Chalisa of All Gods in hindi

List of God Chalisa – Click to open

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  2. Shree Batuk Bhairav Chalisa in Hindi
  3. Shree Bhairav Chalisa or Shri Batuk Bhairav Chalisa in Hindi
  4. Shree Shani Chalisa-2 in Hindi
  5. Shree Shani Chalisa – 1 in Hindi
  6. Shree Shiv Chalisa in Hindi
  7. Shree Vishnu Chalisa in Hindi
  8. Shree Ram Chalisa in Hindi
  9. Shree Krishna Chalisa in Hindi
  10. Shree Gopal Chalisa and Aarti in Hindi
  11. Shree Ganesh Chalisa – Ganesh Chalisa lyrics in Hindi
  12. Shree Brahma Chalisa in Hindi
  13. Shree Gayatri Chalisa in Hindi
  14. Shree Mahalakshmi Chalisa and Ashtakam in Hindi
  15. Shree Lakshmi Chalisa in Hindi
  16. Shree Vindheshwari Chalisa in Hindi
  17. Shree Durga Chalisa in Hindi
  18. Shree Baba Gangaram Chalisa in Hindi
  19. Shree Pitar Chalisa – pitra chalisa in Hindi
  20. Shree Ramdev Chalisa in Hindi
  21. Shree Shyam Khaatu Chalisa in Hindi
  22. Shree Parashuram Chalisa in Hindi
  23. Shree Mahaveer Teerthankar Chalisa in Hindi
  24. Shree Giriraj Chalisa in Hindi
  25. Shree Sai baba Chalisa in Hindi
  26. Shree Balaji Chalisa in Hindi
  27. Shree Pretraj Chalisa in Hindi
  28. Shri Jaharveer Goga Ji Chalisa in Hindi
  29. Shree Gorakh Chalisa in Hindi
  30. Shree Ravidas Chalisa and Aarti in Hindi
  31. Shree Vishwakarma Chalisa in Hindi
  32. Shree Navagrah Chalisa in Hindi
  33. Shree Rani Sati Chalisa in Hindi
  34. Shree Lalita Chalisa in Hindi
  35. Shree Shakambhari Chalisa in Hindi
  36. Shree Sharada Chalisa in Hindi
  37. Shree Narmada Chalisa in Hindi
  38. Shree Ganga Chalisa in Hindi
  39. Shree Bagalaamukhi Chalisa in Hindi
  40. Shree Parvati Chalisa in Hindi
  41. Shree Annapurna Chalisa in Hindi
  42. Shree Santoshi Maa Chalisa
  43. Shree Vaishno Devi Chalisa in Hindi
  44. Shree Tulasi Chalisa in Hindi
  45. Shree Radha Chalisa in Hindi
  46. Shree Shitala Mata Chalisa and Aarti in Hindi
  47. Shree Mahaakaali Chalisa in Hindi
  48. Shree Kali Chalisa in Hindi
  49. Shree Saraswati Chalisa in Hindi
  50. Tamil Hanuman chalisa
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  52. Hanuman chalisa in telugu text – Hanuman chalisa in telugu lyrics
  53. Hanuman Chalisa in Oriya
  54. Hanuman Chalisa in Malayalam
  55. Hanuman Chalisa in Gujarati
  56. Hanuman Chalisa in Bengali
  57. Sri Hanuman Chalisa in English Text
  58. Hanuman Chalisa in devnagari Hindi Marathi text Lyrics
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  60. Sanskrit Hanuman Chalisa
  61. Saraswati Chalisa in Hindi
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  64. Omkar chalisa in gujarati pdf
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  66. Shri Shiv Chalisa in Hindi
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  68. Shree Pitar Chalisa in Hindi
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  70. Chintpurni Chalisa in Hindi
  71. Shree Jwala Devi Maa Chalisa in Hindi
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  14. श्री शाकंभरी देवीची आरती
  15. अंबेची आरती Ambechi Aarti
  16. आरती नर्मदेची
  17. श्री शांतादुर्गेची आरती
  18. श्री मंगेशाची आरती
  19. रामाची कर्पूरआरती
  20. आदीमाता महिषासुरमर्दिनी चण्डिकेची आरती
  21. आरती कशी करावी
  22. नैवेद्य कसा दाखवावा
  23. कोणता नैवेद्य करावा
  24. नैवेद्याचा मंत्र
  25. कर्पूर आरती 
  26. आरतीनंतर म्हणायचे मराठी श्लोक
  27. कर्पुर आरतीचा अर्थ
  28. मंत्रपुष्पांजली अर्थ

Be the first to comment - What do you think?  Posted by admin - February 27, 2019 at 1:25 pm

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ATTRACTION MANTRA : VERY EFFECTIVE AND POWERFUL TO BECOME SUPER ATTRACTIVE : MUST TRY !

कामदेव की कथा से तो सभी परिचित हैं। कामदेव प्रेम, आकर्षण, काम भावना और प्रबलतम लगाव के देवता हैं। उनके यह दो पौराणिक मंत्र मनचाहा प्यार पाने में सहायक हो सकते हैं। मंत्र के नियमित जाप से आकर्षण शक्ति में वृद्धि होती है।

कामदेव वशीकरण मंत्र ….

‘ॐ कामदेवाय विद्महे, रति प्रियायै धीमहि, तन्नो अनंग प्रचोदयात्’

इस मंत्र का नियमित जप करने से कामदेव प्रसन्न होते हैं… जिसे आप चाहते हैं उसकी नजर आप पर रूकने लगती है। उसके ख्यालों में आपका ध्यान आने लगता है।

इसके अलावा आप इस मंत्र का उपयोग कर सकते हैं….

ॐ नमो भगवते कामदेवाय यस्य यस्य दृश्यो भवामि यस्य यस्य मम मुखं पश्यति तं तं मोहयतु स्वाहा’

इन मंत्रों को सुबह और शाम 108 बार जाप करना चाहिए। मंत्र एकांत में बैठकर करें और जिसके लिए यह मंत्र कर रहे हैं उसका ध्यान अवश्य करें,
मंत्र 21 दिनों तक करना जरूरी है।

Be the first to comment - What do you think?  Posted by admin - March 18, 2019 at 6:03 pm

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Chinta Mukti Mantra

चिंता मुक्ति मंत्र :

ॐ नम: शिवाय।


मंत्र प्रभाव : इस मंत्र का निरंतर जप करते रहने से चिंतामुक्त जीवन मिलता है। यह मंत्र जीवन में शांति और शीतलता प्रदान करता है। शिवलिंग पर जल व बिल्वपत्र चढ़ाते हुए यह शिव मंत्र बोलें व रुद्राक्ष की माला से जप भी करें। तीन शब्दों का यह मंत्र महामंत्र है।

संकटमोचन मंत्र : Sankat Mochan Mantra

ॐ हं हनुमते नम:।


मंत्र प्रभाव : यदि दिल में किसी भी प्रकार की घबराहट, डर या आशंका है तो निरंतर प्रतिदिन इस मंत्र का जप करें और फिर निश्चिंत हो जाएं। किसी भी कार्य की सफलता और विजयी होने के लिए इसका निरंतर जप करना चाहिए। यह मंत्र आत्मविश्वास बढ़ाता है।

हनुमानजी को सिंदूर, गुड़-चना चढ़ाकर इस मंत्र का नित्य स्मरण या जप सफलता व यश देने वाला माना गया है। यदि मृत्युतुल्य कष्ट हो रहा है, तो इस मंत्र का तुरंत ही जप करना चाहिए।

शांति, सुख और समृद्धि हेतु : Powerful Mantras for Wealth, Prosperity, Happiness & Success

भगवान विष्णु के वैसे तो बहुत मंत्र हैं, लेकिन यहां कुछ प्रमुख प्रस्तुत हैं।
vishnu
पहला मंत्र :

ॐ नमो नारायण।

या

श्रीमन नारायण नारायण हरि-हरि।


दूसरा मंत्र :
ॐ भूरिदा भूरि देहिनो, मा दभ्रं भूर्या भर। भूरि घेदिन्द्र दित्ससि।।
ॐ भूरिदा त्यसि श्रुत: पुरूत्रा शूर वृत्रहन्। आ नो भजस्व राधसि।।

तीसरा मंत्र :
ऊं नारायणाय विद्महे।
वासुदेवाय धीमहि।
तन्नो विष्णु प्रचोदयात्।।

चौथा मंत्र :
त्वमेव माता च पिता त्वमेव।
त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव।।
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव।
त्वमेव सर्व मम देवदेव।।

पांचवां मंत्र :
शांताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशम्।
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्।।
लक्ष्मीकान्तंकमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यम्।
वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्।।

मंत्र प्रभाव : भगवान विष्णु को जगतपालक माना जाता है। वे ही हम सभी के पालनहार हैं इसलिए पीले फूल व पीला वस्त्र चढ़ाकर उक्त किसी एक मंत्र से उनका स्मरण करते रहेंगे, तो जीवन में सकारात्मक विचारों और घटनाओं का विकास होकर जीवन खुशहाल बन जाएगा। विष्णु और लक्ष्मी की पूजा एवं प्रार्थना करते रहने से सुख और समृद्धि का विकास होता है।

मृत्यु पर विजय के लिए महामृंत्युजय मंत्र :


ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिंपुष्टिवर्द्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धानान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्।।


मंत्र प्रभाव : शिव का महामृंत्युजय मंत्र मृत्यु व काल को टालने वाला माना जाता है इसलिए शिवलिंग पर दूध मिला जल, धतूरा चढ़ाकर यह मंत्र हर रोज बोलना संकटमोचक होता है। यदि आपके घर का कोई सदस्य अस्पताल में भर्ती है या बहुत ज्यादा बीमार है तो नियमपूर्वक इस मंत्र का सहारा लें। बस शर्त यह है कि इसे जपने वाले को शुद्ध और पवित्र रहना जरूरी है अन्यथा यह मंत्र अपना असर छोड़ देता है।

सिद्धि और मोक्षदायी गायत्री मंत्र :


।।ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।।


अर्थ : उस प्राणस्वरूप, दुःखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा को हम अंत:करण में धारण करें। वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करे।
मंत्र प्रभाव : यह दुनिया का एकमात्र ऐसा मंत्र है, जो ईश्वर के प्रति, ईश्वर का साक्षी और ईश्वर के लिए है। यह मंत्रों का मंत्र सभी हिन्दू शास्त्रों में प्रथम और ‘महामंत्र’ कहा गया है। हर समस्या के लिए मात्र यह एक ही मंत्र कारगर है। बस शर्त यह है कि इसे जपने वाले को शुद्ध और पवित्र रहना जरूरी है अन्यथा यह मंत्र अपना असर छोड़ देता है।

समृद्धिदायक मंत्र :

ॐ गं गणपते नम:।


मंत्र प्रभाव : भगवान गणेश को विघ्नहर्ता माना गया है। सभी मांगलिक कार्यों की शुरुआत में श्री गणेशाय नम: मंत्र का उत्चारण किया जाता है। उक्त दोनों मंत्रों का गणेशजी को दूर्वा व चुटकीभर सिंदूर व घी चढ़ाकर कम से कम 108 बार जप करें। इससे जीवन में सभी तरह के शुभ और लाभ की शुरुआत होगी।

अचानक आए संकट से मुक्ति हेतु : कालिका का यह अचूक मंत्र है। इसे माता जल्द से सुन लेती हैं, लेकिन आपको इसके लिए सावधान रहने की जरूरत है। आजमाने के लिए मंत्र का इस्तेमाल न करें। यदि आप काली के भक्त हैं तो ही करें।

पहला : ॐ कालिके नम:।
दूसरा : ॐ ह्रीं श्रीं क्रीं परमेश्वरि कालिके स्वाहा।

मंत्र प्रभाव : इस मंत्र का प्रतिदिन 108 बार जाप करने से आर्थिक लाभ मिलता है। इससे धन संबंधित परेशानी दूर हो जाती है। माता काली की कृपा से सब काम संभव हो जाते हैं। 15 दिन में एक बार किसी भी मंगलवार या शुक्रवार के दिन काली माता को मीठा पान व मिठाई का भोग लगाते रहें।

दरिद्रतानाशक मंत्र :

ॐ ह्रीं ह्रीं श्री लक्ष्मी वासुदेवाय नम:।


मंत्र प्रभाव : इस मंत्र की 11 माला सुबह शुद्ध भावना से दीप जलाकर और धूप देकर जपने से धन, सुख, शांति प्राप्त होती है। खासकर धन के अभाव को दूर करने के लिए इस मंत्र का जप करना चाहिए।

भैरव मंत्र :
*ॐ भैरवाय नम:।
*’ॐ कालभैरवाय नम:।
*’ॐ भयहरणं च भैरव:।
*’ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाय कुरूकुरू बटुकाय ह्रीं।

  • ‘ॐ हं षं नं गं कं सं खं महाकाल भैरवाय नम:।
    *’ॐ भ्रां कालभैरवाय फट्‍।
    मंत्र प्रभाव : उक्त में से प्रथम नंबर का मंत्र जपें। रविवार एवं बुधवार को भैरव की उपासना का दिन माना गया है। कुत्ते को इस दिन मिष्ठान्न खिलाकर दूध पिलाना चाहिए। भैरव की पूजा में श्री बटुक भैरव अष्टोत्तर शत-नामावली का पाठ करना चाहिए। भैरव की प्रसन्नता के लिए श्री बटुक भैरव मूल मंत्र का पाठ करना शुभ होता है।

  • सुख-समृद्धि और सफलता देते हैं मंत्र जाप…
  • हर तरह की बुरी परिस्थितियों को दूर करने में सक्षम है मंत्रों का जाप

12 राशियों में 9 ग्रहों के विचरने से 108 प्रकार की शुभ-अशुभ स्थितियों का निर्माण होता है, जो हर मानव को प्रभावित करती हैं। हर व्यक्ति यह चाहता है कि उसके साथ सिर्फ अच्छी परिस्थितियां हों, पर बुरी परिस्थितियां भी आ जाती हैं और हर कोई मन-मसोसकर कहता है कि होनी को कौन टाल सकता है? पर बुरी परिस्थितियों को टाला जा सकता है या उसका प्रभाव इतना कम किया जा सकता है कि वे नाममात्र का नुकसान कर चली जाएं।
कलयुग में होने का एक ही फायदा है कि हम मंत्र जप कर बड़े-बड़े तप-अनुष्ठान का लाभ पा सकते हैं। मंत्र अगर गुरु ने दीक्षा देकर दिया हो तो और प्रभावी होता है। जिन्होंने मंत्र सिद्ध किया हुआ हो, ऐसे महापुरुषों द्वारा मिला हुआ मंत्र साधक को भी सिद्धावस्था में पहुंचाने में सक्षम होता है।

सद्गुरु से मिला हुआ मंत्र ‘सबीज मंत्र’ कहलाता है, क्योंकि उसमें परमेश्वर का अनुभव कराने वाली शक्ति निहित होती है। मंत्र जप से एक तरंग का निर्माण होता है, जो मन को उर्ध्वगामी बनाते हैं। जिस तरह पानी हमेशा नीचे की ओर बहता है उसी तरह मन हमेशा पतन की ओर बढ़ता है अगर उसे मंत्र जप की तरंग का बल न मिले।
कई लोग टीका-टिप्पणी करते हैं कि क्या हमें किसी से कुछ चाहिए, तो क्या उसका नाम बार-बार लेते हैं? पर वे नासमझ हैं और मंत्र की तरंग विज्ञान से अनजान हैं। मंत्र जाप का प्रभाव सूक्ष्म किंतु गहरा होता है।

जब लक्ष्मणजी ने मंत्र जप कर सीताजी की कुटीर के चारों तरफ भूमि पर एक रेखा खींच दी तो लंकाधिपति रावण तक उस लक्ष्मण रेखा को न लांघ सका। हालांकि रावण मायावी विद्याओं का जानकार था। किंतु ज्यों ही वह रेखा को लांघने की इच्छा करता, त्यों ही उसके सारे शरीर में जलन होने लगती थी।
मंत्र जप से पुराने संस्कार हटते जाते हैं, जापक में सौम्यता आती-जाती है और उसका आत्मिक बल बढ़ता जाता है। मंत्र जप से चित्त पावन होने लगता है। रक्त के कण पवित्र होने लगते हैं। दु:ख, चिंता, भय, शोक, रोग आदि निवृत्त होने लगते हैं। सुख-समृद्धि और सफलता की प्राप्ति में मदद मिलने लगती है।

जैसे ध्वनि तरंगें दूर-दूर तक जाती हैं, ऐसे ही नाद-जप की तरंगें हमारे अंतरमन में गहरे उतर जाती हैं तथा पिछले कई जन्मों के पाप मिटा देती हैं। इससे हमारे अंदर शक्ति-सामर्थ्य प्रकट होने लगता है और बुद्धि का विकास होने लगता है। अधिक मंत्र जप से दूरदर्शन, दूरश्रवण आदि सिद्धियां आने लगती हैं, किंतु साधक को चाहिए कि वह इन सिद्धियों के चक्कर में न पड़े, वरन अंतिम लक्ष्य परमात्मा-प्राप्ति में ही निरंतर संलग्न रहे।
मंत्र जापक को व्यक्तिगत जीवन में सफलता तथा सामाजिक जीवन में सम्मान मिलता है। मंत्र जप मानव के भीतर की सोई हुई चेतना को जगाकर उसकी महानता को प्रकट कर देता है। यहां तक कि जप से जीवात्मा ब्रह्म-परमात्म पद में पहुंचने की क्षमता भी विकसित कर लेता है।

इसलिए रोज किसी एक मंत्र का हो सके, उतना अधिक से अधिक जाप करने की अच्छी आदत अवश्य विकसित करें।

कोई मंत्र कब होता है सिद्ध, एक लाख बार जपने पर या कि 108 बार जपने पर ही सिद्ध हो जाता है? सिद्ध हो जाता है तब क्या होता है? यह तो सवाल आपके मन में जरूर होंगे तो चलो इस बारे में बताते हैं।
मुख्यत: 3 प्रकार के मंत्र होते हैं- 1.वैदिक 2.तांत्रिक और 3.शाबर मंत्र।..पहले तो आपको यह तय करना होगा कि आप किस तरह के मंत्र को जपने का संकल्प ले रहे हैं। साबर मंत्र बहुत जल्द सिद्ध होते हैं, तांत्रिक मंत्र में थोड़ा समय लगता है और वैदिक मंत्र थोड़ी देर से सिद्ध होते हैं। लेकिन जब वैदिक मंत्र सिद्ध हो जाते हैं और उनका असर कभी समाप्त नहीं होता है।

मंत्र जप तीन प्रकार हैं:- 1.वाचिक जप, 2. मानस जप और 3. उपाशु जप। वाचिक जप में ऊंचे स्वर में स्पष्ट शब्दों में मंत्र का उच्चारण किया जाता है। मानस जप का अर्थ मन ही मन जप करना। उपांशु जप का अर्थ जिसमें जप करने वाले की जीभ या ओष्ठ हिलते हुए दिखाई देते हैं लेकिन आवाज नहीं सुनाई देती। बिलकुल धीमी गति में जप करना ही उपांशु जप है।
मंत्र नियम : मंत्र-साधना में विशेष ध्यान देने वाली बात है- मंत्र का सही उच्चारण। दूसरी बात जिस मंत्र का जप अथवा अनुष्ठान करना है, उसका अर्घ्य पहले से लेना चाहिए। मंत्र सिद्धि के लिए आवश्यक है कि मंत्र को गुप्त रखा जाए। प्रतिदिन के जप से ही सिद्धि होती है। किसी विशिष्ट सिद्धि के लिए सूर्य अथवा चंद्रग्रहण के समय किसी भी नदी में खड़े होकर जप करना चाहिए। इसमें किया गया जप शीघ्र लाभदायक होता है। जप का दशांश हवन करना चाहिए और ब्राह्मणों या गरीबों को भोजन कराना चाहिए।

मन का तंत्र : मंत्र को सिद्ध करने के लिए पवित्रता और मंत्र के नियमों का पालन तो करना जरूरी ही है साध ही यह समझना भी जरूरी है कि मंत्र को सिद्ध करने का विज्ञान क्या है। मन को एक तंत्र में लाना ही मंत्र होता है। उदाहरणार्थ यदि आपके मन में एक साथ एक हजार विचार चल रहे हैं तो उन सभी को समाप्त करके मात्र एक विचार को ही स्थापित करना ही मंत्र का लक्ष्य होता है। यह लक्ष्य प्राप्त करने के बाद आपका दिमाग एक आयामी और सही दिशा में गति करने वाला होगा।

जब ऐसा हो जाता है तो कहते हैं कि मंत्र सिद्ध हो गया। ऐसा मंत्र को लगातार जपते रहने से होता है। यदि आपका ध्यान इधर, उधर भटक रहा है तो फिर मंत्र को सिद्ध होने में भी विलंब होगा। कहते हैं कि ‘करत-करत अभ्यास से जडमति होत सुजान। रसरी आवत-जात से सिल पर पड़त निसान॥’

इसी तरह लगातार जप का अभ्यास करते रहने से आपके चित्त में वह मंत्र इस कदर जम जाता है कि फिर नींद में भी वह चलता रहता है और अंतत: एक दिन वह मंत्र सिद्ध हो जाता है। दरअसल, मन जब मंत्र के अधीन हो जाता है तब वह सिद्ध होने लगता है। अब सवाल यह उठता है कि सिद्ध होने के बाद क्या होता है या कि उसका क्या लाभ?

मंत्र सिद्ध होने पर क्या होता है : मं‍त्र से किसी देवी या देवता को साधा जाता है, मंत्र से किसी भूत या पिशाच को भी साधा जाता है और मं‍त्र से किसी यक्षिणी और यक्ष को भी साधा जाता है। मंत्र जब सिद्ध हो जाता है तो उक्त मंत्र को मात्र तीन बार पढ़ने पर संबंधित मंत्र से जुड़े देवी, देवता या अन्य कोई आपकी मदद के लिए उपस्थित हो जाते हैं।
ऐसे भी कई मंत्र होते हैं जिनमें किसी बाधा को दूर करने की क्षमता होता है तो उन्हें जपने से वे बाधाएं दूर हो जाती है। ‘मंत्र साधना’ भौतिक बाधाओं का आध्यात्मिक उपचार है। यदि आपके जीवन में किसी भी प्रकार की समस्या या बाधा है तो उस समस्या को मंत्र जप के माध्यम से हल कर सकते हैं।

मंत्र के द्वारा हम खुद के मन या मस्तिष्क को बुरे विचारों से दूर रखकर उसे नए और अच्छे विचारों में बदल सकते हैं। लगातार अच्छी भावना और विचारों में रत रहने से जीवन में हो रही बुरी घटनाएं रुक जाती है और अच्छी घटनाएं होने लगती है। यदि आप सात्विक रूप से निश्चित समय और निश्चित स्थान पर बैठक मंत्र प्रतिदिन मंत्र का जप करते हैं तो आपके मन में आत्मविश्वास बढ़ता है साथ ही आपमें आशावादी दृष्टिकोण भी विकसित होता है जो कि जीवन के लिए जरूरी है।

अंत में मंत्र जिन्न के उस चिराग की तरह है जिसे रगड़ने पर उक्त मंत्र से जुड़े देवता सक्रिय हो जाते हैं। मंत्र एक प्रकार से मोबाइल के नंबरों की तरह कार्य करता है।

सभी हिन्दू शास्त्रों में लिखा है कि मंत्रों का मंत्र महामंत्र है गायत्री मंत्र। यह प्रथम इसलिए कि विश्व की प्रथम पुस्तक ऋग्वेद की शुरुआत ही इस मंत्र से होती है। माना जाता है कि भृगु ऋषि ने इस मंत्र की रचना की है।

यह मंत्र इस प्रकार है- ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।

गायत्री मंत्र का अर्थ : सृष्टिकर्ता प्रकाशमान परमात्मा के तेज का हम ध्यान करते हैं, वह परमात्मा का तेज हमारी बुद्धि को सन्मार्ग की ओर चलने के लिए प्रेरित करे।

दूसरा अर्थ : उस प्राणस्वरूप, दुःखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा को हम अंत:करण में धारण करें। वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करे।

तीसरा अर्थ : ॐ : सर्वरक्षक परमात्मा, भू : प्राणों से प्यारा, भुव : दुख विनाशक, स्व : सुखस्वरूप है, तत् : उस, सवितु : उत्पादक, प्रकाशक, प्रेरक, वरेण्य : वरने योग्य, भर्गो : शुद्ध विज्ञान स्वरूप का, देवस्य : देव के, धीमहि : हम ध्यान करें, धियो : बुद्धि को, यो : जो, न : हमारी, प्रचोदयात् : शुभ कार्यों में प्रेरित करें।

अर्थात : स्वामी विवेकानंद कहते हैं इस मंत्र के बारे में कि हमें उसकी महिमा का ध्यान करना चाहिए जिसने यह सृष्टि बनाई।

शास्त्रकारों ने गायत्री की सर्वोपरि शक्ति, स्थिति और उपयोगिता को एक स्वर से स्वीकार किया है। इस संदर्भ में पाए जाने वाले अगणित प्रमाणों में से कुछ नीचे प्रस्तुत हैं:-
सर्वेषां जपसूक्तानां ऋचांश्च यजुषां तथा।
साम्नां चौकक्षरादीनां गायत्री परमो जप:।। -वृहत् पाराशर स्मृति।
अर्थ : समस्त जप सूत्रों में समस्त वेद मंत्रों में, एकाक्षर बीज मंत्रों में गायत्री ही सर्वश्रेष्ठ है।
इति वेद पवित्राण्य भिहितानि एभ्य सावित्री विशिष्यते। -शंख स्मृति
अर्थ : यों सभी वेद के मंत्र पवित्र हैं, पर इन सब में गायत्री मंत्र सर्वश्रेष्ठ है।

सप्त कोटि महामंत्रा, गायत्री नायिका स्मृता।आदि देवा ह्मुपासन्ते गायत्री वेद मातरम्।। -कूर्म पुराण
अर्थ : गायत्री सर्वोपरि सेनानायक के समान है। देवता इसी की उपासना करते हैं। यही चारों वेदों की माता है।

तदित्पृचा समो नास्ति मंत्रों वेदचतुष्टये।
सर्ववेदाश्च यज्ञाश्च दानानि च तपांसि च।।
समानि कलपा प्राहुर्मुनयो न तदित्यृक्।। -याज्ञवल्क्यअर्थ : गायत्री के समान चारों वेदों में कोई मंत्र नहीं है। समस्त वेद, यज्ञ, दान, तप मिलकर भी एक कला के बराबर भी नहीं हो सकते, ऐसा ऋषियों ने कहा है-

दुर्लभा सर्वमंत्रेषु गायत्री प्रणवान्विता।
न गायत्र्यधिंक किचित् त्रयीषुपरिगीयते।। -हारीत
अर्थ : इस संसार में गायत्री के समान परम समर्थ और दुर्लभ मंत्र कोई नहीं है। वेदों में गायत्री से श्रेष्ठ कुछ और नहीं है।
नास्ति गंगा, समं तीर्थ, न देव: केशवात्पर:।
गायत्र्यास्तु परं जाप्यं न भूतं न भविष्यति। -अत्रि ऋषि
अर्थ : गंगा के समान कोई तीर्थ नहीं, केशव के समान कोई देवता नहीं और गायत्री से श्रेष्ठ कोई जप न कभी हुआ है और न कभी होगा।

गायत्री सर्वमंत्रणां शिरोमणिस्तथा स्थिता।विद्यानामपि तेनैतां साधने सर्वसिद्धये।।
त्रिव्याहृतियुतां देवीमोंकारयुगसम्पुटाम्।।
उपास्यचतुरो वर्गान्साधयेद्यो न सोsन्धधी:।।
देव्या द्विजत्वमासाद्य श्रेयसेsन्यरतास्तु ये।
ते रत्नानिवां‍छन्ति हित्वा चिंतामणि करात्। -महा वार्तिकअर्थ : गायत्री सब मंत्रों तथा सब विद्याओं में शिरोमणि है। उससे इंद्रियों की साधना होती है। जो व्यक्ति इस उपासना के द्वारा धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष इन चारों पदार्थों को प्राप्त करने से चूकते हैं, वे मंदबुद्धि हैं। जो द्विज गायत्री मंत्र के होते हुए भी अन्य मंत्रों की साधना करते हैं वे ऐसे ही हतभागी हैं, जैसे कि चिंतामणि को फेंककर छोटे-छोटे चमकीले पत्थर ढूंढने वाले हैं।
यथा कथं च जप्तैषा त्रिपदा परम पावनी।
सर्वकामप्रदा प्रोक्ता विधिना किं पुनर्नृय।।
अर्थ : हे राजन! जैसे-तैसे उपासना करने वाले की भी गायत्री माता कामना पूर्ण करती है, फिर विधिवत साधना करने के सत्परिणामों का तो कहना ही क्या?

कामान्दुग्धे विप्रकर्षत्वलक्ष्मी, पुण्यं सुते दुष्कृतं च हिनस्ति।शुद्धां शान्तां मातरं मंगलाना, धेनुं धीरां गायत्रीमंत्रमाहु:।। -वशिष्ठ
अर्थ : गायत्री कामधेनु के समान मनोकामनाओं को पूर्ण करती है, दुर्भाग्य, दरिद्रता आदि कष्टों को दूर करती है, पुण्य को बढ़ाती है, पाप का नाश करती है। ऐसी परम शुद्ध शांतिदायिनी, कल्याणकारिणी महाशक्ति को ऋषि लोग गायत्री कहते हैं।

प्राचीनकाल में महर्षियों ने बड़ी-बड़ी तपस्याएं और योग-साधनाएं करके अणिमा-महिमा आदि ऋद्धि-सिद्धियां प्राप्त की थीं। इनकी चमत्कारी शक्तियों के वर्णन से इतिहास-पुराण भरे पड़े हैं। वह तपस्या थी ‍इसलिए महर्षियों ने प्रत्येक भारतीय के लिए गायत्री की नित्य उपासना करने का निर्देश दिया था।
चत्वारिश्रंगा त्रयो अस्य पादा, द्वे शीर्षे सप्त हस्तासोsअस्य।
त्रिधा बद्धो वृषभो रोरवीति, महादेवो मर्त्यां अविवेश।। -यजुर्वेद 17/19
अर्थात : चार सींग वाला, तीन पैर वाला, दो सिर वाला, सात हाथों वाला, तीन जगह बंधा हुआ, यह गायत्री महामंत्ररूपी वृषभ जब दहाड़ता है, तब महान देव बन जाता है और अपने सेवक का कल्याण करता है।
चार सींग : चार वेद।
तीन पैर : आठ-आठ अक्षरों के तीन चरण।
दो सिर : ज्ञान और विज्ञान।
सात हाथ : सात व्याहृतियां जिनके द्वारा सात विभूतियां मिलती हैं।
तीन जगह बंधा हुआ : ज्ञान, कर्म, उपासना से।
अंत में : जब यह वृषभ दहाड़ता है, तब देवत्व की दिव्य परिस्थितियां उत्पन्न होती हैं जिसके सान्निध्य में रहकर सब कुछ पाया जा सकता है।
देवी भागवत पुराण के अश्वपति उपाख्यान में अनुदान का वर्णन इस प्रकार आता है-

तत: सावित्र्युपाख्यानं तन्मे व्याख्यातुमर्हसि।
पुरा केन समुद्‍भूता सा श्रुता च श्रुते: प्रसू:।।
केन वा पूजिता लोके प्रथमे कैश्च वा परे।।
ब्राह्मणा वेदजननी प्रथमे पूजिवा मुने।द्वितीये च वेदगणैस्तत्पश्चाद्विदुषां गणै:।।
तदा चाश्वपतिर्भूप: पूजयामास भारत।
तत्पश्चात्पूजयामासुवर्णाश्‍चत्वार एव च।। -देवी भागवत (सावित्री उपाख्‍यान)

नारदजी ने भगवान से पूछा- प्रख्‍यात हैं कि श्रुतियां गायत्री से उत्पन्न हुई हैं, कृपा करके उस गायत्री की उत्पत्ति बताइए।भगवान ने कहा- देव जननी गायत्री की उपासना सर्वप्रथम ब्रह्माजी ने की, फिर देवता उनकी आराधना करने लगे, फिर विद्वान, ज्ञानी-तपस्वी उसकी साधना करने लगे। राजा अश्वपति ने विशेष रूप से उसकी तपश्चर्या की और फिर तो चारों वर्ण (रंग) उस गायत्री की उपासना में तत्पर हो गए।

आप भी गायत्री मंत्र की शक्ति और शुभ प्रभाव से सफलता चाहते हैं, तो गायत्री मंत्र जप से जुड़े नियमों का ध्यान जरूर रखें-

  • गायत्री मंत्र के लिए स्नान के साथ मन और आचरण पवित्र रखें, किंतु सेहत ठीक न होने या अन्य किसी वजह से स्नान करना संभव न हो तो किसी गीले वस्त्रों से तन पोंछ लें।
  • साफ और सूती वस्त्र पहनें।
  • तुलसी या चंदन की माला का उपयोग करें।
  • पशु की खाल का आसन निषेध है। कुश या चटाई का आसन बिछाएं। * गायत्री मंत्र जप के लिए तीन समय बताए गए हैं। इन तीन समयों को संध्याकाल भी कहा जाता है। गायत्री मंत्र का जप का पहला समय है- प्रात:काल। सूर्योदय से थोड़ी देर पहले मंत्र जप शुरू किया जाना चाहिए। जप सूर्योदय के पश्चात तक करना चाहिए।
  • मंत्र जप के लिए दूसरा समय है- दोपहर मध्याह्न का। दोपहर में भी इस मंत्र का जप किया जाता है। इसके बाद तीसरा समय है- शाम को सूर्यास्त के कुछ देर पहले। मंत्र जप शुरू करके सूर्यास्त के कुछ देर बाद तक जप करना चाहिए। इन तीन समय के अतिरिक्त यदि गायत्री मंत्र का जप करना हो तो मौन रहकर या मानसिक रूप से जप करना चाहिए।
  • सुबह पूर्व दिशा की ओर मुख करके गायत्री मंत्र जप करें। शाम के समय सूर्यास्त के घंटे भर के अंदर जप पूरे करें। शाम को पश्चिम दिशा में मुख रखें।
  • इस मंत्र का मानसिक जप किसी भी समय किया जा सकता है।
  • गायत्री मंत्र जप करने वाले का खान-पान शुद्ध और पवित्र होना चाहिए।
  • शौच या किसी आकस्मिक काम के कारण जप में बाधा आने पर हाथ-पैर धोकर फिर से जप करें, बाकी मंत्र जप की संख्या को थोड़ी-थोड़ी पूरी करें। साथ ही एक से अधिक माला कर जप बाधा दोष का शमन करें।

जीवन में किसी भी प्रकार का दुख हो या भय इस मंत्र का जाप करने से दूर हो जाते हैं। किसी भी प्रकार का संकट हो या कोई भूत बाधा हो तो यह मंत्र जपते ही पल में ही दूर हो जाती है।
यदि आपको सिद्धियां प्राप्त करना हो या मोक्ष तो इस मंत्र का जाप करते रहने से यह इच्छा भी पूरी हो जाती है, लेकिन शर्त यह है कि इसके जाप के पहले व्यक्ति को द्विज बनना पड़ता है। हर तरह के व्यसन छोड़ना पड़ते हैं। मंत्र के अन्य लाभों को जानने के लिए प्रथम पेज पर दी गई लिंक पर क्लिक करें।

इन 13 मंत्रों में से कोई एक मंत्र रोज पढ़ें, सफलता के कीर्तिमान रचें

सुबह इन मंत्रों को पढ़ने से मिलती है मनचाही सफलता

अगर आप चाहते हैं हर दिन आपका शुभ और सफलतादायक हो तो बिस्तर से उठते ही अपने दोनों हाथों को आपस में रगड़ कर चेहरे पर लगाएं और दिए गए 13 मंत्रों में से किसी भी 1 मंत्र को बोलें। आपका दिन उन्नतिदायक और प्रसन्नतापूर्वक व्यतीत होगा।

1 . ॐ मंगलम् भगवान विष्णु: मंगलम् गरूड़ध्वज:।
मंगलम् पुण्डरीकांक्ष: मंगलाय तनो हरि।।
2 . कराग्रे वसते लक्ष्मी: कर मध्ये सरस्वती।
करमूले गोविन्दाय, प्रभाते कर दर्शनम्।

3 . गुरुर्ब्रह्मा, गुरुर्विष्णु, गुरुर्देवो महेश्वर:।
गुरु साक्षात् परब्रह्मा तस्मै श्री गुरुवे नम:

4 . करारविन्देन पदारविन्दं, मुखारविन्दे विनिवेशयन्तम्।
वटय पत्रस्य पुटेशयानं, बालं मुकुन्दं मनसा स्मरामि।।

  1. सी‍ताराम चरण कमलेभ्योनम: राधा-कृष्ण-चरण कमलेभ्योनम:।

6 . राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमै: सहस्त्रनाम तत्तुल्यं श्री रामनाम वरानने।

7 . माता रामो मम् पिता रामचन्द्र:
स्वामी रामो ममत्सखा सखा रामचन्द्र:
सर्वस्व में रामचन्द्रो दयालु नान्यं जाने नैव जाने न जाने।।1।।

  1. दक्षिणे लक्ष्मणो यस्त वामेच जनकात्मजा,
    पुरतोमारुतिर्यस्य तं वंदे रघुनंदम्।

9 . लोकाभिरामं रण रंग धीरं राजीव नेत्रम् रघुवंश नाथम्।
कारुण्य रूपम् करुणा करम् श्री रामचंद्रम शरणं प्रपद्ये।

  1. आपदा मम हरतारं दातारम् सर्व सम्पदाम्
    लोकाभिरामम् श्री रामम् भूयो भूयो नमाम्यहं।
  2. रामाय रामभद्राय रामचंद्राय वेधसे
    रघुनाथाय नाथाय सीतापतये नम:।
  3. श्री रामचंद्र चरणौ मनसास्मरासि,
    श्री रामचंद्र चरणौ वचसा गृणोमि।
    श्री रामचंद्र चरणौ शिरसा नमामि,
    श्री रामचंद्र चरणौ शरणम् प्रपद्धे:।।
  4. त्वमेव माता च पिता त्वमेव। त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव।
    त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव। त्वमेव सर्वम् ममदेव देव।

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Shanti Dayak Mantra

शांतिदायक मंत्र :

राम… राम… राम….


मंत्र प्रभाव : हनुमानजी भी राम नाम का ही जप करते रहते हैं। कहते हैं राम से भी बढ़कर श्रीराम का नाम है। इस मंत्र का निरंतर जप करते रहने से मन में शांति का प्रसार होता है, चिंताओं से छुटकारा मिलता है तथा दिमाग शांत रहता है। राम नाम के जप को सबसे उत्तम माना गया है। यह सभी तरह के नकारात्मक विचारों को समाप्त कर देता है और हृदय को निर्मल बनाकर भक्ति भाव का संचार करता है।

Be the first to comment - What do you think?  Posted by admin - at 5:31 pm

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Klesh Nashak Mantra

क्लेशनाशक मंत्र :

ॐ श्रीकृष्णाय शरणं मम।

या

कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने।

प्रणत क्लेशनाशाय गोविन्दाय नमो नम:॥


मंत्र प्रभाव : इस मंत्र का नित्य जप करने से कलह और क्लेशों का अंत होकर परिवार में खुशियां वापस लौट आती हैं। प्रतिदिन पहले मंत्र का जप तब करना चाहिए जबकि आप श्रीकृष्ण के अलावा अन्य किसी देवी या देवता में चित्त नहीं रमाते हो। कृष्ण की शरण में होने के बाद फिर किसी अन्य को नहीं भजना चाहिए।

Be the first to comment - What do you think?  Posted by admin - at 5:27 pm

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Bajrangbali Aarti in Hindi

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Be the first to comment - What do you think?  Posted by admin - March 17, 2019 at 11:34 am

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Bajarang Baan

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Be the first to comment - What do you think?  Posted by admin - at 11:28 am

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Sankatmochan Hanuman Ashtak

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Be the first to comment - What do you think?  Posted by admin - at 11:18 am

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Old Indian Maratha Weapons Names And Pictures

Swords.
Fighting knives and daggers.
Blunt staves.
Spears.
Polearms with axe-like blades.
Polearms with spikes and hammers.
Spears and javelins.
Throwing sticks.

Be the first to comment - What do you think?  Posted by admin - at 8:51 am

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Konkan Nivati God – Doongoba Dev

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Be the first to comment - What do you think?  Posted by admin - at 8:25 am

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Ayudha Pooja Invitation format

Be the first to comment - What do you think?  Posted by admin - March 12, 2019 at 5:04 pm

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