तिने साधारण १९९० च्या दशकापर्यंत ब्रिटिश लष्कराची साथ केली. त्यानंतर स्टर्लिंग कार्बाइनची जागा एल ८५ ए १ असॉल्ट रायफलने घेतली. या संपूर्ण कालावधीत स्टर्लिग कार्बाइनने चांगली सेवा दिली.

ब्रिटिश लष्कराने १९४४ च्या दरम्यान नव्या सब-मशीनगनसाठी निकष जाहीर केले. नवी बंदूक सहा पौंड (२.७ किलोग्रॅम) पेक्षा कमी वजनाची असली पाहिजे, तिच्यातून ९ मिमी व्यासाच्या आणि १९ मिमी लांबीच्या पॅराबेलम गोळ्या झाडता आल्या पाहिजेत, गोळ्या झाडण्याचा वेग मिनिटाला किमान ५०० असला पाहिजे आणि १०० यार्डावरून गोळ्या झाडल्या तर त्या लक्ष्यावर किमान १ चौरस फुटाच्या आत लागल्या पाहिजेत असे निकष घालून देण्यात आले. त्यावर आधारित बंदुकांची डिझाइन विकसित करून तपासण्यात आली.

दागेनहॅम येथील स्टर्लिग आर्मामेंट्स कंपनीचे मुख्य डिझायनर जॉर्ज विल्यम पॅशेट यांनी डिझाइन केलेली बंदूक या निकषांचे बऱ्याच प्रमाणात पालन करत होती. ती बरीचशी स्टेन गनसारखीच दिसत असली तरी त्यात अनेक सुधारणा केलेल्या होत्या. युद्धाच्या अखेरीस त्याची काही प्रारूपे तयार करून ती वापरून पाहण्यात आली. त्याने ब्रिटिश लष्कराचे समाधान झाले. त्यानंतर १९५१ च्या दरम्यान लष्कराने ही नवी बंदूक स्वीकारण्याची तयारी दाखवली आणि १९५३ साली ती बंदूक स्टर्लिग सब-मशीनगन एल २ ए १ या नावाने स्वीकारण्यात आली.

या नव्या बंदुकीतही बाजूने बसवले जाणारे मॅगझिन होते. बंदुकीच्या बॅरलवर धातूचे जाळीदार आवरण होते. धूळ आणि मातीपासून संरक्षण करण्यासाठी खास सोय होती. तसेच पुढे संगीन लावण्याचीही सोय होती. सब-मशीनगनला संगीन बसवणे ही तशी विशेष बाब होती. स्टर्लिगच्या मॅगझिनमध्ये ३२ गोळ्या मावत आणि ती मिनिटाला ५५० च्या वेगाने गोळ्या झाडू शकत असे. तिचा पल्ला २०० मीटर होता.

ब्रिटनसह अन्य देशांनीही स्टर्लिग कार्बाइनचा वापर केला. अरब-इस्रायलमधील १९५६ चे सुएझचे युद्ध, व्हिएतनाम युद्ध, ब्रिटन आणि अर्जेटिना यांच्यातील १९८२ सालचे फॉकलंड युद्ध आदी युद्धांमध्ये तिचा वापर झाला. १९९१ साली सद्दम हुसेनच्या इराकने बळकावलेल्या कुवेतच्या मुक्ततेसाठी बहुराष्ट्रीय फौजांनी केलेल्या कारवाईत ब्रिटनच्या वतीने स्टर्लिग कार्बाइनच्या अखेरच्या बॅचचा वापर केला गेला. भारतानेही स्टर्लिग कार्बाइन स्वीकारली होती आणि भारतात तिचे परवान्याने उत्पादनही होत होते. मात्र २०१० साली भारताने तिचा वापर बंद केला. आता स्टर्लिग कार्बाइनच्या जागी नव्या कार्बाइन घेण्यासाठी भारतीय लष्कराने पुन्हा खरेदी प्रक्रिया सुरू केली आहे.

इस्रायलची गलिल असॉल्ट रायफल

इस्रायली सैन्यदलांचा भर १९५० आणि १९६०च्या दशकात प्रामुख्याने उझी सब-मशीनगन आणि बेल्जियमच्या एफएन-एफएएल किंवा सेल्फ लोडिंग रायफलवर होता. पण या दोन्ही बंदुकांच्या काही मर्यादा होत्या. उझी ही सब-मशिनगन प्रकारात मोडत असल्याने तिचा पल्ला कमी म्हणजे २०० मीटरच्या आसपास होता. त्यापेक्षा जास्त अंतरासाठी एफएन-एफएएल रायफल वापरता येत होती. पण ती वाळवंटातील धूळ आणि मातीप्रति खूप संवेदनशील होती. इस्रायली सैन्यदलांना वाळवंटातील वातावरणात निर्वेधपणे काम करू शकणारी आणि अधिक दूपर्यंत मारा करू शकणारी बंदूक हवी होती. या गरजेतून इस्रायलची गलिल असॉल्ट रायफल आकारास आली.

इस्रायलच्या सैन्यदलांनी १९६०च्या दशकात नव्या रायफलसाठी पर्याय शोधण्यास सुरुवात केली. त्यातील एक रायफल उझी सब-मशीनगनचे डिझायनर उजीएल गाल यांनी डिझाइन केली होती. तर दुसरी इस्रायली मिलिटरी इंडस्ट्रीजचे प्रमुख शस्त्रास्त्र डिझायनर इस्रायल गलिली यांनी डिझाइन केली होती. गलिली यांची रायफल फिनलंडच्या वाल्मेट आरके ६२ असॉल्ट रायफलवर आधारित होती. आणि आरके ६२ रशियन एके-४७ वर आधारित होती. याशिवाय अमेरिकी एम १६ ए १, युजीन स्टोनर यांची स्टोनर ६३, जर्मनीची हेक्लर अ‍ॅण्ड कॉख ३३, तसेच रशियन एके-४७ या बंदुकांचाही विचार केला जात होता. अखेर १९७३ मध्ये इस्रायली सैन्यदलांनी गलिली यांच्या रायफलचा स्वीकार केला आणि तिला गलिल असे नाव दिले. मात्र १९७३ साली अरब आणि इस्रायल यांच्यात योम किप्पूरचे युद्ध उफाळले आणि गलिल सैन्याला मिळण्यास आणखी विलंब झाला. त्यामुळे इस्रायली सैन्याने गलिलचा प्रथम वापर केला तो १९८० च्या दशकातील लेबॅननमधील संघर्षांत.

गलिलमध्ये विविध असॉल्ट रायफलमधील उत्तम गुणांचा मिलाफ आहे. तिच्या गॅस आणि बोल्ट ऑपरेशन प्रणाली रशियन एके-४७ वर आधारित आहेत. गलिल मुख्यत्वे अमेरिकी ५.५६ मिमी व्यासाच्या गोळ्यांसाठी बनवली होती. पण तिच्या सुधारित आवृत्तीत ७.६२ मिमीच्या गोळ्याही वापरता येतात. गलिलला ३५ ते ५० गोळ्यांचे मॅगझिन बसते आणि ती मिनिटाला ६५०च्या वेगाने गोळ्या झाडू शकते. गलिलच्या एआर (स्टँडर्ड), एआरएम (लाइट मशिनगन), एसएआर (कार्बाइन) तसेच एमएआर (मायक्रो) अशा आवृत्तीही उपलब्ध आहेत. मायक्रो गलिल तिच्या लहान आकारामुळे कमांडो आणि चिलखती वाहनांमधील सैनिक वापरत. गॅलाट्झ ही आवृत्ती स्नायपर रायफल म्हणून वापरली जाते. मात्र गलिलचे वजन काहीसे अधिक म्हणजे ४ किलोच्या आसपास आहे. तरीही स्वदेशी रायफल म्हणून इस्रायलच्या सैनिकांनी ती आनंदाने स्वीकारली. तिच्या अनेक आवृत्ती मध्य अमेरिका, आफ्रिका आणि आशियाई देशांना निर्यातही झाल्या.

 

इस्रायलची उझी सब-मशीनगन

उझी सब-मशीनगन ही इस्रायलच्या सैन्यदलांकडून जगाला मिळालेली अमोघ देणगी आहे. चहुबाजूंनी अरब शत्रुराष्ट्रांनी घेरलेल्या चिमुकल्या इस्रायलची जीवनरेखा मजबूत करण्यात या बंदुकीचा मोठा हात आहे. तसेच जगातील सुमारे ९० देशांच्या सुरक्षादलांनी या बंदुकीचा स्वीकार केला आहे. भारतातही पंतप्रधानांना सुरक्षा प्रदान करणाऱ्या स्पेशल प्रोटेक्शन ग्रूपच्या (एसपीजी) कमांडोंकडून उझीच्या विविध अवतारांचा वापर होत होता.

शतकानुशतकांचा वनवास संपून अखेर १९४८ साली ज्यूंना इस्रायलच्या रूपात त्यांची हक्काची भूमी मिळाली. पण राष्ट्रनिर्मितीच्या दुसऱ्याच दिवशी शेजारी अरब देशांनी त्याच्या नरडीला नख लावण्याचा प्रयत्न केला. या संघर्षांवेळी इस्रायलकडे पुरेशी शस्त्रे नव्हती. मिळेल तेथून चोरूनमारून, नक्कल करून, किबुत्झमधील जमिनीखालील तळघरांत तयार केलेल्या शस्त्रांनिशी ज्यू स्त्री-पुरुषांनी प्रतिकार केला. त्यात जर्मन माऊझर, अमेरिकी टॉमी गन, ब्रिटिश स्टेन गन आदींचा समावेश होता. पण नंतर इतक्या शस्त्रांचा दारूगोळा जमवणे अवघड झाले. त्यामध्ये एकवाक्यता आणण्याची गरज होती. त्या गरजेपोटी इस्रायली सैन्यातील मेजर उझीएल गाल यांनी १९४० च्या दशकाच्या अखेरीस उझी ही सब-मशीनगन डिझाइन केली. तिचे पहिले प्रारूप १९५० च्या आसपास तयार झाले आणि प्रत्यक्ष उत्पादनास १९५४ मध्ये सुरुवात झाली. त्याच वेळी ती इस्रायली संरक्षण दलांनी स्वीकारली. सुरुवातीला आरिएल शेरॉन यांच्या नेतृत्वाखालील युनिट १०१ नावाच्या कमांडो पथकाने ती पॅलेस्टिनी हल्लेखोरांविरुद्ध वापरली. त्यानंतर १९५६ चे सुएझ युद्ध, १९६७ चे सहा दिवसांचे युद्ध (सिक्स डे वॉर) आणि १९७३ चे योम किप्पूर युद्ध यात उझीने इस्रायलच्या सेना दलांना खूप आधार दिला.

उझी सब-मशीनगनमध्ये दोन महत्त्वाच्या तंत्रांचा विकास साधला आहे. पहिले तंत्र म्हणजे रॅपअराउंड किंवा टेलिस्कोपिक बोल्ट. या प्रकारात रायफलचा बोल्ट बॅरलच्या मागील किंवा ब्रिचकडील भागाच्या भोवतीने एखाद्या दुर्बीण किंवा टेलिस्कोपप्रमाणे बसवलेला असतो. त्यामुळे बंदुकीची लांबी कमी करता येते. सब-मशीनगनसाठी ही बाब महत्त्वाची असते. त्याने बंदुकीचा समतोल पिस्टल ग्रिपभोवती साधता येतो आणि नेम धरण्याची क्षमता सुधारते. दुसरी बाब म्हणजे उझीचे मॅगझिन पिस्तूलप्रमाणे बंदुकीच्या ग्रिपमध्ये बसवता येते.

उझीच्या मॅगझिनमध्ये २५ ते ३२ गोळ्या मावतात. उझी मिनिटाला ६०० च्या वेगाने गोळ्या झाडू शकते. तरीही ती बऱ्यापैकी स्थिर असून तिचा धक्का (रिकॉइल) कमी आहे. त्यामुळे अचूकताही चांगली आहे. तसेच तिचा आकार लहान असल्याने ती खंदकांत आणि कमी जागेत फिरवून वापरता येते. त्यामुळे कमांडो पथकांची ती आवडती बंदूक आहे. वापरण्यास सोपी असल्याने इस्रायली संरक्षण दलांत भरती होणाऱ्या महिला सैनिकांना प्रथम उझी बंदूक चालवण्याचे प्रशिक्षण दिले जाते.

 

जर्मन हेक्लर अँड कॉख : जी ३ रायफल

दुसऱ्या महायुद्धानंतर निर्माण झालेल्या रायफलमध्ये जर्मन हेक्लर अँड कॉख जी-३ रायफलचे डिझाइन आणि गुणवत्ता बरीच उच्च होती. रशियाची एके-४७, अमेरिकेची एम-१६ या रायफलना जे स्थान मिळाले तेच जर्मन जी-३ रायफललाही आहे. जगातील साधारण ७५ देशांच्या सैन्याने त्या रायफलचा स्वीकार केला आणि बऱ्याच देशांत त्या रायफलची निर्मितीही होऊ लागली.

वास्तविक दुसऱ्या महायुद्धाच्या अखेरीस जर्मनीच्या माऊझर कारखान्यातील अभियंते सिलेक्टिव्ह फायर, मॅगझिन-लोडेड रायफलच्या डिझाइनवर काम करत होते. युद्धानंतर स्पेनमधील सीईटीएमई या कंपनीत ते डिझाइन अधिक विकसित करण्यात आले. त्यावर आधारित रायफलच्या उत्पादनाचे अधिकार जर्मनीने १९५९ साली विकत घेतले आणि जर्मनीतील हेक्लर अँड कॉख (एच अँड के) या नामांकित कंपनीकडे दिले. त्यानुसार या कंपनीने तयार केलेल्या रायफलला गेवेर ३ किंवा रायफल मॉडेल ३ म्हटले जाऊ लागले. त्यापेक्षा ती रायफल जी-३ नावानेच अधिक प्रसिद्ध झाली.

त्या काळात नावारूपास आलेल्या बेल्जियमच्या एफएन-एफएएल आणि अमेरिकेच्या एम-१४ रायफलच्या तुलनेत जी-३ तयार करण्यास कमी खर्च येत असे, कारण तिच्या निर्मितीत दबाव देऊन घडवलेले पोलाद (स्टँप्ड स्टील) वापरले होते. या बंदुकीत नॉर्थ अटलांटिक ट्रिटी ऑर्गनायझेशन (नाटो) देशांच्या सैन्याकडून वापरात येणाऱ्या ७.६२ मिमी व्यासाच्या गोळ्या वापरल्या जात. त्यात रोलर-डिलेड ब्लोबॅक अ‍ॅक्शन तंत्राचा वापर केला आहे.

या बंदुकीची रिअर साइट (नेम धरण्यासाठी वापरण्यात येणारी मागील खूण) ड्रमच्या आकाराची होती. ते या रायफलचे वेगळेपण होते. तिला सुरुवातीला लोखंडी साइट्स होत्या. नंतर डायॉप्टर प्रकारच्या रोटेटिंग साइट्स बसवण्यात आल्या. त्यावर १०० ते ४०० मीटपर्यंत नेम धरण्याची सोय होती. ती सेमी-ऑटोमॅकि किंवा फुल-ऑटोमॅटिक प्रकारात वापरता येत असे. ही बंदूक देखभालीसाठीही अत्यंत सोपी होती. तिला २० गोळ्यांचे मॅगझिन किंवा ५० गोळ्यांचे ड्रम मॅगझिन लावता येत असे. त्यातून मिनिटाला ५०० ते ६०० च्या वेगाने गोळ्या झाडता येत असत. याशियावाय या रायफलवर संगीन, अंडर बॅरल ग्रेनेड लाँचर, टेलिस्कोपिक साइट्स आणि नाइट व्हिजन उपकरणेही बसवता येत असत.

पश्चिम जर्मनीच्या सैन्याने स्वीकारल्यानंतर साधारण ५० देशांच्या सैन्यात जी-३ रायफल वापरात आली. ग्रीस, इराण, मेक्सिको, नॉर्वे, पोर्तुगाल, स्वीडन, तुर्कस्तान यांच्यासह पाकिस्तानी सैन्यातही जी-३ रायफल वापरात होत्या. ग्रीस, पाकिस्तान, इराण, तुर्कस्तान आणि पोर्तुगालमध्ये जी-३ रायफलची निर्मितीही होत होती.

पाकिस्तानने जी-३ त्यांच्या सैन्याची स्टँडर्ड रायफल म्हणून स्वीकारली होती. या बंदुकीने सिमेंट काँक्रिट नसलेल्या विटांच्या भिंती आणि बंकरच्या भिंतीही भेदता येतात. तसेच तिच्या गोळ्या लेव्हल-३ प्रकारचे चिलखत भेदू शकतात. भारतीय लष्करात साधारणपणे हीच चिलखते वापरात होती. म्हणून पाकिस्तानने ही रायफल स्वीकारल्याचे एक कारण दिले जाते. तसेच थोडय़ा सुधारणा करून जी-३ चांगली स्नायपर रायफल म्हणूनही वापरता येते.

 

 

सेल्फ-लोडिंग रायफल

दुसऱ्या महायुद्धानंतर ब्रिटिश सैन्याने १९५४ साली स्वीकारलेली एफएन-एफएएल (Fabrique Nationale – Fusil Automatique Leger) ही बंदूक जगभर गाजली ती एसएलआर किंवा सेल्फ-लोडिंग रायफल म्हणून. बेल्जियममधील फॅब्रिक नॅशनल या कंपनीचे हे मूळ रायफलचे डिझाइन आजवरचे सर्वात यशस्वी मॉडेल म्हणून गणले जाते. ब्रिटनसह नॉर्थ अटलांटिक ट्रिटी ऑर्गनायझेशन (नाटो)मधील अनेक देशांत तिचा वापर होत असल्याने ‘राइट आर्म ऑफ द फ्री वर्ल्ड’ अशी या रायफलची ख्याती आहे.

जगभरच्या ९० देशांच्या सेनादलांनी तिच्या विविध आवृत्ती स्वीकारल्या आहेत आणि बऱ्याच ठिकाणी आजही त्या वापरात आहेत. अरब आणि इस्रायल यांच्यात १९६७ साली झालेल्या युद्धात (सिक्स डे वॉर) इस्रायली सैन्याला झंझावाती विजय मिळवून देण्यात त्यांच्या सुप्रसिद्ध उझी सब-मशिनगनचा सिंहाचा वाटा असल्याचे सामान्यत: मानले जाते. पण प्रत्यक्षात सिक्स डे वॉर आणि त्यापुढील १९७३ च्या योम किप्पूर युद्धातही इस्रायली सैन्याची प्रमुख बंदूक होती ती एफएन-एफएएल रायफल. युद्धात दोन्ही पक्षांकडून एकच शस्त्र वापरले जाण्याचे उदाहरण तसे विरळा. पण १९८२ साली अटलांटिक महासागरातील फॉकलंड (माल्विना) बेटांच्या मालकीवरून झालेल्या युद्धात ब्रिटिश आणि अर्जेटिना अशा दोन्ही सैन्याकडे एफएन-एफएएल रायफलच होत्या. भारतीय लष्कराकडेही याच बंदुका होत्या आणि अजूनही भारतातील अनेक राज्यांच्या पोलीस दलांकडे त्याच रायफल वापरात आहेत. भारतात ईशापूर रायफल फॅक्टरीत त्यांचे उत्पादन होत असे.

एफएन-एफएएल रायफल सुरुवातीला .२८० कॅलिबरचे ब्रिटिश इंटरमिजिएट नावाचे काडतूस वापरण्यासाठी डिझाइन केली होती. पण नंतर तिच्यात नाटो सैन्याकडून वापरले जाणारे ७.६२ मिमी व्यासाचे आणि ५१ मिमी लांबीचे काडतूस वापरण्याचे ठरले. त्यामुळे एफएन-एफएएल रायफलचे डिझाइन तिच्या अंतिम मर्यादेपर्यंत ताणले गेल्यासारखे वाटते. ब्रिटनमध्ये ही रायफल एल १ ए १ सेल्फ लोडिंग रायफल म्हणून ओळखली गेली. तिच्या मॅगझिनमध्ये २० गोळ्या मावतात आणि त्यांचा ८०० मीटपर्यंत अचूक मारा करता येतो.

तिची गोळी बरीच शक्तिशाली आहे. ती झाडल्यावर चेंबरमध्ये मोठा स्फोट होतो आणि बराच धक्का बसतो. याच कारणामुळे ही बंदूक एकेक गोळी झाडण्यासाठी किंवा सेमी-ऑटोमॅटिक मोडमध्ये वापरण्यास अधिक सुलभ आहे. ती फुल-ऑटोमॅटिक मोडमध्ये वापरली तर फारशी नियंत्रणात राहत नाही आणि गोळ्या नेम धरून मारणे अवघड होते. म्हणून ब्रिटिश लष्कराने तिची सेमी-ऑटोमॅटिक आवृत्तीच स्वीकारली आहे. फुल ऑटोमॅटिक मोडमध्ये तिचा मारा अधिक अचूक करण्यासाठी रायफलचे बॅरल अधिक जड केले गेले आणि ती दोन पायांच्या स्टँडवर बसवून वापरली गेली.

एफएन-एफएएल काही असॉल्ट रायफल नव्हती. तरीही शीतयुद्धाच्या काळातील तिची कामगिरी निर्विवाद राहिली. त्यानेच तिची ‘राइट आर्म ऑफ द फ्री वर्ल्ड’ ही बिरुदावली सार्थ ठरवली.

 

स्मिथ अँड वेसन एम २९/.४४ मॅग्नम रिव्हॉल्व्हर

डर्टी हॅरी या १९७०च्या दशकातील हॉलीवूड चित्रपटातील एक गाजलेला प्रसंग. हॅरी कलहान या पोलिसाच्या भूमिकेतील अभिनेता क्लिंट ईस्टवुड दुपारी एका हॉटेलात काही तरी खात असतो. बाहेर अचानक आरडाओरडा ऐकू येतो. शेजारच्या बँकेवर दरोडा पडलेला असतो. हॅरी शिताफीने गोळीबार करून दरोडेखोरांना टिपतो. त्यांपैकी एक दरोडेखोर जखमी होऊन बँकेच्या दारात पडलेला असतो. त्याच्यापासून काही अंतरावरच त्याची बंदूक पडलेली असते. हॅरी त्याच्याजवळ जाऊन त्याच्यावर रिव्हॉल्व्हर रोखतो आणि त्याचा तो गाजलेला डायलॉग म्हणतो.. ‘मला माहीत आहे तू कसला विचार करत आहेस. मी सगळ्या सहा गोळ्या झाडल्या की पाच? पण खरं सांगायचं तर या गोंधळात मीही ते विसरून गेलो आहे. पण ही स्मिथ अँड वेसन .४४ मॅग्नम – जगातील सर्वात शक्तिशाली – रिव्हॉल्व्हर असल्याने सहजपणे तुझ्या डोक्याच्या चिंधडय़ा उडवू शकते. तेव्हा तूच विचार कर की तू भाग्यवान आहेस की नाही.’ क्लिंट ईस्टवुडच्या खास शैलीतील या डायलॉगनंतर तो गुंड शरण येतो.

स्मिथ अँड वेसन मॉडेल २९ किंवा .४४ मॅग्नम रिव्हॉल्व्हरची ख्याती तशीच होती. अमेरिकेत १९३० च्या दशकात आणि त्यानंतर गुन्हेगारी मोठय़ा प्रमाणात वाढली होती. अनेक संघटित गुन्हेगारी टोळ्यांनी थॉमसन सब-मशिनगनसारख्या (टॉमी गन) संहारक बंदुका मिळवल्या होत्या. वेगवान मोटारीतून येऊन गोळ्यांचा वर्षांव करून पसार होणाऱ्या गुन्हेगारांना रोखताना पोलिसांच्या पारंपरिक शस्त्रांची ताकद अपुरी पडत होती.

त्याच दरम्यान १९३४ साली स्मिथ अँड वेसन आणि विंचेस्टर कपन्यांमधील एल्मर कीथ आणि फिलिप शार्प यांनी मिळून .३५७ कॅलिबरचे नेहमीपेक्षा मोठे आणि शक्तिशाली काडतूस विकसित केले होते. त्याला नाव काय द्यावे याची चर्चा सुरू असताना मॅग्नम शॅम्पेनचा विषय निघाला. मॅग्नम शॅम्पेनची बाटली नेहमीच्या बाटलीपेक्षा मोठी असते. हे काडतूसही अन्य काडतुसांपेक्षा मोठे होते. त्यामुळे त्याला मॅग्नम असे नाव देण्याचे ठरले. तेव्हापासून नेहमीपेक्षा मोठय़ा आणि शक्तिशाली काडतुसाला मॅग्नम म्हटले जाते आणि तशी काडतुसे वापरणाऱ्या बंदुकीला मॅग्नम म्हणतात.

या काडतुसावर आधारित अनेक बंदुका तयार झाल्या. पुढे स्मिथ अँड वेसननेही १९५५ साली मॉडेल २९ नावाचे रिव्हॉल्व्हर तयार केले. त्यात .४४ कॅलिबरचे मॅग्नम काडतूस वापरले जायचे. त्यावरून ती रिव्हॉल्व्हर .४४ मॅग्नम म्हणून ओळखली गेली. जगातील सर्वात शक्तिशाली हँडगनमध्ये तिचा क्रमांक खूप वरचा आहे. या बंदुकीने अमेरिकी पोलिसांना गुन्हेगारांना रोखण्याची मोठी शक्ती मिळाली. ती गुन्हेगारांची कर्दनकाळ ठरली. अनेक सुरक्षा दलांनी ती रिव्हॉल्व्हर स्वीकारली. गोळी झाडल्यावर तिचा मागे हाताला बसणारा झटकाही तितकाच जोरदार असे.

स्मिथ अँड वेसन .४४ मॅग्नमची हीच खासियत डर्टी हॅरी चित्रपटांच्या मालिकेत अधोरेखित केली आहे. १९७० च्या दशकात त्यांच्या प्रदर्शनानंतर या बंदुकीची मागणी मोठय़ा प्रमाणावर वाढली. अनेकांनी डर्टी हॅरीची बंदूक म्हणून हौसेने ती विकत घेतली. १९७५ साली तिची मॉडेल ६२९ नावाची आवृत्तीही बाजारात आली. ती स्टेनलेस स्टीलची आणि क्रोमियमचा मुलामा दिलेली बंदूक होती. तीही ग्राहकांच्या पसंतीस उतरली. आजही .४४ मॅग्नम रिव्हॉल्व्हर स्मिथ अँड वेसन कंपनीची ‘मॅग्नम ओपस’ बनून राहिली आहे.

 

 

 

अमेरिकी एम-१४ आणि एम-१६ रायफल्स

दुसऱ्या महायुद्धाच्या अखेरीस अमेरिकेने त्यांच्या सैन्यातील विविध शस्त्रांचा आढावा घेतला. त्यात असे दिसून आले की, सैन्याकडे अनेक प्रकारच्या बंदुका असल्याने त्यांच्यासाठी वेगवेगळा दारुगोळा पुरवण्यात अडचणी येत आहेत. बरेचदा एकाच तुकडीत सैनिकांकडे स्प्रिंगफिल्ड रायफल, थॉमसन सब-मशिनगन, ब्राऊनिंग ऑटोमॅटिक रायफल अशी वेगवेगळी शस्त्रे असत. त्या सगळ्यांत एकवाक्यता आणण्याच्या उद्देशाने नवी सिलेक्टिव्ह फायर ऑटोमॅटिक रायफल बनवण्याचा निर्णय घेतला गेला. सिलेक्टिव्ह फायर रायफलमधून ट्रिगर दाबल्यावर एका वेळी एकेक गोळी, सेमी-ऑटोमॅटिक मोडवर तीन गोळ्यांचा बस्र्ट किंवा फुल ऑटोमॅटिक मोडवर सर्व गोळ्या एका दमात झाडता येतात. त्यातून एम-१४ ही रायफल आकाराला आली.

अमेरिकी सैन्याने १९५७ साली एम-१४ रायफल स्वीकारली. स्प्रिंगफिल्ड कारखान्यात १९५८ साली उत्पादनाची सामग्री बसवली आणि १९५९ पासून एम-१४ रायफल प्रत्यक्ष सैन्याला मिळण्यास सुरुवात झाली. तिच्या मॅगझिनमध्ये ७.६२ मिमी व्यासाच्या २० शक्तिशाली गोळ्या बसत. त्यामुळे या रायफलची मारक क्षमता चांगली होती. पण लवकरच व्हिएतनाम युद्धात एम-१४ च्या त्रुटी लक्षात येऊ लागल्या. व्हिएतनामच्या जंगलांमधील पावसाळी आणि दमट वातावरणात एम-१४ च्या लाकडी दस्त्यात (बट) आद्र्रता शोषली जाऊन लाकडी भाग फुगत असत. त्यामुळे तिच्यावरील नेम धरण्यासाठी बसवलेल्या साइट्सचे गणित बिघडून अचूकतेवर परिणाम होत असे. म्हणून एम-१४ चे पुढील मॉडेल एम-१६ ही रायफल विकसित करण्यात आली.

रशियन एके-४७ प्रमाणे अमेरिकी एम-१६ ही रायफलही जगभरात गाजली. कोल्ट आर्मालाइट फॅक्टरीतील युजीन स्टोनर यांनी ही रायफल १९५६ च्या आसपास डिझाइन केली आणि १९६४ पासून ती अमेरिकी सेनादलांत दाखल झाली. तिच्या निर्मितीमध्ये हलके पण टिकाऊ मिश्रधातू, प्लास्टिक, कॉम्पोझिट मटेरियल आदींचा उपयोग केला होता. पूर्वीच्या एम-१४ मध्ये ७.६२ मिमीच्या गोळ्या वापरल्या जात. एम-१६ मध्ये त्याऐवजी थोडय़ा लहान म्हणजे ५.५६ मिमी व्यासाच्या गोळ्या भरल्या जात. त्यामुळे सैनिकांना तेवढय़ाच वजनात अधिक गोळ्या वाहून नेणे शक्य होते. तिला २० ते ३० गोळ्यांचे मॅगझिन बसत असे आणि त्यातून एका मिनटिाला ७०० ते ९५० च्या वेगाने गोळ्यांची बरसात होत असे.

मात्र व्हिएतनामच्या जंगलात एम-१६ रायफल वरचेवर जॅम होत असे आणि त्यामुळे अमेरिकी सैनिक मारले जात. त्यावर उपाय म्हणून अमेरिकेने एम-१६ च्या गोळ्यांमध्ये वापरल्या जाणाऱ्या डय़ुपाँ आयएमआर पावडरऐवजी जुन्या एम-१४ च्या गोळ्यांमध्ये वारली जाणारी स्टँडर्ड बेल पावडर वापरण्यास सुरुवात केली. त्याने बॅरलच्या आतील पृष्ठभागावर काजळी कमी साठत असे. तसेच एम-१६ ला सुरुवातीला स्वच्छतेसाठी किट पुरवले नव्हते, तेही पुरवण्यास सुरुवात केली. रायफल साफ करण्याची सैनिकांना सवय लावली. बॅरल आणि अंतर्गत भागांवर क्रोमियम प्लेटिंग केले. त्यातून एम-१६ ची परिणामकारकता वाढली आणि ती एक खात्रीशीर बंदूक म्हणून नावारूपास आली.

 

 

कलाशनिकोव्ह आणि एके मालिका : एक आख्यायिका

मिखाइल टिमोफेयेविच कलाशनिकोव्ह यांचा जन्म सोव्हिएत युनियनमधील कुर्या येथे १० नोव्हेंबर १९१९ साली झाला. दुसऱ्या महायुद्धात ते सोव्हिएत युनियनच्या लाल सेनेत टँक कमांडर होते. अ‍ॅडॉल्फ हिटलरने ऑपरेशन बार्बारोझा सुरू केले आणि नाझी फौजांनी सोव्हिएत प्रदेशात खोलवर मुसंडी मारली. ऑक्टोबर १९४१ मध्ये ब्रायन्स येथील लढाईत जर्मन सैन्याविरुद्ध टी-३४ रणगाडय़ावरून लढताना कलाशनिकोव्ह जखमी झाले. ते एप्रिल १९४२ पर्यंत रुग्णालयात उपचार घेत होते.

चांगल्या असॉल्ट रायफलच्या अभावी सोव्हिएत सेनेची वाताहत झाली याचे शल्य कलाशनिकोव्ह यांना फार लागले होते. रुग्णालयातील वास्तव्यात त्यांनी देशासाठी चांगली असॉल्ट रायफल तयार करण्याचा ध्यास घेतला. जखमी सैनिकांशी तासन्तास चर्चा करून रायफलसंबंधी त्यांच्या अपेक्षा जाणून घेतल्या आणि नवी रायफल डिझाइन केली. सोव्हिएत सेनेने दुसऱ्या महायुद्धाच्या अखेरीस रायफल डिझाइन करण्याची स्पर्धा ठेवली होती. त्यात कलाशनिकोव्ह यांच्या रायफलचा प्रथम क्रमांक आला. सोव्हिएत सेनेने १९४७ साली ती स्वीकारली आणि १९४९ साली ही नवी रायफल सेनेच्या हाती पडली. कलाशनिकोव्ह यांनी जर्मन श्टुर्मगेवेर -४४ या रायफलच्या धर्तीवर एके-४७चे डिझाइन तयार केले, असा आरोप होतो. पण कलाशनिकोव्ह यांनी त्याचा इन्कार केला होता.

इझमश ही ‘एके-४७’ची निर्माती कंपनी रशियातील इझेवस्क नावाच्या गावात वसली आहे. या गावाची खासियत म्हणजे तेथील पूर्वापार व्यवसाय शस्त्रास्त्रे बनवण्याचा. अ‍ॅडॉल्फ हिटलरच्या नाझी जर्मन आक्रमणाच्या शतकभरापूर्वी नेपोलियनने रशियावर आक्रमण केले होते. त्याचाही तसाच पराभव झाला होता आणि त्या युद्धात रशियाने वापरलेल्या तोफाही इझेवस्क गावातील कारखान्यांतच बनल्या होत्या. तेथील मूळ कारखान्यात आता ‘एके-४७’चे उत्पादन होणे बंद झाले आहे. युद्धकाळात पुरुष आघाडीवर लढण्यासाठी गेले असल्याने येथील बऱ्याचशा कामगार स्त्रिया होत्या. त्या त्यांच्या कामात इतक्या पटाईत होत्या की त्यांच्याबद्दल गमतीने म्हटले जायचे – या महिलांना कोणत्याही कारखान्यात नेऊन सोडले तरी तेथील अंतिम उत्पादन एके-४७ च असेल.

आता बाजारात येणाऱ्या ‘एके-४७’ रशियाच्या मित्रदेशांत परवान्याने बनवलेल्या किंवा आंतरराष्ट्रीय शस्त्रास्त्रांच्या काळ्या बाजारातून आलेल्या ‘पायरेटेड कॉपीज’ असतात. अनेकांना ‘एके-५६’ ही त्याच श्रेणीतील पुढील बंदूक वाटते. पण ती ‘एके-४७’ची चिनी नक्कल किंवा आवृत्ती आहे. कालाशनिकोव्ह यांनी पुढे एकेएम, एके-७४, पीके मशिनगन, आरपीके लाइट मशिनगन आदी बंदुकाही तयार केल्या. ही सर्व मालिका जगभर खूपच गाजली. एके-७४ रायफलमध्ये पूर्वीच्या ७.६२ मिमी व्यासाच्या गोळ्यांऐवजी ५.४५ मिमी व्यासाच्या गोळ्या वापरल्या जात. एके-१०१, १०२, १०३ या बंदुकाही अस्तित्वात आहेत. कलाशनिकोव्ह रशियन सैन्यातून लेफ्टनंट जनरलच्या हुद्दय़ावरून निवृत्त झाले. २३ डिसेंबर २०१३ रोजी त्यांचे निधन झाले. त्यांना यूएसएसआर स्टेट प्राइझ, हिरो ऑफ सोशलिस्ट लेबर, लेनिल प्राइझ, स्टालिन प्राइझ, हिरो ऑफ द रशियन फेडरेशन, ऑर्डर ऑफ सेंट अँड्रय़ू, ऑर्डर फॉर मेरिट टू द फादरलँड आदी पुरस्कार मिळाले होते. ते जिवंतपणीच एक आख्यायिका बनले होते.

 

एके-४७ : बंदूकविश्वाची अनभिषिक्त सम्राज्ञी

सामान्यत: मशिनगनमध्ये वापरल्या जाणाऱ्या ७.६२ मिमी. व्यासाच्या गोळ्या मिनिटाला ६५०च्या वेगाने ५०० मीटर अंतरापर्यंत झाडणारी ‘एके-४७’ असॉल्ट रायफल ओळखली जाते ती तिच्या दमदार ‘पंच’साठी. किंग कोब्राने चावा घेतलेला माणूस जसा पाणी मागत नाही तसा ‘एके-४७’ची गोळी वर्मी लागलेला माणूसही वाचणे अवघड. साधी पण भक्कम रचना, हाताळण्यातील सुलभता, देखभाल व दुरुस्तीची अत्यंत कमी गरज आणि कोणत्याही वातावरणात हुकमी कामगिरी बजावण्याची हमी ही ‘एके-४७’ची वैशिष्टय़े. त्याच्या जोरावर जगभरच्या सेनादलांबरोबरच गनिमी योद्धय़ांच्या गळ्यातील ताईत बनलेली ‘एके-४७’ ही केवळ एक बंदूक न राहता तो एक ‘कल्ट’ बनला आहे. जगातील एकूण बंदुकांपैकी २० टक्के (म्हणजे पाचपैकी एक) बंदुका ‘एके-४७’ आहेत. आजवर ७५ दशलक्ष ‘एके-४७’ बनवल्या गेल्या आहेत. त्या मालिकेतील एके-७४, एके-१००, १०१, १०३ या बंदुका एकत्रित केल्या तर ही संख्या १०० दशलक्षच्या वर जाते. आफ्रिकेतील मोझांबिक या देशाच्या राष्ट्रध्वजावर ‘एके-४७’ची प्रतिमा आहे. इतकेच नव्हे तर ‘एके-४७’चे निर्माते मिखाइल कलाशनिकोव्ह यांचे रशियात पुतळे आहेत. कलाशनिकोव्ह नावाची व्होडकाही आहे.

सोव्हिएत युनियनच्या सैन्याने दुसऱ्या महायुद्धाच्या अखेरीस १९४५ साली उत्तम बंदूक बनवण्याची स्पर्धा घेतली होती. त्या वेळी सोव्हिएत लष्करात अधिकारी असलेले मिखाइल कलाशनिकोव्ह यांनी सादर केलेल्या बंदुकीच्या डिझाइनला या स्पर्धेत पहिले पारितोषिक मिळाले. १९४७ साली ही बंदूक सोव्हिएत लष्कराने स्वीकारली. ऑटोमॅटिक या इंग्रजी शब्दासाठीचा रशियन शब्द ‘आवटोमाट’साठी ‘ए’ हे आद्याक्षर, कलाशनिकोव्ह यांच्या नावातील ‘के’ आणि वापरात आलेल्या वर्षांतील ‘४७’ असे एकत्र करून ‘एके-४७’ हे नाव बनले आहे.

अमेरिकेने ‘एके-४७’च्या मुकाबल्यासाठी ‘एम-१६’ ही बंदूक तयार केली. पण ती ‘एके-४७’ इतकी प्रभावी ठरली नाही. ‘एम-१६’ गोळ्या झाडताना मध्येच जॅम व्हायची. त्यामुळे व्हिएतनाम युद्धात अनेक अमेरिकी सैनिकांनी प्रतिपक्षाच्या मृत रशियन सैनिकांच्या ‘एके-४७’ काढून घेऊन वापरल्या होत्या.

मात्र इतके यश लाभलेले मिखाइल कलाशनिकोव्ह रशियन लष्करातून लेफ्टनंट जनरलच्या हुद्दय़ावरून निवृत्त झाल्यानंतर साधारण ३०० डॉलर इतक्या तुटपुंजा निवृत्तिवेतनावर जगत होते. तेव्हा त्याच किमतीत आंतराष्ट्रीय बाजारात एक ‘एके-४७’ मिळायची. त्याउलट अमेरिकी ‘एम-१६’ बंदुकीचा निर्माता युजीन स्टोनर बंदुकीच्या डिझाइनसाठी मिळणाऱ्या रॉयल्टीवर धनाढय़ झाला होता. हा दोन्ही देशांच्या राजकीय विचारसरणींमधील आणि आर्थिक व्यवस्थांमधील फरक!

 

जर्मन एफजी-४२ : स्वयंचलित बंदुकांच्या दिशेने प्रवास

रशियामध्ये पहिल्या महायुद्धापासूनच स्वयंचलित (ऑटोमॅटिक), सेल्फ-लोडिंग रायफलच्या निर्मितीचे प्रयत्न सुरू होते. मात्र प्रत्यक्षात वापरण्यायोग्य डिझाइन विकसित होण्यास १९३० आणि १९४० चे दशक उजाडले. रशियामध्ये १९३६ साली गॅस-ऑपरेटेड सिमोनोव्ह एव्हीएस ३६ ही रायफल मर्यादित प्रमाणात वापरात आली. त्यानंतर दोन वर्षांनी टोकारेव्ह एसव्हीटी ३८ ही रायफल अस्तित्वात आली. या दोन्ही बंदुका रणभूमीवरील धउळीने आणि मातीने भरलेल्या वातावरणात वापरण्यासाठी पुरेशा दणकट नव्हत्या. त्यामुळे एसव्हीटी ३८ च्या जागी एसव्हीटी ४० ही टोकारेव्ह यांचीच रायफल वापरात आली. ती आधीच्या मॉडेल्सपेक्षा अधिक दणकट, सेमी-ऑटोमॅटिक आणि १० गोळ्या मावणारी रायफल होती. मात्र या रायफलमधील शक्तिशाली काडतूस डागताना खांद्याकडे जोराचा धक्का (रिकॉइल) बसत असे. त्याचा त्रास कमी करण्यासाठी एसव्हीटी ४० रायफलच्या बॅरलच्या पुढील भागात मोठा ‘मझल ब्रेक’ बसवण्यात आला. मझल ब्रेक, कॉम्पेन्सेटर किंवा फ्लॅश सप्रेसर नावाने ओळखले जाणारे उपकरण बंदुकीच्या नळीच्या टोकाला बसवले जाते. त्याने बाहेर पडणारे गरम वायू बाजूला किवा वर फेकले जातात. त्यामुळे गोळी झाडल्यावर बंदुकीला मागे बसणारा धक्का आणि बॅरल वर उचलले जाण्याचा प्रभाव कमी होतो आणि बंदुकीचा अचूकता व सहजता वाढते.

दुसऱ्या महायुद्धात जर्मन सैनिकांनी रशियन सैन्याकडून मोठय़ा प्रमाणात टोकारेव्ह एसव्हीटी-४० रायफल काबीज केल्या. जर्मनांनी त्यांचे नाव बदलून ओ-१ गेवेर २५९ (आर) असे केले आणि त्या पुन्हा रशियन सैनिकांविरुद्धच वापरल्या. या बंदुकीतून जर्मनांना अधिक प्रभावी गॅस-ऑपरेटेड सिस्टिम तयार करण्याचे तंत्र गवसले. त्यातून जर्मन गेवेर-४१ आणि एफजी-४२ (Fallschirmjägergewehr 42) या रायफल्स विकसित झाल्या.

दुसऱ्या महायुद्धाच्या सुरुवातीला जर्मन सैन्याला त्यांच्या जुन्या बोल्ट-ऑपरेटेड कार्बिनर-९८ के या कार्बाइन बदलण्यासाठी नव्या रायफलची गरज होती. ती माऊझर गेवेर-४१ मधून भरून निघाली. मात्र ती रणभूमीवर फारशी प्रभावी ठरली नाही. तिची गुंतागुंतीची गॅस-ऑपरेटेड ब्लो-बॅक प्रणाली माजी अडकून बंद पडत असे. तसेच तिचे वजनही जास्त होते.

या त्रुटी दूर करून एफजी-४२ तयार झाली. ती प्रामुख्याने जर्मन छत्रीधारी सैनिकांसाठी (पॅराट्रपर्स) बनवली होती. त्यात धातूचा कमीतकमी वापर करून वजन कमी केले होते. त्याला २० गोळ्यांचे बॉक्स मॅगझिन होते. गॅस-ऑपरेटेड प्रणाली अधिक कार्यक्षम बनवली होती. पण पूर्ण ऑटोमॅटिक मोडवर फायरिंग करताना तिच्या शक्तिमान काडतुसांचा धक्का या हलक्या बंदुकीला सहन होत नसे. त्यावर मात करून थोडी जड आणि प्रभावी एफजी-४२-२ ही आवृती १९४४ साली वापरात आली.

पडत्या काळात ब्रिटनला तारणारी स्टेन गन

दुसऱ्या महायुद्धात फ्रान्समधील डंकर्क येथे मे-जून १९४० दरम्यान नाझी जर्मनीच्या फौजांनी ब्रिटिश आणि अन्य दोस्त राष्ट्रंच्या ४ लाखांच्या आसपास सैन्याची मोठी कोंडी केली होती. महत्प्रयासाने ब्रिटनने त्यातील बहुतांश सैन्य इंग्लिश खाडी पार करून ब्रिटनमध्ये परत नेले. डंकर्कहून सैन्य परत आणताना बरीच शस्त्रे मागे सोडावी लागली होती. त्यानंतर जुलै ते ऑक्टोबर १९४० दरम्यान माघार घेणाऱ्या ब्रिटिश सैन्याचा जर्मनांनी थेट ब्रिटिश भूमीपर्यंत पिच्छा पुरवला. जर्मन लुफ्तवाफचा (हवाईदल) प्रमुख हर्मन गेअरिंगच्या विमानांनी ब्रिटनला भाजून काढले. ही लढाई ‘बॅटल ऑफ ब्रिटन’ म्हणून इतिहासात गाजली. मात्र विंस्टन चर्चिलच्या नेतृत्वाखालील ब्रिटनने मान तुकवली नाही.

या पडत्या काळात ब्रिटिश लष्कराला नव्या प्रभावी शस्त्राची तातडीने गरज भासत होती. त्यावेळी अनेक देशांत सब-मशिनगन वापरावर भर दिला जात होता. ब्रिटनही अमेरिकेकडून थॉमसन सब-मशिनगन किंवा टॉमी गन आयात करत होते. पण युद्धकाळात त्या बंदुकीच्या किंमती खूप वाढल्या. एका टॉमीगनची किंमत २०० डॉलरच्या आसपास होती. ब्रिटनला अशा लाखो बंदुकांची तातडीने गरज होती. त्यासाठी अमेरिकेला रोख पैशात किंमत भागवणे गरजेचे होते. युद्धाच्या काळात ब्रिटनची अर्थव्यवस्था आधीच कोलमडली होती आणि इतका मोठा आर्थिक व्यवहार, तोही रोकड स्वरूपात, करणे अशक्य होते. या गरजेतून स्टेन गन जन्माला आली. अशा परिस्थितीत जी काही साधने उपलब्ध आहेत त्यातून लवकरात लवकर अधिकाधिक प्रमाणात उत्पादन करता येऊ शकेल असे शस्त्र बनवणे क्रमप्राप्त होते. त्यामुळे स्टेन गन हे मूलत: अतिशय घाई-गडबडीत तयार केलेले कामचलाऊ शस्त्र होते. पण तरीही त्याने ब्रिटनला तारले.

मेजर रेजिनाल्ड शेफर्ड आणि हॅरॉल्ड टर्पिन यांनी या बंदुकीची रचना केली. शेफर्ड यांच्या नावातील एस, टर्पिन यांच्या नावातील टी आणि ब्रिटनमदील ज्या एनफिल्ड कारखान्यात ही बंदूक तयार केली त्यातील ई आणि एन ही अक्षरे घेऊन स्टेन असे नाव तयार झाले आहे.

या बंदुकीच्या मार्क १, २, ३, ५ असा आवृत्ती तयार झाल्या. मार्क ४ चे प्रत्यक्षात उत्पादन झाले नाही. त्यात ३२ गोळ्यांचे मॅगझिन बसत असे. तिचा पभावी पल्ला १०० मीटर होता आणि एका मिनिटाला ५०० ते ६०० च्या वेगाने गोळ्या झाडल्या जात. या एका बंदुकीची किंमत केवळ १० डॉलर किंवा २.३ पौंडांच्या आसपास होती. १९४० च्या दशकात युद्धाच्या उत्तरार्धात या बंदुकांच्या साधारण ४० लाख प्रती तयार झाल्या.

कमीत कमी कच्चा माल वापरून, अल्प कालावधीत तयार झालेल्या आणि बऱ्यापैकी काम करणाऱ्या या स्टेन गनने ब्रिटनला युद्धाच्या उत्तरार्धात तारले. उबलब्ध साधनांचा पुरेपूर वापर केल्याचे उदाहरण म्हणून ही बंदूक प्रसिद्ध आहे.

सब-मशिनगन आणि असॉल्ट रायफलचा उदय

पहिल्या महायुद्धाच्या दरम्यानच्या काळात रिव्हॉल्व्हरची जागा ऑटोमॅटिक पिस्तुले घेत होती. तसेच रायफलची जागा सब-मशिनगननी घेण्यास सुरुवात केली होती. या काळात रायफलचा साधारण पल्ला ८०० ते १२०० मीटरच्या जवळपास होता. पण पहिल्या महायुद्धानंतर १९३० च्या दशकात जर्मनीने केलेल्या एका अभ्यासात असे दिसून आले की प्रत्यक्षात चकमकी इतक्या लांबच्या अंतरावर घडत नाहीत त्या फारफार तर ४०० मीटरच्या अंतरात घडतात. त्यामुळे बंदुकांचा इतका लांबचा पल्ला अनावश्यक वाटू लागला. तसेच शत्रूवर अतिंम टप्प्यात निकराचा हल्ला करताना (असॉल्ट) बोल्ट-अ‍ॅक्शन रायफलइतक्या अचूकतेचीही गरज भासत नाही. त्यावेळी नेम अचूक नसला तरी चालतो पण शत्रूवर गोळ्यांचा जोरात वर्षांव करण्याची गरज भासते. तसेच पारंपरिक मशिनगन एकटय़ा सैनाकाने उचलून नेण्याइतक्या हलक्या नसत. या गरजेतून सब-मशिनगन आणि असॉल्ट रायफलचा उदय झाला.

पहिल्या महायुद्धाच्या अखेरीस अमेरिकेत स्प्रिंगफिल्ड कारखान्यात अशी बंदूक तयार केली गेली. पण तिचा युद्धात वापर झाला नाही. १९१५ साली इटलीच्या डोंगराळ भागातील सैनिकासाठी व्हिलार पेरोसा नावाची पहिली सब-मशिनगन तयार झाली. पण दोन बॅरल असलेल्या आणि ब्लो-बॅक अ‍ॅक्शनवर आधारित ही बंदूक मिनिटाला १२०० च्या वेगाने गोळ्या झाडत असे. पण दोन बॅरलमुळे ती वापरास किचकट होती. त्यामुळे पहिली खरी सब-मशिनगन बनण्याचा मान जातो तो जर्मन बर्गमान कंपनीचे डिझायनर ह्य़ुगो श्मिसर (Hugo Schmeisser) यांच्या मस्केट (Musquete) नावाच्या बंदुकीला. या बंदुकीने सब-मशिनगनची कल्पना प्रत्यक्षात उतरली होती आणि १९१७ साली जर्मन स्टॉर्मट्रपर्सना ती पुरवण्यात आली.

त्यानंतर ब्रिटिश लँकेस्टर आणि अमेरिकी डिझायनर जनरल जॉन टी. थॉमसन यांची एम १९२८ टॉमी गन बाजारात आली. सोव्हिएत युनियनची पीपीएसएच-४१ ही सब-मशिनगनही बरीच गाजली. या दोन्ही बंदुकांना गोल थाळीच्या आकाराचे डिस्क मॅगझिन होते. यासह जर्मन एमपी-४०, ब्रिटिश स्टेन गन आणि अमेरिकी एम-३ या सब-मशिनगनही वापरात आल्या. युद्धात खंदकांमध्ये उतरून हल्ला करताना या बंदुकांनी खूप महत्त्वाची कामगिरी पार पाडली. दोन महायुद्धांदरम्यान आणि त्यांच्या नंतर अमेरिकी टॉमी गनसारख्या बंदुका माफियांच्या हाती पडल्या. त्यामुळे टॉमी गन लष्करापेक्षा माफियांची बंदूक म्हणूनच कुप्रसिद्ध झाली.

 

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Posted by admin - March 18, 2018 at 10:03 am

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Posted by admin - March 11, 2018 at 6:13 pm

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Posted by admin - March 11, 2018 at 5:49 pm

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