Shri Sarvottam Stotra meaning in Gujarati

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श्री सर्वोत्तम जी – गुजराती धौल

भले प्रकट्या श्री वल्लभदेव, श्री पुरुषोत्तम भूतल फरी जी।
नही प्राकृत धर्मनो लेश, अप्राकृत निज वपु धरी जी॥१॥

करे निगम निरूपण एम ते साकारनी स्तुति करी जी।
महा कलिकालदिक दोष, पंडित नी दृष्टि तिमीर भरी जी॥२॥

महिमा नव जाणे जेह, ते कहिये खरा सुर अरि जी।
वहाले दया करी मुख रूप, निज लीला प्रकट करी जी॥३॥

जेनी वाणी अति दुर्बोध, थाय सुबोध जेणे करी जी।
जेना अष्टोत्तर शत नाम, ते कहिये महा अघ हरी जी॥४॥

जेना ऋषिवर अग्निकुमार, जगती छंद नामे धरी जी।
श्री कृष्ण कमल मुख देव, बीज दृष्टी करुणा भरी जी॥५॥

जेनी भक्तिमां अंतराय, ते नाशनुं प्रयिजन सही जी।
आपे अधरामृतनी सिद्धि, ते मध्ये निश्चय करी जी॥६॥

ढाल

वहालो आनंद परमानंद कहेवाय, श्री कृष्ण कमल मुख कृपानिधि थाय॥७॥

वहालो दैवी उद्धारण प्रयत्न उपाय, जेना स्मरण मात्रथी आरती थाय ॥८॥

श्री भागवत गूढार्थ प्रकटाय, साकार ब्रह्मनो वाद स्थपाय॥९॥

वेद पारंग चौदह भुवन कहेवाय, मायावाद निराकृत सहु मली गाय॥१०॥

सर्व वादी निरास कीधा ते लखाय, भक्ति मार्ग सरस कमल विकसाय॥११॥

स्त्री शूद्रादिकने उद्धारवा समर्थ, जेना साधन बलथी न थाये अनर्थ॥१२॥

अंगीकार मात्रथी सर्व स्वकीये, कीधा श्रीगोपीजन पतिने प्रिये॥१३॥

अंगीकार करे मर्यादा अनुसार , महा करुणावंत समर्थ अपार॥१४॥

वहालो अदेय दान देवाने चतुर , महा उदार चरित्र करे बहुपुर॥१५॥

लीला देखाडी प्राकृतनी जेह , ते विषे मोह्या सुर रिपु तेह॥१६॥

वैश्वानर श्री वल्लभ छे नाम , वहालो सुन्दर रूप स्वजन हित काम॥१७॥

कृष्ण भक्ति करे जन शिक्षा काज, आपे अखिल इष्ट श्री वल्लभराज॥१८॥

सर्व लक्षण थी सम्पन्न विवेक, श्री कृष्ण ज्ञा्नदाता गुरु एक॥१९॥

पोताना आनंद थकी बहु पुष्ट, एना कमल पत्र सा नेत्र संतुष्ट॥२०॥

कृपा दृष्टि नो वृष्टि थी हरख्या मन, ते दास दासी प्रिय पतिने अनन्य॥२१॥

रोष दृष्टि करे भक्ति शत्रु प्रजाल, भक्त सेवंता सुख सेवा रसाल॥२२॥

एमनी भक्तो बिना नही सेवा साध्य, ते कारण थी कहिए दुराराध्य॥२३॥

जेना चरण सरोज दुर्लभ दरशाय, तेना उग्र प्रताप त्रैलोकमा कहेवाय॥२४॥

वचनामृत करी पूर्या सेवकना अर्थ, श्री भागवत अमृत मथन समर्थ॥२५॥

तेनो सार कहीए ब्रज सुंदरी नो भाव, ते परिपूर्ण छे देह भराव॥२६॥

सान्निध्य मात्र करे कृष्ण प्रेम, भक्ति मुक्ति देवानु एहने नेम॥२७॥

एक रासलीलामां तेमनुं तान, प्रभु कृपा करी ने करे कथानुं दान॥२८॥

वहालो विरहना अनुभवने हित काज, सर्व त्याग जणाव्यो श्री वल्लभराज॥२९॥

उपदेश कर्यो भक्तोमार्ग आचार, लोकमाहे जणाव्यो कर्ममार्ग प्रचार॥३०॥

वेद शास्त्र कह्यां यज्ञादिक दान, तेनु फल मर्यादा भक्ति निदान॥३१॥

प्रभु पूर्णनंद छे पूरण काम, सरस्वति ना पति देव ईश अभिराम ॥३२॥

वहाले सहस्त्र कह्यां पुरुषोत्तम नाम, निजजननो आश्रयनुं छे धाम॥३३॥

भक्तिमार्गनी रीत करवा उपदेश, बहु ग्रंथ करीने टाल्यो संशयनो लेश॥३४॥

जेने पामवाने छोड्या प्राणथी प्रिये, एवा भक्त समाज बिराजे श्रीये॥३५॥

आप साधन करे निज दासने काज, एवा समर्थ श्री वल्लभ महाराज॥३६॥

करवा भक्ति प्रचार भूतल माही, वंश कीधा पिता थईने ग्रही बांही॥३७॥

सर्व सामर्थ्य धर्युं पोताने वंश, गर्व दूर करी टाल्यो संशय नो अंश॥३८॥

प्रभु पतिव्रताना पति साक्षात, करे परलोक दान विख्यात॥३९॥

जेना अंतःकरण छे गूढ अपार, अंगीकृतने जणाव्यो मननो विचार॥४०॥

उपासनादिक मारग जे अन्य, तेनो मोह टाली ने कीधा सेवक अनन्य॥४१॥

कर्यो निश्चय जे भक्ति सर्वथी विशेष, कीधो शरण मार्गनो जुदो उपदेश॥४२॥

श्री कृष्णना मननी जाणे वात, लीला कुंज बिहारी परिपूरण गात॥४३॥

कथारस मग्न सद छे चित्त , विसर्यु सौ ते थकी बीजूं वित्त॥४४॥

प्रिय छे घणुं व्रज ने व्रज नो वास, करे पुष्टिलीला एकांत विलास॥४५॥

करे भक्त इच्छा परिपूरण दान, नही निज लीला नु कोई ने ज्ञान॥४६॥

अति मोहित जेनुं शील घणों, नहि लोक विषे आसक्ति अणुं॥४७॥

निज भक्त विषे आसक्ति छे एक, प्रभु पावन कीधा पतित अनेक॥४८॥

जे करे पोताना गुणनुं गान, तेना हृदय कमल रहेवानु स्थान ॥४९॥

निज यशरूपी अमृत लहरि, तेथी भीजवी सर्व रस वासना हरी॥५०॥

प्रभु पोते सर्व थकी छे पर, न करे तुल्यता कोई अवर॥५१॥

लीलारस अमृत तरंग बहु, भीज्व्या छे भक्त शरीर सहु ॥५२॥

रुचि आपे गिरि गोवर्धन वास, ते लीला मां छे अतिशय उल्लास॥५३॥

करे यज्ञ भोग ने यज्ञ कर्म, आपे अर्थ कामने मोक्ष धर्म॥५४॥

प्रभु सत्य वचन छे त्रिगुणातीत, नीति चतुराई छे अति अगणित॥५५॥

करवा पोतानी कीर्ति प्रकाश, कर्युं व्याससूत्रनुं नूतन भाष्य॥५६॥

अति तुच्छ तुल जे मायावाद, करि भस्माग्नि स्थाप्यो ब्रह्मवाद॥५७॥

अप्राकृत भूषणनी अति कांति, हसतां मुख शोभे छे बहु भांति॥५८॥

प्रभु त्रण लोकना भूषणसार, प्रकट्या धरणी नुं भाग्य अपार॥५९॥

प्रभु सुंदरता छे अतिरी अनूप, केम वर्णन करी सकूं ए स्वरूप॥६०॥

सौ मांगे छे पोताना जन, चरणारविंद नी रज जे धन॥६१॥

ए कह्या एकसोने आठे नाम, श्री वल्लभ आनंदनुं छे धाम ॥६२॥

||वलण ||

जे कोई श्रद्धा करी नित्य गाय रे, तेनु मन पहेलुं स्थिर थाय रे ॥६३॥

अधरामृतनी सिद्धि पामे रे, तेमा संशय नु नही नाम रे॥६४॥

ए पाम्या बिना मोक्ष छे हीन रे, तेना फलमां मुक्ति छे लीन रे॥६५॥

तेथी सर्वोत्तम जप करवो रे, श्री कृष्ण रसे मन भरवो रे॥६६॥

श्री विट्ठल उच्चरित ए नाम रे, जे कोई गाये पूरे तेना काम रे॥६७॥

तेनो जन्म सफल करी लेखे रे, ते श्री व्रजभूषणजीना सुख देखे रे॥६८॥

श्री सर्वोत्तम स्तोत्र मूल रूप में (संस्कृत) यहाँ पढें।

प्राकृत धर्मानाश्रयम प्राकृत निखिल धर्म रूपमिति ।
निगम प्रतिपाद्यमं यत्तच्छुद्धं साकृत सतौमि ॥१॥

कलिकाल तमश्छन्न दृष्टित्वा द्विदुषामपि ।
संप्रत्य विषयस्तस्य माहात्म्यं समभूदभुवि॥२॥

दयया निज माहात्म्यं करिष्यन्प्रकटं हरिः ।
वाण्या यदा तदा स्वास्यं प्रादुर्भूतं चकार हि ॥३॥

तदुक्तमपि दुर्बोधं सुबोधं स्याद्यथा तथा ।
तन्नामाष्टोरतरशतं प्रवक्ष्याम्यखिलाघहृत ॥४॥

ऋषिरग्नि कुमारस्तु नाम्नां छ्न्दो जगत्यसौ ।
श्री कृश्णास्यं देवता च बीजं कारुणिकः प्रभुः ॥५॥

विनियोगो भक्तियोग प्रतिबंध विनाशने ।
कृष्णाधरामृतास्वादसिद्धिरत्र न संशयः ॥६॥

आनंदः परमानंदः श्रीकृष्णस्यं कृपानिधिः ।
दैवोद्धारप्रयत्नात्मा स्मृतिमात्रार्तिनाशनः ॥७॥

श्री भागवत गूढार्थ प्रकाशन परायणः ।
साकार ब्रह्मवादैक स्थापको वेदपारगः ॥८॥

मायावाद निराकर्ता सर्ववाद निरासकृत ।
भक्तिमार्गाब्जमार्तण्डः स्त्रीशूद्राद्युदधृतिक्षमः ॥९॥

अंगीकृतयैव गोपीशवल्लभीकृतमानवः ।
अंगीकृतौ समर्यादो महाकारुणिको विभुः ॥१०॥

अदेयदानदक्षश्च महोदारचरित्रवान ।
प्राकृतानुकृतिव्याज मोहितासुर मानुषः ॥११॥

वैश्वानरो वल्लभाख्यः सद्रूपो हितकृत्सताम ।
जनशिक्षाकृते कृष्ण भक्तिकृन्न खिलेष्टदः ॥१२॥

सर्वलक्षण सम्पन्नः श्रीकृष्णज्ञानदो गुरुः ।
स्वानन्दतुन्दिलः पद्मदलायतविलोचनः ॥१३॥

कृपादृग्वृष्टिसंहृष्ट दासदासी प्रियः पतिः ।
रोषदृक्पात संप्लुष्टभक्तद्विड भक्त सेवितः ॥१४॥

सुखसेव्यो दुराराध्यो दुर्लभांध्रिसरोरुहः ।
उग्रप्रतापो वाक्सीधु पूरिता शेषसेवकः ॥१५॥

श्री भागवत पीयूष समुद्र मथनक्षमः ।
तत्सारभूत रासस्त्री भाव पूरित विग्रहः ॥१६॥

सान्निध्यम्मात्रदत्तश्रीकृष्णप्रेमा विमुक्तिदः ।
रासलीलैकतात्पर्यः कृपयैतत्कथाप्रदः ॥१७॥

विरहानुभवैकार्थसर्वत्यागोपदेशकः ।
भक्त्याचारोपदेष्टा च कर्ममार्गप्रवर्तकः॥१८॥

यागादौ भक्तिमार्गैक साधनत्वोपदेशकः ।
पूर्णानन्दः पूर्ण्कामो वाक्पतिर्विबुधेश्वरः ॥१९॥

कृष्णनामसहस्त्रस्य वक्ता भक्तपरायणः ।
भक्त्याचारोपदेशार्थ नानावाक्य निरूपकः ॥२०॥

स्वार्थो ज्झिताखिलप्राणप्रियस्तादृशवेष्टितः ।
स्वदासार्थ कृताशेष साधनः सर्वशक्तिधॄक ॥२१॥

भुवि भक्ति प्रचारैककृते स्वान्वयकृत्पिता ।
स्ववंशे स्थापिताशेष स्वमहात्म्यः स्मयापहः ॥२२॥

पतिव्रतापतिः पारलौकिकैहिक दानकृत ।
निगूढहृदयो नन्य भक्तेषु ज्ञापिताशयः ॥२३॥

उपासनादिमार्गाति मुग्ध मोह निवारकः ।
भक्तिमार्गे सर्वमार्ग वैलक्षण्यानुभूतिकृत ॥२४॥

पृथक्शरण मार्गोपदेष्टा श्रीकृष्णहार्दवित ।
प्रतिक्षण निकुंज स्थलीला रस सुपूरितः ॥२५॥

तत्कथाक्षिप्तचितस्त द्विस्मृतन्यो व्रजप्रियः ।
प्रियव्रजस्थितिः पुष्टिलीलाकर्ता रहः प्रियः ॥२६॥

भक्तेच्छापूरकः सर्वाज्ञात लीलोतिमोहनः।
सर्वासक्तो भक्तमात्रासक्तः पतितपावनः ॥२७॥

स्वयशोगानसंहऋष्ठऋदयाम्भोजविष्टरः ।
यशः पीयूष्लहरीप्लावितान्यरसः परः ॥२८॥

लीलामृतरसार्द्रार्द्रीकृताखिलशरीरभृत ।
गोवर्धनस्थित्युत्साहल्लीला प्रेमपूरितः ॥२९॥

यज्ञभोक्ता यज्ञकर्ता चतुर्वर्ग विशारदः ।
सत्यप्रतिज्ञस्त्रिगुणोतीतो नयविशारदः ॥३०॥

स्वकीर्तिवर्द्धनस्तत्व सूत्रभाष्यप्रदर्शकः ।
मायावादाख्यतूलाग्निर्ब्रह्मवादनिरूपकः ॥३१॥

अप्राकृताखिलाकल्प भूषितः सहजस्मितः ।
त्रिलोकीभूषणं भूमिभाग्यं सहजसुन्दरः ॥३२॥

अशेषभक्त संप्रार्थ्य चरणाब्ज रजोधनः ।
इत्यानंद निधेः प्रोक्तां नाम्नामष्टोत्तरं शतम ॥३३॥

श्रृद्धाविशुद्ध बुद्धिर्यः पठत्यनुदिनं जनः ।
स तदेकमनाः सिद्धिमुक्तां प्राप्नोत्यसंशयम ॥३४॥

तदप्राप्तौ वृथा मोक्ष स्तदप्तौतदगतार्थता ।
अतः सर्वोत्तमं स्तोत्रं जप्यं कृष्ण रसार्थिभिः ॥३५॥

॥ इति श्रीमदग्निकुमारप्रोक्तं श्री सर्वोत्तमस्तोत्रं सम्पूर्णम ॥

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