हिन्दू धर्म की महानता के 16 कारण…

‘कृण्वन्तो विश्वमार्यम’
अर्थात सारी दुनिया को श्रेष्ठ, सभ्य एवं सुसंस्कृत बनाएंगे।

जिस तरह वृक्षों में बरगद श्रेष्ठ है उसी तरह धर्मों में हिन्दू धर्म श्रेष्ठ है। आर्य का अर्थ होता है श्रेष्ठ, सज्जन पुरुष, उत्तम पुरुष, सत्य को जानने वाला पुरुष। सही मार्ग पर चलने वाला। अब सवाल यह उठता है कि आखिर हिन्दू धर्म सर्वश्रेष्ठ क्यों और कैसे है?
उक्त पांच रहस्यों को जानने
से पहले जानिए… हिन्दू धर्म की महानता के 16 कारण…

हिन्दू धर्म के संबंध में समाज में बहुत तरह की भ्रांतियां फैलाई गई है। यह भ्रांतियां सिर्फ उस व्यक्ति के मन में हैं जिसने वेद, उपनिषद और गीता का अध्ययन नहीं किया है और जो समाज में प्रचलित धारणा या सुनी-सुनाई बातों पर विश्वास करता है। यह भी कि जो स्थानीय परंपरा को ही हिन्दू धर्म का हिस्सा मान बैठा है। हम उन भ्रांतियों की निष्पत्ति की बात नहीं करेंगे बल्कि यह बताएंगे कि क्यों हिंदू धर्म सर्वश्रेष्ठ है।

कई मार्गों का जन्मदाता : दुनिया के सभी धर्म एकमार्गी हैं, लेकिन हिन्दू धर्म एकमात्र ऐसा धर्म है जिसने सत्य तक, खुद तक, मोक्ष तक या ईश्वर तक पहुंचने के लिए अनेक तरह के मार्गों का निर्माण किया। उसने राजपथ के अलावा कई तरह की छोटी-छोटी पगडंडियां भी बनाई, जिस पर चलकर मनुष्य सत्य तक पहुंच सकता है। व्यक्ति जिस मार्ग पर चलकर खुद को कंफर्ट महसूस करता है उसे उस मार्ग पर चलना चाहिए। इसी तरह हिन्दू धर्मग्रंथों में ध्यान की लगभग 450 से अधिक विधियां बताई गई है।

भक्ति मार्ग, कर्म मार्ग, सांख्य मार्ग, योग मार्ग, मूर्ति पूजा का मार्ग, एकेश्वरवादी मार्ग, सर्वेश्वरवादी मार्ग, देववादी, देवीवादी मार्ग, निराकार की प्रार्थना का मार्ग, ध्यान मार्ग, योग मार्ग मार्ग आदि सैंकड़ों तरह के आध्यात्मिक मार्गों के अलावा उसने बताया कि कोल, तंत्र, आयुर्वेद, ज्योतिष और नास्तिकता भी एक मार्ग हो सकता है। यही हिंदू धर्म की खूबी है कि वह नास्तिकता को भी आध्या‍त्म की राह की प्रथम सीढ़ी मानता है। लेकिन हिंदू धर्म उक्त सभी मार्गों में गीता में बताए गए मार्ग को ही प्राथमिकता देता है। गीता का मार्ग ही वेद का मार्ग है।

महान ईजाद : धर्म में कुछ ऐसी बातें समाहित होती है जिसे देख या जानकर हम कह सकते हैं कि यह धर्म है। इसके लिए कुछ नियम बनाए जाते हैं या कुछ ऐसे कार्य शुरू किए जाते हैं जिसके माध्यम से व्यक्ति धर्म से जुड़ सके। इसी क्रम में ऋषि मुनियों ने लोगों को प्रायश्चित करना, दीक्षा देना, 16 संस्कार, प्रार्थनालय बनाना बताया।  इसी तरह परिक्रमा करना, बिना सिले सफेद वस्त्र पहनकर संध्यावंदन करना, संध्यावंदन का समय नियुक्त करना, लोगों को संध्या के लिए बुलाना घंटी आदि बजाकर, प्रार्थना से पहले शौच-शुद्धि करना, जप-माला फेरना, व्रत-उपवास रखना, तीर्थ जाना, दान पुण्य करना, पाठ करना, सेवा करना, धर्म प्रचार करना आदि ऐसे सैंकड़ों कार्य हैं जिनका दूसरे धर्मों ने अनुसरण किया है। उक्त सभी कार्यों को हिंदू धर्म ने चार आश्रम की व्यवस्था में समेट दिया है।

महान संस्थापक : अक्सर यह कहा जाता है कि हिंदू धर्म का कोई स्थापक नहीं है। लेकिन इस सवाल का जवाब हमें वेद, उपनिषद और गीता में मिल जाता है। चूंकि आम हिंदूजन गीता नहीं पढ़ते इसलिए वे इस ज्ञान से अनभिज्ञ है। जो पढ़ते हैं वे भी ध्यान से नहीं पढ़ते इसलिए वे भी अनभिज्ञ हैं।

चार ऋषि ने सुने वेद…
अग्निवायुरविभ्यस्तु त्र्यं ब्रह्म सनातनम।
दुदोह यज्ञसिध्यर्थमृगयु: समलक्षणम्॥ -मनु (1/13)
जिस परमात्मा ने आदि सृष्टि में मनुष्यों को उत्पन्न कर अग्नि आदि चारों ऋषियों के द्वारा चारों वेद ब्रह्मा को प्राप्त कराए उस ब्रह्मा ने अग्नि, वायु, आदित्य और अंगिरा से ऋग, यजुः, साम और अथर्ववेद का ग्रहण किया।

संपूर्ण विश्व में पहले वैदिक धर्म ही था। फिर इस धर्म की दुर्गती होने लगी। लोगों और तथाकथित संतों ने मतभिन्नता को जन्म दिया और इस तरह एक ही धर्म के लोग कई जातियों व उप-जातियों में बंट गए। ये जातिवादी लोग ऐसे थे जो जो वेद, वेदांत और परमात्मा में कोई आस्था-विश्वास नहीं रखते थे। इसमें से एक वर्ग स्वयं को वैदिक धर्म का अनुयायी और आर्य कहता था तो दूसरा जादू-टोने में विश्वास रखने वाला और प्रकृति तत्वों की पूजा करने वाला था। दोनों ही वर्ग भ्रम और भटकाव में जी रहे थे क्योंकि असल में उनका वैदिक धर्म से कोई वास्ता नहीं था।

श्रीकृष्ण के काल में ऐसे 72 से अधिक अवैदिक समुदाय दुनिया में मौजूद थे। ऐसे में श्रीकृष्ण ने सभी को एक किया और फिर से वैदिक सनातन धर्म की स्थापना की। भगवान श्रीकृष्ण गीता में अर्जुन से कहते भी हैं कि यह परंपरा से प्राप्त ज्ञान पहले सूर्य ने वैवस्वत मनु से कहा फिर वैवस्वत मनु के बाद अन्यों ब्रह्मऋषियों से होता हुआ यह ब्रह्म ज्ञान मुझ तक आया।

*ब्रह्मा, विष्णु, महेश सहित अग्नि, आदित्य, वायु और अंगिरा ने इस धर्म की स्थापना की। क्रमश: कहे तो विष्णु से ब्रह्मा, ब्रह्मा से 11 रुद्र, 11 प्रजापतियों और स्वायंभुव मनु के माध्यम से इस धर्म की स्थापना हुई। इसके बाद इस धा‍र्मिक ज्ञान की शिव के सात शिष्यों से अलग-अलग शाखाओं का निर्माण हुआ। वेद और मनु सभी धर्मों का मूल है। मनु के बाद कई संदेशवाहक आते गए और इस ज्ञान को अपने-अपने तरीके से लोगों तक पहुंचाया। लगभग 90 हजार से भी अधिक वर्षों की परंपरा से यह ज्ञान श्रीकृष्ण और गौतम बुद्ध तक पहुंचा। यदि कोई पूछे- कौन है हिन्दू धर्म का संस्थापक तो कहना चाहिए ब्रह्मा है प्रथम और श्रीकृष्ण हैं अंतिम। ज्यादा ज्ञानी व्यक्ति को कहो…अग्नि, वायु, आदित्य और अंगिरा। यह किसी पदार्थ नहीं ऋषियों के नाम हैं।

  • आदि सृष्टि में अवान्तर प्रलय के पश्चात् ब्रह्मा के पुत्र स्वायम्भुव मनु ने धर्म का उपदेश दिया। मनु ने ब्रह्मा से शिक्षा पाकर भृगु, मरीचि आदि ऋषियों को वेद की शिक्षा दी। इस वाचिक परम्परा वर्णन का पर्याप्‍त भाग मनुस्मृति में यथार्थरूप में मिलता है।
  • शतपथ ब्राह्मण के अनुसार अग्नि, वायु एवं सूर्य ने तपस्या की और ऋग्वेद, यजुर्वेद एवं सामवेद को प्राप्त किया।
  • प्राचीनकाल में ऋग्वेद ही था फिर ऋग्‍वेद के बाद यजुर्वेद व सामवेद की शुरुआत हुई। बहुत काल तक यह तीन वेद ही थे। इन्हें वेदत्रयी कहा जाने लगा। मान्यता अनुसार इन तीनों के ज्ञान का संकलन भगवान राम के जन्‍म के पूर्व पुरुरवा ऋषि के समय में हुआ था।
  • अथर्ववेद के संबंध में मनुस्मृति के अनुसार- इसका ज्ञान सबसे पहले महर्षि अंगिरा को हुआ। बाद में अंगिरा द्वारा सुने गए अथर्ववेद का संकलन ऋषि‍ अथर्वा द्वारा कि‍या गया। इस तरह हिन्दू धर्म दो भागों में बंट गया एक वे जो ऋग्वेद को मानते थे और दूसरे वे जो अथर्ववेद को मानते थे। इस तरह चार किताबों का अवतरण हुआ।
  • कृष्ण के समय महर्षि पराशर के पुत्र कृष्ण द्वैपायन ने वेद को चार प्रभागों में संपादित किया। इन चारों प्रभागों की शिक्षा चार शिष्यों पैल, वैशम्पायन, जैमिनी और सुमन्तु को दी। उस क्रम में ऋग्वेद- पैल को, यजुर्वेद- वैशम्पायन को, सामवेद- जैमिनि को तथा अथर्ववेद- सुमन्तु को सौंपा गया। कृष्ण द्वैपायन को ही वेद व्यास कहा जाता है।
  • गीता में श्रीकृष्ण के माध्यम से परमेश्वर कहते हैं कि ‘मैंने इस अविनाशी ज्ञान को आदित्य से कहा, आदित्य ने अपने पुत्र वैवस्वत मनु से कहा और मनु ने अपने पुत्र राजा इक्ष्वाकु से कहा। इस प्रकार परंपरा से प्राप्त इस योग ज्ञान को राजर्षियों ने जाना।
  • परमेश्वर से प्राप्त यह ज्ञान ब्रह्मा ने 11 प्रजापतियों, 11 रुद्रों और अपने ही स्वरूप स्वयंभुव मनु और सतरूपा को दिया। स्वायम्भु मनु ने इस ज्ञान को अपने पुत्रों को दिया फिर क्रमश: स्वरोचिष, औत्तमी, तामस मनु, रैवत, चाक्षुष और फिर वैवश्वत मनु को यह ज्ञान परंपरा से मिला। अंत में यह ज्ञान गीता के रूप में भगवान कृष्ण को मिला। अभी वराह कल्प में सातवें मनु वैवस्वत मनु का मन्वन्तर चल रहा है।

*ऋग्वेद की ऋचाओं में लगभग 414 ऋषियों के नाम मिलते हैं जिनमें से लगभग 30 नाम महिला ऋषियों के हैं। इस तरह वेद सुनने और वेद संभालने वाले ऋषि और मनु ही हिन्दू धर्म के संस्थापक हैं।

ब्रह्मवाद : एकेश्वरवाद को ही ब्रह्मवाद कह सकते हैं, लेकिन यह इब्राहिमी धर्मों से बहुत कुछ अलग है। निश्चित ही हिन्दू धर्म के अनुसार ईश्वर एक ही है और कोई उसके जैसा दूसरा ईश्वर नहीं है। इस ईश्वर को ही परमेश्वर, परमात्मा और परम सत्य कहा जाता है। ब्रह्मा, विष्णु और महेश ईश्वर नहीं है। माता पार्वती के पति भगवान शंकर भी ईश्वर या परमेश्वर नहीं है।

हिन्दू धर्म के ब्रह्म, ईश्वर और भगवान शब्द के फर्क को समझना चाहिए। कोई भी भगवान ईश्वर नहीं होता। हां, उसे ईश्वर तुल्य या ईश्वर स्वरूप जरूर कहा गया है। हिन्दू धर्म में ब्रह्मवाद को समझना थोड़ा मुश्किल है। आम तौर पर ईश्वर को सृष्टिकर्ता और हमारा न्याय करने वाला माना गया है, लेकिन हिन्दू धर्मानुसार वह ऐसा कुछ नहीं करता। उसके होने मात्र से सृष्टि है और वह कर्ता-धर्ता नहीं है।

ईश्वर है और ईश्वर का होना उक्त दोनों वाक्यों में फर्क है। हिन्दू धर्मानुसार ईश्वर होना है। वह सूर्य के उस प्रकाश की तरह है जो जब प्रकाशित होता है तो किसी में भेद नहीं करता। उसकी प्रकाश की जद में जो भी आता है वह प्रकाशित हो जाता है। उसी तरह जो व्यक्ति ब्रह्म को मानता और जानता है वह किसी भी प्रकार से दुखी नहीं होता। हमें प्रयास करना चाहिए कि हम अंधेरे से निकलकर उस ‘ब्रह्म प्रकाश’ में आएं।

रहस्यमयी धर्म : स्वप्न, जाग्रत और सुषुप्ति पर कई तरह के शोध, सपनों के कई प्रकार बताए जिसमें भाविक अर्थात जो भविष्य में घटित होना है, उसे देखना महत्वपूर्ण है। चंद्र के घट बढ़ के साथ मनुष्य और प्रकृति में बदलाव को जाना, पूर्णिमा और अमावस्या के रहस्य को उजागर किया, भोजन से कैसे मन और भविष्य का निर्माण होता है इस रहस्य को बताया।

मन के पार भी एक अन्य मन होता है जिसे जानकर व्यक्ति कई चमत्कारिक शक्तियों का मालिक बन सकता है यह रहस्य उजागर किया। मन के भी तीन प्रकार हैं: चेतन मन, अवचेतन मन और अचेतन मन होते हैं। ध्यान करने और मौन रहने से क्या हो सकता है इसका रहस्य उजागर किया। यज्ञ से कैसे वर्षों को नियंत्रित किया जा सकता है और कैसे अधिक से अधिक ऑक्सिजन का निर्माण किया जा सकता है इस रहस्य को बताया।

उपरोक्त के अलावा नागलोक का रहस्य, पारसमणी, संजीवनी बूटी, कल्पवृक्ष, कामधेनु, यति, सोमरस, स्वर्ण बनाने की विधि, अमृत कलश, विशालकाय मानव, ब्रह्मास्त्र, सुदर्शन चक्र, इच्छामृत्यु, इच्‍छाधारी सर्प, वरदान, शाप, गरूढ़ जैसे वाहन, रावण के दस सिर, आत्मा का पुनर्जन्म, सृष्टि उत्पत्ति, सृष्टि चक्र, जीवन चक्र आदि ऐसे हजारों बाते हैं जो कि रहस्य से भरी हुई है। उक्त सभी का उल्लेख हिंदू वेद और पुराणों में मिलता है।

इसके अलवा कई रहस्यमयी विद्याओं का जिक्र है जिसमें सम्मोहन विद्या, किसी का आह्‍वान करना, प्राण विद्या, ज्योतिष, वास्तु, हस्तरेखा, सामुद्रीक शास्त्र, चौकी बांधना, तंत्र, मंत्र का जिक्र मिलता है। इसके इतर शमशान साधना, कर्णपिशाचनी साधना, वीर साधना, प्रेत साधना, अप्सरा साधना, परी साधना, यक्ष साधना और तंत्र साधनाओं के बारे में भी उल्लेख मिलता हैं।

इसके अलावा सिद्धियों के प्रकार और उन्हें प्राप्त करने की विधियों का उल्लेख भी धर्मशास्त्रों में मिलता है। जैसे दूसरे के मन की बात जान लेना, शरीर से बाहर निकलकर घूमना, किसी को भी वश में कर लेना, अंतर्ध्यान हो जाना, हाथी जैसा बल प्राप्त कर लेना, कई वर्षों तक अन्न जल गृहण न करके भी जिंदा रहना, अत्यधिक ठंडे या गर्म प्रदेश में भी जी लेना, हजारों किलोमीटर दूर से सुन या देख लेना, सूक्ष्म जगत को देख लेना, त्रिकाल सिद्ध, पुर्वजन्म की बात जान लेना, त्राटक शक्ति, परकाय प्रवेश करना, पशु पक्षियों की भाषा समझना आदि ऐसी हजारों सिद्धियों का वर्णन मिलता है।

दुनिया का प्रथम धर्म : ऋग्वेद दुनिया की प्रथम लिखित पुस्तक है जिसे ईसा पूर्व 1800 से 1500 ई.पू. के बीच लिखा गया था। हालांकि वेद हजारों वर्षों से वाचिक परंपरा से जीवित रहे हैं और जब लिखने का आविष्कार हुआ तब इसे लिखा गया। यह वह काल था जब अरब में पैगंबर इब्राहीम यहूदी धर्म की नींव रख रहे थे। उसके बाद लगभग 1300 ईसा पूर्व पैगंबर मूसा ने इसे एक स्थापित रूप दिया। वेबदुनिया के संदर्भ ग्रंथों और शोधानुसार उनसे भी पूर्व नूह हुए थे और सबसे प्रथम आदम हुए। शोधकर्ता यही मानते हैं कि मानव की उत्पत्ति भारत में हुई थी। प्रथम मानव स्वायंभुव मनु को माना जाता है।

भगवान श्रीराम का जन्म 5114 ईसा पूर्व हुआ था अर्थात आज से 7132 वर्ष पूर्व उनका जन्म हुआ था। उस काल में भी वेद प्रचलित थे। अनुमानित रूप से ब्रह्मा की 39वीं पीढ़ी में सूर्यवंशी भगवान राम का जन्म हुआ। इसका मतलब यह कि श्रीराम के जन्म के भी हजारों वर्ष पूर्व से यह धर्म चला आ रहा है। वेबदुनिया के संदर्भ ग्रंथ और शोधानुसार इसी तरह भगवान श्री कृष्ण का जन्म चन्द्रवंश में हुआ जिसमें ब्रह्मा की 7वीं पीढ़ी में राजा यदु हुए और राजा यदु की 59वीं पीढ़ी में भगवान कृष्ण हुए।

ब्रह्मा की छठी पीढ़ी में ययाति हुए। ययाति के प्रमुख 5 पुत्र थे- 1.पुरु, 2.यदु, 3.तुर्वस, 4.अनु और 5.द्रुहु। इन्हें वेदों में पंचनंद कहा गया है। वेबदुनिया के संदर्भ ग्रंथ और शोधानुसार 7,200 ईसा पूर्व अर्थात आज से 9,200 वर्ष पूर्व ययाति के इन पांचों पुत्रों का संपूर्ण धरती पर धरती पर राज था। पांचों पुत्रों ने अपने- अपने नाम से राजवंशों की स्थापना की। यदु से यादव, तुर्वसु से यवन, द्रुहु से भोज, अनु से मलेच्छ और पुरु से पौरव वंश की स्थापना हुई।

वेबदुनिया के संदर्भ ग्रंथ और शोधानुसार इसी तरह ब्रह्मा की चौथी पीढ़ी में वैवस्वत मनु हुए। वैवस्वत मनु के दस पुत्र थे- इल, इक्ष्वाकु, कुशनाम, अरिष्ट, धृष्ट, नरिष्यन्त, करुष, महाबली, शर्याति और पृषध। राम का जन्म इक्ष्वाकु के कुल में हुआ था। जैन धर्म के तीर्थंकर निमि भी इसी कुल के थे। इक्ष्वाकु कुल में कई महान प्रतापी राजा, ऋषि, अरिहंत और भगवान हुए हैं। इस वैवस्वत मनु को ही इब्राहिमी धर्म में नूह कहा जाता है। जिनके काल में जल प्रलय हुई थी। वैवस्वतमनु के दस पुत्रों में से एक का नाम इक्ष्वाकु था। इक्ष्वाकु ने अयोध्या को अपनी राजधानी बनाया और इस प्रकार इक्ष्वाकु कुल की स्थापना की।